अध्याय 9 / 28
कैमरे की आँख
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
अब नैना और विहान जान चुके हैं कि दीवारों में एक कैमरा है, पर अभी ये नहीं कि किसका और कितने। वो उसे तोड़ते नहीं, क्योंकि तोड़ते ही देखने वाले को पता चल जाएगा कि उन्हें पता चल गया, तो उन्हें उलटी सज़ा मिलती है, अब उन्हें अपने ही घर में, अपने ही पति-पत्नी के साथ, चौबीसों घंटे प्यार का नाटक करना है। और उस कैमरे के सामने प्यार का नाटक करते-करते वो नाटक असली पड़ने लगता है, विहान पहली बार मेहर का नाम ज़ोर से लेता है और नैना पहली बार रोशनी का। उधर रुस्तम की स्क्रीन पर देवयानी एक पल को अपना असली मक़सद ज़बान पर ले आती है। और तीन रातों में उस छुपे सिग्नल का पीछा करते-करते विहान कैमरे के तार देवयानी तक पह
उस टिमटिमाती लाल आँख के सामने नैना कितनी देर जड़ खड़ी रही, उसे ख़ुद नहीं पता। पर उसके भीतर की वो औरत, जो सैकड़ों बिगड़ती शादियों को एक पल में सँभालना जानती थी, धीरे-धीरे इस दहशत में भी जागने लगी। और उस डर के बीच एक ठंडा, साफ़ ख़याल उभरा... अगर उसने वो कैमरा अभी नोच कर फेंक दिया, तो जो देख रहा है, उसे पता चल जाएगा कि नैना जान गई है। उसने आहिस्ता से अपना हाथ अपने ही मुँह पर रख लिया, क्योंकि ऐसी आँखें सिर्फ़ देखती नहीं... सुनती भी हैं। एक-एक क़दम, बहुत धीरे, वो उस आँख की सीध से हटी, और फिर दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर भागी।
"विहान... विहान, उठिए। चुपचाप। एक लफ़्ज़ मत बोलिए। मेरे साथ आइए। और अपने कमरे में कुछ मत कहिए, कुछ भी नहीं। बस मेरे पीछे आइए, ख़ुदा के वास्ते।"
"नैना? क्या हुआ? बच्चियाँ ठीक तो हैं? तुम्हारा चेहरा... तुम काँप रही हो। किसी ने कुछ..."
नैना उसे खींच कर बाथरूम में ले गई, दोनों नल पूरे खोल दिए, और शॉवर की तेज़ आवाज़ को दोनों के बीच एक दीवार की तरह खड़ा कर दिया। और तभी, उस पानी की गड़गड़ाहट के नीचे, उसने वो बात कही जो उसका सीना फाड़ रही थी।
"घड़ी में कैमरा है, विहान। बैठक-घर की उस पुरानी घड़ी में। मेहर के ज़माने वाली घड़ी में। अंकों के पीछे एक नन्ही लाल रोशनी... जल रही थी, बुझ रही थी। कोई हमें देख रहा है। हर वक़्त। शायद महीनों से।"
"महीनों से... वो मोमबत्ती वाली रात। मेरा मेहर के ख़त का ज़िक्र। बच्चियों का हर खेल, उनकी हर फुसफुसाहट। नैना, वो सब... सब कुछ किसी की स्क्रीन पर पहुँच चुका है। हमारे घर का एक-एक कोना।"
"और सबसे बुरी बात ये है कि हम कुछ नहीं कर सकते। अगर हमने वो कैमरा तोड़ा, अगर उसे छुआ भी, तो देखने वाले को पता चल जाएगा कि हम जान गए हैं। और तब वो नया कैमरा लगा देंगे, ऐसी जगह जो हमें कभी दिखेगी ही नहीं।"
"तो हम उसे तोड़ेंगे नहीं। हम उसे वहीं रहने देंगे, जहाँ है। और उसे ठीक वही दिखाएँगे... जो हम उसे दिखाना चाहते हैं। जो देखना उसे सबसे कम पसंद होगा। वो एक झूठी शादी ढूँढ रहा है। हम उसे एक सच्ची शादी दिखाएँगे।"
उसी रात, शहर के दूसरे छोर पर, एक कमरा था जहाँ रोशनी सिर्फ़ स्क्रीनों से आती थी। और उन्हीं में से एक स्क्रीन पर वो शीशे का घर था, हर कमरा, हर कोना, काले और सफ़ेद में तैरता हुआ। रुस्तम अपनी कुर्सी पर पीछे टिका, ठंडी चाय का घूँट भरते हुए, उस घर को यूँ देख रहा था जैसे कोई पुरानी, उबाऊ फ़िल्म हो।
"छह हफ़्ते हो गए, मैडम। छह हफ़्ते से मैं इस घर की हर साँस गिन रहा हूँ। और सच कहूँ तो... आपने कहा था ये शादी झूठी है। पर जो मैं इन स्क्रीनों पर देख रहा हूँ, वो झूठ जैसा नहीं दिखता।"
"जो तुम देख रहे हो, रुस्तम, वो एक अच्छा नाटक है। बस इतना ही। मेहर का पति एक कारोबारी है, वो जानता है नाटक कैसे बेचा जाता है। और ये औरत तो पेशे से ही दूसरों की झूठी कसमें सजाती है। दोनों को झूठ बेचना आता है, बेटा। ये उनका हुनर है।"
"अलग कमरे अब भी अलग हैं, ये मैं मानता हूँ। और मैंने वो सबूत भी निकाल दिया कि शादी से तीन हफ़्ते पहले तक ये अजनबी थे। फिर भी... इस एक तस्वीर को देखिए। ये डर, ये नज़दीकी, ये आँखें। मुझे बीस साल हो गए इस काम में, मैडम। नक़ली मुझसे नहीं छुपता। ये नक़ली नहीं है।"
"नक़ली है या नहीं, इससे मुझे कोई मतलब नहीं। मुझे बस अदालत में इतना साबित करना है कि ये घर पिहू के लिए महफ़ूज़ नहीं। बाक़ी जो मेहर पीछे छोड़ गई है, वो अपने आप मेरे पास आ जाएगा। पिहू मेरी नातिन है, रुस्तम। मैं बस उसका भला चाहती हूँ, और कुछ नहीं। तुम कैमरा चलता रखो। हर घंटा।"
सुबह हुई, वैसी ही बेपरवाह जैसी हमेशा होती है। पर आज उस घर में दो नए मेहमान थे... डर और दिखावा। नैना को अब हर पल याद रखना था कि ताक़ पर रखी वो घड़ी देख रही है, सुन रही है। और बच्चियों को कुछ नहीं पता था, और यही सबसे ख़तरनाक बात थी।
"मम्मा! देखो, कल रात मैंने और कायरा दीदी ने आपका शॉल पापा के कमरे में रख दिया! क्योंकि आप और पापा तो अलग-अलग कमरे में सोते हैं ना, तो हमने सोचा कि अगर आपकी चीज़ें वहाँ होंगी, तो..."
"पिहू! बस बस, मेरी रानी। ये क्या बातें कर रही हो? हम भला कहाँ अलग सोते हैं। तुमने कोई सपना देखा होगा, शरारती कहीं की। चलो, अपना दूध पियो, वरना स्कूल की बस निकल जाएगी।"
कायरा, जिससे इस घर में कोई बात छुपती नहीं थी, ने माँ की उस ऊँची हँसी में कुछ अलग सुना और चुपचाप अपनी छोटी बहन का हाथ थाम कर उसे मेज़ की तरफ़ ले गई। और उसी पल नैना को अपनी नई क़ैद का पूरा नक़्शा समझ आ गया। वो कैमरा सिर्फ़ उसे और विहान को नहीं देख रहा था। वो बच्चियों को भी सुन रहा था। एक भी मासूम लफ़्ज़, और सारा झूठ चौड़ा हो जाता।
"नैना, एक साल पहले मैंने तुम्हें एक शर्त दी थी। नियम नंबर एक। कोई जज़्बात नहीं। और आज मुझे तुमसे उसका ठीक उलटा कहना पड़ रहा है। अब हमें जज़्बात दिखाने पड़ेंगे। हर वक़्त। घर के भीतर भी। उस कैमरे के ऐन सामने भी।"
"यानी अब मुझे अपने ही घर में, अपने ही पति के साथ, प्यार का नाटक करना है। चौबीसों घंटे। मैं बरसों से दुनिया भर के अजनबियों की झूठी कसमें सजाती आई हूँ, विहान। पर ये... ये सबसे मुश्किल शादी होगी जो मैंने कभी सजाई। जिसमें छुट्टी का एक पल भी नहीं।"
और यूँ उनकी ज़िंदगी का सबसे अजीब नाटक शुरू हुआ। एक शीशे की आँख के इकलौते दर्शक के लिए, वो एक ब्याहता जोड़े का किरदार निभाने लगे। पहले-पहल ये एक खेल था, लगभग एक शरारत, वो कोने में बैठ कर उस घड़ी के बारे में दबी-दबी हँसी हँसते।
"और सुनिए जी... आज दिन कैसा रहा आपका? मुस्कुराइए, विहान। हमारा एकलौता दर्शक आज बड़े ग़ौर से देख रहा है। उसे थोड़ा प्यार तो दिखाना पड़ेगा।"
"ऑफ़िस वैसा ही था। बोरिंग। तुम्हें पता है, ये अजीब है, नैना। पूरी दुनिया के सामने झूठ बोलना मेरे लिए आसान था। पर इस एक कैमरे के सामने... मुझे झूठ बोलना नहीं आ रहा। मेहर इसी सोफ़े पर बैठती थी। यहीं, इसी कोने में, पैर मोड़ कर। एक साल से मैंने उसका नाम ज़ोर से नहीं लिया... जैसे नाम लेने से वो और दूर चली जाएगी। मेहर। मेहर।"
"विहान... मेरी बहन का नाम रोशनी था। कायरा की माँ। मैं भी उसका नाम नहीं लेती। क्योंकि हर बार लगता है, मैं वहाँ थी, फिर भी उसे बचा नहीं पाई। वो चली गई और मेरी गोद में अपनी नन्ही बेटी थमा गई, और कहा, इसे तू सँभालना।"
"तुमने उसे बचा लिया, नैना। तुमने कायरा को बचाया। वो रोशनी का सबसे बड़ा, सबसे ज़िंदा हिस्सा है, और वो तुम्हारे पास है, सलामत है। ये कोई छोटी बात नहीं।"
और उस शीशे की आँख ने ठीक वो चीज़ पकड़ ली, जिसे पकड़ने वो कभी लगाई ही नहीं गई थी... सच। वो एक शादी का झूठ बुनने बैठे थे, और बीच में झूठ बुनना ही भूल गए। और उस रात कहीं गहरे, ध्रुव का वो सवाल, जो हफ़्तों से नैना के गले में काँटे की तरह अटका था, आख़िरकार अपना जवाब पा गया... 'क्या तुम सच में उससे प्यार करती हो?' वो जवाब एक 'हाँ' था, और वो 'हाँ' उस एक साल के काग़ज़ पर कहीं नहीं लिखा था, और यही बात उसे किसी भी कैमरे से ज़्यादा डरा गई।
पर विहान सिर्फ़ एक टूटा हुआ पति नहीं था। उसने अपनी पूरी कंपनी इसी एक बात पर खड़ी की थी, कि हर सिग्नल कहीं न कहीं जाता है, और हर सिग्नल का पीछा किया जा सकता है। तीन रातें उसने अपने ही घर के ख़िलाफ़ बिता दीं, एक लैपटॉप की नीली रोशनी में झुका, उस नन्हे कैमरे के तार को कोने-कोने से पकड़ता हुआ।
"मिल गया, नैना। वो कैमरा अपनी तस्वीर घर के वाई-फ़ाई से नहीं भेज रहा। इसमें एक छुपा हुआ सिम है। मैंने उस सिग्नल का पीछा किया, एक सर्वर तक, और उस सर्वर का बिल भरने वाले नाम तक।"
"किसका नाम है, विहान?"
"जिसका मुझे हमेशा से डर था। देवयानी। ये कैमरा मेरी अपनी सास ने लगवाया है। वो हमें, हमारे अपने ड्राइंग रूम में बैठा कर, महीनों से देख रही है। हमारी हर रात, हर बात।"
"हमें तो पता ही था कि वो हमारे पीछे है, विहान। रुस्तम की तस्वीरें, अनाइशा को घर में घुसाना... एक कैमरा और सही। ये भी तो बस पिहू की कस्टडी के लिए है ना? उस बच्ची को हमसे छीनने के लिए। हमेशा की तरह।"
"नहीं। रुको। मैं उसके नाम का पीछा करते-करते और आगे निकल गया... अदालत के काग़ज़ों में। नैना, देवयानी ने पिछले महीने एक और अर्ज़ी डाली है। कस्टडी की नहीं। मेहर की जायदाद की। उसके कंपनी के शेयर, उसका पूरा ट्रस्ट। और यहाँ साफ़ लिखा है... वो सारा पैसा उसी के पास जाएगा, जिसके पास पिहू की कस्टडी होगी।"
"मतलब... देवयानी को पिहू नहीं चाहिए, विहान। उसे पिहू के साथ आने वाला पैसा चाहिए। मेहर का पैसा। बच्ची तो बस उस ख़ज़ाने की चाबी है।"
और वहाँ, उस नीली रोशनी में, आख़िरकार वो चीज़ नज़र आ गई जो एक साल से देवयानी के आँसुओं के नीचे छुपी पड़ी थी। एक नानी का प्यार नहीं... एक हिसाब-किताब। ये जंग कभी पिहू के लिए थी ही नहीं। ये जंग शुरू से मेहर के पैसे के लिए थी, और वो नन्ही बच्ची सिर्फ़ उस तक पहुँचने का रास्ता। और उस अँधेरे कमरे में, विहान के लैपटॉप की वो ठंडी नीली स्क्रीन दोनों के बीच किसी दूसरी आँख की तरह जल रही थी, घड़ी वाली आँख से भी ठंडी। उस स्क्रीन पर एक माँ की मौत के बाद उसके बच्चे की क़ीमत... सादे अक्षरों में, रुपयों में लिखी थी।
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