Chapter 17 of 28
दुश्मन का दिल
उसी रात रुस्तम आख़िरकार वो थैली खोलता है जो उसने महीनों पहले पिहू के म्यूज़िक बॉक्स से चुपचाप निकाल ली थी, और मेहर की अपनी रिकॉर्ड की हुई आवाज़ में देवयानी की असली क्रूरता सुन कर हिल जाता है। एक हफ़्ता पुरानी याद, जब बेख़बर नैना ने भेस बदले रुस्तम को बारिश से बचाया था, उसकी बेचैनी को शर्म में बदल देती है। उधर देवयानी के घर में देवेंद्र आख़िरकार अपनी बीवी की क्रूरता पर आवाज़ उठाते हैं, पर बेअसर रह जाते हैं। रात के दो बजे रुस्तम देवयानी के गेट पर एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा थमा कर कहता है, यह आपके काम आएगा, और न देवयानी, न नैना-विहान, न ख़ुद दर्शक ये समझ पाते हैं कि उसने अभी सुबूत सौंपा है या उसे हमेशा क
उसी रात, जब नैना और विहान की टॉर्च उस ख़ाली ख़ाने पर काँप रही थी, शहर के दूसरे छोर पर रुस्तम के छोटे किराए के दफ़्तर में एक अकेला डेस्क लैंप जल रहा था, और उसके सामने मेज़ पर एक पुरानी छोटी मख़मली थैली रखी थी।
चार महीने पहले, जब उसने पहली बार इस घर में कैमरे लगाए थे, उसने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़ हर बंद ताला, हर शक की जगह टटोली थी, और उस दिन पिहू के कमरे के एक बक्से में उसे यही मख़मली थैली मिली थी, चुपचाप, बिना किसी को बताए।
उसने उसे तब पूरा नहीं खोला था, बस इतना देखा था कि अंदर एक पुराना डिजिटल रिकॉर्डर है और मुड़ा हुआ काग़ज़ का एक टुकड़ा, और अपने पेशेवर दिमाग़ से सोचा था, बाद में देख लूँगा, पहले काम पूरा करना है।
उस मख़मली थैली में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ भी था, मेहर की अपनी लिखावट में, सिर्फ़ चार पंक्तियाँ, "जो भी ये पढ़े, कृपया इसे विहान तक पहुँचाए। मेरी बेटी के नाम की क़सम।"
चार महीने का वो "बाद में" आज रात ख़त्म हो गया। रुस्तम ने काँपते हाथों से थैली खोली, वो पुराना रिकॉर्डर निकाला, अपनी मेज़ पर रखा, और पहली बार बटन दबाया।
रिकॉर्डर से एक कमज़ोर, थकी, पर साफ़ आवाज़ उभरी, "अगर कोई ये सुन रहा है, तो शायद मैं जा चुकी हूँ, या शायद मेरी हिम्मत ने आख़िरकार मुझे यहाँ तक ला दिया है। मेरा नाम मेहर है, और मैं जो कहने जा रही हूँ, वो मेरी अपनी माँ के ख़िलाफ़ है।"
"मेरी माँ, देवयानी, मुझे डॉक्टर के पास जाने ही नहीं देती थीं, महीनों तक, क्योंकि उन्हें डर था अगर बाहर किसी को पता चला कि मैं बीमार हूँ, तो पिहू की कस्टडी की लड़ाई में ये उनके ख़िलाफ़ जाएगा। उन्होंने मेरी बीमारी को इज़्ज़त का मसला बना दिया, मेरी जान का नहीं।"
"अगर विहान को कभी सच जानना पड़े, तो ये सुनाना उसे। मैं मरी नहीं, मुझे मरने दिया गया।"
रिकॉर्डिंग वहीं ख़त्म हो गई, एक हल्की सी क्लिक की आवाज़ के साथ, और रुस्तम बहुत देर तक अंधेरे कमरे में बैठा रहा, हाथ में वो छोटा सा रिकॉर्डर लिए, जैसे उसने अभी-अभी एक मरी हुई औरत की गवाही चुरा ली हो।
रुस्तम ने अपने बैंक खाते में जमा देवयानी के पैसों को याद किया, और पहली बार उस पैसे का वज़न उसे शर्मिंदा करने लगा, चार महीने की तनख़्वाह, एक मरी हुई माँ की आख़िरी गुज़ारिश के सामने अचानक बहुत छोटी लगने लगी।
उसकी नज़र मेज़ के पीछे टँगे कॉर्कबोर्ड पर पड़ी, महीनों की चुराई तस्वीरें, नैना और विहान का हाथ थामे खड़ा होना, दोनों बच्चियों की हँसी, और अब उसी दीवार पर एक मरी हुई औरत की आवाज़ भी टँग गई थी।
चार महीने से वो सोचता रहा था कि उसका काम एक झूठी शादी का पर्दाफ़ाश करना है। आज रात उसे पता चला कि उसकी जेब में जो सबूत है, वो एक शादी को नहीं तोड़ेगा, एक माँ की क़ब्र को खोदेगा।
उसी पल, बिना चाहे, रुस्तम को हफ़्ते भर पुरानी एक शाम याद आ गई, जब वो ख़ुद एक कूरियर वाले के भेस में उसी गेट पर खड़ा था, एक नक़ली पार्सल हाथ में लिए, असल में घर की हलचल भाँपने आया था।
उस दिन गेट खोलने आई थी ख़ुद नैना, बारिश हल्की हो रही थी, और रुस्तम की वर्दी पूरी तरह भीग चुकी थी।
"अरे, इतनी बारिश में आप बिना छाते के? रुकिए, मैं एक तौलिया लाती हूँ, चाय भी, बाहर मत खड़े रहिए इतनी देर।"
रुस्तम ने हड़बड़ा कर मना करने की कोशिश की थी, "नहीं नहीं मैडम, बस दस्तख़त चाहिए, मुझे जाना है," पर नैना पहले ही अंदर जा चुकी थी।
"रख लीजिए, लौटाने की ज़रूरत नहीं। ऐसे ही किसी और की मदद कर दीजिएगा, इतना काफ़ी है।"
रुस्तम ने वो चाय पी थी, गेट के बाहर खड़े, और उस पूरी शाम उसे एक अजीब बेचैनी घेरे रही थी, जिसका नाम उसने उस वक़्त नहीं जाना।
उसी शाम, चाय का कप हाथ में लिए, रुस्तम ने खिड़की के परदे के पीछे से कायरा और पिहू को देखा था, दोनों बारिश की बूँदों को गिनते हुए हँस रही थीं, एक-दूसरे की उँगलियाँ थामे।
उस हँसी में कुछ भी नक़ली नहीं था, और रुस्तम को याद है उसने उस रात अपनी रिपोर्ट में वो हँसी लिखी ही नहीं, क्योंकि उसे पता ही नहीं था उसे किस काॅलम में डालना है।
आज रात, मेहर की आवाज़ अभी भी कानों में गूँजते हुए, रुस्तम को समझ आया उस बेचैनी का नाम, शर्म। जिस औरत को वो झूठा साबित करने आया था, उसने उसे बारिश से बचाया था, बिना जाने कौन है।
रुस्तम ने कॉर्कबोर्ड की तस्वीरें एक-एक कर उतारनी शुरू कीं, हाथ काँप रहे थे, जैसे हर तस्वीर उतारने के साथ वो अपने ही किए का बोझ थोड़ा हल्का करने की कोशिश कर रहा हो।
उसी रात, देवयानी के घर में, एक अलग बेचैनी अपनी जगह बना रही थी। रुस्तम से फ़ोन पर हुई बात के बाद देवयानी अपने स्टडी में चहलक़दमी कर रही थी, हाथ में शेरी का एक गिलास लिए।
"चार महीने। और वो जासूस अब भी 'थोड़ा वक़्त' माँग रहा है।" "मुझे लगता है अब वक़्त आ गया है कि मैं ख़ुद कुछ करूँ, बिना उसका इंतज़ार किए।"
"मैं ख़ुद कल सुबह अदालत में एक इमरजेंसी अर्ज़ी डालूँगी, कस्टडी जल्दी दिलाने के लिए।" "रुस्तम का सबूत मिले या न मिले, मेरे पास और भी रास्ते हैं।"
देवेंद्र दरवाज़े पर खड़े थे, चश्मा हाथ में, आवाज़ में वो थकान जो सालों की चुप्पी के बाद आती है, "देवयानी, कितना और? पिहू हमारी नातिन है, कोई मुक़दमे की फ़ाइल नहीं। मुझे डर लगता है सुन कर तुम कैसी बातें करती हो।"
"तुम्हें कभी डर नहीं लगा जब मेहर की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हमने उसकी शादी करवाई, या जब उसकी बीमारी छुपाई।" "अब अचानक तुम्हारा दिल भर आया?"
देवेंद्र का चेहरा पल भर को सफ़ेद पड़ गया, जैसे किसी पुराने गुनाह का नाम बरसों बाद पहली बार ज़ोर से लिया गया हो।
उनकी आँखों के सामने एक पल को मेहर का बचपन का चेहरा आ गया, वही छोटी लड़की जो कभी उनकी गोद में बैठ कर परियों की कहानियाँ सुनती थी, इससे पहले कि देवयानी उसकी हर हँसी को भी एक हिसाब में बदल दें।
कुछ देर रुककर देवेंद्र ने धीमी आवाज़ में कहा, "उस दिन के बाद से एक रात भी चैन से नहीं सोया, देवयानी। और अब जब तुम उसी की बेटी के साथ वही करने वाली हो, मैं चुप नहीं रह सकता। इस बार नहीं।"
"तो चुप मत रहो। पर रास्ते से हट जाओ।" "मुझे जो चाहिए वो मैं ले कर रहूँगी, तुम्हारी इजाज़त से या बिना।"
देवयानी कमरे से निकल गई, ग्लास मेज़ पर पटकते हुए। देवेंद्र वहीं खड़े रहे, बहुत देर तक, हाथ में वही ठंडा चश्मा, और मन में एक फ़ैसला जो अभी शब्दों में नहीं ढला था।
देवेंद्र ने अपनी जेब से फ़ोन निकाला, रुस्तम का नंबर बहुत देर तक स्क्रीन पर देखता रहा, फिर बिना कुछ लिखे उसे वापस जेब में रख लिया, अभी नहीं, अभी वक़्त नहीं आया।
अकेले खड़ी देवयानी ने खिड़की से बाहर देखा, ट्रस्ट के काग़ज़ात मेज़ पर खुले पड़े थे, पिहू का नाम, मेहर के शेयर, हर आँकड़ा एक बच्ची से कहीं ज़्यादा बड़ा।
उसी वक़्त, शहर के दूसरे छोर पर, नैना और विहान अब भी उसी स्टोर रूम में बैठे उस ख़ाली मख़मल के टुकड़े को घूर रहे थे, अनजान कि जिस हाथ ने वो सुबूत निकाला था, वो हाथ उसी रात उसे किसी और की मुट्ठी में सौंपने जा रहा था।
रात के लगभग दो बजे, रुस्तम अपनी गाड़ी में देवयानी की हवेली के गेट के बाहर आ खड़ा हुआ, हाथ में एक भारी, सीलबंद लिफ़ाफ़ा।
देवयानी की खिड़की में अभी भी बत्ती जल रही थी। रुस्तम के मैसेज पर, बिना कुछ पूछे, वो ख़ुद नीचे गेट तक आई।
गाड़ी से उतर कर गेट तक के वो आख़िरी कुछ क़दम, रुस्तम ने चार महीनों में सबसे धीमी चाल से चले, जैसे शरीर अभी भी दिमाग़ के फ़ैसले से पूरी तरह सहमत नहीं था।
"इतनी रात को, रुस्तम?" "या तो कुछ बहुत बड़ा मिला है, या तुम मेरा वक़्त बर्बाद करने आए हो।"
रुस्तम का चेहरा गेट की धुँधली रोशनी में कुछ नहीं बता रहा था, न पछतावा, न जीत, बस एक थकी हुई, सपाट शांति।
"ये लीजिए, देवयानी जी।" "ये आपके काम आएगा।"
देवयानी ने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया, वज़नी, सीलबंद, बिना किसी नाम या निशान के, और रुस्तम की आँखों में कुछ ढूँढने की कोशिश की, कोई इशारा, कोई जवाब।
देवयानी ने लिफ़ाफ़ा उलट-पलट कर देखा, जैसे उसका वज़न ही उसे कुछ बता देगा, फिर रुस्तम की तरफ़ देखा, एक आख़िरी सवाल जो उसने ज़ुबान पर नहीं आने दिया।
पर रुस्तम की आँखों में कुछ नहीं था, सिवाय एक ख़ामोश फ़ैसले के जो हो चुका था। गाड़ी में लौटते हुए उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।
और उस रात, न देवयानी, न नैना और विहान अपने ख़ाली ख़ाने के सामने, न ख़ुद दर्शक, कोई ये नहीं जानता था कि उस सीलबंद लिफ़ाफ़े ने आख़िरकार मेहर के सुबूत को उजागर कर दिया था, या उसे हमेशा के लिए दफ़ना दिया था।
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