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अध्याय 27 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

घर की वापसी

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

बोर्डरूम के फ़ैसले की ख़बर हवेली तक चर्वी की गाड़ी से पहले पहुँच चुकी थी। ... दरबान ने फाटक खोलते हुए इस बार सिर नहीं झुकाया, आँखें झुकाईं। ... दस साल जिस औरत को नौकर समझा गया, आज उसकी गाड़ी की आवाज़ पर पूरा घर साँस रोक कर खड़ा था।

बरामदे में कोई तालियाँ नहीं थीं, कोई जयकारे नहीं। ... सिर्फ़ एक अजीब सी, भारी ख़ामोशी थी, उस घर की जो अब तक सिर्फ़ हुक्म देना जानता था और आज पहली बार किसी का इंतज़ार कर रहा था। ... जीत भी कभी-कभी दबे पाँव घर में घुसती है।

सबसे पहले रामदुलारी दौड़ी, हाथ में हल्दी का कटोरा, आँखों में दस साल का पानी इकट्ठा। ... उसने गाड़ी का दरवाज़ा ख़ुद खोला, जैसे आज पहली बार उसे इजाज़त माँगनी ना पड़ी हो।

"बहू रानी..." ... "दस साल मैंने रसोई की खिड़की से ये दिन देखने का इंतज़ार किया था। ... आज मेरी आँखें धन्य हो गईं।" ... "आज से इस घर में कोई तुम्हें नौकरानी नहीं कहेगा। ... मैं देख लूँगी।"

"रामदुलारी..." ... "तुमने जो मेरे लिए सहा है, वो मैं कभी नहीं भूलूँगी। ... आज की जीत आधी तुम्हारी है, इतना पक्का मानो।"

अंदर, अपने कमरे में, चर्वी ने सबसे पहले वो किया जो जीत का जश्न नहीं था। ... उसने अपनी अलमारी का सबसे निचला ख़ाना खोला, और गोमती फ़ाइनेंस की उस तसदीक़-शुदा नक़ल को, जिस पर एक अनदेखा नाम सोया पड़ा था, ताले के पीछे रख दिया। ... एक हिसाब अभी बाक़ी था, और आज उसे किसी को दिखाने का दिन नहीं था।

तभी बाहर बरामदे में एक जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी, तेज़ क़दमों की, किसी की जो दौड़ती हुई कभी चलती ही नहीं। ... मिष्टी नानी के घर से लौट आई थी, दो दिन के तूफ़ान के बाद, सीधा माँ की गोद ढूँढती हुई।

"मम्मा! ... रामदुलारी दादी ने फ़ोन पर बताया तुमने सबको हरा दिया! ... तुम अब सबकी बॉस हो?"

"बॉस नहीं, मेरी जान।" ... "बस... अब कोई मुझसे झूठ बुलवा नहीं सकता। ... इतना बदला है।"

"तो अब दादी नहीं कहेंगी कि तुम चोर हो?" ... "आज बताओगी उन्हें कि तुमने कभी कुछ चुराया ही नहीं?"

"आज बताऊँगी, बेटा।" ... "पर बताना और माफ़ी माँगना, दोनों अलग-अलग रास्ते हैं। ... वो रास्ता दादी को ख़ुद चलना होगा। ... मैं उन्हें धकेल नहीं सकती।"

अपने कमरे में लौटते ही चर्वी का फ़ोन फिर बजा, इस बार त्रिशा का नाम स्क्रीन पर था, वही त्रिशा जो सुबह तक अख़बारों की झूठी हेडलाइनें रोकने में जुटी थी।

"भाभी... आपने सच में कर दिखाया।" ... "मुझे माफ़ कर दीजिएगा, कि मैंने शुरू में कुनाल भैया की चमक में आपको देखा ही नहीं। ... वो पूरा शहर जो आपको चोर बुला रहा था, आज वही अख़बार आपकी तारीफ़ लिखने को बेताब है।"

"माफ़ी की ज़रूरत नहीं, त्रिशा।" ... "तुमने जिस दिन सच देखा, उसी दिन आ खड़ी हुई। ... इस घर में यही सबसे बड़ी बात है।"

रात होने से पहले सेठी का भी एक छोटा फ़ोन आया, सिर्फ़ इतना बताने कि रजिस्ट्रार के काग़ज़ात कल तक बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज हो जाएँगे, और चर्वी राजवंश अब काग़ज़ पर भी इस साम्राज्य की मालकिन थी। ... पर उस ख़बर ने उतनी राहत नहीं दी जितनी उम्मीद थी, क्योंकि असली जंग आज इसी घर के भोजन कक्ष में लड़ी जानी थी।

शाम ढलते ही हवेली का बड़ा भोजन-कक्ष अजीब तरह से ख़ाली लग रहा था। ... किरती और शेखर ऊपर अपने कमरे में थे, त्रिशा फ़ोन पर अख़बारों की झूठी हेडलाइनें काटने में जुटी थी, और मेज़ के सिरहाने, जहाँ दस साल इंदुमती का हुक्म गूँजता था, आज सिर्फ़ एक थकी हुई औरत बैठी थी।

इंदुमती के गले में आज कोई गहना नहीं था। ... उसने ख़ुद उतार दिए थे, सुबह बोर्डरूम से लौटते ही, जैसे कोई तमग़ा जो अब उसका हक़ नहीं रहा। ... उसके हाथ मेज़ पर यूँ पड़े थे जैसे उन्हें अब कोई हुक्म देना याद ना हो।

चर्वी दरवाज़े पर एक पल रुकी, फिर अंदर गई। ... दस साल वो इस मेज़ पर खड़ी रहती थी, आज पहली बार वो बैठी।

"आ गईं। ... अपनी जीत दिखाने?" ... "बैठो। ... आख़िर अब ये कुर्सी भी तुम्हारी ही है, हर कमरे की तरह।"

"मैं जीत दिखाने नहीं आई, माँजी।" ... "मैं सिर्फ़ बैठने आई हूँ। ... जैसे इस घर की कोई और बहू बैठती।"

"बहू?" ... "तुम अब बहू नहीं हो, चर्वी। ... तुम इस घर की मालकिन हो। ... मैंने ख़ुद अपनी ज़ुबान से तुम्हें उतार दिया, आज बोर्ड में, सबके सामने।"

"आप उतरी नहीं, माँजी। ... आपने सिर्फ़ वो झूठ उतारा है जो दस साल इस घर को ढोना नहीं चाहिए था।" ... "मैं आपको ज़लील करने नहीं आई। ... मैं सिर्फ़ सच के साथ बैठने आई हूँ।"

इंदुमती का चेहरा एक पल को टूटा, फिर फिर से पत्थर हो गया। ... दस साल हुक्म देना उसे आता था, माफ़ी माँगना नहीं।

"तुम्हें लगता है मैं तुमसे नफ़रत करती थी, चर्वी?" ... "मैं तुमसे डरती थी। ... तुम्हारी चुप्पी से, तुम्हारे उस हिसाब से जो कभी ग़लत नहीं होता था। ... मेरे अपने मायके का गुनाह तुम्हारी आँखों में हर रोज़ खड़ा रहता था, और मैं उसे देख नहीं पाती थी।"

"तो आपने मुझे तोड़ कर उस डर से भागना चुना।" ... "दस साल, माँजी। ... एक बच्चे की जान, एक शादी की बर्फ़, और मेरा नाम, चोर। ... सिर्फ़ इसलिए कि आपका डर बोलने से आसान था चुप रहना।"

इंदुमती ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गई। ... शायद पहली बार अपनी सफ़ाई का कोई शब्द उसे ख़ुद खोखला लगा।

"तो अब क्या चाहती हो, चर्वी? ... मेरी बरबादी? ... इस घर से मेरा नाम मिटा देना, जैसे मैंने तुम्हारा मिटाया था?"

"तुम भूल रही हो, चर्वी, इस घर की इज़्ज़त पचास साल से मेरे कंधों पर टिकी है।" ... "मैंने जो किया, अपने मायके के लिए किया, अपने लिए नहीं।"

"मुझे मालूम है, माँजी।" ... "और शायद इसीलिए मैं आज भी आपसे नफ़रत नहीं करती। ... पर एक माँ का डर, एक बेटे के ग़म की क़ीमत नहीं चुका सकता। ... वो हिसाब आपको ख़ुद बराबर करना होगा, मुझसे नहीं।"

"नहीं, माँजी।" ... "मैं आपसे बरबादी नहीं माँगती। ... मैं सिर्फ़ एक ईमानदार घर माँगती हूँ। ... जहाँ कोई किसी को चुप कराने के लिए झूठ ना बोले, चाहे वो डर से बोला जाए या ग़ुरूर से।"

इंदुमती ने पूछा, अपनी ही आवाज़ में एक अनजानी थकान के साथ, "और अगर मैं वो घर ना दे सकूँ?"

"तो हम फिर भी एक ही छत के नीचे रहेंगे, माँजी। ... पर मैं फिर कभी आपकी चुप्पी का बोझ अकेली नहीं उठाऊँगी। ... इतना ही फ़र्क़ होगा।"

रसोई के दरवाज़े की ओट से रामदुलारी ने दोनों औरतों को देखा, एक हाथ में थाली थामे, साँस रोके हुए। ... दस साल जिस जंग को उसने सहा था, आज पहली बार वो जंग शांत होती दिख रही थी, आँधी के बाद की उस चुप्पी की तरह जो अभी पूरी तरह भरोसे लायक़ नहीं।

ठीक उसी वक़्त मिष्टी दौड़ती हुई कमरे में आई, हाथ में एक टूटी हुई गुड़िया लिए, जिसे उसने ख़ुद रफ़ू करने की कोशिश की थी। ... उसने ना दादी की तरफ़ देखा ना माँ की तरफ़, बस दोनों के बीच खड़ी हो गई, जैसे उसकी जगह वहीं थी।

"दादी, देखो, मैंने गुड़िया की टाँग ख़ुद जोड़ी।" ... "मम्मा कहती है टूटी चीज़ें जुड़ सकती हैं, बस थोड़ा वक़्त लगता है।"

इंदुमती ने वो गुड़िया हाथ में ली, उँगलियाँ उस रफ़ू पर एक पल को ठहर गईं। ... और जब उसने ऊपर देखा, उसकी आँखों में वो नहीं था जो दस साल भर था, ना ग़ुरूर, ना डर। ... सिर्फ़ एक बूढ़ी औरत जो अचानक बहुत थकी हुई दिख रही थी।

इंदुमती की नज़र मिष्टी की आँखों पर टिक गई, वही आँखें जो बरसों पहले उसके अपने खोए बेटे की रही होंगी, जिसे उसने ठीक से देखने का मौक़ा भी नहीं पाया। ... एक पल को उसे याद आया, वो कौन थी, इस घर में ब्याह कर आने से पहले, एक डरी हुई नई बहू, जिसकी अपनी सास ने उसे कभी माफ़ नहीं किया था।

"मिष्टी..." ... "अपनी माँ को बाहर भेज दो थोड़ी देर के लिए, बेटा। ... मुझे उससे कुछ कहना है।"

मिष्टी चुपचाप एक कोने में हट गई, गुड़िया सीने से लगाए। ... चर्वी कुछ नहीं बोली, वो बस खड़ी रही, दस साल का इंतज़ार आज एक साँस में बदल चुका था।

"चर्वी, मुझे... मुझे..." ... "मुझे माफ़..."

और वहीं शब्द रुक गया। ... इंदुमती का गला बंद हो गया, ना ग़ुरूर उसे जाने दे रहा था, ना ग़म उसे बोलने दे रहा था। ... आधा शब्द हवा में लटका रहा, ना गिरा, ना पूरा हुआ।

चर्वी का चेहरा बहुत शांत रहा, उसकी आँखें सख़्त नहीं थीं। ... पर उसने कोई शब्द उधार नहीं दिया। ... उसने बस इंतज़ार किया, जैसे उस अधूरे शब्द को पूरा करने का हक़ सिर्फ़ इंदुमती का था, किसी और का नहीं।

मिष्टी ने अपनी दादी का हाथ छुआ, फिर अपनी माँ की तरफ़ देखा, समझ ना पाते हुए कि आज इस कमरे में इतनी चुप्पी क्यों है। ... चर्वी ने अपनी बेटी को देखा, फिर सास को, फिर वो अधूरा शब्द जो अब भी हवा में लटका था।

दरवाज़े के पास बाऊजी की वो पुरानी तस्वीर टँगी थी, जिसके नीचे कभी हर फ़ैसला हुक्म बन कर गूँजता था। ... उसी तस्वीर के सामने से गुज़रते हुए चर्वी को लगा जैसे बूढ़े की आँखें उसे कुछ याद दिला रही हों, हिसाब बराबर करना काफ़ी नहीं, उसे सही तरीक़े से करना भी ज़रूरी है।

और फिर, बिना कुछ कहे, चर्वी ने अपनी बेटी का हाथ थामा, इंदुमती की तरफ़ पीठ की, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई। ... कुछ माफ़ियाँ इतनी आसानी से पूरी नहीं होतीं कि एक आधा शब्द उन्हें पूरा कर दे। ... और घड़ी की सुई की तरह ठहरा हुआ, इंदुमती का हाथ अब भी हवा में उठा रह गया, उस बहू की तरफ़ जो जा चुकी थी, और जिसका आधा नाम अब भी उसके होंठों पर अटका था।

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