Chapter 12 of 28
आधी सच्चाई
अपने नाम की फ़ाइल हाथ में लिए नैना और विहान की पहली सच्ची लड़ाई छिड़ती है, और बीच लड़ाई में उन्हें याद आता है कि दीवार में लगा कैमरा उनका हर लफ़्ज़ देवयानी तक पहुँचा रहा है, तो सच बोलने के लिए दोनों को अपने ही घर से भाग कर अँधेरे बगीचे में छुपना पड़ता है। वहाँ विहान बिना किसी बहाने के मानता है कि वो जाँच उसे जानने से पहले, डर की एक मशीन ने की थी, और कायरा एक बैग बाँध कर आ खड़ी होती है ताकि घर टूटे तो भी दोनों बहनें अलग न हों। सुलह की सुबह जब घर पहली बार असली लगता है, गेट पर अदालत का एक आदमी एक बंद लिफ़ाफ़ा लेकर आता है।
आधी रात कब की बीत चुकी थी, और शीशे के घर का सबसे ठंडा कमरा, विहान का अध्ययन-कक्ष, अब भी जल रहा था। नैना खड़ी थी, हाथ में अपने ही नाम की वो खुली फ़ाइल थामे, जिसकी तारीख़ें उसकी पहली मुलाक़ात से भी पुरानी थीं। और तभी, पीछे दरवाज़ा खुला, और वो आदमी अंदर आया, जिसे उस रात नींद उतनी ही दूर थी जितनी उसे।
"नैना? तुम... यहाँ? इस वक़्त?" "वो फ़ाइल... वो तुम्हारे हाथ में क्या कर रही है?"
"हाँ, विहान। मैं यहाँ। आपके इसी करीने से सजे कमरे में, जहाँ हर जज़्बात एक ताले में बंद है।" "और ये मेरे हाथ में क्या है, ये तो आप मुझसे बेहतर जानते हैं। मेरा नाम। आपके अपने हाथ की लगवाई हुई जाँच।"
"रुको। नैना, रुको... मैं समझाता हूँ।" "वो फ़ाइल जैसी दिखती है, वैसी है नहीं।"
"तो समझाइए। ये तारीख़ समझाइए, विहान।" "हमारी पहली मुलाक़ात से हफ़्ते भर पहले की है ये। मतलब, मुझे इस घर में बिठाने से भी पहले, आपने मुझे अँधेरे से जाँच लिया था। ठीक देवयानी की तरह। ठीक रुस्तम की तरह।"
और यही इस पूरी शादी में पहली बार था कि दोनों में से कोई अभिनय नहीं कर रहा था। ना किसी अधिकारी के लिए, ना देवयानी के लिए, ना बच्चियों के लिए। ये लड़ाई सच्ची थी, और इसीलिए ख़तरनाक भी।
"वो जाँच तुम्हारे बारे में थी ही नहीं, नैना।" "उस वक़्त तुम... तुम कोई थीं ही नहीं। बस एक नाम थीं, एक लंबी लिस्ट में।"
"एक नाम। एक लिस्ट में।" "हाँ। यही तो मैं हमेशा से हूँ, है ना, विहान? किसी की लिस्ट में एक नाम। अदालत की फ़ाइल में एक अर्ज़ी। आपके अनुबंध में एक दस्तख़त।" "आप सबके लिए मैं एक काग़ज़ हूँ। और काग़ज़ का कोई दिल नहीं होता।"
वो पलटी और उस ठंडे कमरे से बाहर निकल आई, और विहान उसके पीछे। लड़ाई अब अध्ययन-कक्ष की दीवारों से निकल कर अँधेरे बैठक-घर में फैल गई। और वो इतनी आहत थी कि उसे वो एक बात याद ही नहीं रही, जो ये घर कभी नहीं भूलता।
"और आपको पता है सबसे मज़ेदार बात क्या है? हमारी ये पूरी शादी ही तो एक जाँच है! पैसा, दस्तख़त, कोई जज़्बात नहीं, एक साल का अनुबंध, फिर ख़ामोश तलाक़..."
"नैना, रुको! बस... रुको।" "घड़ी। ताक़ पर रखी वो घड़ी।"
और उसका सारा ग़ुस्सा एक पल में ठंडा पड़ गया, क्योंकि उसे याद आ गया। वो सुई जितनी लाल रोशनी, जो उसने हफ़्तों पहले उसी घड़ी के भीतर देखी थी। देवयानी का लगाया हुआ कैमरा। उनकी तीन महीने की पहली सच्ची घड़ी, एक-एक लफ़्ज़ के साथ, दुश्मन के लिए रिकॉर्ड होती हुई।
"वो हमारी हर बात सुन रही है, नैना। और तुम अभी जो चिल्ला रही थीं..." "...'अनुबंध', 'पैसा', 'तलाक़'। ये हर लफ़्ज़ उसके काम का है। यही तो वो साबित करना चाहती है, कि ये शादी सिर्फ़ काग़ज़ की है।"
"हे भगवान... मैंने ये सब उस कैमरे के सामने कह दिया।" "मैंने अपने ही हाथों उसे वो सबूत दे दिया, जो वो महीनों से ढूँढ रही है।"
"बाहर चलो। बगीचे में। वहाँ कोई कैमरा नहीं पहुँचता।" "अगर हमें लड़ना ही है, नैना, तो वहीं लड़ेंगे। जहाँ सिर्फ़ हम दो हों, और कोई तीसरी आँख न हो।"
और फिर वो हुआ जो सबसे अजीब था। दो लोग, जो आज तक एक-दूसरे से पूरी तरह सच बोले ही नहीं थे, अब अपने ही घर की दीवारों से छुप कर, सिर्फ़ इसलिए बाहर भाग रहे थे, ताकि वो सच बोल सकें।
रात का बगीचा। दीवार के उस पार शहर की दबी हुई गुनगुनाहट, और पैरों तले भीगी घास। यहाँ शीशा और उसकी ताकती आँख नहीं पहुँचती थी। यहाँ, आख़िरकार, कोई अभिनय नहीं कर रहा था।
"ठीक है। यहाँ कोई नहीं सुन रहा।" "तो अब बोलिए, विहान। पूरा सच। कोई वकील वाली सधी हुई कतरनी नहीं। वो फ़ाइल क्यों बनी?"
"मेहर के जाने के बाद..." "...जब देवयानी ने पिहू के इर्द-गिर्द मँडराना शुरू किया, तो मैं डर गया, नैना। और मैंने उस डर से एक दीवार खड़ी कर दी। एक सुरक्षा एजेंसी। जो भी पिहू के पास आता, हर आया, हर टीचर, हर नौकर, सबकी जाँच होती थी।"
"तुम्हारा नाम उस लिस्ट में सिर्फ़ इसलिए आया क्योंकि उस संगीत में तुम पिहू के पास थीं। किसी ने तुम्हें चुन कर नहीं जाँचा, नैना।" "एक मशीन थी, जो डर से चलती थी, और उसने तुम्हें भी बाक़ी सबकी तरह जाँच लिया। मैं इसका बचाव नहीं कर रहा। मैं बस सच बता रहा हूँ।"
"डर से चलती मशीन।" "और जिस दिन आपने मेरे सामने वो सौदा रखा? तब तक तो आप ये पूरी फ़ाइल पढ़ चुके थे। आप मेरी हर कमज़ोरी जानते थे। मेरा कर्ज़, कायरा, ध्रुव का छोड़ कर जाना। आप जानते थे कि मैं ना नहीं कह पाऊँगी।"
और यही इस पूरी बात की सबसे तेज़ धार थी। वो उसके पास अंधा होकर नहीं आया था। वो ठीक-ठीक जानता था कि उसका सबसे गहरा ज़ख़्म कहाँ है, और उसने अपना ठंडा सौदा ठीक उसी ज़ख़्म पर रखा था।
"हाँ। जानता था।" "और मैं इसके लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा, नैना, क्योंकि माफ़ी से वो फ़ाइल मिटेगी नहीं, और जो हुआ वो बदलेगा नहीं।" "पर एक बात उस फ़ाइल में नहीं लिखी थी। एक बात जो मैं तुम्हें बता सकता हूँ।"
"क्या?"
"उस फ़ाइल ने मुझे तुम्हारे कर्ज़ बताए। तुम्हारी हार बताई। तुम्हारा छूट गया मंगेतर बताया।" "पर उसने ये नहीं बताया कि तुम मेरी एक साल से ख़ामोश बेटी को हँसा दोगी। उसने ये नहीं बताया कि तुम दो बच्चियों के लिए, जिनमें से एक तुम्हारी भी नहीं, ऐसे लड़ोगी जैसे दोनों तुम्हारी अपनी हों।"
"फ़ाइल ने मुझे तुम्हारी क़ीमत बताई थी, नैना।" "पर तुम इस पूरे घर की इकलौती चीज़ निकलीं, जिसकी क़ीमत मैं आज तक लगा ही नहीं पाया।"
और ये थी वो बात। तीन महीनों में इस शादी ने जो सबसे सेहतमंद काम किया था, वो यही था। दो लोग आख़िरकार एक रटी हुई स्क्रिप्ट दोहराने के बजाय सच चिल्ला रहे थे। ज़ख़्म अब खुला था, पर खुले ज़ख़्म, कम से कम, भर तो सकते हैं।
"आपको पता है मैं दूसरों की शादियों में सारा दिन क्या बेचती हूँ, विहान? कसमें।" "वो कसमें, जिन पर मेरा अपना यक़ीन कब का उठ चुका है। क्योंकि मुझसे जिसने भी वादा किया, वो काग़ज़ पर था। और आपकी सास ठीक कहती हैं, काग़ज़ फाड़ा जा सकता है। ध्रुव ने फाड़ा। अदालत ने फाड़ा।"
"मैं ध्रुव नहीं हूँ, नैना।"
"मुझे नहीं पता आप कौन हैं।" "आज रात से पहले, मुझे लगने लगा था कि मुझे थोड़ा-थोड़ा पता चलने लगा है। और शायद यही सबसे डरावनी बात है।"
और ठीक तभी, शीशे के घर में लौटते उस अँधेरे दरवाज़े से, एक नन्ही, अजीब तरह से शांत आवाज़ आई। कायरा। जागी हुई। छाती से एक छोटा-सा बैग चिपकाए हुए।
"मम्मा... पापा... मैंने सब सुन लिया।" "आप दोनों अंदर ज़ोर से लड़ रहे थे। मैं जागी हुई थी।"
"कायरा! बेटा, तुम यहाँ क्यों आईं? और ये बैग... ये बैग किसलिए है?"
"जब बड़े लोग साथ नहीं रहना चाहते, तो बच्चों को अलग-अलग घर भेज देते हैं। मैंने देखा है।" "तो मैंने अपना और पिहू का सारा सामान एक ही बैग में रख लिया। मेरी चीज़ें, और पिहू की चीज़ें, साथ।"
"आप दोनों जो भी करो। अलग हो जाओ, कुछ भी। पर मुझे और पिहू को अलग-अलग जगह मत भेजना।" "हम एक ही बैग हैं अब। हम साथ जाएँगे।"
और वो दोनों बड़े, जिन्होंने पूरी रात इस बात पर लड़ाई की थी कि किसने किसे जाँचा, किसने किसकी क़ीमत लगाई, बिलकुल ख़ामोश हो गए। क्योंकि उनके सामने एक छह साल की बच्ची खड़ी थी, जो वो बात पहले ही समझ चुकी थी जिसे बचाने के लिए ये पूरी शादी रची गई थी, और जो उसके टूटने से बच निकलने के लिए चुपचाप बैग बाँध चुकी थी।
"कायरा दीदी...? हम कहीं जा रहे हैं क्या? मुझे नींद आ रही है..."
"कहीं नहीं, पिहू। सो जा। मैं हूँ ना।" "इसको कुछ नहीं पता। इसकी असली मम्मा तो तब चली गई थीं जब ये बहुत छोटी थी। अब तो आप ही हो, मम्मा। अगर आप भी..."
"नहीं। नहीं, मेरी जान।" "कोई कहीं नहीं जाएगा। ये बैग हम अभी, इसी वक़्त, साथ मिल कर खोलेंगे। और तुम दोनों को कोई कभी अलग नहीं करेगा। ये मम्मा का वादा है।"
दोनों बच्चियों को वापस सुला दिया गया। कायरा तभी सोई जब नैना ने पिहू के बनाए उसी काग़ज़ के फूल पर हाथ रख कर वादा किया कि दो बहनें कभी दो अलग घर नहीं जाएँगी। और जब घर फिर से ख़ामोश हुआ, तो लड़ाई राख हो चुकी थी, पर उस राख के भीतर कुछ गुनगुना दहक रहा था।
"नैना... आज रात तुमने मेरी सबसे मोटी फ़ाइल का सबसे सच्चा पन्ना देख लिया।" "मैं ऐसा ही हूँ। डर से दीवारें बनाने वाला आदमी। पर मैं ये नहीं चाहता कि तुम भी उन दीवारों के पीछे बस एक और नाम बन कर रह जाओ।"
"मुझे बस इतना चाहिए था, विहान। कि इस पूरे शीशे के घर में कोई एक हो, जो मुझे काग़ज़ से हट कर देखे।" "और शायद आज रात, पहली बार... तुमने देखा।"
उसने अपने ही मुँह से निकला वो 'तुम' अँधेरे में गिरते सुना। वो 'आप' की दीवार, जिसे उसने तीन महीने एक ढाल की तरह उठाए रखा था, एक बार फिसल गई, और उसने उसे दोबारा नहीं उठाया।
और उसका हाथ उठा, नैना के चेहरे की तरफ़, वही हाथ जो एक बार एक इंच पहले ठिठक गया था। इस बार वो नहीं रुका। उसने उसके जबड़े पर ठहरी नमी को छू लिया। एक साँस भर की दूरी, पूरा घर सोया हुआ। दोनों माथे से माथा लगभग सटाए खड़े रहे, वो आख़िरी इंच अनछुआ, और दोनों समझ गए कि इस काग़ज़ी घर में कुछ चुपके से सच हो चला था।
सुबह शीशे के घर में उस तरह उतरी, जैसे पहले कभी नहीं उतरी थी। कुछ गुनगुनी। ठंडे शीशे पर रोशनी थोड़ी नरम। और रसोई से काका की खनक।
"बहूरानी! आज इस घर में कुछ तो बदला-बदला है।" "बारह बरस से मैं इस घर को खिला रहा हूँ, और साहब ने आज पहली बार नाश्ता अपने कमरे में नहीं, इसी मेज़ पर माँगा है, दोनों बच्चियों के साथ।" "मैं तो कहता हूँ, इस घर को किसी की नज़र लग गई है। अच्छी वाली नज़र।"
"काका, आप और आपकी नज़रें।" "चाय दो कप ज़्यादा बना दीजिए। आज मेज़ पर सब साथ बैठेंगे। बच्चियाँ भी, और... हम भी।"
और ठीक तभी, जब चाय से भाप उठ रही थी और एक साँस भर के लिए ये घर लगभग असली लग रहा था, गेट की घंटी बजी। कोई मेहमान नहीं। एक सादे कमीज़ वाला आदमी, हाथ में प्लास्टिक में मढ़ा एक बंद लिफ़ाफ़ा।
"साहब... गेट पर कोई आया है। कहता है अदालत से है।" "आपके नाम एक काग़ज़ है। कहता है, दस्तख़त लेकर ही जाएगा।"
"अदालत से?" "कस्टडी का मुक़दमा... इन्होंने सुनवाई की तारीख़ आगे खींच ली है। जो महीनों दूर थी..." "...अब सिर्फ़ एक महीने दूर है, नैना।"
"एक महीना?" "पर अफ़ताब जी ने तो कहा था अभी बहुत वक़्त है। और... और कायरा की गोद लेने की अर्ज़ी? वो भी तो इसी शादी के मज़बूत दिखने पर टिकी है।"
"और ये आख़िरी लाइन।" "'...सुनवाई से पहले, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी दिन, किसी भी घड़ी, एक बाल-कल्याण अधिकारी घर की जाँच के लिए आ सकता है।'" "बिना किसी सूचना के, नैना। किसी भी घड़ी।"
और वो दोनों, जिन्होंने चंद घंटे पहले ही इन शीशे की दीवारों के भीतर सच बोलना सीखा था, अब इस लिफ़ाफ़े की क्रूरता समझ गए। आज की इस सुबह से, किसी भी आम दिन, किसी भी आम घड़ी, एक अजनबी उस दरवाज़े से अंदर आ सकता था, ये तय करने कि उनकी ये नई-नई, बिना रिहर्सल वाली सच्चाई इतनी 'शादीशुदा' लगती है या नहीं कि दो नन्ही बच्चियाँ उनके पास रह सकें। जो घड़ी हमेशा एक साल की थी, वो अब एक महीने की रह गई थी। और वो तलवार, अब किसी भी साँस पर, बिना किसी आहट के, गिर सकती थी।
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