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अध्याय 28 / 30 पढ़ने में 9 मिनट

बरसों की चुप्पी

बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi

सुबह सात बजे, राजवंश हाउस की रसोई में एक नज़ारा था जो दस साल में कभी नहीं दिखा था, रणबीर ख़ुद मिष्टी का टिफ़िन पैक कर रहा था, आस्तीन चढ़ाए, हाथों में हल्दी का दाग़, चेहरे पर एक अनाड़ी सी एकाग्रता।

रात भर वो जाग कर सोचता रहा था, माँ का आधा अधूरा शब्द, चर्वी का बिना कुछ कहे पलट जाना, और अपनी दस साल की ग़ैर-हाज़िरी का हिसाब। ... आज सुबह उसने तय कर लिया था, माफ़ी माँगना काफ़ी नहीं, कुछ करना होगा।

"पापा? ... आप रसोई में क्या कर रहे हैं?" ... "घर में आग तो नहीं लगी?"

"नहीं, पगली।" ... "बस आज से तुम्हारा टिफ़िन मैं बनाऊँगा। ... भले ही ठीक से ना बन पाए।"

"पापा, ये पराठा है या पापड़?" ... "मम्मा का पराठा गोल होता है। ... ये तो नक़्शे जैसा है।"

रणबीर हँस पड़ा, दस साल में शायद पहली बार इतनी खुली हँसी। ... मिष्टी को नहीं पता था कि उसने अभी अपने पापा को किस चीज़ से बचाया है, ख़ुद पर तरस खाने से।

"पापा... कल रात दादी रो रही थीं क्या?" ... "मैंने उनका हाथ हवा में ही रुका हुआ देखा था, गुड़िया वाले कमरे में।"

"हाँ, बेटा।" ... "दादी कुछ कहना चाह रही थीं, और नहीं कह पाईं। ... कभी-कभी बड़े लोग भी शब्द ढूँढते रह जाते हैं।"

"तो मम्मा ने उनकी मदद क्यों नहीं की? ... मम्मा तो सबकी मदद करती है।"

"क्योंकि कुछ बातें, मिष्टी, ख़ुद कहनी पड़ती हैं।" ... "कोई किसी की जगह माफ़ी नहीं माँग सकता। ... मैंने भी यही तुम्हारी मम्मा से सीखा है, बहुत देर से।"

उसी वक़्त चर्वी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, कॉफ़ी का कप हाथ में। ... अपने पति को रसोई में बेटी के साथ हँसते देखना, ये उसने बरसों बाद देखा था, और एक पल को ठिठक गई।

"आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या?" ... "रणबीर राजवंश ख़ुद रसोई में?"

"बस सोचा, दस साल जो काम तुमने अकेले किया, उसका थोड़ा बोझ मैं भी उठा सकता हूँ।" ... "शुरुआत टिफ़िन से कर रहा हूँ।"

"टिफ़िन बनाना आसान हिस्सा है, रणबीर।" ... "असली मुश्किल तब आती है जब कोई देखना शुरू करे, रोज़, बिना छुट्टी के।"

"तो मैं रोज़ आऊँगा।" ... "बिना छुट्टी के।"

सुबह रणबीर ख़ुद मिष्टी को स्कूल छोड़ने गया, गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी बेटी से बातें करते हुए जान कर, कि उसकी पसंदीदा टीचर कौन है, वो किस दोस्त से लड़ी है, और वो टिफ़िन में रोज़ क्या बदलना चाहती है।

"पापा, मिस भारती सबसे अच्छी हैं, पर वो डांटती बहुत हैं।" ... "और आरवी मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, पर कल हम लड़े थे रबड़ के लिए।"

"मिस भारती। ... आरवी। ... रबड़ वाली लड़ाई।" ... "मुझे ये सब याद रखना है।"

"हाँ, पापा। ... मम्मा को सब याद है।"

रणबीर ने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिला दिया। ... उस एक मासूम वाक्य में उसे साफ़ पता चल गया कि उसे अभी कितना कुछ सीखना बाक़ी है।

उस शाम, दफ़्तर के काग़ज़ात समेटते हुए, रणबीर ने पहली बार वो पूछा जो उसने बरसों नहीं पूछा था, आगे कारोबार का क्या होगा, और गोमती फ़ाइनेंस की जड़ का क्या।

"चर्वी... सेठी जी कह रहे थे गोमती फ़ाइनेंस की जड़ पर अभी एक नाम बाक़ी है, जिसे तुमने अभी खोला नहीं।" ... "क्या मुझे पता चल सकता है?"

"अभी नहीं, रणबीर।" ... "वो हिसाब मैं अकेले उठाऊँगी, जब वक़्त आएगा। ... अभी हमें एक-दूसरे को सीखना है, वो जंग बाद में लड़ी जाएगी।"

"ठीक है।" ... "जब तुम कहोगी, मैं साथ खड़ा रहूँगा। ... तब तक इंतज़ार कर सकता हूँ।"

दोपहर को घर का पुराना टेलीफ़ोन बजा, इंदुमती की बरसों पुरानी सहेली, कुँवरानी शीला जी का फ़ोन, अगले महीने के मंदिर के भंडारे की तैयारी के बारे में। ... नौकर ने फ़ोन चर्वी की तरफ़ बढ़ाया, पुरानी आदत से, "बहू जी, ज़रा माँजी को दे दीजिए" कह कर।

पर इससे पहले कि चर्वी फ़ोन हाथ में ले, रणबीर बीच में आ गया, और फ़ोन ख़ुद उठा लिया।

"शीला आंटी? ... राजवंश हाउस के किसी भी काम के लिए अब से चर्वी से बात कीजिए। ... मैं और मेरी माँ, दोनों यही चाहते हैं।"

फ़ोन के उस पार एक हैरान सी ख़ामोशी थी, फिर एक अटकी हुई "जी अच्छा"। ... रणबीर ने फ़ोन रख दिया, बिना किसी एहसान का बोझ चर्वी पर डाले, जैसे ये कोई बड़ी बात ही ना हो।

"तुम्हें ये करने की ज़रूरत नहीं थी, रणबीर।" ... "मैं ख़ुद जवाब दे सकती थी।"

"मुझे पता है तुम दे सकती थीं।" ... "तुमने दस साल अकेले जवाब दिए हैं। ... आज बस मैंने सोचा, एक दिन तुम्हें जवाब ना देना पड़े।"

चर्वी कुछ देर चुप रही। ... उसने बरसों पहले भी ऐसी ही एक मीठी शुरुआत देखी थी, जो आख़िर में उसे और अकेला छोड़ गई थी। ... आज वो ख़ुद से पूछ रही थी, क्या ये अलग है, या सिर्फ़ एक बेहतर झूठ।

"रणबीर, मैं डरती हूँ।" ... "दस साल मैंने ख़ुद को इतना मज़बूत बनाया कि कोई मुझे फिर तोड़ ना सके। ... अगर मैंने तुम्हें फिर अंदर आने दिया, और तुम फिर पलट गए..."

"मैं वादा नहीं कर सकता कि मैं परफ़ेक्ट रहूँगा, चर्वी।" ... "मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ, अब मैं देख रहा हूँ। ... आँखें खुली रख कर, हर रोज़।"

रात के खाने पर, पहली बार दस साल में, तीनों एक ही मेज़ पर बैठे, बिना इंदुमती के हुक्म के इंतज़ार के, बिना किसी और की मौजूदगी के दबाव के। ... सिर्फ़ एक छोटा परिवार, अपनी शक्ल तलाशता हुआ।

"पापा, आप हमारे साथ रोज़ खाना खाओगे?"

"जितने दिन तुम्हारी मम्मा मुझे बर्दाश्त करे, बेटा।" ... "उम्मीद है ज़्यादा दिन।"

"एक वक़्त की बात है, रणबीर।" ... "एक वक़्त से ज़्यादा वादा मत करो।"

मिष्टी ने दोनों की तरफ़ देखा, पूरी तरह समझे बिना कि इतनी मामूली सी शाम इतनी बड़ी क्यों लग रही है, बस इतना जानते हुए कि आज घर में कुछ अलग था, कुछ हल्का।

रामदुलारी रसोई की खिड़की से ये नज़ारा देख रही थी, बरसों बाद एक मेज़ पर हँसी की आवाज़ें। ... उसने चुपचाप एक और थाली सजाई, जैसे उसका दिल जानता था कि आज की रात कल के लिए एक नई नींव रख रही है।

रात को रणबीर मिष्टी के कमरे में गया, होमवर्क में मदद करने, कुछ ऐसा जो दस साल में शायद पाँच बार हुआ हो। ... उसे पता चला कि उसकी बेटी को नक़्शे बनाना पसंद है, कि वो अंधेरे से नहीं डरती, सिर्फ़ बिजली की गरज से डरती है, और उसका सबसे पसंदीदा खिलौना वही टूटी गुड़िया है जिसे उसने ख़ुद रफ़ू किया।

"पापा, आपको पता है मेरा जन्मदिन कब है?"

रणबीर एक पल को रुका, और शर्मिंदगी से उसका चेहरा लाल हो गया। ... उसे ठीक तारीख़ याद नहीं थी, सिर्फ़ महीना।

"सच बताऊँ? ... मुझे ठीक तारीख़ याद नहीं है, बेटा।" ... "और मुझे इसकी शर्म है।"

"कोई बात नहीं, पापा।" ... "अब से याद रखना। ... मैं आपको एक बार और बताती हूँ, आख़िरी बार।"

और उसने बता दी, बिना किसी शिकवे के, जैसे यही उसका इस रिश्ते को दूसरा मौक़ा देने का तरीक़ा था। ... रणबीर ने वो तारीख़ अपने फ़ोन में नहीं, हथेली की लकीर की तरह, याद में लिख ली।

"पापा, आपको पता है मुझे बिजली की गरज से डर लगता है?" ... "तूफ़ान वाली रात मैं मम्मा के कमरे में सोती हूँ।"

"नहीं, मुझे नहीं पता था।" ... "अब से, जब बिजली गरजे, मुझे बुला लेना। ... मैं आ जाऊँगा।"

"पक्का?"

"पक्का।"

रात गहरी हो चली थी, मिष्टी सो चुकी थी, और रणबीर अपने बरामदे वाले कमरे की तरफ़ लौट रहा था, वही कमरा जो दस साल से चर्वी के कमरे से एक दीवार भर दूर था, और एक पूरी ज़िंदगी जितना दूर भी।

तभी दीवार के उस पार से एक धीमी सी आवाज़ आई, इतनी धीमी कि लगभग गुम हो जाए। ... एक लोरी, टूटी-फूटी, आधी भूली हुई, जिसे चर्वी बरसों पहले उस बेटे के लिए गुनगुनाती थी जो कभी पालने तक नहीं पहुँचा।

अंदर, चर्वी को नहीं पता था कि दीवार के उस पार कोई खड़ा है। ... वो सिर्फ़ उस पुरानी लोरी को गुनगुना रही थी, अकेले में, जैसे हर रात करती थी, उस बच्चे के लिए जिसे उसने कभी पालने में नहीं सुलाया, सिर्फ़ अपने दिल में दफ़नाया।

रणबीर के क़दम वहीं जम गए। ... यही वो आवाज़ थी जिससे वो दस साल पहले भागा था, बंद दरवाज़े के पीछे से आती एक माँ की लोरी, एक बच्चे के लिए जो अब कहीं नहीं था, और जिसे सुनना उसके लिए अपने ही ग़म से भी बड़ा भारी था।

उसके अंदर वही पुराना डर भी जाग उठा था, कि शायद अंदर जाना, इस बार भी, किसी और दर्द का दरवाज़ा खोल दे। ... पर आज उसने तय कर लिया था, डरने से भागना अब उसे कहीं नहीं ले जाएगा, सिवाय उसी दस साल पुरानी चुप्पी के।

उस रात वो पलट गया था, बिना दस्तक दिए, बिना कुछ पूछे, अपने ही दर्द में डूबता हुआ, और उसके बाद दस साल की चुप्पी शुरू हुई थी। ... आज वही आवाज़ फिर दीवार के उस पार से आ रही थी, उतनी ही धीमी, उतनी ही टूटी हुई।

रणबीर का हाथ एक पल को हवा में रुका, दस साल पुरानी आदत, पलट जाने की, अभी भी उसकी हड्डियों में बसी थी। ... और फिर, पहली बार, उसने पलटने के बजाय हाथ आगे बढ़ाया, और उस बंद दरवाज़े पर दस्तक दी।

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