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अध्याय 14 / 30 पढ़ने में 8 मिनट

एक रात की सच्चाई

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

बाऊजी की आवाज़ रुकी नहीं, बंद नर्सरी की धूल भरी हवा में गूँजती रही, जैसे दस साल का बोझ एक-एक शब्द में धीरे-धीरे उतर रहा हो। ... चर्वी ने साँस रोक ली, दोनों हाथ डिक्टाफ़ोन के गिर्द ऐसे कस लिए जैसे वो कोई ज़िंदा चीज़ हो जो अभी छूट सकती है।

"बेटा... ... जो सच मैंने तुमसे दफ़नवाया, वो एक साँस में नहीं कहा जा सकता, इसलिए मुझे माफ़ करना अगर आज की बात अधूरी लगे। ... मैंने ये टेप हफ़्तों में भरा है, थोड़ा-थोड़ा, जितनी हिम्मत उस दिन जुटा पाया, क्योंकि पूरा सच एक ही रात में बोलने की ताक़त मुझमें कभी नहीं रही।" ... "...आज इतना ही सुनो, कि तुमने किसी का गुनाह नहीं ढोया, बेटा, तुमने किसी और का प्यार ढोया है, वो प्यार जो किसी और को दिखाने की हिम्मत नहीं थी।"

चर्वी के हाथ काँप उठे, और उसकी आँखों के आगे दस साल का धुँधलका पल भर को छँट गया। ... इससे ज़्यादा साफ़ बाऊजी कभी नहीं बोले थे, फिर भी उसे लगा जैसे असली नाम अब भी अँधेरे के पीछे किसी परदे की तरह खड़ा हो, इंतज़ार में।

"बाक़ी बातें आगे इसी टेप में हैं, हर बात, हर नाम, हर काग़ज़... ... पर वो तब सुनना, बेटा, जब तुम्हारे साथ कोई और भी खड़ा हो, जो तुम्हें उस सच के बाद अकेला न छोड़े।" ... "...और रणबीर को जल्दी माफ़ मत करना। ... उसे ख़ुद अपनी आँखों से देखना होगा कि उसने किसे खोया और किसे बचाया, वरना उसकी माफ़ी भी झूठी रह जाएगी, तुम्हारी तरह।"

उसके बाद सिर्फ़ टेप की सरसराहट रह गई, जैसे बाऊजी की हिम्मत वहीं टूट गई हो, ठीक उस जगह जहाँ असली नाम आना था। ... चर्वी ने दोनों हाथों से डिक्टाफ़ोन थाम लिया, कमरे की धूल भरी ख़ामोशी में, और दस साल में पहली बार, बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़ी।

तभी नीचे से क़दमों की आवाज़ तेज़ होती गई, और गलियारे के आख़िर से रामदुलारी की घबराई हुई आवाज़ आई, कि मिष्टी बिटिया को अचानक बहुत तेज़ बुख़ार चढ़ आया है और वो नींद में बड़बड़ा रही है, बहू रानी को जल्दी बुलाया जाए। ... चर्वी ने आँसू पोंछे, डिक्टाफ़ोन जेब में रख कर वो दरवाज़ा बंद किया जिसे अभी-अभी दस साल बाद खोला था।

बाऊजी की आधी-अधूरी बात अब भी उसकी छाती में जल रही थी, हर लफ़्ज़ एक अंगारे की तरह, पर आज एक दूसरी आवाज़ ज़्यादा ज़रूरी थी, और वो सीढ़ियाँ दो-दो कर के उतर गई, अपनी बेटी के नाम पर सब कुछ पीछे छोड़ते हुए।

मिष्टी के कमरे में चर्वी पहुँची तो पाया रणबीर पहले से वहाँ था, बेटी के माथे पर गीला कपड़ा रखे, हाथ हल्के काँपते हुए, माथे पर वही घबराहट जो किसी बाप की आँखों में पहली बार दिखती है जब बच्ची तपती हो। ... दोनों की नज़रें मिलीं, और आज पहली बार उसमें शिकायत नहीं थी, सिर्फ़ एक साझा डर था।

"बुख़ार एक सौ चार है। ... डॉक्टर को फ़ोन कर दिया है, दवाई रास्ते में है, बस दस मिनट में पहुँचेगी।" ... "...तुम आ गई, अच्छा हुआ, चर्वी। ... मुझे नहीं पता था अकेले क्या करूँ।"

"मिष्टी, मेरी जान, मम्मा यहाँ है, मम्मा यहीं है।" ... "...कब से है ये, रणबीर? इतना क्यों बढ़ गया अचानक?"

"शाम से थोड़ी सुस्त थी, मैंने सोचा दिन भर खेल कर थक गई होगी। ... रात को सोते-सोते अचानक बढ़ गया, मुझे भी डर लगने लगा था।"

रात भर दोनों बारी-बारी माथे पर पट्टी बदलते रहे, दवाई का समय गिनते रहे, पानी का गिलास एक-दूसरे की तरफ़ बढ़ाते रहे, और घंटों बाद, कहीं बीच में, वो पुराना अजनबीपन ख़ुद-ब-ख़ुद पिघलने लगा, जैसे एक नन्ही तपिश ने दो जमे हुए दिलों को भी छू लिया हो।

"पापा... ... मम्मा को डाँटना बंद करो... ... वो चोर नहीं है..." ... "...मैंने कहा था ना आपको..."

रणबीर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, हाथ में भीगा कपड़ा वहीं थम गया। ... आठ साल की बेटी नींद में भी वही जंग लड़ रही थी जो पूरा घर महीनों से लड़ रहा था, और वो जंग अब उसी के कान में उतरी थी, बिना किसी चेतावनी के।

"मैं डाँट नहीं रहा, बेटा... ... मैं सीख रहा हूँ।" ... "...तुम्हारी उम्र में भी तुम्हें पता था, और मुझे दस साल लगे।"

क़रीब चार बजे बुख़ार टूटने लगा, मिष्टी की साँसें गहरी और शांत हो गईं, माथा ठंडा पड़ने लगा, और पहली बार उस रात चर्वी और रणबीर एक ही तकिए के दोनों तरफ़ बैठे, चुपचाप, बिना किसी लड़ाई के, दो थके हुए माँ-बाप जो एक ही डर से गुज़रे थे।

"शुक्र है... ... बुख़ार उतर रहा है।" ... "...आज रात तुमने अच्छा किया, रणबीर।"

"तुम कब से ऐसे अकेले सम्भालती आई हो, चर्वी? ... सिर्फ़ मिष्टी नहीं, ये पूरा घर, ये पूरा कारोबार... मुझे कभी दिखा ही नहीं।"

मिष्टी को सुला कर, दोनों बाहर बरामदे में आ खड़े हुए, ठंडी हवा में, दस साल के फ़ासले से थोड़ा कम फ़ासले पर, ठीक इतने पास कि एक-दूसरे की थकान महसूस हो सके।

"मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, चर्वी, और मुझे डर है कि आज नहीं कहा, तो फिर कभी हिम्मत नहीं होगी।"

"कहो, रणबीर। ... मैं सुन रही हूँ।"

"जिस रात हमने बेटे को खोया, मैं इतना टूट गया था कि मैंने अपनी माँ को अपनी जगह सोचने दिया, अपनी जगह फ़ैसला लेने दिया। ... उन्होंने कहा तुमने किया, और मैंने पूछा तक नहीं, चर्वी, एक बार भी नहीं।" ... "...मैंने अपना ग़म तुम्हारे नाम कर दिया, क्योंकि किसी को दोष देना, ख़ुद टूटने से बहुत आसान था।"

चर्वी ख़ामोश खड़ी रही, बरसों बाद पहली बार किसी ने उसे ये कहा था, और उसका दिल एक पल को उम्मीद से भर आया, पर तुरंत ही सावधान भी हो गया, क्योंकि माफ़ी माँगना सच बोलने जैसा नहीं होता।

"तुमने दस साल मुझसे एक बार भी नहीं पूछा, रणबीर। ... एक बार भी नहीं कहा, बताओ क्या हुआ था उस रात। ... तुमने बस मान लिया, और मैंने बस सहा।"

"मानता हूँ। ... इसकी कोई सफ़ाई नहीं है मेरे पास, सिवाय इसके कि एक डरा हुआ आदमी हमेशा सबसे आसान सच पकड़ लेता है, ताकि दर्द से भागा जा सके।" ... "...पर आज रात मिष्टी के बुख़ार में तुम्हें देख कर, मैंने वो औरत देखी जो दस साल से हर रात अकेले यही करती आई है, हर तूफ़ान, हर बुख़ार, हर हिसाब, अकेले, और मुझे ख़ुद पर शर्म आई, चर्वी, बहुत शर्म।"

चर्वी की आँखों में कुछ हिला, इतने बरसों की दीवार में शायद पहली सच्ची दरार, इतनी छोटी कि शायद सिर्फ़ उसने ही महसूस की।

"तुम जानते हो मैंने कभी अपनी सफ़ाई क्यों नहीं दी, रणबीर? ... इतने सालों में एक बार भी?"

"नहीं। ... पर आज सुनना चाहता हूँ, चर्वी। ... सच में, पूरा, जितना तुम बता सको।"

चर्वी ने उसे देखा, बरसों की चुप्पी और आज की इस थकी, ईमानदार शक्ल के बीच झूलती हुई, एक तराज़ू जो दस साल से एक ही तरफ़ झुका था। ... शायद पहली बार उसे लगा कि सामने खड़ा आदमी सच सुनने के लायक़ है, और उसे उठाए रखने के लायक़ भी।

"बाऊजी ने मरने से पहले मुझे एक टेप दिया था, रणबीर। ... आज रात, उनकी मौत के बाद पहली बार, मैंने उसे सुना।"

"क्या है उसमें, चर्वी? ... क्या कहा उन्होंने?"

"उतना ही सच, जितना एक मरता हुआ आदमी हिम्मत जुटा कर बोल पाया, टुकड़ों में, हफ़्तों में। ... और मैं चाहती हूँ तुम इसे मेरे साथ सुनो, रणबीर। इस बार मैं ख़ुद को उस कमरे में अकेला नहीं छोड़ना चाहती।"

उसने अपना हाथ बढ़ाया, वही हाथ जो दस साल से इस घर का हर बोझ अकेले सम्भालता आया था, हर काग़ज़, हर झूठ, हर रात, और रणबीर ने बिना एक पल गँवाए उसे थाम लिया, जैसे डर था कि झिझका तो मौक़ा फिर कभी नहीं मिलेगा।

"चलो, चर्वी। ... जो भी हो, मैं साथ हूँ।"

दोनों, हाथ में हाथ डाले, उस गलियारे की तरफ़ बढ़ चले जहाँ दस साल से बंद वो कमरा उनका इंतज़ार कर रहा था, हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल की सन्नाटे भरी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, और चर्वी को पहली बार लगा कि इस बार वो अकेली नहीं जा रही।

"रणबीर... ... इस दरवाज़े के पीछे जो सुनोगे, वो हमारे पूरे परिवार को तोड़ सकता है, तुम्हारी माँ को भी। ... फिर भी सुनना चाहते हो?"

"मुझे अब सच से ज़्यादा तुम्हारे बिना रहना डराता है, चर्वी। ... दरवाज़ा खोलो।"

चर्वी की उँगलियाँ ताले पर गईं, और दस साल में पहली बार उसने ये फ़ैसला अकेले नहीं, अपने पति का हाथ थामे हुए लिया, वो दरवाज़ा खोलने का जो इस घर का सबसे पुराना ज़ख़्म अपने भीतर छुपाए बैठा था, अब सिर्फ़ एक साँस दूर।

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