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Chapter 24 of 28

दो बहनें

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

पिहू के म्यूज़िक बॉक्स की वो नन्ही धुन गलियारे की ऊँची छत से टकरा कर हर तरफ़ से एक साथ आती हुई लग रही थी, और नैना और विहान, दोनों जमे हुए, समझ ही नहीं पा रहे थे कि आवाज़ किस बंद दरवाज़े के पीछे से आ रही है।

पर गैलरी के पास बेंच पर बैठी कायरा जमी नहीं थी। वो पिछले दस मिनट से अपनी छोटी बहन की तरफ़ से एक पल को भी नज़र नहीं हटा पाई थी, और अब वो बेंच से उतर कर सीधी नैना की तरफ़ दौड़ी।

"मम्मा! मम्मा, मैंने देखा!" "नानी पिहू को उधर नहीं ले गईं, जहाँ आप गई थीं। वो उसे उस तरफ़ ले गईं, चाय वाले स्टॉल के पीछे, जहाँ पुरानी फ़ाइलों वाला कमरा है।"

"तुमने ठीक देखा, कायरा? बिल्कुल पक्का देखा?"

"मम्मा, पिहू मेरी बहन है। मैं उसे हज़ार लोगों की भीड़ में भी पहचान लूँ।" "और जब पिहू डरती है ना, तो अपना म्यूज़िक बॉक्स बजाती है। ये वही आवाज़ है। मैंने पहचान ली।"

विहान का पूरा शरीर उस एक तरफ़ घूम गया जिस तरफ़ न वो भागा था, न नैना। जो दो बड़े लोग डर के मारे ग़लत गलियारों में दौड़ते रहे थे, उन्हें अब छह साल की उस बच्ची की नज़र रास्ता दिखा रही थी, जिसने अपनी बहन से एक पल के लिए भी आँख नहीं हटाई थी।

"शाबाश, मेरी बच्ची। तुम हमारे आगे-आगे चलो, बस हमारा हाथ मत छोड़ना।"

तीनों उस तंग, कम रौशनी वाले गलियारे में मुड़ गए, और जैसे-जैसे रिसेस का वो मेले जैसा शोर पीछे छूटता गया, म्यूज़िक बॉक्स की वो पतली धुन साफ़, और साफ़, और क़रीब होती चली गई।

"नैना, तुम कायरा को अपने पीछे रखना। जो भी सामने मिले, पहले पिहू को अपनी तरफ़ खींच लेना।" "बाक़ी मैं देख लूँगा।"

"तुम आगे रहो, विहान। मैं ठीक तुम्हारे पीछे हूँ, एक क़दम की दूरी पर।"

"पिहू? बेटा, तुम वहाँ हो? मम्मा आ रही है।"

वो हिस्सा अदालत के उस पुराने कोने में था जहाँ धूल में लिपटी फ़ाइलों की अलमारियाँ खड़ी थीं, और सबसे आख़िर में एक बग़ल का गेट, जो सीधे बाहर सड़क पर खुलता था, जहाँ शायद कोई गाड़ी इंतज़ार कर रही हो।

और वहीं, गलियारे के आख़िरी मोड़ पर, उन्हें वो दिख गई। देवयानी तेज़ क़दमों से उस बग़ल के गेट की तरफ़ बढ़ रही थी, पिहू का नन्हा हाथ अपनी मुट्ठी में कसे, और पिहू लगभग दौड़ती हुई उसके साथ क़दम मिलाने की कोशिश कर रही थी, दूसरे हाथ में अपना म्यूज़िक बॉक्स थामे।

"देवयानी! रुकिए!"

देवयानी एक झटके से रुकी, मुड़ी, और एक पल के लिए उसके चेहरे पर वही पुरानी, मुलायम मुस्कान तैर गई, वही जो सालों से हर कमरे में काम कर जाती थी।

"आप मेरी बेटी को लेकर उस गेट की तरफ़ क्या कर रही थीं, देवयानी?" "वो मुलाक़ात का कमरा नहीं है। वो बाहर जाने का रास्ता है।"

देवयानी ने वही शहद-सी आवाज़ निकालनी चाही, कि वो तो बस बच्ची को ज़रा हवा खिलाने ले जा रही थी, बस थोड़ी देर की बात थी, पर इस बार वो लफ़्ज़ हवा में ही घुल गए, क्योंकि उन्हें सच मान लेने वाला अब वहाँ कोई नहीं बचा था।

और फिर, आख़िरकार, वो मुखौटा पूरी तरह उतर गया। उसके चेहरे पर जो रह गया, वो किसी नानी का अपनी नातिन के लिए प्यार नहीं था, वो कुछ और था, ठंडा, भूखा, कब्ज़े वाला, और पहली बार वहाँ खड़े हर इंसान ने देवयानी का असली चेहरा देख लिया।

पिहू ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ाया और सीधी नैना की तरफ़ दौड़ी, अपने आप को उसकी गोद में गिरा दिया, और नैना घुटनों के बल बैठ कर उसे अपनी बाँहों में यूँ समेट लिया, जैसे अब दुनिया की कोई ताक़त उसे छीन न सके।

"मैं यहीं हूँ, मेरी जान। मैं कहीं नहीं गई, और अब कहीं नहीं जाऊँगी।"

कायरा दौड़ती हुई आई और पिहू के चारों तरफ़ अपनी नन्ही बाँहें लपेट दीं, दोनों बहनें फिर एक-दूसरे में सिमट गईं, ठीक वैसे ही जैसे उस पहले दिन, बिना किसी काग़ज़ के, उन्होंने बहनें बनने का फ़ैसला किया था।

"मैंने कहा था ना, मैं तुझे कभी खोने नहीं दूँगी।" "अब हम कहीं नहीं जाएंगे। हमेशा साथ।"

दो बहनें, एक-दूसरे से लिपटी हुईं, और उस एक पल में वो दो शब्द, दो बहनें, इस पूरे घर का सबसे सच्चा सच बन गए, वो सच जिसे कोई अदालत, कोई देवयानी, कोई काग़ज़ कभी झूठा नहीं ठहरा सकता था।

तभी गलियारे के दोनों सिरों से क़दमों की आवाज़ें उठीं, अफ़ताब के इशारे पर गेट बंद कराते सुरक्षा गार्ड, और उनके पीछे वो कोर्ट अधिकारी, हाँफ़ता हुआ, और देवयानी अचानक ख़ुद को उसी क़ानून के बीचों-बीच घिरा पाकर खड़ी रह गई जिसे उसने अभी-अभी धोखा देने की कोशिश की थी।

वो कोर्ट अधिकारी अब भी पानी का वही गिलास हाथ में लिए पहुँचा, और जब उसने गेट की तरफ़ बढ़ती देवयानी और उससे छूटती बच्ची को देखा, तो उसके चेहरे की सारी उलझन एक पल में एक ठंडी समझ में बदल गई, कि उसे कैसे, और किसलिए, बहलाया गया था।

"आपको पिहू कभी चाहिए ही नहीं थी, देवयानी।" "आपको वो चाहिए था जो पिहू के नाम के साथ बँधा है। बस यही सच था, शुरू से आख़िर तक।"

गलियारे के धुँधले सिरे से एक धीमा, भारी क़दम उठा। देवेंद्र, वही भारी बैग अपने सीने से लगाए, धीरे-धीरे उनकी तरफ़ बढ़े। उन्होंने सब कुछ देख लिया था, वो गेट, वो छूटता नन्हा हाथ, अपनी पत्नी का उतरता मुखौटा, सब।

"बस करो, देवयानी।" "तीस साल मैं चुप रहा। तुम्हारी हर बात पर सिर झुकाता रहा। पर आज नहीं।"

एक पति अपनी पत्नी के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया, और पूरा गलियारा एक पल के लिए इतना ख़ामोश हो गया कि पिहू के म्यूज़िक बॉक्स की वो मद्धम धुन फिर से सबको साफ़ सुनाई देने लगी।

"विहान, बेटा, तुम्हें अब पूरा सच जान लेना चाहिए।" "ये कभी पिहू के प्यार की लड़ाई थी ही नहीं। मेहर के हिस्से के शेयर, और वो ट्रस्ट, जब तक पिहू बालिग़ नहीं होती, उन सब पर उसी का क़ब्ज़ा रहता जिसके पास पिहू की कस्टडी होती।"

"तो वो अर्ज़ी... मेहर की जायदाद और ट्रस्ट वाली..." "इसलिए। ये सब इसीलिए था।"

"हाँ, बेटा। मैं जानता था, और फिर भी चुप रहा, क्योंकि वो मेरी पत्नी थी।" "पर मैं अपनी बेटी को खो चुका हूँ। अब अपनी नातिन को यूँ बिकते हुए नहीं देख सकता।"

"आप अभी बोल रहे हैं, देवेंद्र जी। देर से सही, पर बोल रहे हैं। यही सबसे बड़ी बात है।"

देवेंद्र के हाथ काँप रहे थे जब उन्होंने वो बैग खोला, जिसे वो हफ़्तों से किसी ज़ख़्म की तरह छाती से लगाए बैठे थे। उसमें से उन्होंने एक छोटा, पुराना रिकॉर्डर निकाला, और उसे यूँ थामा जैसे वो काँच का बना हो।

"वो जासूस, रुस्तम, जब सब छोड़ कर जाने लगा, तो ये मेरे हाथ में रख गया। कहा, इसे सही हाथों तक पहुँचा देना।" "मैं हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। पर अब वो वक़्त आ गया है।" "ये मेहर की आवाज़ है, बेटा।"

एक हल्की सी क्लिक हुई, फिर एक पल की खरखराहट, और फिर उस छोटे से रिकॉर्डर से एक आवाज़ निकली, वो आवाज़ जिसे दोबारा सुनने की उम्मीद वहाँ खड़ा हर इंसान कब का खो चुका था।

"अगर तुम ये सुन रहे हो, तो शायद मैं अब तुम्हारे साथ नहीं हूँ।" "विहान, ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं है। ये उस दिन के लिए है, जब कोई मेरी पिहू को मुझसे छीनने की कोशिश करेगा।"

पूरा गलियारा जम गया। विहान का चेहरा टुकड़ों में बिखर रहा था, और नैना ने चुपचाप अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया, जैसे बिना कहे कह रही हो, मैं यहीं हूँ, तुम अकेले नहीं हो।

"मेरी माँ, देवयानी, ने मुझे बचपन से एक ही बात सिखाई, कि कमज़ोरी कभी मत दिखाओ।" "इसीलिए मैंने अपनी बीमारी सबसे छुपाई, विहान, तुमसे भी। मुझे डर नहीं था, मुझे बस यही सिखाया गया था। और जब तक सच सामने आया, बहुत देर हो चुकी थी।"

"और अब वो मेरी पिहू के पीछे है। नातिन के प्यार में नहीं, मेरे हिस्से और उस ट्रस्ट के लिए, जो पिहू के साथ बँधा है।" "मैं ये अपनी ही माँ के बारे में कह रही हूँ, और फिर भी कह रही हूँ, क्योंकि मैं उसका दिल जानती हूँ, और उसमें पिहू के लिए मोहब्बत नहीं, सिर्फ़ हिसाब है।"

पिहू के नन्हे हाथों में वही म्यूज़िक बॉक्स अब भी धीरे-धीरे बज रहा था, और उसकी वो टिमटिमाती धुन उसकी माँ की आवाज़ से जा मिली, जैसे डेढ़ साल का फ़ासला एक पल में मिट गया हो, माँ और बेटी, एक ही धुन के दो सिरों पर खड़ी।

"मेरी एक ही आख़िरी कसम है, जो भी ये सुन रहा है।" "मेरी पिहू को मेरी माँ के पास मत जाने देना। किसी भी क़ीमत पर नहीं। कभी नहीं।"

रिकॉर्डर की वो आवाज़ गलियारे की हवा में ठहर गई, और वहाँ खड़ा हर चेहरा एक ही तरफ़ मुड़ गया, देवयानी की तरफ़, जिसे आख़िरकार उसकी अपनी बेटी की आवाज़ ने, उसी की ज़बान में, पूरी दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया था।

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