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अध्याय 20 / 30 पढ़ने में 8 मिनट

दो सच

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

लखनऊ के आसमान पर अभी सुबह पूरी तरह उतरी भी नहीं थी कि हवेली के फाटक पर वो ख़बर आ पहुँची, जिसके लिए सारी रात जागा गया था। ... भोर की जिस बैठक में सूर्यवंशी का सौदा पास होना तय था, वो त्रिशा की गवाही और चर्वी के नाम दुगने-वोट वाले शेयरों के आगे अटक कर रह गई। ... कुनाल का मोशन मरा तो नहीं, पर साँस लेने के लिए तड़प रहा था, और पूरी हवेली में एक अजीब, थकी हुई ख़ामोशी उतर आई थी।

पर चर्वी की मेज़ पर जश्न नहीं, एक खुला काग़ज़ पड़ा था, दस साल पुराना, इंदुमती के दस्तख़त वाला। ... वो पूरी रात उसे यूँ घूरती रही थी, जैसे वो काग़ज़ किसी भी पल आग पकड़ लेगा।

"बड़ी बहू जी... ... रात भर दिया जलता देखा मैंने आपके कमरे में। ... चाय रख दी है, ठंडी होने से पहले पी लीजिए।" ... "जीत गईं ना आप? ... तो फिर चेहरे पर ये पत्थर कैसा?"

"जीत, रामदुलारी? ... आज रात सिर्फ़ कुनाल का मोशन मरा है। ... जंग नहीं जीती।" ... "और मेरे हाथ में अब वो है, जो जंग हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता है।"

"वो कौन सा काग़ज़ है, बड़ी बहू जी? ... इतनी रात से आप जिसे यूँ ताक रही हैं?"

"वो दस्तख़त, रामदुलारी, जो साबित करता है कि दस साल पहले का घोटाला कुनाल ने नहीं, ख़ुद सास ने रचा था, अपने डूबते मायके के लिए।" ... "इसे बोर्ड के सामने रख दूँ, तो इंदुमती की कुर्सी, उनका नाम, उनका पूरा वजूद, एक ही रात में ख़ाक हो जाएगा।"

"तो फिर रख क्यों नहीं देतीं?" ... "मैंने भी उस औरत को दस साल आपके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते देखा है, बड़ी बहू जी। ... उस रात की बरसात में भी..." ... "...नहीं, छोड़िए। वो पुरानी बात है।"

"जब भी तुम्हें कहने की हिम्मत हो, रामदुलारी, मैं सुनने को यहीं रहूँगी।" ... "पर अभी मुझे एक और सवाल का जवाब चाहिए। ... कि क्या इंसाफ़ की क़ीमत, इस पूरे घर को जलते देखना है।"

बरसों पहले बाऊजी ने यही सवाल ख़ुद से पूछा था, और जवाब में एक झूठ को दफ़ना दिया था, ताकि घर बचा रहे। ... आज वही सवाल चर्वी के हाथ में था, बस इस बार दफ़नाने वाली नहीं, वो थी जिसका दफ़नाया हुआ सच अब मिट्टी तोड़ कर बाहर आना चाहता था।

दोपहर होते-होते इंदुमती ख़ुद चर्वी के कमरे के दरवाज़े पर आ खड़ी हुईं, कुछ ऐसा जो उन्होंने दस साल में कभी नहीं किया था। ... उनके चेहरे पर वही पुराना ग़ुरूर था, पर उसके नीचे, पहली बार, एक बेचैनी काँप रही थी।

"सुना है कल रात सेठी और तुम बहुत देर तक बैठे रहे, पुराने काग़ज़ों के साथ।" ... "इस घर में कुछ भी छुपता नहीं, बड़ी बहू। ... तुम भी नहीं छुप पाओगी।"

"आप सही कह रही हैं, माँजी। ... इस घर में कुछ भी छुपता नहीं। ... देर-सवेर, हर दस्तख़त अपना नाम बोल ही देता है।"

"धमकी दे रही हो मुझे? ... मेरे ही घर में, मेरी ही मेज़ पर?" ... "तुम भूल रही हो, चर्वी, कि इस घर की हर दीवार मेरी बनाई हुई है। ... और जो दीवार मैंने बनाई है, वो मैं गिरा भी सकती हूँ, तुम्हारे ऊपर।"

"गिराइए, माँजी। ... इस बार मैं मलबे में दबने के लिए खड़ी नहीं हूँ।"

"तुम सोचती हो एक पुराना दस्तख़त तुम्हें सब कुछ दे देगा?" ... "उस रात के बारे में तुम कुछ नहीं जानतीं, चर्वी। ... कुछ भी नहीं। ... और भगवान करे, तुम कभी न जानो।" ... "अपने काग़ज़ सँभाल कर रखना। मैं भी अपने रखती हूँ।"

इंदुमती दरवाज़े से यूँ पलटीं जैसे कोई ज़ख़्मी जानवर अपनी माँद की तरफ़ भागता है। ... चर्वी ने उनकी आवाज़ में जो थरथराहट सुनी थी, वो ग़ुस्से की नहीं थी। ... वो डर था। ... और एक डरी हुई इंदुमती, चर्वी जानती थी, एक ललकारती इंदुमती से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थी।

गलियारे के मोड़ पर इंदुमती ने अपना फ़ोन निकाला, हाथ हल्के काँपते हुए, और एक ही नाम डायल किया। ... "कुनाल... आज रात, अभी। ... जो भी करना है, आज रात ही हो जाना चाहिए," इतना कह कर उन्होंने फ़ोन काट दिया, जैसे एक-एक पल अब क़ीमती हो।

शाम ढलते-ढलते चर्वी के कमरे में एक छोटा सूटकेस खुला पड़ा था, तह लगे कपड़ों के ऊपर मिष्टी का मनपसंद खिलौना भालू भी सलीक़े से रखा हुआ। ... दरवाज़े पर आठ साल की मिष्टी खड़ी थी, माथे पर वही सवाल जो उसने महीनों से इस घर में सैकड़ों बार पूछा था।

"मम्मा... ... हम कहीं जा रहे हैं क्या?" ... "ये मेरा भालू आपने बैग में क्यों रख दिया?"

"हाँ मेरी जान... ... कुछ दिनों के लिए तू नानी के घर जाएगी। ... वहाँ खूब मस्ती होगी, और नानी तुझे वो वाली मीठी खीर भी बनाएँगी, जो तुझे सबसे पसंद है।"

"पापा नहीं आएँगे?" ... "और आप? ... आप भी नहीं आ रहीं ना?" ... "ये लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है ना, मम्मा? ... इसीलिए मुझे भेजा जा रहा है, ताकि मैं ना देखूँ।"

"तू मुझसे ज़्यादा समझदार है, मेरी जान।" ... "हाँ, लड़ाई अभी बाक़ी है। ... और मैं नहीं चाहती कि उसकी आँच तुझ तक पहुँचे।" ... "पर मैं वादा करती हूँ, जब तू लौटेगी, ये घर तेरे लिए वो घर होगा, जहाँ कोई तेरी मम्मा को चोर नहीं कहेगा।"

"मुझे पता है आप चोर नहीं हैं, मम्मा। ... मैंने दादी से भी कह दिया था।" ... "बस जल्दी जीत जाइए। ... और पापा को भी अपने साथ ले आइए, जल्दी वाला पापा, जो हमेशा उदास नहीं रहता।"

चर्वी ने बेटी को इतनी देर तक गले लगाए रखा कि उसे डर लगने लगा, कहीं मिष्टी को उसके हाथों की काँपती हुई पकड़ महसूस न हो जाए। ... "जल्दी वाला पापा", ये शब्द उसके सीने में कहीं गहरे उतर गए, एक ऐसे वादे की तरह जिसे पूरा करना अब सिर्फ़ उसके अपने हाथ में नहीं था।

रामदुलारी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, मिष्टी का हाथ थामने के लिए, गाड़ी तक ले जाने के लिए। ... जाते-जाते उसने चर्वी की तरफ़ बस एक नज़र भर देखी, ऐसी नज़र जो बरसों की वफ़ादारी और आज रात के डर, दोनों को एक साथ बोल गई।

रात गहराते ही रणबीर हवेली के मुख्य दरवाज़े से भागता हुआ अंदर आया, उसकी साँसें उखड़ी हुई, आँखों में कुछ ऐसा जो चर्वी ने बरसों में उसमें नहीं देखा था। ... वहशत नहीं, यक़ीन।

"चर्वी... ... मैंने उस बूढ़ी नर्स को ढूँढ निकाला। ... घंटों बैठा रहा उसके सामने, जब तक उसका झूठ टूट नहीं गया।" ... "उसे पैसे दिए गए थे, चर्वी। ... वो जो कुछ बोली, रटा हुआ था, किसी और की ज़ुबान से।"

"रणबीर... ... तुम कह क्या रहे हो?"

"मैं कह रहा हूँ कि उस रात के बारे में जो कहानी मुझे रटाई गई, वो झूठ थी। ... मुझे नहीं पता अभी पूरा सच क्या है, चर्वी... पर इतना जानता हूँ कि तुमने वो नहीं किया, जिसका इल्ज़ाम दस साल तुम्हारे सिर मढ़ा गया।" ... "मैं दस साल ग़लत था। ... और मैं आज, अभी, तुमसे वो कहने आया हूँ जो मुझे उसी रात कह देना चाहिए था।"

उसने चर्वी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, ठीक उसी पल जब उसकी नज़र दरवाज़े के पास रखे सूटकेस पर, और उसके पीछे विदा होती मिष्टी की गाड़ी की बत्तियों पर पड़ी। ... उसका चेहरा उलझन से भर गया, पर उससे पहले कि वो कुछ पूछ पाता, कहीं भीतर एक फ़ोन बज उठा।

सेठी की आवाज़ फ़ोन के उस पार काँप रही थी। ... "बड़ी बहू जी, कुनाल और माँजी ने आज रात ही इमरजेंसी बोर्ड मीटिंग बुला ली है, अभी, इसी घंटे में। ... फ़्लैगशिप का सौदा वो आज रात ही पास करवा लेना चाहते हैं, दिन की रौशनी का इंतज़ार किए बिना।"

"अभी? ... आज ही रात?" ... "मुझे जाना होगा, सेठी जी। ... मैं पहुँच रही हूँ।"

"चर्वी, रुको... ... मुझे बस इतना कहने दो कि..."

"मुझे पता है, रणबीर। ... मुझे लगता है मुझे पता है। ... पर आज रात, अगर मैं नहीं गई, तो बाऊजी का पूरा साम्राज्य राख हो जाएगा।" ... "जब मैं लौटूँगी... तब सुनूँगी। ... वादा है।"

वो दरवाज़े से निकल गई, अपने पति का चेहरा, उसकी आधी कही बात, अपने पीछे छोड़ कर, ठीक उसी तरह जैसे दस साल पहले एक और रात उसने कुछ पीछे छोड़ा था। ... रणबीर दरवाज़े पर खड़ा रह गया, उसके शब्द अब भी उसकी ज़ुबान पर अटके, सुनने वाला जा चुका था। ... और लखनऊ के उस काले आसमान के नीचे, राजवंश का ताज एक बार फिर बिकने के लिए तैयार खड़ा था, इस बार भोर का इंतज़ार किए बिना।

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