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अध्याय 3 / 28

दो नन्ही जासूस

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

सुबह के सात बजते ही घर एक मंच बन गया था। शीशे की दीवारों से छनती धूप, मेज़ पर सजी चार थालियाँ, और उस पूरे नाटक की अकेली दर्शक, मेज़ के सिरे पर बैठी, चाय में चम्मच घुमाती देवयानी। रात यहीं रुक गई थी, और अब हर घूँट के साथ नई बहू को नाप रही थी।

नैना अपनी शादी के पहले नाश्ते के लिए यूँ तैयार होकर आई थी जैसे किसी की सबसे मुश्किल शादी सँभालने जा रही हो। क्योंकि आज मेज़ पर बैठा हर चेहरा एक कैमरा था, और सबसे तेज़ नज़र देवयानी की।

"तो बताओ बेटा... तुम दोनों मिले कैसे? इतनी बड़ी बात, और वो भी इतनी चुपचाप। तीन दिन में शादी। मुझे तो अब तक यक़ीन नहीं होता।"

विहान ने कॉफ़ी का प्याला नीचे रखा और कुछ कहने को हुआ, पर देवयानी की नज़र उस पर थी ही नहीं। ये सवाल दामाद के लिए नहीं था। ये जाल सीधे नई बहू के लिए बिछाया गया था।

"एक शादी में, आंटी।" "मैं एक संगीत सजा रही थी, और ये... दूल्हे के किसी रिश्तेदार निकले। बस, फूलों के उस मंडप के बीच नज़र मिली, और... बात बन गई।"

"अच्छा? और मेरे दामाद ने, जो पिछले पूरे एक साल से किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता... उसने तुम्हें पहली ही मुलाक़ात में रोक लिया?" "प्यार भी क्या चीज़ है। इतनी जल्दी।"

नैना समझ गई कि हर सवाल एक फंदा था, जो धीरे-धीरे कसता जा रहा था। सामने बैठा उसका 'पति' पत्थर बना था, कोई मदद नहीं। तो नैना ने वही किया जो वो सबसे बेहतर करती थी। उसने एक कहानी गढ़ी, ठीक वैसे जैसे वो दुल्हनों के लिए गढ़ती थी।

"आप ही बताइए, आंटी। जब सामने वाला इंसान इतना ख़ामोश हो, तो उसकी आँखें बहुत कुछ कह जाती हैं। और विहान की आँखों में मैंने उस रात वो देखा जो शायद इन्होंने ख़ुद कभी किसी को नहीं दिखाया।"

और फिर, मेज़ के नीचे, नैना ने अपना हाथ बढ़ा कर विहान की कलाई पर रख दिया। सिर्फ़ दिखावे के लिए। पर विहान की कलाई एक झटके से अकड़ गई, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ के पानी में डुबो दिया हो। नैना ने उँगलियाँ वहीं जमाए रखीं, मुस्कुराती रही, और मन ही मन उस अकड़न को गिन लिया।

"हम्म।" "बहुत ख़ूब।" "नए प्यार में तो लोग एक-दूसरे को छोड़ते नहीं, और यहाँ छूने भर से बर्फ़ जम रही है।"

"अरे, ये शरमाते हैं, आंटी। इतने बड़े आदमी हैं, पर हैं बिल्कुल बच्चे।" "क्यों जी?"

विहान ने बस एक बार सिर हिलाया, इतना छोटा कि उसे हामी भी नहीं कहा जा सकता था। पर देवयानी के लिए इतना ही काफ़ी था। उस 'हम्म' में एक ऐसी चीज़ थी जो कहती थी कि खेल अभी शुरू ही हुआ था।


पर उस सुबह, जब बड़े नीचे नक़ली मुस्कानें सजा रहे थे, इस घर की असली कहानी ऊपर, दूसरी मंज़िल पर, चुपचाप लिखी जा रही थी। जहाँ दो नन्ही ज़िंदगियाँ पहली बार आमने-सामने थीं।

दरअसल सूरज उगने से भी पहले, जब घर अभी सो रहा था, पूरब वाले कमरे का दरवाज़ा बहुत धीरे से चरमराया था। पिहू, नंगे पैर, अपना एक फटा-पुराना टेडी घसीटती हुई, दबे पाँव अंदर झाँक रही थी।

कायरा जाग रही थी। शायद रात भर जागी थी। वो बिस्तर पर बैठी, अपना वही छोटा बैग सीने से लगाए, नई जगह को यूँ नाप रही थी जैसे कोई सिपाही अनजानी सरहद को नापता है। दरवाज़े पर पिहू को देख कर वो और सिकुड़ गई।

"तुम रोई थीं क्या? तुम्हारी आँखें लाल हैं।"

कायरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपने बैग को और कस कर पकड़ लिया, जैसे वो कोई ढाल हो, और अपनी अजनबी बहन को घूरती रही।

"मैं भी रोती हूँ कभी-कभी। रात में। पर काका को नहीं बताती, वो उदास हो जाते हैं।" "ये गुड्डू है। इसका एक कान नहीं है, पर ये बहुत बहादुर है। तुम पकड़ोगी?"

और उसने वो एक-कान वाला टेडी कायरा की तरफ़ बढ़ा दिया। कायरा ने उसे देखा, फिर पिहू को। छह साल की उस बच्ची की आँखों में एक ऐसा शक़ था जो उसकी उम्र से कहीं बड़ा था। पर पिहू का नन्हा हाथ हिला नहीं। वो वहीं, बढ़ा हुआ, इंतज़ार करता रहा।

"तुम्हारी मम्मा कहाँ है?"

एक पल को पिहू की मुस्कान डगमगाई। फिर उसने बहुत सहजता से, जैसे मौसम की बात कर रही हो, वो बात कही जो एक बच्ची को उम्र से बहुत पहले सीखनी पड़ी थी।

"मेरी मम्मा तारों में रहती हैं। काका कहते हैं वो सबसे चमकीला तारा हैं।" "तुम्हारी?"

"मेरी भी।" "मेरी मम्मा का नाम रोशनी था।"

"रोशनी! मतलब उजाला! तो वो तो और भी ज़्यादा चमकती होंगी।" "मेरी मम्मा का नाम मेहर था। शायद वो दोनों ऊपर दोस्त हों ना? तारे तो सब पास-पास ही रहते हैं।"

और कायरा की आँखों में महीनों से जमी बर्फ़ में पहली दरार पड़ी। किसी ने पहली बार उसकी मम्मा को इस तरह नहीं कहा था, न 'बेचारी', न 'भगवान के घर चली गईं'। बस... एक तारा, जिसकी एक दोस्त थी। उसने बहुत धीरे से अपना बैग नीचे रख दिया। पूरे एक दिन में पहली बार।

"तुम्हें पता है, इस घर में कोई हँसता नहीं है। पापा भी नहीं। पर तुम आई हो ना, तो शायद अब हँसें।" "सुनो... तुम मेरी बड़ी बहन बनोगी? मेरी कोई बहन नहीं है। और तुम मुझसे बड़ी हो, तुम्हें तो सब कुछ पता होगा।"

"बहनें ऐसे नहीं बनतीं। ये... ये बहुत बड़ी बात होती है।"

"तो हम बड़ी बात कर लेंगे ना। पक्की वाली। ऊँगली पर।"

और कायरा ने उस नन्ही, बढ़ी हुई ऊँगली को देखा। बहुत देर तक। फिर, जैसे कोई बहुत पुराना, बहुत भारी ताला खुलता है, उसने अपनी ऊँगली आगे बढ़ाई और पिहू की ऊँगली में फँसा दी। दो टूटे घरों की दो बच्चियाँ, बिना किसी काग़ज़, किसी वकील, किसी शर्त के, उस सुबह बहनें बन गईं।


नीचे, नाश्ता ख़त्म हो चुका था, और देवयानी ने घर को एक बार 'देख लेने' की इजाज़त माँगी, जैसे कोई शेरनी अपने पुराने इलाक़े को फिर से सूँघने निकली हो। और उस पूरे घर में एक ही इंसान था जो जानता था कि कहाँ क्या छुपा है। काका।

"काका, कितने बरस हो गए तुम्हें इस घर में?"

"जी, बहूजी... मेहर बिटिया की शादी से भी पहले से। पूरे बीस बरस।"

"बीस बरस। तो तुमने इस घर के सारे राज़ देखे होंगे।" "अच्छा ये बताओ... नई बहू का कमरा कौन सा है? मुझे उसके लिए थोड़े फूल भिजवाने हैं। नई-नवेली दुल्हन है आख़िर।"

काका का दिल एक धड़कन को रुक गया। फूल नहीं, ये औरत कमरे गिनने निकली थी। वो जानना चाहती थी कि दूल्हा-दुल्हन एक कमरे में हैं या दो। बीस बरस में काका ने इस घर की सेवा में ऐसे बहुत सवाल टाले थे।

"अरे बहूजी, आप फूलों की चिंता क्यों करती हैं। आप बैठिए, मैं आपके लिए गरम चाय लाता हूँ। बिटिया के कमरे में तो मैं ख़ुद रोज़ ताज़े फूल रख देता हूँ।"

"रहने दो चाय। मैं ख़ुद देख लेती हूँ।"

और देवयानी गलियारे में चल पड़ी, हर दरवाज़े को यूँ पढ़ती हुई जैसे कोई किताब के पन्ने पलटता है। पूरब की तरफ़ एक कमरा, बिस्तर पर बिखरी नैना की चीज़ें, कायरा का नन्हा बैग। और गलियारे के बिल्कुल दूसरे सिरे पर, बहुत दूर, विहान का कमरा। दो कमरे। दो अलग बिस्तर। दोनों सोए हुए।

उसने कुछ नहीं कहा। बस एक बार, बहुत धीरे से सिर हिलाया, जैसे किसी लंबे हिसाब में एक और सधा हुआ आँकड़ा जुड़ गया हो। और बीस साल पुराने काका, उसके पीछे बेबस खड़े, वो सब देख रहे थे जो वो जान पर खेल कर छुपाना चाहते थे।

"बहुत सुंदर घर है, काका। बस... थोड़ा ठंडा है ना? जैसे यहाँ कोई दिल से नहीं, बस काग़ज़ से रहता हो।" "ख़ैर। मैं फिर आऊँगी। बहुत जल्दी।"

और देवयानी अपनी रेशमी साड़ी सँभाले, वो अनकहा हिसाब अपने साथ लिए, चली गई। पर जाते-जाते उसकी आँखें एक बार ऊपर, बच्चों के कमरे की तरफ़ उठीं। क्योंकि इस घर की सबसे कमज़ोर कड़ी वो अच्छी तरह जानती थी। बड़े झूठ बोलना सीख जाते हैं। बच्चे नहीं सीखते।


उधर ऊपर, दो नई बहनें अपने पहले बड़े 'मिशन' पर काम कर रही थीं। पिहू कहीं से एक क्रेयॉन और एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ चुरा लाई थी, और कायरा, जो अब उसकी बड़ी बहन थी, बहुत गंभीरता से उस पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींच रही थी।

"तो लिखो, दीदी! नंबर एक... मम्मा और पापा को एक साथ बैठना पड़ेगा। रोज़। खाने की मेज़ पर।"

"पर पापा तो कभी पास नहीं बैठते। मैंने देखा है। वो हमेशा दूर वाली कुर्सी पर बैठते हैं।"

"तो हम बीच वाली कुर्सी छुपा देंगे! फिर तो बैठना ही पड़ेगा ना।" "नंबर दो लिखो... पापा को मम्मा के लिए फूल लाने पड़ेंगे। बड़े वाले। लाल वाले।"

"और नंबर तीन।" "जब मम्मा उदास हों, तो पापा उनका हाथ पकड़ेंगे। मेरी मम्मा कहती थीं, जब कोई हाथ पकड़ता है ना, तो डर कम हो जाता है।"

और पिहू एक पल को चुप हो गई। फिर उसने बहुत धीरे से कहा कि उसने पापा को कभी किसी का हाथ पकड़ते नहीं देखा। मम्मा के जाने के बाद से, पापा का हाथ हमेशा ख़ाली रहता है। और उस एक पल में, दोनों बच्चियाँ अपनी उम्र से बहुत, बहुत बड़ी हो गईं।

"पर अब नहीं! अब हमारे पास ये काग़ज़ है ना।" "ये हमारी पक्की कसम है। बड़े लोगों वाली। इसमें दस्तख़त भी होंगे। तभी तो सच होगी।"

तभी दरवाज़े पर काका आए, हाथ में दो कटोरी गरम खीर। और दो नन्ही जासूसों ने एक-दूसरे को देखा, जैसे क़िस्मत ने ख़ुद उनका तीसरा साथी दरवाज़े पर भेज दिया हो।

"काका! काका, आप हमारी टीम में हो? पक्की वाली टीम। इसमें एक राज़ है, बहुत बड़ा वाला।"

"राज़? अच्छा। और इस बूढ़े को इस बड़े राज़ में क्या काम, मेरी गुड़िया?"

"आपको मदद करनी है। हम मम्मा और पापा की... सच्ची वाली शादी करवा रहे हैं। ताकि इस घर में सब हँसें। पर ये किसी को पता नहीं चलना चाहिए। आप यहाँ दस्तख़त कीजिए।"

और बूढ़े काका के हाथ में खीर की चम्मच रुक गई। उसने उस मुड़े-तुड़े काग़ज़ को देखा, उन टेढ़ी लकीरों को, और उन दो बच्चियों को जो इस पत्थर के घर में हँसी वापस लाना चाहती थीं। बीस साल में इस घर ने उसे बहुत रुलाया था। पर आज पहली बार, आँसू किसी और ही वजह से आँखों तक आए।

"लाओ। ये बूढ़ा भी आज से तुम्हारी टीम में हुआ। पर एक शर्त है।" "खीर रोज़ मिलेगी। और ये काग़ज़... इसे ख़ूब छुपा कर रखना, गुड़िया। इस घर में तो दीवारों के भी कान हैं।"

और काका ने अनजाने में कितनी बड़ी बात कह दी थी। इस घर की दीवारों के सच में कान थे। बस, उन्हें एक बच्ची की एक मासूम आवाज़ का इंतज़ार था। और वो शाम अब दूर नहीं थी।


उसी शाम। नैना रसोई में काका के साथ थी, और विहान अभी दफ़्तर से लौटा नहीं था। ड्रॉइंग रूम के बड़े सोफ़े पर पिहू अकेली बैठी थी, हाथ में नैना का फ़ोन, अपनी कोई पसंदीदा तस्वीर ढूँढ़ती हुई। तभी स्क्रीन जगमगाई और घंटी बजी। वीडियो कॉल। स्क्रीन पर एक ही लफ़्ज़, 'नानी'।

पिहू की आँखें चमक उठीं। उसने बटन दबा दिया, और उस छोटी सी चमकती स्क्रीन पर देवयानी का चेहरा उभरा, मीठा, मुस्कुराता, और बहुत, बहुत ध्यान से देखता हुआ।

"मेरी पिहू! मेरी सोना बेटी। नानी को याद कर रही थी? बता, आज क्या-क्या किया मेरी गुड़िया ने?"

"नानी! मेरी एक बड़ी बहन आ गई है! कायरा दीदी। और हमने एक बहुत बड़ा राज़ बनाया है, पर वो मैं नहीं बता सकती।" "और नई मम्मा है ना, वो बहुत अच्छी हैं। वो मुझे रोज़ कहानी सुनाती हैं।"

"अच्छा? नई मम्मा कहानी सुनाती हैं?" "और... रात को कौन सुलाता है तुझे, बेटा? मम्मा और पापा, साथ में?"

और पिहू ने, जिसे झूठ बोलना आता ही नहीं था, बहुत सहजता से, दुनिया की सबसे सीधी सच्ची बात बता दी।

"नहीं नानी! मम्मा तो दूर वाले कमरे में सोती हैं, गलियारे के बिल्कुल उस सिरे पर। और पापा एकदम दूसरी तरफ़। बहुत दूर।" "और पता है, पापा ना, मम्मा का हाथ कभी नहीं पकड़ते। कभी भी नहीं। इसीलिए तो हमने वो राज़..."

पिहू अपना 'राज़' बताते-बताते अचानक रुकी, अपने दोनों नन्हे हाथों से अपना मुँह ढँक लिया, और खिलखिला कर हँस पड़ी। उसे लगा उसने ऐन वक़्त पर अपनी शरारत बचा ली। उसे नहीं पता था कि वो अभी-अभी, हँसते-हँसते, क्या दे बैठी थी।

और उस छोटी सी चमकती स्क्रीन के उस पार, देवयानी की मुस्कान अपनी जगह जमी रही। पर उसकी आँखें, धीरे-धीरे, किसी शिकारी की तरह सिकुड़ती चली गईं। अलग कमरे। कभी न पकड़ा गया हाथ। काका जो छुपा रहे थे, दो बिस्तर जो उसने ख़ुद गिने थे, और अब एक पाँच साल की बच्ची की सच्ची ज़ुबान, सब एक ही लकीर में आ मिले।

"तो ये शादी सच में सिर्फ़ काग़ज़ी है।" "शुक्रिया, मेरी गुड़िया। नानी को उसका जवाब मिल गया।"

और कॉल कट गई। ड्रॉइंग रूम में पिहू फिर से तस्वीरों में खो गई, बिल्कुल बेख़बर, कि उसकी उस एक नन्ही, सच्ची बात ने अभी-अभी उस काग़ज़ी घर की नींव के नीचे पहला बारूद बिछा दिया था। और उस बारूद तक जाती फ़ितील अब सुलग चुकी थी।

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