अध्याय 26 / 30 पढ़ने में 11 मिनट
फ़ैसले की घड़ी
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
सुनवाई वाली सुबह चर्वी बोर्डरूम में असली मुखिया की तरह पूरी कड़ी खोल देती है, कि सूर्यवंशी का 'मेहरबान सौदा' दरअसल इसी घर के दस साल पहले चुराए पैसे से खड़ा है, जिससे सौदा और वसीयत की याचिका दोनों मर जाते हैं, रणबीर खुल कर उसके साथ खड़ा होता है और कुनाल पहली बार सच क़ुबूल कर के कुर्सी छोड़ देता है। पर जीत की देहरी पर सेठी गोमती फ़ाइनेंस की बुनियाद वाला पन्ना उसके हाथ में रखता है, जिस पर सूर्यवंशी नहीं, बल्कि एक ऐसा नाम दर्ज है जिसे पूरा शहर देवता मानता है।
राजवंश हाउस के दफ़्तर की खिड़कियों पर सुबह की पहली सफ़ेदी उतर रही थी, और चर्वी रात भर उस मेज़ के उस पार बैठी रही थी जहाँ दस साल का हिसाब अब एक नक़्शे की तरह बिछा था। ... जाली दस्तख़त एक तरफ़, गोमती फ़ाइनेंस की रजिस्ट्री दूसरी तरफ़, और बीच में सूर्यवंशी के एस्क्रो का वो काग़ज़ जो अब चीख़-चीख़ कर एक ही बात कह रहा था। ... आज की बोर्ड बैठक में जो फंदा खुलने वाला था, वो चर्वी ने दस साल की चुप्पी से बुना था।
पर उस पूरे नक़्शे में एक पन्ना अब भी औंधा पड़ा था। ... गोमती फ़ाइनेंस की बुनियाद वाला वो काग़ज़, जिस पर पहले मुनीम के दस्तख़त की जगह एक नाम सोया पड़ा था, और जिसे चर्वी ने जान-बूझ कर अभी तक उलटा नहीं था। ... वो नाम अँधेरे में एक रात और सो सकता था।
नीचे हवेली सोई पड़ी थी। ... मिष्टी दो दिन से नानी के घर थी, तूफ़ान से दूर, और रामदुलारी रसोई में जाग कर बार-बार ऊपर चाय भेजती रही थी, बिना कुछ पूछे। ... वो जानती थी कि आज ऊपर के कमरे में क्या तय हो रहा है।
"चर्वी जी, रात भर में मैंने हर कड़ी दो बार जाँची है।" ... "कुनाल के जाली दस्तख़त, माँ जी के मायके गया धुआँ, और गोमती फ़ाइनेंस की चोरी की पूँजी। ... तीनों एक ही रस्सी के तीन बल हैं।" ... "बस बुनियाद वाले उस पन्ने की तसदीक़-शुदा नक़ल रजिस्ट्रार के यहाँ से दोपहर तक आएगी। ... तब तक वो नाम काग़ज़ पर होते हुए भी अदालत के लिए अधूरा है।"
"रहने दीजिए, सेठी जी। ... उसे दोपहर तक सोने दीजिए।" ... "पहले वो लड़ाई, जिसमें चार हज़ार मज़दूरों की रोटी और बाऊजी का ब्रांड दाँव पर है। ... जड़ बाद में। ... आज बोर्ड में सूर्यवंशी का सौदा दफ़न होगा।"
"और जिस दिन वो सौदा गिरा, चर्वी जी, वसीयत की याचिका भी उसी के साथ गिरेगी। ... बाऊजी की वो भूली हुई शर्त और आपके नाम दर्ज दुगने-वोट वाले शेयर, दोनों आज कुर्सी आपके नीचे पत्थर कर देंगे।" ... "आज आप बचाव में नहीं जा रहीं। ... आज आप वार कर रही हैं।"
"दस साल मैंने इस घर की हर दरार पर हल्दी लगाई है, सेठी जी। ... आज पहली बार मैं उसी घर के सामने आईना रखूँगी।" ... "और आईना तोड़ता नहीं। ... बस दिखा देता है।"
"मैं तैयार हूँ।" ... "आज बोर्ड में तुम्हारे साथ अंदर आऊँगा, चर्वी। ... तुम्हारे पीछे नहीं। ... तुम्हारे बग़ल में।"
"अच्छा लगता है, रणबीर। ... पर देर से अच्छा लगता है।" ... "तुम बग़ल में खड़े हो, इससे मेरी लड़ाई हल्की नहीं होती। ... बस अकेली कम होती है। ... चलो।"
चर्वी ने फ़ाइल उठाई और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, और किसी ने उसके चेहरे पर जीत की चमक नहीं देखी। ... क्योंकि वो एक ही बात जानती थी, जो सिर्फ़ सेठी के कान में रखी थी। ... ये आख़िरी काग़ज़ जीत कर, वो इस घर की मालकिन बन कर नहीं रुकेगी। ... वो मिष्टी का हाथ थाम कर इसी देहरी से निकल जाएगी।
राजवंश ग्रुप का काँच वाला बोर्डरूम आज पूरा भरा था। ... एक तरफ़ ख़ानदान, दूसरी तरफ़ तटस्थ डायरेक्टर, और मेज़ के सिरे पर सूर्यवंशी के वकील, अपने 'मेहरबान सौदे' का पुलिंदा खोले। ... और सबकी हैरानी के बीच चर्वी मेज़ के सिरहाने जा कर खड़ी हुई, गिड़गिड़ाने नहीं, बैठक चलाने।
"सूर्यवंशी ग्रुप का प्रस्ताव है कि वो राजवंश को बाज़ार से बीस फ़ीसदी ऊपर, इज़्ज़त के साथ ख़रीद ले।" ... "बोर्ड इस पर कोई फ़ैसला करे, उससे पहले मैं इस मेज़ पर सिर्फ़ एक बात रखूँगी। ... कि वो पैसा आ कहाँ से रहा है।"
"सूर्यवंशी ने ख़रीद की रक़म एक एस्क्रो खाते में रखी है। ... उस एस्क्रो की ज़मानत और आधी फ़ंडिंग एक ही कंपनी से आती है।" ... "गोमती फ़ाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड।"
"और गोमती फ़ाइनेंस, इसी शहर में, ठीक दस साल पहले खड़ी हुई थी। ... कारोबार डूबने के ग्यारह हफ़्ते बाद।" ... "पाई-पाई उसी रक़म से, जो उस साल राजवंश के खातों से ग़ायब हुई थी, और जिसका इल्ज़ाम दस साल इस बहू के सिर रहा।"
बोर्डरूम में एक अजीब सी ख़ामोशी उतरी, वो ख़ामोशी जो तब आती है जब कोई पुरानी झूठी कहानी अचानक सीधी खड़ी हो जाए। ... सूर्यवंशी के वकील ने काग़ज़ों में कुछ ढूँढना शुरू किया, और नहीं मिला।
"यानी जो पैसा आज हमें ख़रीदने आया है... ... वो इसी घर का चुराया हुआ पैसा है।" ... "सूर्यवंशी हमें अपने पैसे से नहीं ख़रीद रहे, इज़्ज़तदार डायरेक्टरो। ... वो हमें हमारी ही चोरी से ख़रीद रहे हैं। ... ये मेहरबानी नहीं है। ... ये उसी लूट का दूसरा दौर है।"
"और अगर ख़रीद की बुनियाद में ही चुराया हुआ पैसा है, तो ये सौदा बदनीयती में डूबा है। ... कोई बोर्ड ऐसे प्रस्ताव पर वोट नहीं डाल सकता।" ... "और वसीयत को चुनौती देने वाली याचिका, जिसकी फ़ंडिंग भी इसी रास्ते से हुई है, वो उसी दिन अदालत में गिर जाएगी।"
सूर्यवंशी के वकील ने काग़ज़ समेटे, कुछ कहने को मुँह खोला, और फिर बंद कर लिया। ... मेज़ पर रखा 'मेहरबान सौदा' अब मेहरबानी नहीं, सबूत था। ... तटस्थ डायरेक्टरों की नज़रें एक-एक कर के मेज़ के सिरहाने की तरफ़ मुड़ गईं, उस बहू की तरफ़ जिसे वो कभी नौकरानी समझते थे।
मेज़ के दूसरे सिरे पर इंदुमती बैठी थी, गहनों के बिना, बोल के बिना। ... दस साल जिस बहू को उसने रसोई की नौकरानी कहा था, आज वही बहू पूरे बोर्डरूम को दिशा दे रही थी, और सास के पास अब न कोई गवाह बचा था, न कोई मुखौटा। ... वो सिर्फ़ देख रही थी, और वो चुप्पी उसकी सबसे बड़ी सज़ा थी।
"मैं रणबीर राजवंश, इस ख़ानदान का बड़ा बेटा।" ... "और मैं ऐलान करता हूँ कि इस घर का जवाब आज मेरी माँ की आवाज़ नहीं देगी। ... मेरी भी नहीं देगी। ... इस घर का जवाब सिर्फ़ वो देगी जिसने इस घर को दस साल अकेले बचाया है। ... मेरी पत्नी।"
दस साल जो तालियाँ ग़लत हाथों में बजती रहीं, वो आज पहली बार सही मेज़ के सिरहाने पहुँचीं। ... तटस्थ डायरेक्टरों ने सौदे के ख़िलाफ़ हाथ उठाए, और सूर्यवंशी का प्रस्ताव बिना पूरा गिने ही मर गया। ... फ़्लैगशिप बचा, ग्रुप बचा।
"रिकॉर्ड में लिखा जाए। ... सूर्यवंशी का प्रस्ताव ख़ारिज। ... फ़्लैगशिप बिकाऊ नहीं है, न आज, न कभी।" ... "बाऊजी ने ये ब्रांड अपने हाथों से खड़ा किया था। ... वो इसी घर में रहेगा।"
सौदा गिरते ही सबकी नज़रें उस कोने की तरफ़ मुड़ीं जहाँ कुनाल बैठा था। ... वही कुनाल, जिसकी मुस्कान कभी पूरे शहर को चौंधिया देती थी, आज मेज़ के नीचे अपने हाथ छुपाए बैठा था। ... क्योंकि उन्हीं हाथों ने बाऊजी के दस्तख़त बनाए थे, और अब वो सबूत चर्वी की फ़ाइल में बंद था।
"कुनाल। ... मेरे हाथ में एक फ़ाइल है जो तुम्हें ख़त्म कर सकती है। ... जाली दस्तख़त, बैंकों से झूठ, सूर्यवंशी वाला रास्ता। ... एक काग़ज़, और तुम्हारी बाक़ी ज़िंदगी अदालतों में बीतेगी।" ... "पर मैं वो काग़ज़ नहीं खोल रही। ... मैं तुम्हें एक चीज़ दे रही हूँ जो इस घर ने मुझे कभी नहीं दी। ... चुनने का हक़।"
"भाभी, ये... ये सब बड़ा नाटकीय हो रहा है।" ... "मैं मान लेता हूँ, कुछ फ़ैसले ग़लत हुए। ... कारोबार में होता है। ... हम अंदर बैठ कर सुलझा लेंगे, है ना?"
"नाटक दस साल चला, कुनाल। ... स्टेज पर तुम थे, और परदे के पीछे मैं। ... आज परदा गिर गया है।" ... "मैं तुम्हें सज़ा दे सकती हूँ। ... पर सज़ा देने से बाऊजी का ब्रांड और चार हज़ार घर नहीं बचते। ... सच बोलने से बचते हैं। ... एक बार, कुनाल, कुछ ऐसा करो जो जमा-घटा से बड़ा हो।"
"तुम्हें पता है सबसे बुरा क्या है, भाभी?" ... "मैं दस साल पूरे शहर का हीरो बना रहा। ... और मुझे ख़ुद पता था कि हर रात जिस औरत को सब हुक्म देते थे, असली हीरो वही है। ... मैंने वो तालियाँ लीं जो तुम्हारी थीं।"
"कुनाल। ... मैं भी दस साल ग़लत इंसान को सज़ा देता रहा। ... तुम कम से कम आज सही काम कर सकते हो।" ... "भाई का रोब झाड़ कर नहीं कह रहा। ... एक ऐसे आदमी की तरह कह रहा हूँ जिसने देर की, पर आख़िर पहुँचा।"
"ठीक है।" ... "मैं बोर्ड के सामने, और अदालत के सामने, सब सच कहूँगा। ... जाली दस्तख़त मैंने बनाए। ... सूर्यवंशी का रास्ता मैंने खोला।" ... "और आज से राजवंश की किसी कुर्सी पर मेरा नाम नहीं होगा। ... मैं हट रहा हूँ। ... जो इस घर को दस साल चलाती रही, अब सिर्फ़ उसका नाम कुर्सी पर लिखा जाए।"
कुनाल ने ये कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कोई चमक नहीं थी, सिर्फ़ एक थका हुआ सुकून। ... जिस ताज को उसने दस साल उधार पहना था, आज उसे ख़ुद उतार कर मेज़ पर रख देना, शायद उसकी ज़िंदगी का पहला असली वज़न था जो उसने अकेले उठाया।
"शुक्रिया, कुनाल।" ... "तुमने आज जो किया, वो इस घर के किसी मर्द ने दस साल में नहीं किया। ... तुम्हारा हिसाब होगा, पर इंसान की तरह होगा, मुजरिम की तरह नहीं। ... इतना मैं देख लूँगी।"
दोपहर होते-होते तूफ़ान थम चुका था। ... सूर्यवंशी का सौदा मर चुका था, याचिका की जड़ कट चुकी थी, और बोर्ड की हर नज़र अब उसी एक कुर्सी की तरफ़ थी जिसे दस साल से चर्वी परदे के पीछे से चलाती आई थी। ... आज पहली बार वो कुर्सी उसके नाम के साथ, खुले में, उसकी थी।
"प्रस्ताव पारित। ... सूर्यवंशी की ख़रीद ख़ारिज, फ़्लैगशिप सुरक्षित, और यशवंत राजवंश की वसीयत के मुताबिक़ चर्वी राजवंश समूचे राजवंश ग्रुप की विधिवत मुखिया।" ... "बाऊजी ने जो लिखा था, वो आज सच हुआ, चर्वी जी। ... दस साल देर से, पर हुआ।"
"शुक्रिया, सेठी जी।" ... "अब सिर्फ़ एक काग़ज़ बाक़ी है। ... और उसके बाद... हमारी बात याद है ना। ... ये जंग जीत कर मैं यहाँ रुकने नहीं आई थी।"
ठीक उसी वक़्त सेठी का वो पुराना शागिर्द बोर्डरूम के दरवाज़े पर आया, हाथ में रजिस्ट्रार के दफ़्तर की मुहर लगी एक तसदीक़-शुदा नक़ल। ... गोमती फ़ाइनेंस की बुनियाद वाला वही पन्ना, जिसे चर्वी ने सुबह जान-बूझ कर सोने दिया था। ... अब वो जाग चुका था।
सेठी ने वो नक़ल ली, ऊपरी लकीर पढ़ी, और उसकी उँगलियाँ काग़ज़ पर एक पल को रुक गईं। ... उसने चश्मा उतारा, फिर दोबारा पहना, जैसे यक़ीन न हो रहा हो कि लिखा वही है जो पढ़ा।
"चर्वी जी, गोमती फ़ाइनेंस किसी मुनीम ने नहीं खोली थी। ... दस साल पहले उसका पहला प्रवर्तक, पहला हिस्सेदार, कोई और था।" ... "इस काग़ज़ पर पहले दस्तख़त की जगह जो नाम दर्ज है... ... वो सूर्यवंशी नहीं है। ... वो नाम है... धर्मपाल सक्सेना।"
"धर्मपाल सक्सेना।" ... "जिसका नाम इस शहर के हर अस्पताल, हर धर्मशाला, हर ट्रस्ट के पत्थर पर खुदा है। ... जिसे लखनऊ देवता की तरह पूजता है। ... जिस पर ख़ुद बाऊजी आँख मूँद कर भरोसा करते थे।"
"चर्वी जी, सूर्यवंशी तो बस बाहर का भेड़िया था। ... उसे तो हमने आज हरा दिया।" ... "पर जिसने दस साल पहले इस घर का चुराया पैसा अपनी तिजोरी में उतारा, उसे सूद पर पाला, और आज उसी पैसे से हमें ख़रीदने भेजा... ... वो आज भी खड़ा है। ... बेदाग़, बेख़ौफ़, और सबकी नज़रों में दूध का धुला।"
"आज हमने भेड़िये को हराया, सेठी जी।" ... "पर जिसने भेड़िये को पाला था, उसका हिसाब अभी बाक़ी है। ... इस काग़ज़ को अभी किसी फ़ाइल में मत रखिए। ... ये अब मेरे पास रहेगा।"
चर्वी उस काग़ज़ को देखती रही, और बोर्डरूम की जीत उसके चेहरे से धीरे-धीरे उतर गई। ... दस साल जिस दुश्मन से वो लड़ती रही, वो कभी असली जड़ था ही नहीं। ... असली हाथ, जिसने दस साल पहले इस घर में ज़हर बोया था, आज भी इसी शहर में, सबसे ऊँची कुर्सी पर, सबसे साफ़ दामन के साथ बैठा था। ... एक नाम, जिस पर पूरा शहर भरोसा करता था। ... अब भी खड़ा। ... अब भी देखता हुआ।
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