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Chapter 19 of 28

अदालत के बाहर

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

उस आधे सुने वाक्य की रात बीत गई थी, पर उसका भार नैना के सीने से नहीं उतरा था। सुबह की पीली रोशनी में वो अब भी वही कर रही थी जो रात को शुरू किया था, एक-एक कपड़ा तह कर के उसी पुराने सूटकेस में रखना, वही सूटकेस जो वो एक साल पहले इस घर में लाई थी।

पर आज घर छोड़ना इतना आसान नहीं था। दीवार पर टँगे कैलेंडर पर एक तारीख़ लाल घेरे में थी, आज से तीसरे दिन, पिहू की कस्टडी की पहली सुनवाई। जिस दिन काग़ज़ पर ये शादी ख़त्म होनी थी, ठीक उसके बाद उसे उसी शादी को अदालत के सामने सबसे सच्ची साबित करना था।

दरवाज़े पर एक आहट हुई। कायरा खड़ी थी, स्कूल की ड्रेस में, बालों में आधी गुँथी चोटी, और उसकी नज़र सीधे उस खुले सूटकेस पर जमी थी।

"मम्मा... ये सूटकेस क्यों निकाला?" "आप कहीं जा रही हो?"

"अरे नहीं, बेटा। बस... अलमारी साफ़ कर रही थी, पुरानी चीज़ें निकाल रही थी।" "तू तैयार हो गई? नाश्ता लगा दूँ?"

"आप झूठ बोल रही हो। मुझे पता है सूटकेस कब सफ़ाई के लिए निकलता है, और कब जाने के लिए।" "मैंने और पिहू ने कसम खाई थी, याद है? इस घर को टूटने नहीं देंगे।"

नैना का हाथ एक पल को रुक गया। उसे वो दिन याद आया जब इसी कायरा ने अपना और पिहू का सारा सामान एक ही बैग में बाँध लिया था, ताकि घर टूटे तो भी दोनों बहनें अलग न हों। और आज वही बच्ची उसे सामान बाँधते देख रही थी।

"कायरा, मेरी तरफ़ देख। तीन दिन बाद एक बहुत ज़रूरी दिन है, पिहू की सुनवाई। उस दिन हम सब मिलकर, एक परिवार की तरह, अदालत जाएँगे।" "वो लड़ाई अधूरी छोड़ कर मैं कहीं नहीं जाऊँगी। ये पक्का वादा है।"

कायरा ने एक लंबा पल उसे देखा, फिर बिना कुछ कहे मुड़ गई, पर जाते-जाते उसने सूटकेस की तरफ़ एक आख़िरी नज़र डाली, जैसे उसे याद रखना चाहती हो। और उन तीन दिनों में वो सूटकेस अलमारी के पास खुला ही पड़ा रहा, न पूरा भरा गया, न ख़ाली किया गया।

तीसरी सुबह, बेंगलुरु की फ़ैमिली कोर्ट के ठंडे गलियारे में, छत के पंखे की घरघराहट और फ़ाइलों की सरसराहट के बीच, नैना और विहान अगल-बगल खड़े थे, दो अजनबियों जैसे नहीं, पर पूरे पति-पत्नी जैसे भी नहीं। दोनों ने सबसे सलीक़े के कपड़े पहने थे, एक ऐसी शादी का सबूत बनने के लिए जिसे झूठा साबित करने वो सब लोग वहाँ जमा हुए थे।

गलियारे के दूसरे सिरे पर देवयानी बैठी थी, सफ़ेद किनारी वाली साड़ी में, हाथ में एक मोटी नीली फ़ाइल, चेहरे पर वही तलवार जैसी शांति। और उसके ठीक पीछे, दीवार से टिकी, अनाइशा खड़ी थी, जैसे वो भी इसी परिवार का हिस्सा हो।

"नैना... अंदर जो कुछ भी हो, वो लोग जो भी कहें... तुम बस पिहू और कायरा के बारे में सोचना। बाक़ी सब मैं सँभाल लूँगा।"

"मुझे पता है मुझे क्या करना है, विहान।" "एक आख़िरी बार... इस शादी को सच की तरह निभाना है।"

अफ़ताब ने पास आकर धीमे से बताया कि देवयानी के पास सिर्फ़ शुरुआती जाँच है, तीन हफ़्ते, अलग कमरे, पैसा, इससे ज़्यादा कुछ नहीं दिख रहा। पर जो सीलबंद लिफ़ाफ़ा रुस्तम ने महीनों पहले देवयानी को थमाया था, उसमें क्या था, ये अब तक कोई नहीं जानता था, न विहान, न नैना, न शायद ख़ुद देवयानी।

चपरासी ने नाम पुकारा। लकड़ी के भारी दरवाज़े खुले, और वो सब एक ऐसे कमरे में दाख़िल हुए जहाँ प्यार को सबूत में तौला जाता है, और कसमों को काग़ज़ पर परखा जाता है।

सुनवाई शुरू हुई। देवयानी का वकील उठा, एक ऊँचा, चिकनी आवाज़ वाला आदमी, और उसने अदालत के सामने एक कहानी रखनी शुरू की, ऐसी कहानी जिसका हर लफ़्ज़ सच था, और इसीलिए सबसे ख़तरनाक।

उसने कहा कि ये कोई प्रेम-विवाह नहीं, एक ठंडा सौदा है। कि शादी से सिर्फ़ तीन हफ़्ते पहले तक ये दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे। कि विहान ने शादी के ऐन बाद नैना के खाते में एक बड़ी रक़म भेजी थी। और कि उस घर में पति और पत्नी आज तक अलग कमरों में सोते हैं।

एक-एक बात के साथ कमरे की हवा भारी होती गई। जज ने अपनी ऐनक के ऊपर से पहले विहान को देखा, फिर नैना को, और उनकी क़लम फ़ाइल पर कुछ लिखने लगी।

"जज साहिबा, मैं एक माँ हूँ जिसने अपनी बेटी खोई है। मैं यहाँ सिर्फ़ अपनी नातिन पिहू के लिए हूँ।" "एक मासूम बच्ची को एक ऐसे घर में नहीं छोड़ा जा सकता जहाँ शादी ही झूठी हो, जहाँ माँ-बाप एक-दूसरे के कमरे तक नहीं जाते, जहाँ प्यार सिर्फ़ अदालत को दिखाने के लिए सजाया जाता है।"

"ये सच नहीं है।" "जज साहिबा, मेरी बेटी उस घर में अब हर रात हँस कर सोती है। एक साल में पहली बार।"

जज ने हाथ उठाया। विहान की बारी अभी नहीं थी। देवयानी के वकील ने मुस्कुरा कर कहा कि अगर ये शादी इतनी ही सच्ची है, तो वो ख़ुद पत्नी को, नैना को, गवाही के कठघरे में बुलाना चाहेगा।

और नैना का नाम पुकारा गया। उसके पैर एक पल को भारी हो गए। वो उठी, विहान की तरफ़ एक नज़र डाली, वही आदमी जिसे उसने कल सुबह फ़ोन पर तलाक़ के काग़ज़ात तैयार करने को कहते सुना था।

गवाही के कठघरे में खड़े हो कर नैना ने वही शब्द दोहराए जो उसने सैकड़ों दुल्हनों को सिखाए थे, सच कहूँगी, सच के सिवा कुछ नहीं। उम्र भर कसमें सजाने वाली औरत आज ख़ुद एक कसम खा रही थी, और उसे नहीं पता था कि सामने बैठा आदमी उसे रखना चाहता है या जाने देना।

देवयानी के वकील ने बहुत नरमी से पूछना शुरू किया, जैसे कोई पुराना दोस्त हो। शादी से कितने दिन पहले आप विहान से मिली थीं? क्या ये सच है कि उन्होंने आपको पैसे दिए? क्या आप दोनों आज भी अलग कमरों में सोते हैं?

"हाँ... हम शादी से कुछ हफ़्ते पहले मिले थे।" "हाँ, उन्होंने मेरी भांजी की क़ानूनी लड़ाई के लिए मदद की थी।" "और हाँ... शुरू में हम अलग कमरों में सोते थे।"

हर 'हाँ' के बाद वकील पलट कर जज की तरफ़ देखता, जैसे कह रहा हो, सुना आपने। हर सच एक 'सौदे' की तस्वीर में एक और गहरा रंग भर रहा था।

फिर वकील एक पल रुका, और सबसे सीधा सवाल पूछा, वो सवाल जिसका जवाब काग़ज़ पर नहीं, सिर्फ़ दिल में था। "मिसेज़ नैना, एक सीधा सवाल। क्या आप विहान से प्यार करती हैं? या ये शादी सिर्फ़ अपनी भांजी को पाने का एक ज़रिया थी?"

नैना की नज़र अपने आप विहान की तरफ़ उठ गई। और उसी पल उसके कानों में कल सुबह की वो आवाज़ फिर गूँजी, तलाक़ के काग़ज़ात तैयार कर लो, जैसा तय हुआ था। उसे नहीं पता था कि उसी आदमी की आवाज़ ठीक उसके बाद काँप गई थी।

और तभी नैना ने एक फ़ैसला किया। जो सच वो पिछले एक साल में विहान से नहीं कह पाई थी, वो आज इस भरी अदालत में, एक अजनबी वकील के सवाल के जवाब में कह देगी। कम से कम एक बार, ज़ोर से।

"जज साहिबा, आप पूछ रही हैं कि क्या मैं इस आदमी से प्यार करती हूँ।" "मैं वेडिंग प्लानर हूँ। बरसों मैंने दूसरों की कसमें सजाईं और ख़ुद किसी कसम पर यक़ीन नहीं किया। जिस दिन मैंने उस घर में क़दम रखा था, मैंने भी यही सोचा था, ये सिर्फ़ काग़ज़ है।"

"पर एक साल में उस घर ने मुझे फिर से हँसना सिखाया। दो बच्चियों ने मुझे माँ बना दिया। और एक आदमी ने, जो पत्थर बन कर बैठा था, मुझे फिर से कसमों पर यक़ीन करना सिखा दिया।" "तो हाँ। ये शादी काग़ज़ पर शुरू हुई थी। पर मैं आज सच कह रही हूँ, इससे ज़्यादा सच्ची शादी मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखी। मैं उससे प्यार करती हूँ।"

विहान का साँस रुक गया। ये वो शब्द थे जो नैना ने उससे कभी नहीं कहे थे, जो वो कल रात बरामदे की सीढ़ियों पर भी नहीं कह पाई थी, और आज वो एक अजनबी वकील के सवाल पर, जज के सामने कह रही थी। और विहान के दिल में एक ठंडा डर उठा, कि कहीं वो ये सब सिर्फ़ कायरा की लड़ाई जीतने के लिए तो नहीं कह रही।

एक पल को कमरे में गहरी ख़ामोशी छा गई। पर जज का चेहरा नहीं पिघला। उसने अपनी ऐनक उतारी और धीरे से कहा कि जज़्बात अपनी जगह हैं, पर अदालत तथ्यों पर चलती है। एक तरफ़ एक ठहरा हुआ, दौलतमंद, दादा-दादी का घर था, और दूसरी तरफ़ एक ऐसी शादी, जिस पर ख़ुद सुविधा का शक था। और इस तराज़ू में, अभी पलड़ा देवयानी की तरफ़ झुका हुआ था।

नैना कठघरे से उतरने ही वाली थी, जब देवयानी के वकील ने कहा, "जज साहिबा, बचाव पक्ष कहता है ये शादी सच्ची है। अदालत ख़ुद इसका फ़ैसला कर ले।" और उसने अपनी नीली फ़ाइल से काग़ज़ों का एक पतला सा पुलिंदा निकाला।

विहान की नज़र उस काग़ज़ पर पड़ी, और उसका ख़ून जम गया। ये कोई आम काग़ज़ नहीं था। ये वही अनुबंध था, वही काग़ज़ी कसमें, जिस पर एक साल पहले उन दोनों ने दस्तख़त किए थे। वो काग़ज़ जो अफ़ताब की तिजोरी में बंद पड़ा होना चाहिए था, आज देवयानी के वकील के हाथ में लहरा रहा था।

"ये... ये उनके पास कैसे आया? ये तो सील था। इसकी सिर्फ़ एक ही कॉपी थी, हमारे पास।"

वकील ने वो काग़ज़ ऊँचा उठाया और अदालत के सामने ठंडी, साफ़ आवाज़ में एक-एक शर्त पढ़नी शुरू की। "धारा एक, दोनों पक्ष अलग कमरों में रहेंगे। धारा दो, कोई भावना नहीं। धारा तीन, ठीक एक साल बाद, ये विवाह ख़ुद-ब-ख़ुद रद्द माना जाएगा।"

जिसे नैना ने अभी-अभी अपनी सबसे सच्ची शादी कहा था, वो अब एक काग़ज़ पर, दस्तख़त के साथ, एक सौदे की तरह अदालत की फ़ाइल में दर्ज हो रहा था। जज ने वो काग़ज़ हाथ में लिया, धीरे-धीरे पन्ने पलटे, और उसके चेहरे पर जो भाव उभरा, उसने कमरे की बची-खुची गर्मी भी सोख ली।

"ये तो... ये तो हमारा अपना काग़ज़ है।"

देवयानी ने अपनी जगह पर सिर्फ़ हल्का सा सिर झुकाया, जैसे कोई खिलाड़ी अपना आख़िरी पत्ता मेज़ पर फेंक कर आराम से पीछे टिक जाता है। और उसके पीछे खड़ी अनाइशा ने बहुत धीरे से अपनी नज़र फ़र्श पर टिका ली, जैसे इस काग़ज़ का इस कमरे तक पहुँचना, कहीं न कहीं, उसका भी एक राज़ हो।

और उसी पल नैना को समझ आ गया कि देवयानी ने अपना सबसे घातक हथियार आख़िर तक क्यों बचा कर रखा था। उनकी अपनी कसमें, उनके अपने हाथ के दस्तख़त, अब उन्हीं के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बन कर अदालत की मेज़ पर पड़े थे। काग़ज़ी कसमें, जो कभी झूठ मान कर लिखी गई थीं, आज उनके सच की सबसे बड़ी दुश्मन बन कर, अदालत के रिकॉर्ड में, सबूत नंबर एक की तरह दर्ज हो चुकी थीं।

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