Chapter 27 of 28
दो फ़ैसले
शादी की रात आया लिफ़ाफ़ा खुलता है और पिहू की स्थायी अभिरक्षा विहान और नैना को मिल जाती है; अगली सुबह देवेंद्र की गवाही पर कायरा की गोद लेने की अर्ज़ी मंज़ूर हो जाती है और दोनों बच्चियाँ क़ानूनन सगी बहनें बन जाती हैं।
गेट के बाहर क्लर्क की गाड़ी की लाल बत्तियाँ अँधेरे में घुलती चली गईं, और पीछे रह गए दो नए-नवेले पति-पत्नी, गले में मुरझाती मालाएँ, और नैना की काँपती हथेली में वो सील बंद लिफ़ाफ़ा, जिसके भीतर पिहू की पूरी ज़िंदगी का फ़ैसला बंद था।
"आज ही, विहान? हमारी शादी की रात... हमें ये आज ही खोलना होगा?"
"जो इसमें लिखा है, नैना, वो कल तक नहीं बदलेगा। न खोलने से डर कम नहीं होगा... बस लंबा हो जाएगा।"
"और अगर... अगर इसमें लिखा हो कि पिहू को देवयानी के पास जाना है? आज की रात के बाद मैं वो लफ़्ज़ कैसे पढ़ूँगी?"
"देवयानी हिरासत में है, नैना। मेहर की अपनी आवाज़ अदालत के रिकॉर्ड में है, वो चिट्ठी है, देवेंद्र जी की गवाही है। हमने इस बार सच के साथ लड़ा है। चलो... अंदर, बच्चियों के पास खोलते हैं।"
वो दोनों दबे पाँव भीतर आए, उस कमरे की दहलीज़ तक जहाँ कायरा और पिहू, दिन भर की थकान में डूबी, एक ही रज़ाई में बाँहें डाले सो रही थीं, बेख़बर कि उनके घर का आख़िरी फ़ैसला अभी-अभी दरवाज़े तक आ पहुँचा था।
"मुझसे नहीं खुलेगा, विहान। तुम पढ़ो। तुम्हारी बेटी है... और अब मेरी भी।"
विहान ने काँपती उँगलियों से मोम की सील तोड़ी, वो बारीक-सी आवाज़ पूरे घर में गूँज गई, और उसने वो एक पन्ना धीरे-धीरे खोला, दीये की मद्धम रौशनी में।
"इस अदालत का फ़ैसला है... कि पिहू की स्थायी अभिरक्षा... उसके पिता विहान... और उसकी माँ नैना... के पास रहेगी।"
"देवयानी की अर्ज़ी... पूरी तरह ख़ारिज की जाती है।"
एक पल को कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी, सिर्फ़ दोनों बच्चियों की गहरी, बेफ़िक्र साँसें, और वो चार लफ़्ज़ हवा में तैरते हुए, पिहू हमारी रहेगी।
"फिर से पढ़ो। विहान, प्लीज़, एक बार फिर से पढ़ो। पिहू... पिहू हमारे पास रहेगी?"
"हाँ, नैना। और यहाँ लिखा है क्यों। जज साहिबा ने... मेहर की अपनी रिकॉर्ड की हुई आवाज़ को सबसे बड़ा सबूत माना है। एक माँ की आख़िरी गुज़ारिश को, कि उसकी बेटी कभी देवयानी के पास न जाए।"
मेहर का नाम, इस कमरे में, इस रात, और विहान की आँखों से वो अपराधबोध जो एक साल से पत्थर बना बैठा था, आख़िरकार पिघल कर बह निकला, क्योंकि जिसे उसने खो दिया था, उसी ने कब्र के उस पार से आ कर उसकी बेटी बचा ली थी।
"एक फ़ैसला हमारे हक़ में आ गया, नैना। पर दूसरा... कायरा का... वो अभी बाक़ी है। कल सुबह। अलग अदालत, अलग जज।"
"पिहू सुरक्षित है। अब सिर्फ़ मेरी कायरा बची है। बस एक रात और, विहान... एक और सुबह।"
अगली सुबह वो शीशे का घर, जो कल रात दीयों से जगमगा रहा था, एक बार फिर अदालत के उसी पुराने, ठंडे गलियारे में बदल गया, पर इस बार कटघरे में विहान की बेटी नहीं, नैना की कायरा थी, और सवाल था, क्या एक कर्ज़ में डूबी, कभी गोद लेने से ठुकराई गई औरत अब एक सच्ची माँ मानी जा सकती है।
अफ़ताब ने कल रात ही समझा दिया था कि अनुबंध भले फाड़ दिया गया हो, उसकी परछाई अब भी इस अदालत में खड़ी हो सकती थी, कि कहीं ये शादी सिर्फ़ कायरा को हासिल करने की एक चाल तो नहीं थी।
"बस थोड़ी देर, बेटा। जज साहिबा कुछ सवाल पूछेंगी, और फिर... फिर शायद हम हमेशा के लिए एक हो जाएँ। काग़ज़ पर भी।"
"मुझे डर नहीं लग रहा, मम्मा। मैं जज साहिबा को ख़ुद बता दूँगी। तुम मेरी मम्मा हो, और पिहू मेरी बहन। ये कोई काग़ज़ थोड़ी बदल सकता है।"
कायरा के उन सीधे, बिना डर के लफ़्ज़ों ने नैना का काँपता हाथ थाम लिया, जैसे इस पूरे साल में असल में बड़ा कौन हुआ था, ये उसी छोटी-सी लड़की ने तय कर दिया हो।
तभी अदालत के दरवाज़े पर एक बूढ़ी, झुकी हुई परछाई आ खड़ी हुई, और नैना का दिल एक पल को रुक गया, क्योंकि वो चेहरा उसी ख़ानदान का था जिसने महीनों उसका घर तोड़ने की कोशिश की थी, देवेंद्र, मेहर के पिता, पिहू के नाना।
"देवेंद्र जी? आप... आप यहाँ? कायरा की अदालत में?"
"मैं गवाही देने आया हूँ, बेटी। तुम्हारे ख़िलाफ़ नहीं... तुम्हारे लिए। अगर जज साहिबा इजाज़त दें, तो मैं वो कहना चाहता हूँ जो मैं सालों ख़ामोश रह कर नहीं कह पाया।"
अदालत में एक सन्नाटा छा गया, और जज साहिबा ने सिर हिला कर उस बूढ़े आदमी को बोलने की इजाज़त दे दी, वो आदमी जो कभी देवयानी की ख़ामोश ढाल था, अब उसी के ख़िलाफ़ कटघरे की तरफ़ बढ़ रहा था।
"जज साहिबा, मैंने इस औरत को महीनों दूर से देखा है। मेरी पत्नी ने इसके घर में एक जासूस बिठाया था, इसकी हर साँस पर नज़र रखने को। और उस जासूस की हर तस्वीर, हर रिपोर्ट ने आख़िर में सिर्फ़ एक बात साबित की... कि ये शादी झूठी नहीं थी।"
"मेरी बेटी मेहर के जाने के बाद, मैं डर और ख़ामोशी में छुप गया था। पर इस औरत ने दो टूटी बच्चियों को एक माँ दी। मेरी अपनी नातिन पिहू को इसने फिर से हँसना सिखाया, जो हम नाना-नानी न सिखा सके। अगर कोई सच्ची माँ है इस कमरे में, तो वो नैना है।"
और वो सबसे भारी गवाही थी, क्योंकि वो नैना के किसी अपने की नहीं, बल्कि उसी ख़ानदान की ज़बान से आई थी जिसने उसे सबसे ज़्यादा तोड़ना चाहा था, और अदालत में हर सिर उस बूढ़े आदमी की तरफ़ झुक गया।
"आपने... आपने ये क्यों किया, देवेंद्र जी? मैं तो आपके ख़ानदान की दुश्मन थी।"
"क्योंकि मेरी मेहर यही चाहती थी, बेटी। और एक ग़लती जो मैंने अपनी बेटी के साथ की, वो मैं अपनी नातिन की बहन के साथ नहीं दोहराऊँगा।"
जज साहिबा ने कुछ पल अपने सामने रखे काग़ज़ों को देखा, फिर नैना को, फिर उस छोटी-सी कायरा को जो बिना पलक झपकाए खड़ी थी, और फिर वो लफ़्ज़ कहे जिनका नैना ने एक साल से इंतज़ार किया था।
यह अदालत मानती है कि यह विवाह अब क़ानूनी तौर पर सच्चा और हर शर्त से आज़ाद साबित हो चुका है, और यह बच्ची एक स्थायी, प्यार भरे घर में है। इसलिए यह अदालत कायरा को नैना की गोद ली हुई बेटी घोषित करती है। आज से, ये दोनों बच्चियाँ, क़ानून की नज़र में भी, सगी बहनें हैं।
"बहनें... क़ानून की नज़र में भी बहनें... कायरा, बेटा, सुना तुमने? अब कोई तुम्हें मुझसे नहीं ले जा सकता। कोई भी नहीं।"
"तो अब ये पक्का हो गया, मम्मा? काग़ज़ पर भी? हमेशा के लिए?"
अदालत की सीढ़ियों पर धूप खिली हुई थी, दो फ़ैसले जीते जा चुके थे, और उसी रौशनी में देवेंद्र अकेले खड़े थे, उस परिवार से थोड़ी दूर जिसे उन्होंने अभी-अभी बचाया था, पर जिसका वो कभी हिस्सा न बन सके।
"विहान बेटा, मैं जानता हूँ मेरा और देवयानी का जो क़र्ज़ है, वो कभी नहीं उतरेगा। मैं बस... मैं बस इतना पूछना चाहता हूँ... क्या मैं कभी-कभी पिहू को दूर से देख सकता हूँ? वो मेरी मेहर की आख़िरी निशानी है।"
"आप देवयानी नहीं हैं, देवेंद्र जी। आपने आख़िर में सच के साथ खड़े होने का हौसला किया, दो बार। मेहर की रिकॉर्डिंग आप लाए, और आज कायरा के लिए आप खड़े हुए।"
"पिहू आपसे मिल सकती है। पर हमारे सामने, हमारे घर में, हमारी शर्तों पर। जितना मेहर चाहती कि उसकी बेटी अपने नाना को जाने, बस उतना। इससे ज़्यादा नहीं।"
"इतना ही बहुत है, बेटा। इतना ही बहुत है। और देवयानी... वो जो भुगत रही है, वो उसका अपना चुना हुआ है। मैं अब उसकी ढाल नहीं बनूँगा।"
कहीं दूर एक हिरासत की ठंडी दीवार के पीछे देवयानी की वो तलवार जैसी मुस्कान बुझ चुकी थी, उसकी जायदाद की हर चाल, हर झूठ, मेहर की अपनी आवाज़ के सामने ढह गया था, और जो औरत सबको मोहरा समझती थी, आज ख़ुद अकेली रह गई थी।
और तभी वो दो नन्ही जासूस, जिनकी अँगूठे के निशान वाली गुप्त कसम से ये पूरी कहानी शुरू हुई थी, सीढ़ियाँ फाँदती हुई नैना और विहान की तरफ़ दौड़ीं, हाथ में वही पुराना, मुड़ा-तुड़ा काग़ज़।
"मम्मा! पापा! देखो, हमारी वाली कसम! हमने लिखा था कि मम्मा-पापा की सच्ची शादी होगी और हम सच्ची बहनें बनेंगी... और आज दोनों सच हो गया! दोनों!"
"हमारी कसम तो बड़ों के काग़ज़ों से भी पहले सच थी, पिहू। हमने तो उसी दिन तय कर लिया था। बड़ों को बस थोड़ी देर लगी।"
और उस एक बात में इस पूरे साल का सच छुपा था, कि जो कसमें दो बच्चियों ने बिना किसी वकील, बिना किसी अदालत के, सिर्फ़ एक अँगूठे के निशान से ली थीं, वही सबसे पहले, और सबसे सच्ची निकली थीं।
"हाँ, मेरी जान। तुम दोनों की कसम सबसे पहले सच हुई। हम बड़े तो बस तुम्हारे पीछे-पीछे चले।"
उस शाम शीशे का घर पहली बार पूरी तरह अपना लगा, न कोई कैमरा, न कोई जासूस, न कोई अदालती तारीख़ सिर पर, दोनों बच्चियाँ ऊपर अपने कमरे में थकान से चूर सो चुकी थीं, और नीचे बरामदे में सिर्फ़ नैना और विहान बचे थे, और एक लंबी, हलकी ख़ामोशी।
"एक साल पहले मैंने सोचा था कि एक काग़ज़ दो मुसीबतें हल कर देगा, नैना। आज दोनों फ़ैसले हमारे हक़ में हैं, दोनों बेटियाँ सुरक्षित हैं, और मेरे पास कोई शर्त नहीं बची जिसके पीछे छुपूँ।"
"विहान... एक काम बाक़ी है। मुझे तुमसे एक आख़िरी मदद चाहिए।"
"अब क्या बचा, नैना? हमने शादी दो बार कर ली, दो अदालतें जीत लीं, दो बेटियाँ पा लीं। इससे बड़ा क्या हो सकता है?"
"मुझे एक और जश्न की तैयारी करनी है, विहान। इस घर की सबसे ख़ास तैयारी। पर इस बार कोई दुल्हन या दूल्हा नहीं... इस बार इस घर के सबसे नन्हे मेहमान के लिए। उसके लिए जो अभी आया भी नहीं।"
विहान एक पल को उसे यूँ देखता रहा जैसे लफ़्ज़ समझ तो आए हों पर दिल अभी उन पर यक़ीन करने से डर रहा हो, और ठीक उसी पल, सीढ़ियों के ऊपर, कायरा और पिहू एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ी थीं, और उन दोनों बहनों ने आपस में एक ऐसी नज़र का आदान-प्रदान किया जैसे उन्हें पहले से पता हो, और जैसे उन्हें अपनी नन्ही कसम में जल्द ही एक और नाम जोड़ना हो।
"तो बताओ, विहान... इस घर की सबसे बड़ी वेडिंग प्लानर की ज़िंदगी की सबसे ख़ास तैयारी में... तुम मेरी मदद करोगे न?"
और वहीं, उस बरामदे में, नैना की वो बात एक अनकहे नए वादे की तरह हवा में लटकी रह गई, ऊपर से मुस्कुराती दो बहनें, नीचे एक पिता जिसकी साँस अभी रुकी हुई थी, और एक घर जो अभी-अभी पूरा हुआ था और अभी से, चुपके-चुपके, और बड़ा होने की तैयारी में लग गया था।
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