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अध्याय 23 / 30 पढ़ने में 9 मिनट

भेड़िया दरवाज़े पर

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

रणबीर का सवाल हवा में लटका ही रह गया, क्योंकि सुबह किसी के जवाब का इंतज़ार नहीं करती। ... राजवंश हाउस के दफ़्तर में धूप खिड़कियों से भीतर आ चुकी थी, और चर्वी की मेज़ पर रात भर की जीत का मलबा, फ़ाइलों का एक नया पहाड़, पहले से जमा था।

सेठी दरवाज़े पर दस्तक दिए बिना अंदर आए, जो उनकी आदत नहीं थी, और चर्वी उसी पल जान गई कि रात की जीत की उम्र बहुत छोटी थी।

"चर्वी जी, रात की जीत के लिए बधाई। ... पर मुझे डर है, वो जीत सुबह होते-होते सूर्यवंशी की मेज़ पर एक नया हथियार बन चुकी है।"

"बोलिए, सेठी जी। ... सुबह-सुबह आपकी आवाज़ में इतनी सावधानी अच्छा संकेत नहीं है।"

"सूर्यवंशी के वकीलों ने आज सुबह अदालत में एक याचिका दाख़िल की है। ... वो बाऊजी की वसीयत को ही चुनौती दे रहे हैं, ये कह कर कि एक मरणासन्न आदमी का फ़ैसला, जिसके अपने परिवार में जालसाज़ी और घोटाला अभी-अभी साबित हुआ हो, भरोसे लायक़ नहीं।" ... "कल रात जो सच बोर्डरूम में खुला, उसी को अब वो हथियार बना रहे हैं, ये साबित करने के लिए कि पूरा राजवंश ख़ानदान ही अपना कारोबार चलाने के लायक़ नहीं रहा।"

चर्वी की मेज़ पर रखे काग़ज़ अचानक और भारी लगने लगे। ... जिस सच ने रात उसे बेगुनाह साबित किया था, वही सच अब सुबह उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रहा था।

"और सिर्फ़ अदालत नहीं, चर्वी जी। ... आज सुबह के अख़बारों में पहले ही छपना शुरू हो गया है, राजवंश ख़ानदान की टूटन, सास-बहू की जंग, बाऊजी की जाली वसीयत, हर हेडलाइन में। ... सूर्यवंशी चाहते हैं शहर पहले ख़ुद फ़ैसला कर ले कि ये घर भरोसे लायक़ नहीं, अदालत बाद में सिर्फ़ मुहर लगाए।"

चर्वी ने खिड़की से बाहर देखा। ... वो शहर जो कल तक कुनाल की तालियाँ बजाता था, आज उसी परिवार को सुर्ख़ियों में नंगा देख रहा था, और इस बार तालियाँ किसी के लिए नहीं थीं।

नीचे त्रिशा सुबह से फ़ोन पर लगी थी, एक-एक रिश्तेदार को ख़ुद बुला कर, अख़बारों की झूठी हेडलाइनों को काटती हुई, सच बताती हुई, वही त्रिशा जो कुछ हफ़्तों पहले तक अपने चमकते भाई की तालियों में डूबी रहती थी।

"ये अब बोर्डरूम की जंग नहीं रही, चर्वी जी। ... अब ये लड़ाई इस नाम की है, राजवंश के नाम की, कि क्या ये ख़ानदान अब भी अपने कारोबार पर, अपने चार हज़ार मज़दूरों पर, हक़ रखने लायक़ है।"

"तो हम ये लड़ाई भी लड़ेंगे, सेठी जी। ... इस घर ने मुझसे दस साल छिपाया कि मैंने इसे बचाया था। ... आज पूरा शहर देखेगा, मैं इसे दोबारा बचाती हूँ।"

चर्वी के फ़ोन पर एक मैसेज टिमटिमाया, रणबीर का। ... कोई माफ़ी नहीं, कोई सफ़ाई नहीं, बस इतना, बताओ मुझे अदालत के काग़ज़ों में मैं कहाँ काम आ सकता हूँ। ... चर्वी ने जवाब नहीं दिया, पर मैसेज को बंद भी नहीं किया।

दोपहर होते-होते दफ़्तर के बाहर एक और परछाईं आ खड़ी हुई, जिसे किसी ने अंदर आने से नहीं रोका, क्योंकि किसी में अब उतनी हिम्मत नहीं बची थी। ... कुनाल। ... कल रात का चमकता देवर आज बिना प्रेस किए कपड़ों में, बिना कंघी किए बालों में, किसी और आदमी जैसा लग रहा था।

"मैं जानता हूँ मेरा यहाँ आना बेवक़ूफ़ी है। ... पर मुझे बात करनी है, चर्वी। ... अभी, इससे पहले कि तुम भी वो दरवाज़ा बंद कर दो जो इस घर में सबने मेरे लिए बंद कर दिया है।"

चर्वी ने उसे बाहर नहीं करवाया। ... उसने सिर्फ़ इशारे से सामने की कुर्सी दिखाई, जैसे दस साल की दुश्मनी के बाद भी, आज सुनने का वक़्त था।

"तुम्हें पता है मैंने क्या किया, चर्वी? ... मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक तालियों की गूँज पर बनाई, जो कभी मेरी थी ही नहीं। ... और जब वो गिरने लगी, तो मैंने उसे बचाने के लिए, अपने ही घर का दरवाज़ा दुश्मन के लिए खोल दिया।"

सेठी कोने में खड़े, चुपचाप देख रहे थे, न तंज़, न तरस, बस एक वकील की वो पुरानी आदत, जो जानती है कि हर क़बूलनामा किसी न किसी काम का हो सकता है।

"महीनों पहले, जब मुझे लगा फ़्लैगशिप ही मेरा आख़िरी सहारा है, मैंने सूर्यवंशी के वकीलों को टाउनशिप की वो सारी फ़ाइलें दे दी थीं। ... तब मुझे नहीं पता था वो एक दिन इसे वसीयत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करेंगे। ... आज सुबह जो याचिका दाख़िल हुई है, उसका आधा सबूत मेरा ही दिया हुआ है।"

चर्वी को अब समझ आया, वो दरवाज़ा जो घर के भीतर से दुश्मन के लिए खुला था, वो सिर्फ़ इंदुमती का दस्तख़त नहीं था, कुनाल के हाथ भी उतने ही भीगे थे।

"तो अब तुम क्या चाहते हो, कुनाल? ... माफ़ी? ... या कोई नया सौदा?"

"मुझे नहीं पता, चर्वी। ... शायद पहली बार अपनी ज़िंदगी में, मुझे सच में नहीं पता।" ... "बस इतना जानता हूँ, अगर तुम्हें अदालत में मेरी गवाही चाहिए, कि सूर्यवंशी ने मुझसे क्या करवाया, मैं दूँगा। ... भले ही उससे मेरा बचा-खुचा नाम भी मिट्टी में मिल जाए।"

सेठी ने पहली बार कुनाल की तरफ़ ऐसे देखा जैसे किसी काम की चीज़ की तरफ़ देखा जाता है, न दुश्मन की तरह, न दोस्त की तरह, बस एक गवाह की तरह, जो शायद अदालत में जान डाल सके।

"त्रिशा... ... वो ठीक है? ... मैंने उसका नाम भी बिना सोचे इस्तेमाल किया था। ... वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी, है ना?"

"वो लड़ी है, कुनाल, तुम्हारे लिए नहीं, इस घर के लिए। ... माफ़ी उसकी तरफ़ से मुझसे मत माँगो। ... ख़ुद माँगो, अगर हिम्मत बची हो।"

"तो तुम आज यहाँ माफ़ी माँगने नहीं आए, कुनाल। ... तुम आज यहाँ चेतावनी देने आए हो।" ... "ये कुछ है। ... दस साल में पहली बार कुछ तो है।"

"मैं तालियों के पीछे भाग कर, अपने ही घर को दुश्मन के हाथों बेच बैठा, चर्वी। ... और अब समझ आ रहा है, जो तालियाँ मैंने कभी कमाई नहीं थीं, उनकी क़ीमत ये पूरा घर चुका रहा है।"

कुनाल जा चुका था, अपनी शर्मिंदगी को पीछे छोड़ कर, जिससे कुछ बदलता नहीं, पर सेठी की मेज़ पर अब एक नया सिरा आ गया था, पकड़ने लायक़।

"अगर याचिका के आधे सबूत कुनाल के दिए हुए हैं, तो हम अदालत में ये दिखा सकते हैं कि सूर्यवंशी का पूरा केस एक अंदरूनी बग़ावत पर टिका है, इंसाफ़ पर नहीं।" ... "पर इसमें वक़्त लगेगा, चर्वी जी। ... और तब तक अदालत ग्रुप की संपत्ति फ़्रीज़ करने का आदेश भी दे सकती है।"

चार हज़ार मज़दूर, जिनके लिए चर्वी ने दस साल पहले अपने गहने बेचे थे, आज फिर एक अदालती काग़ज़ के पीछे खड़े थे, बेख़बर।

"तो हमें अदालत पहुँचने से पहले ये साबित करना होगा कि याचिका ख़ुद बदनीयती से भरी है।" ... "और सेठी जी, अजीब बात है, आज सुबह पहली बार इस घर के कुछ रिश्तेदारों ने ख़ुद मुझे फ़ोन किया, ये पूछने नहीं कि मैं चोर हूँ या नहीं, बल्कि ये पूछने कि क्या मैं इस बार भी हमें बचा लूँगी।"

जिस घर ने दस साल उसे रसोई की नौकरानी समझा, वो आज पहली बार उसकी तरफ़ उम्मीद से देख रहा था, और चर्वी को ये उलटफेर राहत से ज़्यादा थका देने वाला लगा।

नीचे आँगन में मिष्टी की हँसी गूँज उठी, वो सुबह ही नानी के घर से वापस लाई गई थी, बेख़बर कि उसकी माँ आज एक और जंग की तैयारी कर रही है, बस इतना जानती हुई कि दादी अब अपने कमरे से बाहर नहीं निकलतीं और घर में एक अजीब सा सन्नाटा है।

"उसे अभी कुछ मत बताना, सेठी जी। ... जितनी देर हो सके, उसकी दुनिया वैसी ही रहने दीजिए।" ... "अब बताइए, अदालत में हमारा पहला क़दम क्या होगा।"

"पहला क़दम, स्थगन की अर्ज़ी। ... दूसरा, कुनाल का बयान क़लमबद्ध करना, इससे पहले कि सूर्यवंशी उसे भी चुप करा दें।" ... "पर चर्वी जी, एक बात। ... सूर्यवंशी इतनी आसानी से अदालत के भरोसे नहीं बैठते। ... वो हमेशा एक दरवाज़े पर सीधे दस्तक देना पसंद करते हैं।"

"दस साल मैंने इस घर की हर जंग अकेले लड़ी है, सेठी जी। ... एक भेड़िया दरवाज़े पर आ भी जाए, तो मैं दरवाज़ा बंद करके नहीं बैठूँगी।"

शाम ढलते-ढलते राजवंश हाउस के फाटक पर एक गाड़ी आ कर रुकी, जिसे किसी ने नहीं बुलाया था। ... दरबान की घबराई हुई आवाज़ हवेली के अंदर तक पहुँची।

"सूर्यवंशी हाउस से... ... ख़ुद रणविजय सूर्यवंशी साहब आए हैं।" ... ये सुनते ही दफ़्तर की खिड़की के पास खड़ी चर्वी का हाथ मेज़ पर पड़ी फ़ाइल पर जम गया।

"वो ख़ुद? ... सूर्यवंशी अपने वकीलों के पीछे छुपने वाले आदमी नहीं हैं, ये अच्छा संकेत नहीं है, चर्वी जी। ... जब भेड़िया ख़ुद दरवाज़े पर आता है, वो धमकाने नहीं आता।"

"तो फिर वो किस लिए आया है?"

फाटक के उस पार से एक साया धीरे-धीरे भीतर आया, बिना जल्दी के, बिना धमकी के, एक ऐसी मुस्कान लिए जो किसी भी चीख़ से ज़्यादा ख़तरनाक लगती थी। ... रणविजय सूर्यवंशी हवेली की सीढ़ियों के नीचे रुके, चर्वी की तरफ़ देखा, और सिर हल्का सा झुका दिया, किसी पुराने दोस्त की तरह, जो एक मेहरबान सा प्रस्ताव लिए आया हो, जिसे ठुकराना धमकी सुनने से कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा।

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