DesiHub

Chapter 15 of 30 9 min read

फिर वही दीवार

बड़ी बहू by Avni Oberoi

चर्वी की उँगलियाँ ताले पर टिकी रहीं, और दरवाज़ा एक सिसकती हुई चरमराहट के साथ भीतर की तरफ़ खुल गया, ठीक वैसे ही जैसे दस साल पहले खुला था, धूल की परत, ठहरा हुआ वक़्त, और वो खाली पालना जिस पर अब पहली बार रणबीर की नज़र पड़ी।

"ये... ये कमरा। ... दस साल में मैंने इसका दरवाज़ा भी नहीं देखा, चर्वी। ... मुझे पता भी नहीं था ये इतना छोटा है, इतना... अधूरा।"

रणबीर धीरे से उस खाली पालने के पास गया, अपनी उँगलियों से उसकी धूल भरी सलाख़ों को छुआ, जैसे दस साल बाद अपने खोए बेटे को पहली और आख़िरी बार महसूस कर रहा हो। ... उसकी साँस भारी हो गई।

"आज देखो, रणबीर। ... मेज़ पर वो डिक्टाफ़ोन है, बाऊजी की आवाज़ उसी में क़ैद है, दस साल से इसी मेज़ पर हमारा इंतज़ार कर रही थी।"

चर्वी ने वो डिक्टाफ़ोन उठाया, अपनी उँगली बटन पर रखी, और एक गहरी साँस ली, जैसे दस साल की हिम्मत को एक ही पल में इकट्ठा करना हो। ... रणबीर उसके क़रीब आ खड़ा हुआ, हाथ अब भी उसके हाथ में, दोनों की धड़कनें उस छोटे से कमरे में साफ़ सुनाई दे रही थीं।

ठीक उसी पल, उसकी जेब में रखा फ़ोन बज उठा, एक बेरहम, लगातार घंटी, इतनी रात को बजने वाली घंटी जो हमेशा बुरी ख़बर लाती है। ... स्क्रीन पर एक ही नाम चमक रहा था, सेठी।

"अभी नहीं... ... प्लीज़ अभी नहीं, आज रात नहीं, इतने सालों बाद बस थोड़ी देर और नहीं मिल सकती।"

पर घंटी बजती रही, बेरहम, लगातार, और चर्वी जानती थी कि सेठी इस वक़्त, इतनी रात को, बिना किसी बहुत ज़रूरी वजह के फ़ोन नहीं करता। ... उसने डिक्टाफ़ोन मेज़ पर वापस रख दिया, बिना बटन दबाए, और फ़ोन उठा लिया।

"बोलिए, सेठी जी। ... इतनी रात को, ज़रूर कुछ बड़ा हुआ है।"

फ़ोन के उस पार सेठी की आवाज़ काँप रही थी, और चर्वी का चेहरा हर वाक्य के साथ सफ़ेद पड़ता गया। ... बैंक ने अफ़वाह सुन ली थी कि राजवंश का फ़्लैगशिप सूर्यवंशी को बेचा जा रहा है, और सुबह छह बजे तक सारे क़र्ज़े वापस माँगने का नोटिस भेजने वाला था, जिससे चार हज़ार मज़दूरों की तनख़्वाह का पूरा हिसाब एक ही रात में डूब सकता था।

और उससे भी बुरा, सूर्यवंशी वालों ने ख़ुद ये अफ़वाह हवा में उछाली थी, काग़ज़ आधी रात में दस्तख़त के लिए तैयार कर के, इस उम्मीद में कि अफ़रा-तफ़री में घर की कोई कमज़ोर कड़ी घबरा कर दस्तख़त कर बैठेगी, और साम्राज्य एक झटके में हाथ से निकल जाएगा।

"मुझे अभी दो डायरेक्टरों को फ़ोन पर जगवाओ, अभी। ... बैंक को सुबह छह बजे से पहले एक भरोसे की चिट्ठी चाहिए, मेरे दस्तख़त के साथ। ... मैं आधे घंटे में तैयार हूँ, सेठी जी।"

उसने फ़ोन काटा, और एक पल को उस खुले दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ बाऊजी की आवाज़ अब भी उसका इंतज़ार कर रही थी। ... रणबीर की आँखों में उसने वही पुराना डर देखा, जो उसने ख़ुद बरसों पहले कहीं भीतर पाला था, कि क्या मैं फिर अकेली रह जाऊँगी।

"अभी? ... चर्वी, अभी हम यहाँ खड़े हैं, इतने पास, इतने बरसों बाद... ये रुक नहीं सकता, कुछ घंटे भी नहीं?"

"अगर आज रात बैंक ने क़र्ज़ वापस माँग लिया, तो चार हज़ार घरों का चूल्हा बुझ जाएगा, रणबीर, बाऊजी की पूरी उम्र की मेहनत एक रात में राख हो जाएगी। ... मुझे जाना होगा, अभी।"

रणबीर कुछ कह नहीं पाया, क्योंकि वो पहली बार साफ़ देख रहा था कि उसकी पत्नी बरसों से यही करती आई है, अपने दिल को पीछे धकेल कर, दूसरों का घर बचाने के लिए आगे बढ़ जाना, बिना किसी शिकायत के, बिना कभी थकने की इजाज़त लिए।

"ये रिकॉर्डिंग कहीं नहीं जा रही, रणबीर। ... दरवाज़ा फिर खुलेगा, मैं वादा करती हूँ। ... पर आज रात, ये आग पहले बुझानी होगी।"

उसने डिक्टाफ़ोन वापस मेज़ पर रख दिया, ठीक वहीं जहाँ वो दस साल रहा था, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई, अपने पति को उस अधूरे पल के साथ खड़ा छोड़ कर, जैसे इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा हो, वही कमरा, वही आवाज़, वही अकेलापन।

अगले एक घंटे में चर्वी ने वो किया जो वो दस साल से करती आई थी, चुपचाप, तेज़ी से, बिना घबराए। ... दो डायरेक्टरों को जगाया, बैंक को एक भरोसे की चिट्ठी भिजवाई, और सुबह होने से पहले वो आग बुझा दी जिसने कुछ घंटे पहले पूरे घर को जलाने की धमकी दी थी।

पर हर फ़ोन कॉल के बीच, उसकी नज़र बार-बार उस बंद गलियारे की तरफ़ उठती रही, जहाँ रणबीर अब भी उस अधूरे पल के साथ खड़ा था, और हर बार उसका दिल थोड़ा और भारी होता गया, हर सुलझते हिसाब के साथ एक और उलझा हुआ सवाल जुड़ता गया।

पौने छह बजे बैंक का जवाब आया, चिट्ठी मान ली गई थी, नोटिस टल गया था, और चार हज़ार घरों का चूल्हा एक और दिन के लिए बच गया। ... चर्वी ने राहत की एक लंबी साँस ली, पर उसकी आँखों में जीत की कोई चमक नहीं थी, सिर्फ़ थकान, और उस अधूरे कमरे की याद।

"तुम फिर वही कर रही हो, चर्वी। ... मुझे नज़दीक बुला कर, फिर दूर चली जाती हो, बिना बताए कब लौटोगी, या लौटोगी भी या नहीं।"

"मैं दूर नहीं जा रही, रणबीर, मैं बस डूबते जहाज़ को थाम रही हूँ। ... दस साल यही किया है, आज भी वही कर रही हूँ, और मुझे ख़ुद नहीं पता ये कब बदलेगा, या बदलेगा भी या नहीं।"

और दोनों जानते थे कि असली सवाल ये नहीं था कि वो कहाँ जा रही है, असली सवाल ये था कि क्या ये घर उसे कभी रुकने भी देगा, या हर बार कोई नई आग उसे खींच ले जाएगी, ठीक उस पल जब वो आख़िरकार रुकना चाहती हो।

सुबह की पहली रोशनी में, सेठी का एक आख़िरी संदेश आया, जिसने चर्वी को भीतर तक हिला दिया, कि बैंक तक वो अफ़वाह पहुँचाने वाला फ़ोन हवेली के ही एक लैंडलाइन नंबर से गया था, ठीक आधी रात के बाद, ठीक उसी वक़्त जब चर्वी उस बंद कमरे का ताला खोल रही थी।

"कोई इस घर के भीतर से जानता था कि मैं आज रात वो दरवाज़ा खोलने वाली हूँ। ... कोई जो मुझे उस कमरे से, या उस टेप से, दूर रखना चाहता था।"

चर्वी सीधी इंदुमती के कमरे की तरफ़ बढ़ी, नींद और थकान दोनों को पीछे छोड़ कर, क्योंकि अब सवाल सिर्फ़ बैंक का नहीं रहा था, सवाल ये था कि इस घर में उसका सबसे बड़ा दुश्मन आख़िर कौन है, और वो कितना डरा हुआ है, कि उसे एक बंद कमरे का दरवाज़ा भी बर्दाश्त नहीं हुआ।

दरवाज़ा खुला ही मिला, इंदुमती अंदर खड़ी थी, खिड़की के परदे अब भी बंद, चेहरे पर वो पुराना मुखौटा फिर से कसा हुआ, कल सुबह की वो कमज़ोरी जैसे कभी हुई ही न हो, बाल फिर से बँधे, पीठ फिर से सीधी, आँखों में फिर वही पुरानी हुकूमत, जैसे रात भर में वो अपने ही डर को दफ़ना कर आई हो।

"आपने बैंक तक वो फ़ोन करवाया, माँ जी। ... ठीक उसी वक़्त, जब मैं और रणबीर उस कमरे में खड़े थे। ... ये इत्तेफ़ाक़ नहीं था, और आप ये जानती हैं।"

"तुम सोचती हो मैं इतनी कमज़ोर हूँ कि एक बुख़ार भरी रात मुझे हरा देगी, बहू? ... मैंने पचास साल इस घर को चलाया है, एक फ़ोन कॉल मेरे लिए किसी बच्चे का खेल है।"

"आप डर गई हैं, माँ जी। ... इसीलिए ये किया। ... और डरे हुए लोग जल्दबाज़ी में ग़लतियाँ करते हैं, वही ग़लतियाँ जो आख़िर में पकड़ में आ जाती हैं, चाहे कितनी भी सफ़ाई से बनाई गई हों।"

इंदुमती की आँखों में एक पल को वही डर लौटा जो रामदुलारी ने कल सुबह देखा था, पर आज उसने उसे बहुत जल्दी दबा दिया, जैसे कोई पुराना, माहिर हाथ किसी टूटे बर्तन को फिर से जोड़ रहा हो, दरार छुपा कर नहीं, बस दिखाई न दे इतना छुपा कर।

"डर? ... तुम्हें क्या लगता है तुम्हारे हाथ में क्या है, बहू? एक पुराना टेप, एक मरे हुए आदमी की काँपती हुई आवाज़? ... इस घर में मुर्दों की नहीं, ज़िंदों की चलती है।"

इंदुमती चर्वी के बिल्कुल पास आ गई, इतनी पास कि उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से ज़्यादा कुछ नहीं रही, पर हर लफ़्ज़ किसी छुरी की धार जितना तेज़ था, और चर्वी को पहली बार लगा कि सामने खड़ी औरत सच में कुछ खोने से डर रही है, इतना डरी हुई कि अब वो अपने ही मुखौटे के पीछे साफ़ दिख रही थी।

"तुम्हें लगता है वो रिकॉर्डिंग तुम्हें बचा लेगी? ... मैंने दस साल इस बात का इंतज़ाम किया है कि इस घर में कोई, कोई भी, तुम्हारी बात मेरी बात से ज़्यादा कभी न माने। ... बजा लो वो टेप, बहू। ... देख लेना, ये घर किसे चुनता है।"

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.