Chapter 13 of 28
घर का इम्तिहान
देवयानी नई बहू को परखने के बहाने पूरे ख़ानदान को शीशे के घर में जमा कर लेती है, और ठीक उसी भरे फंक्शन के बीच बाल-कल्याण अफ़सर बिना बताए घर की जाँच करने आ पहुँचती है। दो नन्ही बच्चियाँ पहले सच उगलते-उगलते बचती हैं, फिर उसे प्यार में बदल कर बचा लेती हैं, और एक धीमे संगीत पर मजबूरन नाचते नैना और विहान का तीन महीने पुराना अभिनय पहली बार सच में पिघल जाता है। जब दोनों भीड़ से छुप कर एक कमरे में सच में एक हो जाते हैं, ठीक उसी पल देवयानी अफ़सर को पीछे खड़ा किए दरवाज़ा खोल देती है।
सुबह की पहली रोशनी के साथ ही शीशे का घर अपना नहीं रहा था। मालाओं के ट्रक, हलवाई की भट्टियाँ, सजावट वालों की सीढ़ियाँ, सब देवयानी के एक इशारे पर घर के भीतर उतर आए थे। और घर की मालकिन की जगह, आज दरवाज़े पर खड़ी हुक्म चला रही थीं वो औरत, जिसने ये पूरा जमावड़ा 'नई बहू को ख़ानदान से मिलवाने' के नाम पर रचा था।
और शहर की सबसे बड़ी वेडिंग प्लानर नैना आज अपने ही घर में वो फंक्शन देख रही थी जो उसने नहीं, उसकी दुश्मन ने सजाया था, और हर गेंदे के फूल के पीछे एक जाल था।
"नैना बेटा, इधर आओ ज़रा।" "ये घर बारह बरस से किसी दुल्हन का मुँह देखने को तरस रहा था। आज पूरा ख़ानदान आ रहा है। सबको देखना है कि मेरी मेहर की जगह इस घर में आख़िर आई कौन है।" "तुम्हें कोई एतराज़ तो नहीं? आख़िर... छुपाने को तो कुछ नहीं है ना तुम्हारे पास?"
"एतराज़ किस बात का, मम्मी जी?" "आपने इतने प्यार से घर सजाया है। बस आज मैं मेहमान हूँ, प्लानर नहीं।" "आज तो बस... एक अच्छी बहू का किरदार निभाना है।"
पर पिछली रात, उस अँधेरे बगीचे में, जहाँ कोई कैमरा नहीं पहुँचता था, नैना और विहान ने पहली बार एक-दूसरे से पूरा सच बोला था। और आज सुबह, उसी सच की नमी अभी दोनों की आँखों में बाक़ी थी, जब देवयानी की भीड़ ने उन्हें फिर उसी अभिनय के मंच पर धकेल दिया।
"तुम ठीक हो?" "कल रात के बाद, और आज ये पूरा तमाशा। मुझे माफ़ करना, नैना। मैंने माँ जी को मना किया था, पर वो कहाँ रुकने वाली थीं।"
"तुमने मना किया, यही बहुत है।" "और वैसे भी, अपनी ही नक़ली शादी का फंक्शन संभालना, ये तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है। बस आज एक फ़र्क़ है, विहान।" "आज जो हाथ मैं थामूँगी, वो सच में थामने का मन कर रहा है। और यही सबसे ख़तरनाक बात है।"
और इसी हँसते घर में दो आँखें ऐसी थीं जिन्हें ये दोनों भूल नहीं सकते थे। एक, ताक़ पर रखी घड़ी के भीतर छुपा देवयानी का कैमरा, जो अब भी हर लम्हा रिकॉर्ड कर रहा था। और दूसरी, दीवार के पार वो लंबी लेंस, जिसका मालिक रुस्तम आज भीड़ में एक फ़ोटोग्राफ़र बन कर घुसने की ताक में था।
ऊपर के कमरे में, इस पूरे तमाशे की दो सबसे नन्ही षड्यंत्रकारी अपनी अलग तैयारी में जुटी थीं। कायरा और पिहू, दोनों नई फ्रॉक पहने, और दोनों के बीच में वही काग़ज़ का फूल, जिस पर इस घर के सबसे सच्चे वादे लिखे जा चुके थे।
"कायरा दीदी, आज सब लोग आ रहे हैं ना? तो आज हम अपना वाला प्लान करेंगे।" "टीवी में ऐसे ही होता है। जब गाना बजता है, तो मम्मा और पापा साथ में डांस करते हैं, और फिर... उनकी सच्ची वाली शादी हो जाती है!"
"पिहू, चुप। इतनी ज़ोर से नहीं।" "ये सीक्रेट मिशन है। किसी को पता नहीं चलना चाहिए, ख़ास कर के नानी को।" "हमने इस फूल पर कसम खाई थी ना? तो आज जब गाना बजेगा, तू पापा का हाथ पकड़ के मम्मा के पास ले जाएगी। बाक़ी मैं संभालूँगी।"
"पक्का प्रॉमिस। इस फूल की कसम।" "पर दीदी... अगर नानी ने देख लिया तो? नानी को तो पता है ना कि मम्मा दूर वाले कमरे में सोती है। मैंने ही तो बताया था उस दिन फ़ोन पे..."
"वो पुरानी बात है, पिहू। अब वैसा नहीं है।" "अब मम्मा और पापा एक-दूसरे को सच में देखने लगे हैं। मैंने कल रात देखा था, बगीचे में। बस उन्हें ख़ुद अभी पता नहीं चला।" "बड़े लोग ना, सबसे आख़िर में समझते हैं।"
और यही इस घर का सबसे बड़ा मज़ाक़ था, और सबसे बड़ा सच भी। कि जिस प्यार को दो बड़े अपने-अपने डर के पीछे छुपाए बैठे थे, उसे दो नन्ही बच्चियाँ कब का पहचान चुकी थीं, और अब उसे सच कर देने पर तुली थीं।
दोपहर होते-होते घर भर गया, विहान की मौसियाँ, मामे, और देवयानी का पूरा कुनबा, जो 'नई बहू' को किसी नुमाइश की तरह परखने आया था। एक कोने में मेहर के पिता देवेंद्र चुपचाप बैठे थे, आँखों में थकी हुई बेचैनी लिए। और देवयानी के पीछे चलती वो सजी-धजी अनाइशा, जिसे वो हमेशा से विहान के लिए 'सही' मानती आई थीं।
नैना हर रिश्तेदार के सवाल का जवाब मुस्कुरा कर देती रही। शादी कैसे हुई, इतनी जल्दी क्यों हुई, हर सवाल एक कँटीली तार था, और वो हर तार पर से हँसती हुई गुज़रती रही। पर देवयानी की आँखें उसका पीछा कर रही थीं, बस एक ही दरार की तलाश में।
"अरे, प्रेम-विवाह है जी, प्रेम-विवाह।" "तीन हफ़्ते में मिले, और शादी कर ली। आजकल के बच्चे... दिल की सुनते हैं।" "अच्छा पिहू बेटा, इधर आ मेरी लाडो। नानी को बता, रात को कहानी कौन सुनाता है तुझे? मम्मा और पापा, दोनों साथ में? एक ही कमरे में?"
और पूरा कमरा, बिना जाने, एक पाँच साल की बच्ची की तरफ़ झुक गया। नैना का दिल एक पल को रुक गया, क्योंकि इसी सवाल का सच्चा जवाब, वो अलग कमरे, पूरी शादी को झूठा साबित कर सकता था। और पिहू को झूठ बोलना आता ही नहीं था।
"कहानी तो..." "पहले पापा अकेले सुनाते थे, अपने कमरे में। और मम्मा दूर वाले कमरे में..."
देवयानी की मुस्कान चौड़ी हो गई। भीड़ के पीछे से रुस्तम का कैमरा हल्का-सा हिला। नैना का हाथ मेज़ के किनारे पर जम गया। बस एक लफ़्ज़ और, और सब कुछ बिखर जाता।
"...पर अब ना, अब हम सब साथ सोते हैं! कायरा दीदी, मैं, और बीच में मम्मा-पापा।" "कल रात भी मम्मा ने हमें एक साथ कहानी सुनाई, और पापा ने लाइट बंद की। नानी, मेरी नई मम्मा दुनिया की सबसे अच्छी मम्मा है!"
"नानी, पापा का कमरा और मम्मा का कमरा साथ-साथ हैं। बीच में बस एक दरवाज़ा है।" "बड़े लोगों के घर में ऐसे ही होता है ना। आपके घर में भी नाना और आप अलग-अलग कमरे में नहीं सोते क्या?"
और पूरा कमरा हँस पड़ा, यहाँ तक कि कोने में बैठे देवेंद्र के होंठ भी काँपे। छह साल की एक बच्ची ने अपने सीधे सवाल से देवयानी का जाल उसी के मुँह पर पलट दिया था। देवयानी की मुस्कान चेहरे पर जमी रह गई, पर आँखें बर्फ़ हो गईं।
"होशियार बच्ची है।" "पर बच्चे तो सिखाए हुए बोल भी बोल लेते हैं, नैना। असली इम्तिहान बच्चों का नहीं होता।" "असली इम्तिहान तो तब होता है, जब उसे लेने वाला कोई और आता है।"
और मानो उसके ये लफ़्ज़ किसी को बुला लाए हों, गेट पर एक सादी सफ़ेद कार आ कर रुकी। काका दौड़े-दौड़े अंदर आए, चेहरे पर वही घबराहट जो पिछली सुबह उस लिफ़ाफ़े वाले आदमी को देख कर थी।
काका ने विहान के कान में जो कहा, उससे उसके चेहरे का रंग उड़ गया। अदालत से बाल-कल्याण विभाग की अफ़सर आई थीं, घर की जाँच के लिए, बिना बताए। वही, जिसका डर उस लिफ़ाफ़े में लिखा था, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी घड़ी। और वो सबसे बुरी घड़ी आज आ पहुँची थी।
अब मंच पर तीन इम्तिहान एक साथ खड़े थे। एक तरफ़ परखता ख़ानदान, दूसरी तरफ़ दरार ढूँढती देवयानी, और बीच में वो अजनबी अफ़सर, जिसकी एक रिपोर्ट तय करेगी कि दो नन्ही बच्चियाँ इस घर में रहेंगी या नहीं। और दोनों के पास रिहर्सल का एक पल भी नहीं था।
"विहान, सुनो। घबराना मत।" "ये मेरा मैदान है। मैं दिन में दस झूठी शादियों को सच बना देती हूँ। बस मेरे साथ रहो, मेरी आँखों में देखते रहो, बाक़ी सब मुझ पर छोड़ दो।" "आज हमें सबसे मुश्किल क्लाइंट को यक़ीन दिलाना है। ख़ुद को।"
वो अफ़सर, एक शांत, तेज़ नज़र वाली औरत, कोने में जा बैठी, बिना कुछ बोले सब देखती हुई। एक फ़ाइल, एक कलम, और वो सधी हुई ख़ामोशी जो हर हँसी के पीछे का सच तौल रही थी। और देवयानी को इससे बेहतर मौक़ा मिल ही नहीं सकता था।
"अरे, इतना सन्नाटा क्यों है भई! ख़ुशी का मौक़ा है!" "संगीत बजाओ! और हमारे नए जोड़े को नाचने दो। नैना, विहान, चलो। ख़ानदान देखना चाहता है कि तुम दोनों में कितना प्यार है।" "या फिर... कोई बात है जो तुम दिखा नहीं सकते?"
और अब कोई रास्ता नहीं था, मना करना ही सबसे बड़ी दरार होती। पूरे ख़ानदान, तौलती अफ़सर, और छुपे कैमरे के सामने, नैना और विहान को अब वही करना था जिससे दोनों सबसे ज़्यादा डरते थे, एक-दूसरे को छूना, और उस छूने को सच बना देना।
धीमा संगीत बजा। मेहमान किनारों पर हट गए, और घेरे के बीचोंबीच बस वो दो खड़े रह गए। नैना ने विहान की तरफ़ हाथ बढ़ाया, वही हाथ जो कल रात एक इंच पहले ठिठक गया था।
"हाथ यहाँ रखो। मेरी कमर पर।" "और मेरी आँखों में देखो, इधर-उधर नहीं। मैं ऐसे ही तो दूल्हों को सिखाती हूँ।" "बस... आज सिखाने वाली ख़ुद भूल रही है कि ये अभिनय है।"
"नैना..." "मुझे नाचना नहीं आता। मेहर के बाद मैंने किसी का हाथ नहीं थामा। पाँच साल हो गए।" "पर आज, अगर तुम्हारा हाथ है, तो शायद... मैं सीख जाऊँ।"
और फिर वो हुआ जो किसी स्क्रिप्ट में नहीं लिखा था। दोनों नाचने लगे, धीरे-धीरे, और वो दूरी जो अभिनय के लिए बनाई गई थी, एक-एक क़दम के साथ पिघलने लगी। कल रात का बगीचा, वो अधूरा इंच, वो 'तुम' जो अँधेरे में गिरा था, सब इस एक धुन में उतर आया। अब वो दुनिया को कुछ नहीं दिखा रहे थे, बस नाच रहे थे।
"विहान, एक बात बताऊँ?" "मैं सैकड़ों दुल्हनों से कहती आई हूँ कि जब सही इंसान का हाथ थामोगी, तो पैर अपने आप चलेंगे।" "मुझे ख़ुद इस पर यक़ीन नहीं था। आज... पहली बार, हो रहा है।"
"तो शायद तुम जो बेचती आई हो, वो झूठ नहीं था।" "शायद बस अब तक तुम्हें सही हाथ नहीं मिला था।"
और उस एक पल में दोनों वो सब भूल गए जो उन्हें कभी नहीं भूलना था, ख़ानदान, तौलती अफ़सर, घड़ी में छुपा कैमरा। और भीड़ के पीछे से रुस्तम के लेंस ने ठीक उसी लम्हे की तस्वीर खींच ली जो सबसे कम नक़ली था। जिसे झूठा साबित करने वो रखा गया था, उसी की सबसे सच्ची तस्वीर उसने अपने ही हाथों खींच ली।
गाना ख़त्म हुआ। तालियाँ बजीं। पर वो दोनों एक-दूसरे से हटे नहीं, बस खड़े रहे, साँसें उखड़ी हुई, आँखें एक-दूसरे में गड़ी हुई, जैसे उस कमरे में और कोई था ही नहीं। और यही वो पल था जब देवयानी की आँखें और भी सिकुड़ गईं, क्योंकि जिसे उसने नाटक समझा था, वो ख़तरनाक हद तक सच लग रहा था।
भीड़ और उन ताकती आँखों से घबराए, नैना और विहान एक-दूसरे का हाथ थामे चुपके से उस हॉल से निकल कर साथ वाले पढ़ने के कमरे में आ गए, जहाँ कोई भीड़ नहीं थी, कोई कैमरा नहीं था, बस वो दो थे और एक बंद दरवाज़ा।
"विहान, हमें... हमें रुकना चाहिए। बाहर सब..." "बाहर वो अफ़सर है, पूरा ख़ानदान है, और मैं... मैं साफ़ सोच ही नहीं पा रही।"
"मैं भी नहीं, नैना।" "वहाँ, उस डांस में, मैं भूल गया कि हम किसके लिए नाच रहे थे। मुझे लगा हम... सिर्फ़ अपने लिए नाच रहे थे।" "और मैं पाँच साल से किसी बात से इतना नहीं डरा, जितना अभी इस बात से डर रहा हूँ कि... ये सच है।"
और वो आख़िरी इंच, जो कल रात बगीचे में अनछुआ रह गया था, जो हफ़्तों से एक साँस भर की दूरी पर ठिठका था, आज मिट गया। नैना का चेहरा ऊपर उठा, विहान झुका, और इस बार कोई अभिनय नहीं था। कोई अधिकारी नहीं, कोई कैमरा नहीं, कोई दिखावा नहीं।
उनके होंठ मिले, और एक पल को पूरी दुनिया थम गई। ये वो नक़ली गुड नाइट किस नहीं था जो कभी दहलीज़ पर ठिठक कर रह गया था। ये सच था। तीन महीने की काग़ज़ी कसमों के नीचे दबा एक सच, जो अब बाहर आ कर पहली बार साँस ले रहा था। एक लंबे, गहरे पल के लिए, वो काग़ज़ी कसमें असली हो गईं।
और ठीक उसी पल, ठीक उस एक साँस पर जब सब कुछ पहली बार सच था, कमरे का दरवाज़ा एक झटके से खुला। दहलीज़ पर देवयानी खड़ी थी, हाथ अभी भी हैंडल पर, और उसके ठीक पीछे, वो बाल-कल्याण अफ़सर, अपनी फ़ाइल थामे।
"वाह।" "क्या बात है। अफ़सर साहिबा, आइए, देखिए ज़रा। ये है वो 'सच्ची' शादी।" "इतना बढ़िया अभिनय तो मैंने आज तक किसी स्टेज पर नहीं देखा। और ठीक उसी वक़्त, जब जाँच वाली मैडम मौजूद हैं। कितना... सुविधाजनक है ना?"
और नैना का दिल एक पत्थर की तरह नीचे गिर गया। क्योंकि उसकी ज़िंदगी का सबसे सच्चा पल, वो इकलौता चुंबन जो किसी के लिए नहीं, बस उन दोनों के लिए था, अब देवयानी के हाथों एक नाटक बना दिया गया था। जो सबसे असली था, वो अब सबसे बड़ा सबूत बन गया था कि ये सब दिखावा है। और वो दोनों समझ गए, उनका सबसे निजी सच अब उनके ही ख़िलाफ़ अदालत की फ़ाइल में दर्ज होने वाला था।
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