Chapter 25 of 30 11 min read
बदलते पाले
अपने ही खाते में झूठी गवाह की क़ीमत का लेन-देन पा कर शेखर किरती से पूरी तरह टूट जाता है और भरे आँगन में अपना वोट और अपनी आवाज़ बड़ी भाभी के हवाले कर देता है, जबकि झूठी गवाह की रचयिता के रूप में बेनक़ाब किरती पहली बार रिश्तेदारों के बीच अकेली पड़ जाती है। किरती के ढहने से मिला गोमती फ़ाइनेंस का धागा पकड़ कर चर्वी, शेखर और सेठी वो सच खोज निकालते हैं कि सूर्यवंशी का 'मेहरबान सौदा' उसी दफ़न पैसे से खड़ा है जिसने दस साल पहले सब कुछ शुरू किया था।
सुबह होते-होते सूर्यवंशी का ठुकराया हुआ सौदा हवेली की दीवारें लाँघ चुका था। ... रणबीर सुबह की पहली रोशनी में सेठी के भेजे वकीलों के साथ कुनाल का बयान क़लमबद्ध करवाने निकल गया था, त्रिशा फिर फ़ोन पर मोर्चा सँभाले थी। ... पर आज की पहली चिंगारी न बैठक में गिरी, न बोर्डरूम में। ... वो गिरी मँझले हिस्से के एक बंद कमरे में।
शेखर के सामने मेज़ पर घर के खाते की पासबुक खुली पड़ी थी, और वो एक ही लकीर को तीसरी बार पढ़ रहा था। ... एक मोटी निकासी। ... उसी हफ़्ते की, जिस हफ़्ते वो बूढ़ी नर्स इस हवेली में गवाही देने लाई गई थी।
"किरती। ... ये सात लाख। ... हमारे खाते से निकले, गोमती फ़ाइनेंस के रास्ते घूमे, और तुम्हारे भाई के नर्सिंग होम में जा कर रुके। ... उसी हफ़्ते, जिस हफ़्ते वो नर्स यहाँ भाभी पर इल्ज़ाम लगाने आई थी।" ... "मुझे बस एक बात बताओ। ... ये हमारी बेटी की फ़ीस थी... या एक झूठी गवाह की क़ीमत?"
"उफ़, तुम भी ना। ... सुबह-सुबह पासबुक ले कर बैठ गए।" ... "भाई का हाथ तंग था, मैंने मदद भेज दी। ... मायके की मदद भी अब इस घर में गुनाह है क्या?"
"बस। ... दस साल में पहली बार कह रहा हूँ, किरती। ... बस।" ... "रणबीर भैया उस नर्स का झूठ तोड़ चुके हैं। ... तारीख़ें, बयान, सब अदालत तक जाएगा। ... और उस काग़ज़ के रास्ते में ये पासबुक पड़ती है। ... मुझसे झूठ मत बोलो।"
"हाँ। ... दिए मैंने पैसे।" ... "क्योंकि इस घर में जो कमज़ोर होता है ना शेखर, वो रोटी भी माँग कर खाता है। ... मैंने अपनी बेटी के लिए जगह बनाई, जो उसका बाप कभी नहीं बना पाता। ... तुम्हारी शराफ़त इस हवेली में सिर्फ़ सजावट है।"
"नहीं, किरती। ... कमज़ोर वो नहीं होता जो माँग कर खाता है। ... कमज़ोर वो होता है जो झूठ बो कर खाता है।" ... "तुमने एक मरे हुए बच्चे की क़ीमत लगाई। ... भाभी के बेटे की। ... और मैं दस साल तुम्हारी बोई हुई फ़सल खाता रहा। ... अब और नहीं।"
किरती ने पति की तरफ़ देखा, और पहली बार उसे वहाँ वो नरम मिट्टी नहीं मिली जिसे वो दस साल से गूँधती आई थी। ... शेखर पासबुक उठा कर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, और उसके क़दमों में आज कोई हिचक नहीं थी।
दोपहर को शेखर ने वो किया जो इस हवेली में किसी ने सोचा नहीं था। ... उसने ख़ुद पूरे घर को दालान में बुलाया। ... रिश्तेदार, जो सौदे की बहस से अभी उबरे नहीं थे, हैरान जमा हुए, और सबसे ऊपर सीढ़ियों के पास चर्वी रुकी रही, अनजान कि आज पाला किस तरफ़ गिरने वाला है।
"मुझे कुछ कहना है। ... सबके सामने। ... क्योंकि आज नहीं कहूँगा, तो फिर कभी नहीं कह पाऊँगा।" ... "वो नर्स, जिसने भरे घर में बड़ी भाभी पर उनके अपने बच्चे की मौत का इल्ज़ाम लगाया था... ... वो ख़रीदी हुई थी। ... झूठी थी।"
दालान में सन्नाटा उतर आया। ... किरती दरवाज़े की ओट से निकल कर आगे आई, चेहरे पर वही तराशी हुई मुस्कान, पर आँखों में पहली बार कुछ काँपता हुआ।
"और उस झूठ की क़ीमत... मेरे अपने घर के खाते से गई थी।" ... "मेरी पत्नी ने वो गवाह ख़रीदी थी। ... भाभी का सबसे गहरा ज़ख़्म, इस आँगन में हथियार बना कर बेचा गया, और दुकान मेरे घर में खुली थी। ... ये कह कर मैं अपनी बेटी की माँ को बेच नहीं रहा। ... मैं बस अब उस झूठ की छत के नीचे नहीं सो सकता।"
"होश में आओ, शेखर। ... घर की बात आँगन में...।" ... "ये... ये सब भाभी ने सिखा कर भेजा है ना? ... देख रही हूँ मैं, जबसे कुर्सी मिली है...।"
"और आज से मेरा हिस्सा, मेरा वोट, मेरी आवाज़... बड़ी भाभी के साथ है।" ... "जिसने ये घर दस साल अकेले ढोया, उसे अब अकेला नहीं छोड़ूँगा। ... देर से आया हूँ, भाभी। ... पर पूरा आया हूँ।"
और तब वो हुआ जो किरती ने कभी हिसाब में नहीं रखा था। ... जिन रिश्तेदारों को वो बरसों से चाय, तारीफ़ और ख़बरों से पालती आई थी, वो एक-एक कर के उससे आधा क़दम दूर सरक गए। ... वही घेरा, जो इस आँगन ने कभी चर्वी के गिर्द बाँधा था, आज बिना किसी के हुक्म के किरती के गिर्द कसने लगा।
"बस।" ... "इस आँगन में एक औरत को घेर कर तमाशा देखने का रिवाज़ आज बंद हो रहा है। ... मैं जानती हूँ उस घेरे के बीच खड़े हो कर साँस कैसे ली जाती है।"
"तुम्हारा हिसाब होगा, किरती। ... पूरा होगा, पाई-पाई।" ... "पर बंद कमरे में, काग़ज़ों के साथ। ... आँगन में नहीं। ... औरत की इज़्ज़त का तमाशा इस घर में बहुत हो चुका।"
किरती ने सिर उठा कर चर्वी को देखा। ... वो पत्थर की तैयारी में खड़ी थी, और उसके हाथ में दरवाज़ा रख दिया गया था। ... और ये बात पत्थर से ज़्यादा गहरी चुभी।
"बिटिया, पचास साल में इस आँगन ने पाले बदलते बहुत देखे हैं। ... पर आज पहली बार पाला सच की तरफ़ बदला है।" ... "कहो तो सबको दही-शक्कर खिला दूँ? ... मुँह मीठा करने का इससे अच्छा मुहूर्त फिर नहीं आएगा।"
चर्वी की थकी आँखों में एक पल को हँसी उतर आई। ... रसोई की उस बूढ़ी आवाज़ ने दस साल हर जंग के बीच यही किया था, ज़ख़्म पर हल्दी और ज़ुबान पर मिठास।
घंटे भर बाद, बंद कमरे में सिर्फ़ तीन लोग थे और एक पासबुक। ... चर्वी मेज़ के उस पार, शेखर खिड़की के पास, और किरती, जिसके पास अब न दरबार बचा था, न दर्शक।
"नर्स को पैसा तुमने दिया, ये साबित हो चुका। ... पर इंतज़ाम दस साल पुराना था, किरती। ... तुमने सिर्फ़ पुराने कुएँ में नई बाल्टी डाली है।" ... "मुझे बाल्टी नहीं चाहिए। ... मुझे कुआँ चाहिए। ... गोमती फ़ाइनेंस क्या है?"
"पहले मेरी बेटी।" ... "मैंने जो किया, अपनी औक़ात से बड़ा लालच किया, मानती हूँ। ... पर मेरी बच्ची का इसमें कोई हाथ नहीं। ... जो भी हो जाए... उसकी जगह, उसका हक़, इस घर में वैसा ही रहेगा। ... वचन दो।"
"तुम्हारी बेटी इस घर की बच्ची है, और रहेगी। ... उसकी थाली, उसकी पढ़ाई, उसकी जगह, किसी चीज़ को आँच नहीं आएगी।" ... "माँ के गुनाह बच्चों से वसूलना इस घर की पुरानी रीत थी, किरती। ... मेरी नहीं।"
किरती की आँखें एक पल को भर आईं, और उसने जल्दी से मुँह फेर लिया। ... जिस औरत को उसने दस साल काँटे बिछाए, उसी ने आज उसकी बेटी के नीचे से ज़मीन खिसकने नहीं दी। ... फिर उसने साँस ली, और कुआँ खोल दिया।
"गोमती फ़ाइनेंस। ... भाई के नर्सिंग होम का पुराना रास्ता है। ... दस साल पहले किसी ने वो खाता खुलवाया था, हमारी शादी के अगले ही साल। ... नाम मैंने कभी नहीं देखा, सब कुछ एक मुनीम के ज़रिए होता था।" ... "हमें बस इतना समझाया गया था... इस रास्ते से पैसा जाए, तो सवाल नहीं पूछे जाते।"
"दस साल पहले।" ... "वही साल, जब कारोबार डूबा था। ... वही साल, जब माँ जी के मायके का हिसाब धुएँ में खोया था।" ... "खाता खुलवाया किसने, किरती? ... याद करो।"
"कहा ना, नाम नहीं देखा।" ... "पर एक बात और है। ... पिछले महीने उसी गोमती फ़ाइनेंस से भाई के पास फिर फ़ोन आया था। ... इस बार पैसा भेजने के लिए नहीं। ... ये पूछने के लिए... कि राजवंश हवेली के अंदर की ख़बरें किस भाव मिलती हैं।"
कमरा ठंडा हो गया। ... दस साल पुराना कुआँ सूखा नहीं था। ... वो आज भी पानी पी रहा था, और उसकी रस्सी किसी ऐसे हाथ में थी जो इस घर की ख़बरों का भाव लगाना जानता था।
रात को दफ़्तर की मेज़ पर रजिस्ट्री दफ़्तर से निकलवाए काग़ज़ों का ढेर लगा था। ... सेठी ने चश्मा ठीक किया, और चर्वी और शेखर के सामने पहला पन्ना घुमा दिया।
"गोमती फ़ाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड। ... रजिस्ट्रेशन, आज से ठीक दस साल पहले, कारोबार डूबने के ग्यारह हफ़्ते बाद।" ... "और शुरुआती पूँजी... ... चर्वी जी, ये रक़म देखिए। ... पाई-पाई वही, जितनी उस साल राजवंश के खातों से ग़ायब हुई थी, और माँ जी के मायके के रास्ते धुएँ में खो गई बताई गई थी।"
"यानी मायके गया पैसा वहाँ कभी रुका ही नहीं।" ... "किसी ने उसे उसी साल एक नई तिजोरी में उतार दिया। ... और तिजोरी दस साल चुपचाप बढ़ती रही, इसी शहर में, हमारी नाक के नीचे।"
"बढ़ती ही नहीं रही, फलती-फूलती रही। ... दस साल में गोमती फ़ाइनेंस ने क़र्ज़ बाँटे, ज़मीनें ख़रीदीं, छोटे कारोबार निगले। ... चोरी की पूँजी सूद पर चलती रही, और छोटी तिजोरी एक पूरा ख़ज़ाना बन गई।" ... "और अब आख़िरी काग़ज़। ... आज शाम मेरे एक पुराने शागिर्द ने बैंक से निकलवाया है।"
सेठी ने वो पन्ना मेज़ के बीच रखा, और एक पल के लिए ख़ुद भी उसे ऐसे देखा जैसे अब भी यक़ीन न हो रहा हो।
"सूर्यवंशी ग्रुप ने राजवंश को ख़रीदने के लिए जो रक़म एस्क्रो में रखी है... ... जिस मेहरबान सौदे की मेज़ पर रणविजय सूर्यवंशी बीस फ़ीसदी ऊपर बोल रहा था... ... उस रक़म की ज़मानत और आधी फ़ंडिंग जिस कंपनी के ज़रिए खड़ी की गई है, उसका नाम है... ... गोमती फ़ाइनेंस।"
"यानी... ... जो पैसा हमें ख़रीदने आया है...।"
"...वो इसी घर का चुराया हुआ पैसा है।" ... "दस साल पहले जो घोटाला इस घर को डुबोने चला था, वही पैसा आज सूद समेत हमें निगलने लौटा है। ... भेड़िया बाहर से नहीं आया, सेठी जी। ... उसे दस साल... इसी आँगन का दाना डाला गया है।"
"और अगर हम ये कड़ी अदालत में जोड़ दें, चर्वी जी... ... कि याचिका और ऑफ़र, दोनों की जड़ में वही पुराना चुराया हुआ पैसा है... ... तो सूर्यवंशी का पूरा केस बदनीयती में डूब जाएगा। ... वसीयत की याचिका उसी दिन गिरेगी, और गिरते-गिरते उसे भी ले डूबेगी।"
पर हर खुलते ताले के नीचे एक और बंद दरवाज़ा था। ... दस साल पहले वो खाता खुलवाया किसने था? ... सूर्यवंशी तब इस घर के इतने भीतर नहीं था। ... वो कोई था जो राजवंश के खाते, राजवंश की कमज़ोरियाँ, और राजवंश के राज़, तीनों को अपनी हथेली की लकीरों की तरह जानता था।
"कल सुनवाई से पहले ये पूरी कड़ी मेरी मेज़ पर चाहिए, सेठी जी।" ... "दस साल पहले किसी ने इस घर का ख़ून एक बोतल में भर कर रख लिया था। ... और आज वही बोतल हमें दवा बता कर बेची जा रही है।" ... "अब मैं सिर्फ़ ये घर नहीं बचाऊँगी। ... इस घर का पैसा भी वापस लूँगी। ... पाई-पाई।"
उस रात राजवंश हाउस की बत्तियाँ बहुत देर तक जलती रहीं। ... मेज़ पर बिखरे काग़ज़ों में दस साल पुराना ज़ख़्म पहली बार अपनी पूरी शक्ल दिखा रहा था, सूर्यवंशी की मेहरबान मुस्कान के ठीक पीछे इसी घर की चोरी खड़ी थी। ... और उन्हीं काग़ज़ों के सबसे नीचे, गोमती फ़ाइनेंस की बुनियाद वाले पन्ने पर, पहले मुनीम के दस्तख़त की जगह एक ऐसा नाम सोया पड़ा था... ... जिसे अभी तक किसी ने पढ़ा नहीं था।
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