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अध्याय 18 / 30 पढ़ने में 9 मिनट

बिकता ताज

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

चर्वी किरती के कमरे से निकली, पर वो एक नाम, मिष्टी, उसके भीतर एक धधकते कोयले की तरह पड़ा रहा। ... वो जानती थी कि ये धमकी सिर्फ़ धमकी नहीं थी, ये एक नक़्शा था, कि अगली चाल कहाँ से आएगी। ... पर आज रात वो इसे रोक नहीं सकती थी, क्योंकि सुबह होते ही एक और जंग उसके दरवाज़े पर दस्तक देने वाली थी।

"अभी नहीं, किरती। ... अभी मुझे एक कारोबार बचाना है। ... पर याद रखना, तुमने आज मुझे धमकी नहीं दी, तुमने मुझे बता दिया कि मुझे सबसे पहले किसकी हिफ़ाज़त करनी है।"

रणबीर ने अब तक उससे दोबारा बात नहीं की थी, अपने कमरे में बंद, अपनी माँ के आधे सच और उस सिस्टर के आधे झूठ के बीच जूझता हुआ। ... चर्वी ने ख़ुद से कहा कि इंतज़ार करेगी, क्योंकि दस साल के बाद कुछ दिन कोई मायने नहीं रखते, पर सच ये था कि इस बार भी वो अकेली इस जंग में उतरने वाली थी, ठीक वैसे ही जैसे वो दस साल से उतरती आई थी।

सुबह निकलने से पहले चर्वी एक पल को मिष्टी के कमरे में झाँक आई, जहाँ बच्ची स्कूल के लिए तैयार होते हुए अपनी नई फ़्रॉक पर ज़िद कर रही थी, बेख़बर कि कल रात उसी की देहरी दाँव पर लगी थी। ... उस एक बेफ़िक्र हँसी ने चर्वी को याद दिलाया कि वो आज किसके लिए लड़ रही है, और किसे बचाने के लिए वो हर सुबह फिर से खड़ी होती है।

और उस कोयले के साथ-साथ, चर्वी के कंधों पर एक दूसरा बोझ भी था, वही बोझ जो उसने दस साल पहले उठाया था, चार हज़ार मज़दूरों के घरों का चूल्हा, बाऊजी का वो सपना जिसे उसने अपने गहनों और अपनी चुप्पी से ज़िंदा रखा था। ... आज उसे दोनों जंग एक साथ लड़नी थी, अपनी बेटी की हिफ़ाज़त की जंग, और इस पूरे ख़ानदान की विरासत की जंग।

अगले दो दिन ई.जी.एम. के दूसरे दौर की तरफ़ भागते हुए बीत गए। ... चार हज़ार मज़दूरों की तनख़्वाह, बाऊजी का फ़्लैगशिप, और उस पर लगातार बढ़ता सूर्यवंशी का साया, इन सबके बीच घर के भीतर की जंग को चर्वी ने एक कोने में समेट कर रख दिया, बिना उसे भुलाए।

उधर, हवेली के दूसरे छोर पर, कुनाल का अपना कमरा एक अलग तरह के तूफ़ान में डूबा था। ... बोर्ड में बेनक़ाब हो चुका, बैंकों से घिरा, अपने ही परिवार की नज़रों में गिरा हुआ, वो आदमी जिसे कभी पूरा शहर तालियों से नवाज़ता था, आज अपने ही कमरे में अकेला बैठा एक गिलास व्हिस्की को घूर रहा था।

"दस साल... दस साल मैंने वो चेहरा पहना, जो इस घर को बचाने वाला हीरो था। ... और असलियत में मैं क्या था? ... एक जोकर, जिसे कोई और डोर से नचा रहा था।"

"पचास साल का जश्न... वो तालियाँ... वो कैमरे... वो सब मेरे लिए थे। ... और वो औरत कोने में खड़ी, चुपचाप, टेक्स्ट भेजती रही, जैसे किसी नौकर की तरह।" ... "मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वही नौकरानी मुझे तख़्त से उतार फेंकेगी।"

तभी उसका फ़ोन बजा, एक अनजान नंबर से। ... कुनाल ने एक पल हिचकिचाहट के साथ उसे देखा, फिर उठा लिया, जानते हुए कि इस कॉल को उठाना उसकी अपनी पहचान का आख़िरी टुकड़ा भी बेचना है।

"हाँ... हाँ, रणविजय जी, बोलिए।" ... "फ़्लैगशिप? ... आप लोग अभी भी वही चाहते हैं?"

"और बदले में मुझे क्या मिलेगा?" ... "इतना? ... और मेरा हिसाब चर्वी के साथ, वो भी आप बराबर कर देंगे?"

"ठीक है। ... मुझे सोचने का वक़्त नहीं चाहिए, रणविजय जी। ... मैं तैयार हूँ। ... बाक़ी प्रॉक्सी वोट भी मैं ख़ुद जुटा लूँगा, आप बस अपनी तरफ़ का काम कर दीजिए।"

"ई.जी.एम. से पहले, कल रात तक तीनों वोट आपके खाते में होंगे। ... और डेटा-रूम का बाक़ी हिस्सा भी, भोर होते ही खुल जाएगा।"

फ़ोन रखते ही कुनाल की आँखों में एक अजीब-सी सुकून जैसी थकान उतर आई, उस आदमी की तरह जिसने आख़िरकार गिरना तय कर लिया हो और अब गिरते हुए डर नहीं रहा। ... राजवंश का ताज, जिसे बाऊजी ने अपने ख़ून-पसीने से खड़ा किया था, अब चुपचाप एक फ़ोन कॉल में बिक चुका था, और इस घर को अभी इसकी भनक तक नहीं थी।

कुनाल जानता था कि इस सौदे से न सिर्फ़ उसकी जेब भरेगी, बल्कि वो आख़िरकार चर्वी को वहीं पटकेगा जहाँ से उसने ख़ुद को हमेशा नीचे महसूस किया था, उसके पैरों तले। ... एक भाई की जगह, आज वो सिर्फ़ एक हारा हुआ जुआरी था, अपने आख़िरी दाँव पर बदला ढूँढ़ता हुआ।

दो दिन से कुनाल के दफ़्तर की तरफ़ से कोई शोर नहीं आया था, कोई फ़ोन नहीं, कोई नई चाल नहीं, और चर्वी को यही ख़ामोशी सबसे ज़्यादा बेचैन कर रही थी। ... रामदुलारी ने बताया कि कुनाल के कमरे की बत्ती हर रात देर तक जलती रहती थी, और नौकरों में फुसफुसाहट थी कि वो अकेले शराब पी कर घंटों फ़ोन पर बात करता रहता है। ... चर्वी ने सेठी से कह रखा था कि हर प्रॉक्सी वोट पर पैनी नज़र रखें, पर एक आदमी अपनी बरबादी में जितना गहरा डूबता है, उतना ही अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि वो बचने के लिए क्या बेच देगा।

उसी शाम, हवेली की छत पर, शेखर अकेला खड़ा था, अपनी चाय ठंडी होने दे रहा था। ... वो नरम, चुप रहने वाला बेटा, जिसने बरसों साम्राज्य को बचते और तालियाँ किसी और को मिलते देखा था, आज कुछ और भी देख चुका था, जो उसे भीतर तक हिला गया था।

चर्वी सीढ़ियाँ चढ़ कर छत पर आई, बोर्ड के काग़ज़ात हाथ में लिए, पर शेखर का उतरा हुआ चेहरा देख कर वो एक पल को रुक गई।

"भाभी... मुझे किरती की एक बात पता चली। ... वो सिस्टर, जो माँजी के कमरे में आई थी। ... वो किरती के भाई के दवाख़ाने से थी।" ... "मेरी बीवी ने एक मरे हुए बच्चे को अपनी शतरंज की चाल बनाया, भाभी। ... मुझे नहीं पता था वो इतनी दूर जा सकती है।"

"मैं तुम्हें दोष नहीं देती, शेखर भैया। ... तुमने ये नहीं किया। ... पर अब तुम्हें ये फ़ैसला करना है कि तुम इसे देख कर चुप रहते हो, या कुछ कहते हो।"

"पिछली बार मैंने आपसे वादा किया था, भाभी, और रात होते-होते तोड़ दिया। ... मुझमें अब भी वो हिम्मत नहीं है कि आज सबके सामने आपके साथ खड़ा हो जाऊँ।" ... "पर मैं ये भी नहीं कह सकता कि जो हो रहा है, वो ठीक है। ... इतना काफ़ी नहीं है, मुझे पता है। ... पर अभी इतना ही सच है।"

"कल दूसरे दौर की गिनती है, शेखर भैया। ... मैं तुमसे तुम्हारा वोट नहीं माँग रही, अभी नहीं। ... बस इतना पूछती हूँ, कल तुम अपने दिल की सुनोगे, या किरती की?"

"मुझे नहीं पता, भाभी। ... पर आज पहली बार, मैं ख़ुद से यही सवाल पूछ रहा हूँ, कि अपने दिल की जगह किरती की क्यों सुनता आया हूँ, इतने साल।"

चर्वी ने उसके कंधे पर हाथ रखा, कुछ कहा नहीं, क्योंकि वो जानती थी कि शेखर जैसे आदमी को धकेलने से नहीं, थमने से जीता जाता है। ... वो अभी उसकी तरफ़ पूरी तरह नहीं झुका था, पर पहली बार वो उसके ख़िलाफ़ भी नहीं खड़ा था।

ई.जी.एम. के दूसरे दौर की पूर्वसंध्या पर सेठी बोर्डरूम के बाहर, चर्वी के दफ़्तर में, काग़ज़ों का एक पुलिंदा लिए बैठा था, उसका चेहरा हमेशा की तरह सपाट, पर आवाज़ में एक हल्की-सी उम्मीद।

"बड़ी बहू जी, कल सुबह वोटों की गिनती है। ... मैंने हिसाब लगाया है। ... अगर शेखर जी और दो और तटस्थ डायरेक्टर हमारे साथ आएँ, तो सूर्यवंशी वाला सौदा वहीं गिर जाएगा।"

"अग्रवाल जी हमारे साथ पक्के हैं, वर्मा जी अब भी झिझक रहे हैं, पर झुक जाएँगे अगर शेखर जी खुल कर साथ आएँ। ... बस कुनाल की तरफ़ से कोई नई चाल न आए।"

"शेखर भैया झुक रहे हैं, पूरी तरह नहीं। ... कुनाल पिछले दो दिन से बहुत ख़ामोश है, सेठी जी, और इस घर में कुनाल की ख़ामोशी हमेशा किसी तूफ़ान से पहले की होती है।" ... "हमें आज रात एक-एक वोट दोबारा गिनना होगा।"

"यशवंत जी अक्सर कहते थे, एक कंपनी की असली दौलत उसके बही-खातों में नहीं, उसके मज़दूरों के भरोसे में होती है। ... कल की गिनती सिर्फ़ शेयरों की नहीं, उसी भरोसे की भी है, बड़ी बहू जी।"

"मुझे पता है, सेठी जी। ... इसीलिए मैं ये जंग हारूँगी नहीं।"

और ठीक उसी पल, मेज़ पर रखा सेठी का फ़ोन बज उठा। ... उसने एक निगाह डाली, माफ़ी माँगते हुए उसे उठाया, और चर्वी ने देखा कि दो पंक्तियाँ सुनते ही उस हमेशा सपाट रहने वाले चेहरे का रंग उतर गया।

"बड़ी बहू जी... वो तीन प्रॉक्सी वोट, जिन पर हम टिके थे... वो अब हमारे साथ नहीं हैं। ... कुनाल ने पिछले चौबीस घंटों में उन्हें चुपचाप ख़रीद लिया है, सूर्यवंशी के पैसे से।"

"नहीं... ... वो तीन वोट तो..." ... "सेठी जी, अगर वो तीनों चले गए, तो..."

"तो फ़्लैगशिप बेचने का मोशन, भोर होते-होते, पास होने के लिए काफ़ी वोट जुटा चुका है। ... और ये वोट किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, ख़ुद इस घर के एक बेटे ने बेचे हैं।"

"रोना अभी नहीं, हिसाब अभी। ... सेठी जी, कितना वक़्त बचा है हमारे पास, मोशन पास होने से पहले?"

"कुछ घंटे, बड़ी बहू जी। ... भोर तक।"

चर्वी वहीं काग़ज़ों के बीच बैठी रह गई, बाऊजी की वो आख़िरी वसीयत जिसे बचाने के लिए उसने दस साल की चुप्पी और अब हर रात की नींद दाँव पर लगाई थी, कुछ ही घंटों में उसी घर के एक अपने के हाथों नीलाम होने वाली थी। ... और खिड़की के बाहर, लखनऊ की रात धीरे-धीरे भोर की तरफ़ खिसक रही थी, उस भोर की तरफ़, जो राजवंश का ताज हमेशा के लिए बिकते देखने वाली थी।

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