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अध्याय 25 / 28

जाने की बात

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

रिकॉर्डर की आवाज़ ख़त्म हो चुकी थी, पर उसकी गूँज दीवारों में अब भी काँप रही थी, और देवयानी, जो अब तक हर कमरे की सबसे ताक़तवर आवाज़ हुआ करती थी, पहली बार अपनी ही मरी हुई बेटी के सामने गूँगी खड़ी रह गई।

अफ़ताब ने एक पल भी नहीं गँवाया, कोर्ट अधिकारी की तरफ़ मुड़े और सीधे भीतर के चैंबर की तरफ़ इशारा किया, जहाँ जज अभी-अभी दूसरी सुनवाई ख़त्म कर के निकली थीं।

"योर ऑनर अभी कोर्टरूम तीन में हैं। ये रिकॉर्डिंग, देवेंद्र जी की गवाही, और अभी जो यहाँ हुआ... इसे आज ही फ़ाइल में दर्ज होना है।" "और आपको भी अंदर चलना होगा। जो आपने देखा, वो अदालत को ख़ुद बताना होगा।"

अफ़सर ने सिर हिलाया, अब भी उस लम्हे से बाहर नहीं निकल पाई थी जब उसने देवयानी को बग़ल के गेट की तरफ़ बढ़ते देखा था, हाथ में अब भी वही पानी का गिलास थामे हुए।

अगले बीस मिनट में जो फ़ैसला हफ़्तों तक टलता रह सकता था, वो उसी धूल भरी, फ़ाइलों वाली गैलरी से निकल कर एक इमरजेंसी चैंबर हियरिंग की शक्ल में तय हो गया।

जज ने देवेंद्र की गवाही सुनी, मेहर की रिकॉर्डिंग सुनी, और कायरा के बग़ल के गेट तक पहुँचने की पूरी कहानी सुनी, और जब उन्होंने फ़ाइल बंद की, तो उनकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं बची थी। पिहू की अस्थायी हिफ़ाज़त पूरी तरह विहान के नाम, देवयानी की हर मुलाक़ात फ़िलहाल रुकी हुई, और पुलिस को हुक्म कि आज ही एक बच्ची को बग़ल के गेट से चुराने की कोशिश की तफ़्तीश शुरू हो।

एक सुरक्षा गार्ड देवयानी को उसी बग़ल के गेट से बाहर ले गया, जहाँ से वो पिहू को लेकर भागना चाहती थी, और इस बार वो ख़ुद उस गेट से गुज़री, बिना तलवार जैसी मुस्कान के, बिना एक लफ़्ज़ के।

गलियारे में अचानक इतनी जगह बन गई कि आख़िरकार सिर्फ़ महसूस करने के लिए बच गया, और नैना विहान की तरफ़ मुड़ी, आँखों में आँसू, आवाज़ में डर और राहत दोनों।

"ख़त्म हुआ, विहान... सच में ख़त्म हुआ?" "पिहू सुरक्षित है? असल में?"

"हाँ... पिहू सुरक्षित है।" "पर अभी नहीं, नैना। अभी बस एक जंग ख़त्म हुई है।"

कायरा और पिहू दौड़ती हुई नैना और विहान की टाँगों से आ लिपटीं, दोनों बड़ों के बीच सैंडविच बनी दो नन्ही जान।

"मम्मा, नानी अब कभी वापस नहीं आएंगी ना? मुझे नहीं ले जाएंगी?"

"मैंने कहा था ना, पिहू, मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।" "अब हम घर जा सकते हैं ना?"

"हाँ मेरी जान, अब हम घर चलते हैं। सब घर चलते हैं।"

कोर्ट की सीढ़ियों पर उतरते-उतरते अफ़ताब का चेहरा एक बार फिर वकील का चेहरा बन गया, वो मुस्कान जो एक जंग जीतने पर होती है, सिकुड़ कर एक झिझक में बदल गई।

"नैना जी, विहान... मुझे आपको कुछ बताना है, और मैं चाहता हूँ आप इसे ठंडे दिमाग़ से सुनें।" "पिहू की कस्टडी की लड़ाई आज लगभग ख़त्म हुई। पर कायरा की गोद लेने की अर्ज़ी... वो एक अलग अदालत में है, एक अलग जज के सामने।"

"मतलब? विहान की जीत का कायरा से क्या लेना-देना?"

"मतलब वो अदालत आज यहाँ जो हुआ, वो नहीं देखेगी। वो सिर्फ़ अपनी फ़ाइल देखेगी। आपकी फ़ाइल।" "एक अकेली, कर्ज़ में डूबी औरत, जिसे एक बार गोद लेने से इनकार किया जा चुका है, अब अचानक एक अरबपति की पत्नी है, जिसके नाम एक साल पुराना अनुबंध है, पैसा है, और एक तारीख़ है जो शादी से भी पहले की है।"

नैना का हाथ अपने आप विहान का हाथ ढूँढ बैठा, ठीक वैसे ही जैसे साल भर पहले उस पहले अदालती इनकार के दिन उसने ख़ुद को सम्भाला था, अकेले।

"पर वो अनुबंध अब सबूत नंबर एक बन कर वहीं दर्ज है, मेरी अदालत में। कोई भी उसे कायरा वाले जज तक ला सकता है।"

"ला सकता है, और लाएगा भी। जिस समाज-सेविका ने साल भर पहले नैना जी की अर्ज़ी ठुकराई थी, वो अब भी उस केस पर है। और उसे ये कहने में एक पल नहीं लगेगा कि एक ग़रीब औरत ने अपनी भांजी को पाने के लिए शादी ख़रीदी।"

"ख़रीदी हुई माँ..." "देवयानी ने यही कहा था मेरे लिए। और अब वही बात मेरे ख़िलाफ़ फिर खड़ी हो जाएगी, बस अदालत बदल जाएगी।"

"फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इस बार वो झूठ नहीं होगा, मैडम। काग़ज़ पर, ये शादी सच में एक सौदा हो कर शुरू हुई थी। और काग़ज़, अदालत के लिए, सबसे बड़ा सच होता है।"

"तो हम वो अनुबंध जला दें, फाड़ दें, ग़ायब कर दें, जो भी करना पड़े। मैं इसे नैना और कायरा के बीच नहीं आने दूँगा।"

"वो पहले ही अदालत के रिकॉर्ड में सील है, विहान। उसे मिटाया नहीं जा सकता, सिर्फ़ उसका मतलब बदला जा सकता है, और वो भी सही वक़्त पर, सही तरीक़े से।" "अभी नहीं। पहले हमें कायरा की सुनवाई की तारीख़ पता करनी होगी।"

कमरे में, गैलरी में, कहीं भी, एक ख़ामोशी उतर आई, वही पुराना डर, नए कपड़ों में, और नैना ने महसूस किया कि जिस लड़ाई को उसने जीता हुआ समझा था, वो सिर्फ़ अपनी शक्ल बदल कर एक नए दरवाज़े के पीछे इंतज़ार कर रही थी।

उस रात शीशे का घर सालों बाद पहली बार सच में एक घर जैसा लगा, काका ने रसोई से मिठाई की ख़ुशबू पूरे घर में फैला दी थी, और दोनों बहनें सोफ़े पर उछल-उछल कर पिहू के लौटने का जश्न मना रही थीं।

काका दरवाज़े पर खड़े दोनों बच्चियों को देखते रहे, आँखों में पानी लिए, और चुपचाप एक थाली में मिठाई सजा कर मेज़ पर रख दी, जैसे ये उनकी अपनी दुआ हो।

कायरा और पिहू ने खाने की मेज़ के नीचे एक-दूसरे को कोहनी मारी, वही पुरानी शरारती नज़र जो उनकी हर गुप्त कसम से पहले आती थी।

"देखा, कायरा? हमारी कसम सच हुई! मम्मा-पापा की शादी सच्ची है!"

"मैंने कहा था ना, बड़ों को थोड़ा वक़्त लगता है। हम बच्चे जल्दी समझ जाते हैं।"

नैना उन दोनों को देखती रही और एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, दिन भर का हर डर भूल गई।

"तुम आज पूरे दिन इतनी मज़बूत रहीं, नैना। हर बार जब मैं टूटने वाला था, तुमने मुझे थाम लिया।"

"तुमने भी तो यही किया, विहान। शायद हम दोनों बस एक-दूसरे को गिरने से बचाते रहे हैं, महीनों से।"

देर रात तक घर हँसी और मिठाई की ख़ुशबू में डूबा रहा, दो बच्चियाँ आख़िरकार थक कर एक ही बिस्तर पर सो गईं, हाथ में हाथ डाले, ठीक वैसे ही जैसे उनकी पहली साथ वाली रात में सोई थीं।

पर नैना, बालकनी के दरवाज़े के पास खड़ी, अब भी अफ़ताब के लफ़्ज़ों को दोहरा रही थी, ख़रीदी हुई माँ, अलग अदालत, अलग जज, और उसके अंदर कुछ सख़्त होने लगा था, कुछ जो फ़ैसला बनने की तैयारी में था।

रात के उस पहर, जब पूरा घर सो चुका था, नैना अकेली बालकनी में जा खड़ी हुई, बेंगलुरु की रौशनियों की तरफ़ देखते हुए, अपने अंदर उस फ़ैसले को शक्ल लेते महसूस करते हुए जो उसे डरा भी रहा था और साफ़ भी दिख रहा था।

विहान भी नींद ना आने पर उठ आया था, और बालकनी के दरवाज़े पर एक पल रुक कर उसे यूँ खड़ी देखा, जैसे कोई भारी बात उठाने से पहले हिम्मत बटोर रही हो।

"तुम यहाँ अकेली क्या सोच रही हो, नैना? इतनी रात को?"

"कायरा की अर्ज़ी के बारे में सोच रही थी, विहान। और उस अदालत के बारे में, जो सिर्फ़ काग़ज़ देखेगी।"

"अफ़ताब कोई रास्ता निकाल लेंगे। वो हमेशा निकालते हैं।"

"पिछली बार जब एक अदालत ने मुझसे कायरा छीनने की सोची थी, विहान, मेरे पास लड़ने के लिए कुछ नहीं था, सिर्फ़ प्यार था, और प्यार वहाँ कुछ गिनती में नहीं आया।" "इस बार मेरे पास तुम हो। और शायद यही सबसे बड़ा ख़तरा है।"

"शायद इस बार रास्ता वो नहीं है, विहान।" "मैंने सोचा है... अगर मैं और तुम, अभी, इस अदालत की नज़रों से थोड़ा दूर हट जाएँ... कायरा की अर्ज़ी बिना किसी शक के, साफ़ निकल सकती है।"

"दूर हट जाएँ... इसका मतलब क्या है, नैना?"

नैना ने एक गहरी साँस ली, वो साँस जो किसी दरवाज़े को धीरे से बंद करने से पहले ली जाती है।

"शायद मुझे कुछ वक़्त के लिए यहाँ से चली जानी चाहिए, विहान। कोई दूसरे शहर की नौकरी ले लूँ, कुछ महीनों के लिए... ताकि जब कायरा का फ़ैसला आए, कोई ये ना कह सके कि उसकी माँ ने एक अरबपति के घर में बैठ कर उसे ख़रीदा।"

और वो लफ़्ज़ हवा में यूँ उतरे जैसे कोई दरवाज़ा धीरे से, पर पूरी तरह, बंद हो रहा हो, ना कोई चीख़, ना कोई शोर, बस एक ठंडी, आख़िरी सी दस्तक, और विहान वहीं खड़ा रह गया, यक़ीन ना कर पाते हुए कि जिस औरत को उसने आज दुनिया के सामने चुना था, वो आज रात ख़ुद उससे दूर जाने की बात कह रही थी।

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