अध्याय 22 / 30 पढ़ने में 9 मिनट
माफ़ी की क़ीमत
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
इंदुमती के क़ुबूलनामे के फ़ौरन बाद टूटा हुआ रणबीर माफ़ी माँगने चर्वी के पीछे हवेली की छत तक चला आता है, पर आज़ाद हो चुकी चर्वी को वो इतनी आसानी से वापस नहीं मिलता। आख़िर में जब रणबीर कहता है कि वो अब उस पर यक़ीन करता है, चर्वी सिर्फ़ इतना पूछती है, जिसने माँ को बिना सबूत माना, वो सबूत के साथ ही उसे मानता है, तो इस शादी में अजनबी असल में कौन है।
बोर्डरूम की बत्तियाँ अब भी उतनी ही तेज़ जल रही थीं, पर उस उजाले के बीचोंबीच रणबीर किसी पत्थर की तरह खड़ा था, न आगे बढ़ पा रहा था, न पीछे। ... उसकी माँ के मुँह से निकले वो आख़िरी शब्द अब भी हवा में लटके हुए थे, तेरा बेटा मेरे ग़ुस्से ने छीना था, और उन शब्दों के नीचे उसका दस साल का पूरा ग़म एक झटके में गिर पड़ा था, एक ग़लत नींव पर बना पूरा घर, ढहता हुआ।
डायरेक्टर एक-एक कर बाहर खिसक रहे थे, कोई किसी की आँख में आँख नहीं डाल रहा था। ... कुनाल कब दरवाज़े से निकल गया, किसी को पता नहीं चला, उसका चेहरा उस जुआरी का था जिसने अपना आख़िरी पत्ता भी गँवा दिया हो। ... इंदुमती को दो नौकरानियों ने लगभग सहारा दे कर बाहर ले जाया, उनका ग़ुरूर अब भी वहीं फ़र्श पर पड़ा था, जहाँ वो टूटा था।
दरवाज़े के बाहर, अँधेरे गलियारे में, किसी ने देखा होता तो देखता कि कुनाल की जेब में फ़ोन उसी वक़्त जगमगा उठा था, सूर्यवंशी की तरफ़ से एक नंबर, जो हार के बाद भी उसका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था। ... वो अभी सिर्फ़ कुनाल की जेब में काँप रहा था, किसी को उसकी भनक तक नहीं थी।
"मैं... ... मैं यहीं खड़ा हूँ, चर्वी। ... और मुझे नहीं पता मैं किस ज़मीन पर खड़ा हूँ।" ... "दस साल मैंने एक कहानी को अपना ग़म माना। ... और वो कहानी मेरी माँ ने गढ़ी थी।"
चर्वी दरवाज़े की तरफ़ बढ़ चुकी थी, हाथ में वही पतली फ़ाइल, कंधे अब भी सीधे। ... वो रुकी, पर पलटी नहीं, जैसे रणबीर की आवाज़ सुनना काफ़ी था, उसकी तरफ़ मुड़ना अभी नहीं।
"हाँ, रणबीर। ... दस साल तुमने एक कहानी को अपना ग़म माना।" ... "मैं इस वक़्त बोर्ड का मलबा समेटने जा रही हूँ। ... चार हज़ार मज़दूर, बैंक, एक टूटा हुआ सौदा। ... बाक़ी बातें, कल।"
"कल नहीं, चर्वी। ... अभी। ... मुझे अभी बात करनी है, नहीं तो मुझे नहीं पता मैं ये रात इस सच के साथ कैसे काटूँगा।" ... "प्लीज़।"
चर्वी रुकी। ... दस साल में ये पहला मौक़ा था जब रणबीर की आवाज़ में गिड़गिड़ाहट थी, और वो पहली बार उसे सुन भी रही थी, पर उस उम्मीद के साथ नहीं जो उसकी आँखों में थी।
"ठीक है। ... पर यहाँ नहीं। ... इस कमरे में आज रात बहुत कुछ मर चुका है, रणबीर, मैं इस मलबे में एक बात और नहीं जोड़ना चाहती।"
हवेली रात के इस पहर में डूबी हुई थी, इंदुमती के कमरे की बत्ती बुझी हुई, नीचे रामदुलारी की रसोई में बस एक अकेला दीया जलता हुआ। ... छत पर चर्वी अकेली खड़ी थी, फ़ाइल अब भी हाथ में, जब रणबीर सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ ऊपर आया।
सीढ़ियों के नीचे, अँधेरे बरामदे में, रामदुलारी दुबकी खड़ी थी, न ऊपर आने की हिम्मत, न सोने की। ... दस साल जिस बहू को उसने चुपचाप अपना माना था, आज रात उसका सच बाहर आ चुका था, और बुढ़िया की आँखों में डर से ज़्यादा राहत थी, कि आख़िरकार, कोई तो देख पाया।
"चर्वी। ... मुझे माफ़ कर दो।" ... "मैंने तुम्हें दस साल एक क़ातिल समझा। ... अपनी बीवी को। ... अपने बच्चे की माँ को। ... और असल में मेरी अपनी माँ..."
चर्वी ने उसे बीच में नहीं टोका। ... उसने रणबीर को उस अधूरे वाक्य में खड़ा रहने दिया, जैसे वो जानती थी कि इस बार उसे बचाना उसका काम नहीं है।
"पूरा करो, रणबीर। ... कहो, तुम्हारी माँ ने तुम्हें दस साल एक झूठ खिलाया।" ... "मुझे नहीं, ख़ुद को सुनाओ ये बात। ... मैं तो ये दस साल से जानती थी।"
"तुम जानती थी। ... और मैंने कभी पूछा भी नहीं।" ... "मैं इतना अपने ग़म में डूबा था कि मैंने अपनी माँ को अपनी जगह सोचने दिया। ... और तुमने... तुमने दस साल एक ऐसे इल्ज़ाम के साथ जिया, जो कभी तुम्हारा था ही नहीं।"
"तुम्हें याद है, रणबीर, बच्चे के जाने के दसवें दिन? ... तुम अपने कमरे में बंद थे, और मैं नीचे बैठ कर बैंकों को फ़ोन कर रही थी, ताकि फ़ैक्ट्री की तनख़्वाहें न रुकें।" ... "उस दिन किसी ने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा कि मैं कैसे बैठी हूँ। ... सबने सिर्फ़ पूछा, हिसाब कब तक ठीक होगा।"
रणबीर की आँखों के पीछे कुछ हिला, जैसे कोई पुरानी तस्वीर अचानक नए रंगों में रँग गई हो। ... वो दसवाँ दिन उसे भी याद था, पर एक बिल्कुल अलग तस्वीर की तरह।
"मुझे याद है। ... मैंने सोचा था तुम पत्थर की हो, कि तुम्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता।" ... "आज समझ आ रहा है, तुम रो नहीं रही थी, चर्वी, क्योंकि रोने की इजाज़त इस घर ने तुम्हें कभी दी ही नहीं थी।"
एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे वो पुरानी गरमाहट लौट आई हो, जो कभी मिष्टी के बुख़ार वाली उस रात जागी थी। ... पर वो रात एक उम्मीद थी। ... आज की रात एक हिसाब थी, और हिसाब गरमाहट से नहीं चुकता।
"रणबीर, तुम सोचते हो आज रात, इस एक सच के खुलने से, दस साल का हिसाब बराबर हो गया?" ... "जो औरत दस साल अपने ही घर में अजनबी की तरह रही, जिसे किसी ने पलट कर देखा तक नहीं, वो एक रात में फिर से देखी जाना नहीं भूल जाती।"
एक नाम अब भी उस छत पर मौजूद था, बिना बोले, मिष्टी का। ... नानी के घर भेजी गई आठ साल की वो लड़की, जो नहीं जानती थी कि आज रात उसकी दुनिया का सबसे पुराना झूठ मिट्टी में मिल चुका है।
"मिष्टी को कल ले आएँ? ... उसे पता होना चाहिए कि उसकी माँ ने आज रात क्या जीता है। ... कि उसकी माँ चोर नहीं है।"
"अभी नहीं। ... जब तक ये घर ख़ुद तय नहीं कर लेता कि वो अपनी सास को किस नज़र से देखेगा, मिष्टी उस आग में वापस नहीं आएगी।" ... "मैंने उसे इस तूफ़ान से दूर भेजा था, रणबीर, सिर्फ़ बोर्ड के तूफ़ान से नहीं। ... इस घर के तूफ़ान से।"
नीचे हवेली में ख़बर हवा की तरह फैलने लगी थी। ... त्रिशा, जो हफ़्तों पहले ही अपने चमकते भाई से मुँह मोड़ चुकी थी, सबसे पहले जाग कर बाक़ी रिश्तेदारों को फ़ोन घुमा रही थी कि आज बोर्डरूम में असल में क्या हुआ, इससे पहले कि इंदुमती की तरफ़ से कोई नई, नरम कहानी घर में फैले।
उसके फ़ोन की स्क्रीन छत की मुँडेर पर जगमगा उठी, सेठी का नाम। ... चर्वी ने एक नज़र डाली, जवाब नहीं दिया, पर उसका चेहरा बता गया कि आज रात की जंग शायद अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है।
"सेठी साहब का मैसेज? ... इस वक़्त?" ... "चर्वी, बताओ मुझे। ... मैं अब पूछना चाहता हूँ। ... दस साल की तरह चुप नहीं रहना चाहता, सच में पूछना चाहता हूँ।"
"सौदा आज रात टूटा है, कुर्सी नहीं टूटी। ... सूर्यवंशी हारे नहीं हैं, रणबीर, बस आज की चाल हारे हैं।" ... "और कुनाल, जिसने आज अपना सब कुछ खोया है, वो अब किसी और के लिए हथियार बन सकता है। ... हमारे लिए नहीं। ... जंग घर के अंदर से बाहर जा रही है, रणबीर। ... वो भी अभी ख़त्म नहीं हुई।"
उसी वक़्त, शहर के दूसरे छोर पर, सूर्यवंशी हाउस की एक खिड़की की बत्ती अब भी जल रही थी, जैसे वहाँ बैठा कोई आज की हार को हार नहीं, बस अगली चाल का पहला क़दम मान रहा हो।
"तो बताओ मुझे मैं क्या करूँ। ... मैं बोर्ड के सामने खड़ा हो सकता हूँ, हर रिश्तेदार के सामने कह सकता हूँ कि तुम सही थी, मैं ग़लत था। ... मैं आज अपनी माँ के ख़िलाफ़ भी खड़ा हो चुका हूँ। ... मुझे कुछ तो करने दो, चर्वी।"
चर्वी ने उसे देखा, जैसे कोई कर्ज़दार आख़िरकार क़र्ज़ चुकाने आया हो, दस साल देर से। ... उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं था, उससे कहीं ज़्यादा थका देने वाली एक चीज़ थी, साफ़गोई।
"तुम्हें किसी के सामने खड़ा होने की ज़रूरत नहीं है, रणबीर। ... मुझे कोई सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए, न बोर्ड से, न इस ख़ानदान से, न तुमसे।" ... "जो चाहिए था, वो दस साल पहले चाहिए था। ... जब मैं रोज़ इस घर में अकेली खड़ी थी, और तुम एक कमरे की दूरी पर बैठे अपनी माँ की कहानी सुन रहे थे।"
"तो बताओ मुझे, चर्वी। ... मैं क्या करूँ। ... मुझे क्या चाहिए तुमसे, जो मैं दे सकूँ?"
चर्वी ने कुछ पल कुछ नहीं कहा, जैसे ये सवाल किसी बोर्डरूम की चाल से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो।
"मुझे नहीं पता, रणबीर। ... और यही बात मुझे तुम्हारी माँ के क़ुबूलनामे से भी ज़्यादा हिला देती है।" ... "कि दस साल बाद, मुझे ख़ुद नहीं पता मैं तुमसे क्या चाहती हूँ।"
"तो मत बताओ अभी। ... मैं इंतज़ार करूँगा, चर्वी। ... दस साल तुमने मेरा इंतज़ार, मेरी माँ की कहानी का इंतज़ार, बिना शिकायत के गुज़ारे। ... कम से कम इतना तो मैं कर सकता हूँ।"
"मुझे पता है मैं देर से आया हूँ। ... पर मैं यहाँ हूँ, चर्वी। ... आज मैं तुम पर यक़ीन करता हूँ। ... पूरी तरह।"
और वहाँ था, वो जुमला जो रणबीर को लगा शायद काफ़ी होगा। ... चर्वी की आँखों में कुछ हिला, पर वो गरमाहट नहीं थी, कोई पुराना दुख था, जो आख़िरकार शब्द पा रहा था।
"तुमने अपनी माँ पर दस साल बिना किसी सबूत के यक़ीन किया, रणबीर।" ... "मुझ पर तुम सिर्फ़ तब यक़ीन कर पाए, जब काग़ज़ ने तुम्हें मजबूर कर दिया।" ... "तो बताओ मुझे। ... इस शादी में अजनबी असल में कौन है?"
छत पर हवा जैसे थम गई थी, मानो घर ख़ुद जवाब का इंतज़ार कर रहा हो। ... और रणबीर के पास, दस साल में पहली बार, कोई जवाब नहीं था।
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