अध्याय 30 / 30 पढ़ने में 11 मिनट
नया राजवंश
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
भोर में चर्वी अपना जवाब लाती है, कि वो पुराना क़ैदख़ाना घर सच में छोड़ चुकी है और नए घर में रुक रही है सिर्फ़ इसलिए कि ग्यारह साल में पहली बार वो ख़ुद रुकना चाहती है, और रणबीर से बराबरी का ब्याह माँगने को कहती है। रामदुलारी को उस रात का बोझ उतार कर मेज़ पर जगह मिलती है, कुनाल पहली ईमानदार कमाई की चिट्ठी भेजता है, इंदुमती चाबियाँ लौटा कर गहने विहान ट्रस्ट के नाम करती है, आँगन में विहान का अमलतास लगता है, और लोरी पहली बार पूरे घर में गूँजती है।
रणबीर सारी रात छत पर खड़ा रहा था, और जब आसमान का रंग स्याही से सिंदूरी हुआ, तो सीढ़ियों पर हल्के क़दमों की आवाज़ आई। ... चर्वी आ रही थी, हाथ में चाय के दो कप, और चेहरे पर वो फ़ैसला जो उसने रात भर सीने में बंद रखा था।
"तुम सच में पूरी रात यहीं खड़े रहे?" ... "मालूम है, दस साल मैं भी ऐसे ही जागी हूँ। ... एक रात में ही थक गए?"
"थका नहीं हूँ, चर्वी। ... डरा हुआ हूँ।" ... "पूरी ज़िंदगी में किसी बोर्ड, किसी सौदे से इतना नहीं डरा, जितना तुम्हारे इस एक जवाब से।"
चर्वी ने चाय का कप मुँडेर पर रखा। ... जब वो बोली, तो आवाज़ में ना जीत थी, ना हार, सिर्फ़ बरसों की जंग के बाद आया सुकून।
"मैंने सेठी से कहा था, जीतते ही मैं ये घर छोड़ दूँगी।" ... "तो सुनो, रणबीर। मैंने छोड़ दिया।"
"चर्वी..." ... "मतलब... तुम जा रही हो?"
"मैंने वो घर छोड़ा है जो दस साल मेरा क़ैदख़ाना था। ... जहाँ बहू एक नौकरानी थी और चुप्पी एक क़ानून।" ... "और वो घर, रणबीर, अब है ही नहीं। उसे हमने पिछले महीनों में गिरा दिया, ईंट-ईंट कर के।"
"जो घर अब बनेगा, उसमें मैं रुक रही हूँ। ... वसीयत की वजह से नहीं, मिष्टी की वजह से भी नहीं, तुम्हारी वजह से भी नहीं।" ... "सिर्फ़ इसलिए, कि ग्यारह साल में पहली बार, मैं ख़ुद रुकना चाहती हूँ।"
"पर एक बात समझ लो।" ... "मैं पुरानी शादी में वापस नहीं जा रही। वो शादी उसी रात मर गई थी जिस रात विहान गया था। ... अगर तुम्हें मैं चाहिए, रणबीर, तो इस बार ब्याह मुझसे माँगो। ... बराबरी से।"
और रणबीर राजवंश, राजवंश ग्रुप का बड़ा बेटा, उस छत पर, उगते सूरज के सामने, अपनी ही पत्नी के आगे घुटनों पर बैठ गया। ... बिना अँगूठी, बिना गवाहों, सिर्फ़ एक खुली हथेली और एक खुला चेहरा।
"चर्वी... मैं तुमसे वादा नहीं करता कि मैं कभी ग़लती नहीं करूँगा।" ... "मैं बस ये माँगता हूँ, कि अपनी बाक़ी ज़िंदगी मैं तुम्हें देखते हुए जियूँ। ... रोज़। बिना छुट्टी के। ... मुझसे ब्याह करोगी, चर्वी?"
"शर्तें मंज़ूर हैं।" ... "हाँ, रणबीर। ... इस बार, हाँ। मेरी अपनी हाँ।"
और छत की मुँडेर पर रखी दो चाय ठंडी होती रहीं, क्योंकि ग्यारह साल में पहली बार, दोनों के पास कहने को इतना कुछ था कि वक़्त कम पड़ रहा था।
अगले दिनों में राजवंश हाउस ने नई शक्ल पहननी शुरू की, और उसकी पहली गवाह बनी रसोई, जहाँ चर्वी एक सुबह ख़ुद आई, हाथ में एक ख़ाली थाली ले कर।
"अरे अरे, बहूरानी, आप क्यों... लाइए, मैं परोस दूँ।" ... "मालकिन हो कर रसोई में खड़ी हैं, कोई देखेगा तो क्या कहेगा?"
"कहने दो, काकी।" ... "आज ये थाली मैं परोसूँगी, और तुम मेज़ पर बैठोगी। ... हमारे साथ। पहली बार नहीं, अब से हमेशा।"
रामदुलारी की आँखें छलक पड़ीं। ... पचास साल इस घर की देहरी के अंदर रह कर भी वो हमेशा देहरी के बाहर रही थी। ... पर आँसुओं के नीचे एक और बोझ था, जो आज भी उसके सीने पर रखा था।
"बहूरानी... एक बात कहनी है। ... उस रात, तूफ़ान वाली रात, मैंने ऊपर की आवाज़ें सुनी थीं। मालकिन की आवाज़, फाटक की आवाज़।" ... "और मैं डर के मारे चुप रही। दस साल चुप रही। ... मुझे माफ़ कर दो, बिटिया।"
"काकी, उस रात फाटक के बाहर कीचड़ में से मुझे किसने उठाया था?" ... "तुमने। ... सारा घर दीवारों के पीछे था, और तुम तूफ़ान में बाहर आईं। ... जो डर से चुप रहा, वो गुनहगार नहीं होता, काकी। गुनहगार वो होता है जिसने डर बोया। ... तुम्हारा हिसाब उसी रात साफ़ हो गया था।"
"दस साल बाद आज रात नींद आएगी, बिटिया।" ... "बाऊजी ठीक कहते थे। ... इस घर की तिजोरी में जो सबसे क़ीमती चीज़ आई, वो डोली में आई थी।"
उसी दोपहर सीतापुर की फ़ैक्ट्री से एक चिट्ठी आई। ... कुनाल, जो कभी मंचों पर तालियाँ बटोरता था, अब वहाँ सबसे नीचे की सीढ़ी से काम सीख रहा था, अपने ही नाम के साये से दूर।
चिट्ठी में लिखा था, भाभी, इस महीने पहली बार वो पैसे कमाए हैं जिन पर किसी और का नाम नहीं। ... रक़म छोटी है, पर रात की नींद बड़ी। ... कुछ माँगने की हिम्मत नहीं है, बस इतना कहना था, कि अब गिनती आने लगी है। और सबसे पहला हिसाब यही निकला, कि मुझ पर आपका कितना क़र्ज़ है।
"जवाब लिखवा दो, सेठी जी से।" ... "लिखना, वापसी का दरवाज़ा बंद नहीं है, कुनाल। ... पर वो दरवाज़ा उस दिन खुलेगा जिस दिन तुम बिना काँपे आईने के सामने खड़े हो सको। ... जल्दी मत करना। इस घर ने जल्दबाज़ी की बड़ी क़ीमत चुकाई है।"
उसी हफ़्ते बोर्ड की नई तालिका बनी। ... त्रिशा, जिसकी सच्चाई ने आख़िरी जंग पलटी थी, फ़्लैगशिप ब्रांड की कमान सँभालने लगी, और शेखर, जिसने आख़िर में हिम्मत सीख ली थी, टाउनशिप का मलबा साफ़ करने बैठा, इस बार अपने नाम से, अपनी मेहनत से।
किरती हवेली के अपने हिस्से में चुप रहने लगी थी, उस घर में जहाँ अब साज़िशों की कोई क़ीमत नहीं लगती थी। ... और चर्वी ने अपना वचन निभाया, उसकी बेटी की जगह पर कभी आँच नहीं आई।
और फिर आई वो शाम, जब बरसों बाद पूरा राजवंश ख़ानदान एक मेज़ पर बैठा। ... वही मेज़ जहाँ कभी चर्वी को खड़े रह कर शरबत परोसना पड़ता था। ... आज उस मेज़ के सिरहाने वाली कुर्सी ख़ाली थी, और सब चर्वी का इंतज़ार कर रहे थे।
पर उससे पहले इंदुमती उठी। ... धीमे, बूढ़े क़दमों से वो चर्वी के पास आई, और उसके हाथों में वो चीज़ रख दी जो उसने भरे आँगन में उसकी कमर से छीनी थी। ... घर की चाबियाँ।
"ये चाबियाँ मैंने तुझसे भरे आँगन में छीनी थीं, तमाशा बना कर।" ... "आज भरे आँगन में लौटा रही हूँ। ... छीनना आसान था, बहू। लौटाने में पचास साल का ग़ुरूर गलाना पड़ा है।"
"चाबियाँ मैं रख लूँगी, माँजी।" ... "पर इस घर में अब कोई तिजोरी किसी के ख़िलाफ़ बंद नहीं होगी। ... चाबी और ज़ंजीर में फ़र्क़ होता है। ये घर अब फ़र्क़ जानता है।"
"और एक काग़ज़ है।" ... "मेरे सारे गहने, मेरे हिस्से की जायदाद, सब बेच कर एक ट्रस्ट बनेगा। मज़दूरों के बच्चों की पढ़ाई के लिए। ... जो पैसा मैंने अपने मायके के लिए चुराया था, वो सूद समेत लौटेगा। ... और ट्रस्ट का नाम होगा... विहान।"
पूरी मेज़ साँस रोके बैठी रही। ... जिस औरत ने उस बच्चे को जनमने नहीं दिया था, वो आज अपना सब कुछ उसके नाम कर रही थी। ... क़र्ज़ इससे उतरता नहीं था, पर क़ुबूल ज़रूर होता था।
"और मैं हर साल चार महीने वृंदावन में रहूँगी, सेवा में।" ... "तू मुझे माफ़ करे ना करे, तेरी मर्ज़ी। मैं माँगूँगी भी नहीं। ... बस इतनी इजाज़त दे, कि लौटूँ तो इस घर के किसी कोने में जगह हो। ... हुक्म चलाने नहीं। सिर्फ़ रहने।"
"दादी, आप कहीं मत जाओ चार महीने।" ... "आप यहीं रहो। ... पर अब आप मम्मा को बहू नहीं बोलोगी। मम्मा बोलोगी। ... प्रॉमिस करो।"
और पचास साल हुक्म चलाने वाली इंदुमती राजवंश ने अपनी पोती के आगे, भरी मेज़ पर, धीरे से सिर हिला दिया। ... उस झुके सिर में जितनी हार थी, उतनी ही मुक्ति भी।
"चर्वी..." ... "उस दिन गुड़िया वाले कमरे में एक शब्द अटक गया था। ... आज नहीं अटकेगा। ... मुझे माफ़ कर दे, बेटा। हो सके तो।"
"माफ़ी एक दिन में नहीं आती, माँजी। ... पर आज से उसका रास्ता खुला है।" ... "खाना ठंडा हो रहा है। ... बैठिए। अपनी जगह पर।"
और उस शाम राजवंश हाउस की उस लंबी मेज़ पर कोई खड़ा नहीं रहा। ... रामदुलारी समेत, सब बैठे। ... खाना वही था जो हमेशा बनता था। बस पहली बार, उसका स्वाद किसी के आँसुओं से नमकीन नहीं था।
अगली सुबह चर्वी बाऊजी के पुराने कमरे में बैठी, उस आख़िरी काग़ज़ के सामने, जो राजवंश ग्रुप की कमान हमेशा के लिए उसके नाम करता था। ... दीवार पर बाऊजी की तस्वीर थी, ताज़े गेंदे के हार में, और उनकी आँखों में वही पुरानी, थकी हुई मोहब्बत।
सेठी ने काग़ज़ आगे बढ़ाया, और अपने सूखे अंदाज़ में सिर्फ़ इतना कहा, कि बाऊजी ने ये दिन देखने के लिए दस साल इंतज़ार किया था। ... चर्वी ने क़लम उठाई, और अपने पूरे, असली नाम से दस्तख़त किए। चर्वी राजवंश।
"आपने कहा था, आपने हिसाब बराबर कर दिया है।" ... "आज मैं कहती हूँ, बाऊजी। ... आपका हिसाब बराबर हुआ। आपकी बेटी ने आपका घर संभाल लिया।"
जाते-जाते सेठी एक पतली फ़ाइल मेज़ पर रख गए थे। ... उस पर एक नाम लिखा था, जिसे ये पूरा शहर आज भी देवता की तरह पूजता है। धर्मपाल सक्सेना। ... दस साल पुरानी जड़ का वो आख़िरी, अनखुला सिरा।
चर्वी ने फ़ाइल खोली नहीं। ... उसने उसे दराज़ में रखा, ताला घुमाया, और चाबी अपने पास रख ली। ... बाऊजी ने एक बही साफ़ की थी। अगली बही कब खुलेगी, ये अब वो औरत तय करेगी जिसे सब्र इसी घर ने सिखाया था। ... आज नहीं। आज इस घर का दिन था।
उस शाम आँगन के बीचों-बीच एक गड्ढा खोदा गया, और माली की जगह ख़ुद रणबीर ने खोदा। ... पास में एक नन्हा अमलतास का पौधा रखा था, और पूरा परिवार उसके गिर्द खड़ा था।
"मम्मा, इसका नाम क्या रखेंगे?" ... "पेड़ का भी तो नाम होना चाहिए। ... सब चीज़ों का होता है।"
"विहान।" ... "तुम्हारा बड़ा भाई, मिष्टी। ... वो इस घर में कभी रह नहीं पाया। ... अब हमेशा रहेगा। हर बरसात में बढ़ेगा, हर बसंत में फूलेगा।"
"भैया..." ... "ठीक है। मैं इसे रोज़ पानी दूँगी। ... और स्कूल की सारी बातें बताऊँगी। बड़े भाई को सब बताना पड़ता है।"
मिट्टी सबने डाली। ... रणबीर ने, चर्वी ने, त्रिशा ने, शेखर ने, रामदुलारी ने। ... और आख़िर में इंदुमती आगे बढ़ी, काँपते हाथों से एक लोटा पानी लिए, और उस नन्हे पौधे की जड़ में डाल दिया, जैसे कोई बरसों पुराना क़र्ज़ बूँद-बूँद लौटा रही हो।
"ग्यारह साल पहले मैं एक दरवाज़े से भाग गया था।" ... "आज हमारा बेटा खुले आँगन में है। ... ना कोई बंद कमरा, ना कोई बंद दरवाज़ा। ... थैंक यू, चर्वी। मुझे वापस रास्ता दिखाने के लिए।"
"रास्ता मैंने नहीं दिखाया, रणबीर।" ... "तुमने ख़ुद दस्तक दी थी। ... बस इतना याद रखना। हर दरवाज़ा उतनी ही बार खुलता है, जितनी बार कोई दस्तक देने की हिम्मत करे।"
रात को मिष्टी दोनों के बीच लेटी थी, एक हाथ माँ के, एक बाप के हाथ में। ... और नींद में उतरते-उतरते उसने वो फ़रमाइश की जो इस घर में ग्यारह साल किसी ने नहीं की थी।
"मम्मा... वो वाली लोरी सुनाओ ना। ... जो आप अकेले में गाती हो। ... आज सबके सामने गाओ।"
और चर्वी ने गाई। ... वही लोरी, जो दस साल एक बंद कमरे में, एक बंद सीने में क़ैद थी। ... पर आज उसकी आवाज़ काँपी नहीं। आज वो लोरी एक बच्चे के खोने का मातम नहीं थी, दो बच्चों के होने का शुक्राना थी। एक जो आँगन में जड़ पकड़ रहा था, एक जो बाँहों में साँस ले रही थी।
दीवार के उस पार कोई भागा नहीं। ... गलियारे में रामदुलारी ठिठकी, और मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई। अपने कमरे में इंदुमती ने आँखें मूँद लीं, और पहली बार उस आवाज़ को पूरा सुना। ... आज वो लोरी किसी दीवार के पीछे नहीं थी। आज वो पूरे घर में थी।
लखनऊ की उस पुरानी हवेली के फाटक पर आज भी वही नाम लिखा है, राजवंश हाउस। ... और उस घर में बड़ी बहू अब कोई हुक्म नहीं, कोई बोझ नहीं, कोई ताना नहीं। ... उस घर में बड़ी बहू एक ताज है, जो झुके हुए सिर पर नहीं, उठे हुए सिर पर पहना जाता है।
क्योंकि घर वो नहीं होता जहाँ आपका नाम दीवार पर लिखा हो। ... घर वो होता है जहाँ आपको देखा जाए। ... और राजवंश हाउस में अब, हर आँख खुली थी।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।