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अध्याय 16 / 30 पढ़ने में 11 मिनट

माँ का झूठ

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

चर्वी इंदुमती के कमरे से बाहर निकली, और सास के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी उसके कानों में किसी घंटी की तरह गूँज रहे थे, बजा लो वो टेप, बहू, देख लेना ये घर किसे चुनता है। ... बाहर बरामदे में सुबह की पहली सफ़ेद रोशनी फैल रही थी, पर चर्वी को लगा जैसे ये लंबी रात अभी ख़त्म ही नहीं हुई।

"वो सही कहती है... ... अगर मैंने अपने हाथ से वो टेप बजाया, तो ये मेरी सफ़ाई बन जाएगी, और इस घर ने दस साल मेरी सफ़ाई न मानने की तैयारी की है।" ... "ये सच किसी और के मुँह से नहीं, ख़ुद रणबीर के हाथ से खुलना चाहिए।"

पर चर्वी को नहीं पता था कि जिस अधूरे पल को वो रात के बीच पीछे छोड़ आई थी, वो अब भी उसी बंद नर्सरी में साँस ले रहा था। ... रणबीर वहीं खड़ा था, उसी खाली पालने के पास, और उसकी नज़र बार-बार उस मेज़ पर रखे डिक्टाफ़ोन पर जा टिकती थी, जिसे चर्वी बिना बजाए छोड़ गई थी।

"दस साल..." ... "दस साल मैंने इस औरत से एक ही सवाल का जवाब नहीं माँगा, क्योंकि मुझे डर था कि जवाब मेरी माँ को झूठा साबित कर देगा। ... और आज वही जवाब यहाँ, इसी मेज़ पर, एक बटन की दूरी पर रखा है।"

रणबीर का हाथ धीरे-धीरे उस डिक्टाफ़ोन की तरफ़ बढ़ा, और ठीक बटन के ऊपर आ कर ठहर गया। ... वो जानता था कि जो आवाज़ इस छोटी-सी मशीन में क़ैद है, एक बार सुन लेने के बाद उसे फिर कभी अनसुना नहीं किया जा सकेगा, और शायद इसीलिए वो दस साल इससे भागता रहा था।

"नहीं... ... अब और नहीं भागूँगा। ... आज सुन ही लेता हूँ, चाहे इसके बाद जो भी टूटे।"

उसने बटन दबा दिया। ... एक पल की खरखराहट, फिर टेप के घूमने की हल्की सी आवाज़, और फिर उस सूने कमरे में बाऊजी की आवाज़ गूँज उठी, वही आवाज़ जो हफ़्ते भर पहले तक इसी घर में साँस लेती थी, अब दस साल की चुप्पी के पार से लौटती हुई।

"बेटा... चर्वी... ... जब तुम ये सुनोगी, मैं जा चुका होऊँगा, और शायद यही ठीक है, क्योंकि जो मैं अब कहने जा रहा हूँ, वो तुम्हारे सामने कहने की हिम्मत मुझमें ज़िंदगी भर नहीं आई।" ... "दस साल पहले, जब ये पूरा घर डूब रहा था, तो उसे किसी कुनाल ने नहीं बचाया था, बेटा। ... उसे तुमने बचाया था।"

रणबीर के घुटने जैसे एक पल को काँप गए, और उसने पालने का किनारा थाम लिया। ... दस साल जिस कहानी को उसने पत्थर की तरह सच माना था, उसकी पहली ईंट अभी-अभी उसकी आँखों के सामने खिसक गई थी।

तभी गलियारे के उस पार से चर्वी के क़दम ठहर गए। ... बंद नर्सरी के अधखुले दरवाज़े से बाऊजी की आवाज़ छन कर बाहर आ रही थी, और चर्वी समझ गई, रणबीर ने वो बटन ख़ुद दबाया था, बिना उसके कहे, बिना उसका हाथ थामे। ... उसकी आँखें भर आईं, क्योंकि दस साल में पहली बार, ये सच किसी की सफ़ाई नहीं, किसी का अपना फ़ैसला बन रहा था।

"उस रात, जब बैंक दरवाज़े पर खड़े थे और चार हज़ार घरों का चूल्हा बुझने वाला था, तो तुमने अपने गहने बेच दिए, बेटा, अपने पिता का वो छोटा-सा हिस्सा भी, जो उनकी पूरी उम्र की जमा-पूँजी थी। ... और फिर तुमने वो सारा क़र्ज़ अपने कंधों पर उठा लिया, जो तुमने कभी लिया ही नहीं था।"

रणबीर की साँस अटक गई। ... उसे याद आया कि चर्वी के पिता आख़िरी बरसों में कितनी तंगी में गुज़रे थे, और उसने हमेशा मान लिया था कि ये उनकी अपनी नाकामी थी। ... आज पहली बार उसे पता चला कि वो छोटा-सा हिस्सा किस आग में झोंका गया था, किसके घर की लाज बचाने में।

"और सबसे बड़ा गुनाह मेरा है, चर्वी... ... मैंने ही तुमसे कहा था, चुप रहो। ... क्योंकि अगर सच बाहर आता, तो जिसका असल गुनाह था, वो इस घर का अपना ख़ून था, मेरे अपने बेहद क़रीब का कोई। ... और मैं, एक कमज़ोर बूढ़ा, अपने ही घर को टूटते नहीं देख सकता था, इसलिए मैंने एक नई बहू के कंधों पर पूरे ख़ानदान का पाप रख दिया।"

रणबीर का सिर बाऊजी के उस एक फ़िक़रे पर अटक गया, इस घर का अपना ख़ून, मेरे अपने बेहद क़रीब का कोई, पर बूढ़े ने कोई नाम नहीं लिया, जैसे मर कर भी उस नाम को ज़बान पर लाने की ताक़त उसमें न रही हो। ... और दरवाज़े पर खड़ी चर्वी की आँखों से एक आँसू चुपचाप ढलक गया, दस साल में पहली बार किसी और के सामने।

"इस घर ने तुम पर एक ऐसा क़र्ज़ चढ़ाया है, बेटा, जो ये सात जनम में नहीं उतार सकता। ... एक ज़ख़्म और है, पैसे से भी कहीं गहरा, जिसका हिसाब अभी बाक़ी है... पर उसका नाम मैं मर कर भी अपनी ज़बान पर नहीं ला सकता, क्योंकि उसे लेते ही ये घर राख हो जाएगा। ... वो सच तुम्हें ख़ुद तक पहुँचना होगा, बेटा। ... मुझे माफ़ कर देना।"

एक हल्की सी खरखराहट के साथ बाऊजी की आवाज़ थम गई, और डिक्टाफ़ोन में सिर्फ़ ख़ाली टेप घूमता रह गया। ... रणबीर धीरे से पलटा, और दरवाज़े पर खड़ी चर्वी उसे उसी नज़र से देख रही थी, जिस नज़र से वो दस साल से देखे जाने का इंतज़ार करती आई थी।

"दस साल..." ... "जिसे मैं इस घर का बोझ समझता रहा, वो असल में इस घर की रीढ़ थी। ... और मैंने... मैंने तुम्हें चोर समझा, चर्वी। ... अपनी ही पत्नी को, दस साल, चोर समझता रहा।"

"मैंने तुमसे कभी नहीं कहा कि मुझे चोर मत समझो, रणबीर। ... मैंने सिर्फ़ चुपचाप इंतज़ार किया कि किसी दिन तुम ख़ुद देखो। ... आज तुमने ख़ुद देखा, अपने हाथ से। ... इतना काफ़ी है।"

"अगर ये आधा सच है, तो बाक़ी आधा भी..." ... "माँ ने मुझसे जो कहा, मेरे बेटे के बारे में, उस रात के बारे में, वो भी...?" ... "मैं अभी माँ से पूछूँगा, चर्वी। ... अभी, इसी वक़्त।"

रणबीर तेज़ क़दमों से बाहर निकला, और चर्वी उसके पीछे। ... रास्ते में मिष्टी के कमरे का दरवाज़ा अधखुला था, बुख़ार उतरने के बाद वो गहरी नींद में सोई थी, एक नन्हा हाथ तकिये से बाहर लटका हुआ, बेख़बर कि उसके माँ-बाप की दुनिया आज सुबह फिर से पलट रही थी। ... चर्वी की नज़र एक पल को उस सोते चेहरे पर ठहरी, और उसने मन ही मन दुआ की कि आज जो तूफ़ान आने वाला है, उसकी आँच इस दरवाज़े तक न पहुँचे।

इंदुमती अब भी अपने कमरे में थी, वही बँधे बाल, वही सीधी पीठ, वही कसा हुआ मुखौटा, जैसे उसे पता हो कि आज कोई न कोई तूफ़ान इस दरवाज़े को ज़रूर खटखटाएगा। ... पर जब उसने अपने बड़े बेटे को उस तरह अंदर आते देखा, तो एक पल के लिए उसकी आँखों में वही डर लौटा, जो कल सुबह रामदुलारी ने देखा था।

"मैंने बाऊजी की रिकॉर्डिंग सुन ली है, माँ। ... पूरी। ... दस साल से आप जो कहानी मुझे सुनाती आई हैं, उसकी पहली ईंट अभी-अभी झूठी निकली।"

"रिकॉर्डिंग? ... एक मरते हुए बूढ़े की बहकी हुई बड़बड़ाहट, रणबीर? ... तू अपनी सगी माँ पर यक़ीन करेगा या एक घूमते हुए टेप पर, जिसमें कोई भी कुछ भी भर सकता है?"

"वो बहके हुए नहीं थे, माँ। ... एक-एक लफ़्ज़ साफ़ था। ... दस साल पहले कंपनी को चर्वी ने बचाया था, कुनाल ने नहीं। ... मेरी आँखों में देख कर कहिए कि ये झूठ है। ... कह सकती हैं?"

और तभी इंदुमती ने वो किया जो शायद चर्वी ने भी न सोचा हो। ... उसने इनकार नहीं किया। ... पचास साल की उस औरत ने, जिसने ज़िंदगी में कभी हार नहीं मानी थी, एक पल में हिसाब लगाया, और एक छोटा सच क़ुबूल कर लिया, सिर्फ़ इसलिए कि एक बड़ा झूठ सलामत रहे।

"हाँ। ... हाँ, रणबीर, कारोबार इसी ने बचाया था। ... मैंने कभी माना नहीं, पर आज मान लेती हूँ, तेरे सामने। ... ये औरत हिसाब-किताब में तेज़ है, इसने कंपनी सँभाली, ये सच है। ... ख़ुश?"

"तो... आप मान रही हैं? ... दस साल जिस बात को आप झूठ कहती रहीं, आज एक साँस में मान रही हैं?"

"पर बेटा... ... कारोबार और तेरे बेटे में फ़र्क़ है। ... पैसे का हिसाब ये जानती होगी, मान लिया। ... पर जिस रात मेरा पोता, इस राजवंश का इकलौता वारिस, इसके पेट में ही मर गया, उस रात का हिसाब कोई पुराना टेप नहीं बदल सकता। ... वो अपनी ज़िद में, अपनी महत्वाकांक्षा में अंधी हो कर उस तूफ़ान में निकली थी, और मेरे पोते को अपने साथ ले डूबी।"

"आप जानती हैं ये झूठ है, माँ जी। ... आप उस रात वहाँ थीं। ... आप जानती हैं मैं उस तूफ़ान में क्यों निकली थी, किसकी बात पर, किसके..."

"किसके क्या, बहू? ... बोल, सबके सामने बोल, अगर हिम्मत है।" ... "देख रणबीर, अब ये कहानी गढ़ेगी, अब ये पलट कर मुझ पर इल्ज़ाम लगाएगी, क्योंकि इसके पास अपनी सफ़ाई का एक भी सबूत नहीं है, सिर्फ़ आँसू हैं और अल्फ़ाज़।"

रणबीर की नज़र एक से दूसरे पर घूमती रही, माँ से पत्नी तक, पत्नी से माँ तक। ... एक बात सच निकली थी, तो उसका पूरा भरोसा हिल गया था, पर उसी हिले हुए भरोसे में अब उसे ये भी नहीं पता था कि माँ का कौन-सा लफ़्ज़ सच है और कौन-सा झूठ।

"बस करो! ... दोनों बस करो!" ... "एक बात झूठ निकली, माँ, तो मैं कैसे मानूँ कि बाक़ी सब सच है? ... और चर्वी, अगर तुम सच कह रही हो, तो मुझे सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं, कुछ ठोस चाहिए। ... किसी एक को, आज, मुझे सबूत देना होगा।"

रणबीर के मुँह से वो लफ़्ज़ निकलते ही इंदुमती के चेहरे का डर धीरे-धीरे किसी ठंडी जीत में बदलने लगा। ... क्योंकि सबूत ही वो जगह थी जहाँ वो दस साल से तैयार बैठी थी, और चर्वी ने पहली बार, उस बदलते चेहरे में, एक ऐसी चाल देखी जो उसने आते हुए नहीं देखी थी।

"सबूत? ... तू सबूत माँगता है, बेटा? ... ठीक है।" ... "मैं दस साल से जानती थी कि एक दिन ये घड़ी ज़रूर आएगी। ... इसीलिए मैंने उस रात की एक गवाह को आज तक सँभाल कर रखा है।"

"गवाह? ... कौन-सी गवाह, माँ जी? ... उस रात उस कमरे में तो..."

इंदुमती ने आवाज़ लगाई, और गलियारे के दूसरे छोर से एक बूढ़ी औरत धीरे-धीरे कमरे में दाख़िल हुई, सिर झुका हुआ, हाथ काँपते हुए, सफ़ेद बालों पर एक पुराना दुपट्टा। ... और चर्वी का ख़ून जम गया, क्योंकि वो चेहरा उसने दस साल पहले उस अस्पताल की उसी भयानक रात देखा था, वो नर्स जो उस रात वहीं मौजूद थी।

"ये सिस्टर उस रात अस्पताल में मौजूद थीं, रणबीर। ... इन्होंने अपनी इन्हीं आँखों से देखा था कि तेरी पत्नी किस हाल में, किस ज़िद में वहाँ पहुँची थी। ... पूछ इनसे, ख़ुद पूछ, कि उस रात तेरे बेटे की मौत का ज़िम्मेदार असल में कौन था।" ... "अब बता, बेटा... किस पर यक़ीन करेगा? एक मरे हुए बाप की आधी, अधूरी आवाज़ पर, या उस औरत पर जो उस रात अपनी आँखों से वहाँ मौजूद थी?"

रणबीर की नज़र उस काँपती हुई बूढ़ी औरत पर जम गई, फिर चर्वी पर, फिर अपनी माँ पर, और उसे लगा जैसे उसके पैरों तले की ज़मीन दो हिस्सों में फट गई हो, एक तरफ़ बाऊजी की आवाज़, दूसरी तरफ़ ये गवाह, और ठीक बीच की दरार पर वो ख़ुद, जो नहीं जानता था कि अपनी माँ के किस आधे सच पर यक़ीन करे और किस आधे झूठ पर। ... और उसी पल उस बूढ़ी औरत ने पहली बार अपना झुका हुआ सिर उठाया, अपने सूखे, काँपते होंठ खोले, जैसे दस साल से रटा हुआ कोई एक जुमला अभी, इसी कमरे में, बोलने ही वाली हो।

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