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अध्याय 17 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

गवाह का खेल

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

चर्वी की साँस उस दहलीज़ पर ही जम गई, जहाँ अभी-अभी बाऊजी की आवाज़ थमी थी। ... बूढ़ी नर्स ने अपना झुका सिर उठाया, एक पल इंदुमती की तरफ़ देखा, जैसे आख़िरी बार इजाज़त माँग रही हो, और फिर काँपते होंठों से बोलना शुरू किया।

"साहब... मैं... मैं उस रात ड्यूटी पर थी।" ... "बड़ी बहू जी बरामदे में खड़ी थीं, पूरी तरह भीगी हुई, दर्द से दोहरी हुई जा रही थीं। ... मैंने कहा, अंदर आइए, हालत ठीक नहीं है आपकी।"

"पर उन्होंने मुझे परे धकेल दिया... और कहा..." ... "'अभी नहीं। पहले मुझे एक फ़ोन करना है। ये बच्चा रुक सकता है... कारोबार नहीं रुकेगा।'"

रणबीर का चेहरा राख जैसा सफ़ेद पड़ गया। ... दस साल जिस औरत को उसने ठंडी, महत्वाकांक्षी, अपने ही बच्चे से बेपरवाह मान कर जिया था, वही तस्वीर अभी इस बूढ़ी सिस्टर के मुँह से एक सीधी, सच्ची गवाही बन कर लौट आई थी।

"तुमने... तुमने ये कहा था?" ... "कारोबार नहीं रुकेगा? ... अपने ही बच्चे के बारे में?"

"नहीं। ... मैंने ये नहीं कहा था, रणबीर। ... मैंने उस रात कोई फ़ोन नहीं किया, किसी कारोबार की बात नहीं की। ... मैं दर्द से इतनी बेहाल थी कि मुझे ठीक से खड़ा होना भी याद नहीं।"

"देख लिया, रणबीर? ... इसकी अपनी सफ़ाई भी वही है, जो दस साल से रही है, याद नहीं। ... पर इस सिस्टर को याद है। ... एक अजनबी को याद है, और माँ को झूठा, और बीवी को बेक़सूर मानेगा तू?"

पर उसी लम्हे, चर्वी के भीतर की रणनीतिकार, अपने ही ज़ख़्म के शोर के बीच भी, एक बात पर अटक गई। ... 'ये बच्चा रुक सकता है, कारोबार नहीं रुकेगा' ... ये किसी दर्द से तड़पती, बेहोशी के कगार पर खड़ी औरत का जुमला नहीं था। ... ये किसी बोर्डरूम की भाषा थी, किसी ने रट कर सिखाई हुई।

"सिस्टर जी... एक बात बताइए। ... उस रात अस्पताल में बिजली नहीं थी, जनरेटर ख़राब था, याद है आपको? ... मुझे भर्ती किस कमरे में किया गया था?"

"वो... वो..." ... "कमरा नंबर... याद नहीं, साहब, इतने साल हो गए। ... पर बाक़ी सब मुझे साफ़ याद है।"

"बस, बहू। ... बूढ़ी औरत की उम्र से हिसाब मत माँग। ... इन्हें इतना याद है कि तूने उस रात क्या कहा था, यही काफ़ी है।" ... "आप जा सकती हैं, सिस्टर जी। ... शुक्रिया।"

बूढ़ी नर्स सिर झुकाए, उतनी ही ख़ामोशी से कमरे से निकल गई, जितनी ख़ामोशी से आई थी, और अपने पीछे एक ऐसी चुप्पी छोड़ गई जिसमें रणबीर का पूरा यक़ीन डगमगा रहा था।

कमरे में एक अजीब सन्नाटा तैर गया, वो सन्नाटा जो किसी तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद नहीं, बल्कि उसके ठीक बीचोंबीच उतरता है। ... रणबीर की नज़र इंदुमती से चर्वी और चर्वी से इंदुमती के बीच यूँ भटक रही थी, जैसे कोई डूबता आदमी किनारे की तलाश में हो, पर आज दोनों किनारे धुँधले पड़ गए थे।

"मुझे... मुझे अकेला छोड़ दीजिए। ... दोनों।" ... "बस थोड़ी देर के लिए।"

और वो पलट कर कमरे से निकल गया, अपनी माँ की जीत और अपनी पत्नी के दर्द के बीच से गुज़रता हुआ, बिना किसी एक की तरफ़ देखे। ... इंदुमती के होंठों पर एक हल्की, थकी हुई मुस्कान तैर गई, पर चर्वी की आँखों में अब सिर्फ़ एक सवाल बचा था, ये लफ़्ज़ कहाँ से आया।

उस सुबह के बाद हवेली में एक अजीब सन्नाटा उतर आया, वो सन्नाटा जो तूफ़ान के बाद नहीं, तूफ़ान से ठीक पहले उतरता है। ... रणबीर पूरे दिन चर्वी से नज़रें चुराता रहा, जैसे उसे डर हो कि एक नज़र मिली, तो वो फिर उसी असमंजस में डूब जाएगा जिससे वो अभी उबर कर बाहर नहीं आ पाया।

"मुझे... मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए, चर्वी। ... एक तरफ़ बाऊजी की आवाज़ है, दूसरी तरफ़ वो सिस्टर। ... दोनों सच नहीं हो सकते, और मुझे नहीं पता किसे मानूँ।"

"ले लो, रणबीर। ... जितना चाहिए। ... मैं दस साल से इंतज़ार कर रही हूँ, कुछ दिन और सही।" ... "पर एक बात सुन लो। ... मैंने अपने बेटे के बारे में वो लफ़्ज़ कभी नहीं कहे। ... कभी नहीं।"

चर्वी को ख़ुद पर, इस घर पर एक कड़वी हँसी आई। ... कल रात मिष्टी के बुख़ार में जागते हुए जो बर्फ़ पहली बार पिघली थी, आज एक बूढ़ी सिस्टर के मुँह से निकले चंद लफ़्ज़ों ने उसे फिर से जमा दिया था। ... दस साल की जंग में उसने सीख लिया था कि इस घर में हर जीत की उम्र एक रात से ज़्यादा नहीं होती।

और उस निजी ज़ख़्म के पीछे, बोर्डरूम की घड़ी रुकी नहीं थी। ... ई.जी.एम. का दूसरा दौर अब हफ़्ते भर दूर था, चार हज़ार मज़दूरों की तनख़्वाह उसी फ़ैसले पर टँगी थी, और सेठी की सुबह-सुबह भेजी एक चिट्ठी में सिर्फ़ इतना लिखा था कि सूर्यवंशी वालों की तरफ़ से हलचल तेज़ हो गई है, और कुनाल घिरे हुए जानवर की तरह कोई आख़िरी दाँव खेलने की फ़िराक़ में है।

"ठीक है। ... तुम मुझे मेरे ज़ख़्म से तोड़ना चाहती हो, माँ जी। ... तो मैं ये तय करूँगी कि आपकी वो सिस्टर, आई कहाँ से थी।" ... "क्योंकि दस साल पुरानी याद इतनी सफ़ाई से रटी नहीं जाती। ... इसे किसी ने सिखाया है।"

उस रात सोने से पहले चर्वी मिष्टी के कमरे में रुकी, जैसे रोज़ रुकती थी। ... बच्ची नींद में करवट लेते हुए धीमे से कुछ बुदबुदाई, हलवा बनाने की, रामदुलारी दादी के साथ की, कल की एक छोटी-सी योजना। ... चर्वी ने उसका माथा चूमा, ये जानते हुए कि उसी छत के नीचे, कुछ ही देर पहले, किसी ने उसकी बेटी के नाम को एक हथियार में बदलने की नींव रख दी थी, पर आज वो इस नन्ही, बेख़बर हँसी को उस लड़ाई से दूर रखेगी।

अगले दो दिन चर्वी ने कोई शोर नहीं मचाया। ... न सेठी को बुलाया, न इंदुमती से भिड़ी। ... उसने बस वही किया जो वो दस साल से करती आई थी, चुपचाप, बिना किसी को भनक लगे, धागे जोड़े।

उसे याद आया कि यही तरीक़ा उसने कभी सुधा के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया था, एक झूठा काग़ज़ छोड़ कर देखना कि वो किसके हाथ जाता है। ... आज वो वही खेल उलटी दिशा में खेल रही थी, एक झूठे गवाह के पीछे चल कर देखना कि डोर असल में किसके हाथ में है।

रामदुलारी से उसने बस इतना पूछा कि क्या हवेली में हाल में कोई सिस्टर या नर्स किसी से मिलने आई थी, और बुढ़िया की आँखों में जो चमक उभरी, वो किसी जवाब से कम नहीं थी। ... उसने बताया कि दो दिन पहले किरती बिटिया की अपनी गाड़ी उसी सिस्टर को शहर के बाहर, एक छोटे नर्सिंग होम तक छोड़ने गई थी, जहाँ किरती के अपने भाई का दवाख़ाना है।

एक फ़ोन कॉल, एक पुराने क्लर्क से पूछा गया ज़रा-सा सवाल, और चर्वी के हाथ एक पतला-सा सुराग़ लग गया, कि उसी सिस्टर के खाते में पिछले महीने उस नर्सिंग होम से एक मोटी रक़म गई थी, ठीक उन्हीं दिनों जब इंदुमती ने पहली बार गवाह की बात छेड़ी थी।

और चर्वी को समझ आ गया, ये सिर्फ़ इंदुमती का दस साल पुराना इंतज़ाम नहीं था। ... किसी ने उस पुराने इंतज़ाम को हाल ही में, बहुत होशियारी से, नए सिरे से सींचा था। ... और वो हाथ माँ जी का नहीं था।

शाम को चर्वी सीधे किरती के कमरे में पहुँची, जहाँ मँझली बहू अपनी चाय की प्याली को यूँ थामे बैठी थी, जैसे इस घर में आज कुछ हुआ ही न हो।

"वो सिस्टर, किरती। ... जो आज सुबह माँ जी के कमरे में आई थी। ... तुम्हारे भाई के नर्सिंग होम से आती है, और पिछले महीने उसके खाते में एक मोटी रक़म भी वहीं से गई। ... इत्तेफ़ाक़ है, या तुम बताओगी?"

"अरे भाभी। ... आप तो जासूसी में भी उतनी ही तेज़ हैं जितनी हिसाब-किताब में। ... पर इत्तेफ़ाक़ को इत्तेफ़ाक़ रहने दीजिए न, इसमें साज़िश ढूँढ़ने से क्या मिलेगा।"

"मुझे कोई साज़िश नहीं ढूँढ़नी, किरती। ... मुझे बस ये जानना है कि इस घर की एक और औरत, मेरे बेटे की मौत को अपनी शतरंज की बिसात क्यों बना रही है। ... शेखर को कुर्सी चाहिए, ये मैं समझती हूँ। ... पर इस रास्ते से?"

"आप हर बार भूल जाती हैं, भाभी, कि इस घर में सिर्फ़ आप ही चार क़दम आगे नहीं सोचतीं। ... मैंने कुछ नहीं किया, बस... एक बूढ़ी औरत की याददाश्त को थोड़ा सहारा दिया। ... सच तो सच है, बस उसे बोलने के लिए कभी-कभी थोड़ी हिम्मत चाहिए होती है। ... और हिम्मत का दाम होता है।"

"याद रखना, किरती। ... जो आग तुम आज दूसरों के घर में लगा रही हो, वो कल तुम्हारे अपने आँगन तक भी पहुँच सकती है। ... मैं अभी तक चुप हूँ, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुझे अभी बड़ी लड़ाई लड़नी है। ... इसे कमज़ोरी मत समझना।"

"आप मुझे धमकी दे रही हैं, भाभी, या ख़ुद को दिलासा? ... क्योंकि जिस दिन से आपने बोर्ड में क़दम रखा है, इस घर में हर किसी को अपनी जगह के लिए लड़ना पड़ रहा है। ... मैं भी बस अपनी लड़ रही हूँ।"

"शेखर की भी अपनी जगह है, किरती, और वो तुम्हारी चालों से हर दिन छोटी होती जा रही है। ... तुम एक जुआ खेल रही हो, और जुए में कभी-कभी हारने वाला वो नहीं होता जो मेज़ पर बैठा है, बल्कि वो होता है जिसके नाम पर दाँव लगा है।"

"मैं आपकी कमज़ोरी में दिलचस्पी ही कहाँ रखती हूँ, भाभी। ... मुझे दिलचस्पी है आपकी ताक़त में। ... मिष्टी।" ... "आप जितना गहरा उस पुरानी रात में खोदेंगी, उतना ही गहरा मुझे भी खोदना पड़ेगा। ... और ज़मीन के नीचे जो निकलेगा, वो शायद आपकी बेटी के इस घर में रहने के हक़ पर ही सवाल खड़ा कर दे।" ... "सोच लीजिए, कौन-सी लड़ाई आप लड़ना चाहती हैं, बड़ी बहू।"

चर्वी वहीं जड़ खड़ी रह गई, उसकी हर रणनीति, हर हिसाब, एक पल के लिए ख़ामोश पड़ गया, क्योंकि किरती ने उस एक नाम पर उँगली रख दी थी, जिस पर इस घर की कोई और चाल अब तक नहीं पहुँची थी। ... मिष्टी। ... और चर्वी को पहली बार समझ आया कि इस बार का मुक़ाबला बोर्डरूम में नहीं, उसकी अपनी बेटी की देहरी पर लड़ा जाएगा।

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