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Chapter 21 of 30 10 min read

असली मालकिन

बड़ी बहू by Avni Oberoi

लखनऊ की उस काली रात में राजवंश हाउस का शीशे वाला बोर्डरूम किसी ऑपरेशन थिएटर की तरह जगमगा रहा था। ... मेज़ पर फ़्लैगशिप बेचने के काग़ज़ तैयार पड़े थे, कोने में लगे स्पीकरफ़ोन पर सूर्यवंशी का आदमी साँस रोके इंतज़ार कर रहा था, और मेज़ के सिरे पर कुनाल बैठा था, अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत से बस एक दस्तख़त की दूरी पर। ... तभी दोहरे दरवाज़े खुले, और चर्वी अंदर आई, न गिड़गिड़ाती बहू की तरह, न घबराई हुई औरत की तरह, बल्कि उस मालकिन की तरह जो दस साल से इस मेज़ के पीछे का असली दिमाग़ थी।

"अरे, बड़ी बहू! ... इस वक़्त, इस घंटे? ... हमने तो सोचा था आप थक-हार कर सो गई होंगी।" ... "ख़ैर, आ ही गई हैं तो देख लीजिए। ... मीटिंग शुरू हो चुकी है, और इस बार गिनती मेरे साथ है। ... आपका आना, न आना, अब सिर्फ़ एक रस्म भर है।"

"रस्म?" ... "तुमने ठीक कहा, कुनाल। ... आज रात एक रस्म ज़रूर पूरी होगी। ... बस वो रस्म वो नहीं है, जो तुमने सोच रखी है।" ... "मैं दस साल इस कुर्सी के पीछे खड़ी रही, ताकि ये घर बचा रहे। ... आज सामने आई हूँ, ताकि इसे बिकने से बचा सकूँ।"

इंदुमती मेज़ के दूसरे सिरे पर बैठी थीं, चेहरे पर वही पुराना ग़ुरूर, पर आँखें उस पतली फ़ाइल पर गड़ी हुई, जैसे उसमें कोई ज़िंदा चीज़ बंद हो। ... रात भर की वो थरथराहट, जो चर्वी ने दोपहर उनकी आवाज़ में सुनी थी, अब उनके हाथों तक उतर आई थी।

"ये बहू के घर का आँगन नहीं है, चर्वी, जहाँ तू अपना नाटक करेगी। ... ये बोर्ड है। ... यहाँ काग़ज़ बोलते हैं, आँसू नहीं।" ... "जो फ़ाइल तू लाई है, उसे बंद ही रहने दे। ... वरना जो आग लगेगी, उसमें तू अकेली नहीं जलेगी।"

"आप बिल्कुल सही कह रही हैं, माँजी। ... यहाँ काग़ज़ ही बोलते हैं।" ... "तो आइए, आज रात काग़ज़ों को ही बोलने देते हैं। ... दस साल से जो नहीं बोले, वो सब।"

मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे तटस्थ डायरेक्टर अब कुनाल की तरफ़ नहीं देख रहे थे। ... वो उस औरत की तरफ़ देख रहे थे, जिसके एक-एक फ़ैसले पर वो बरसों बिना नाम जाने चलते आए थे, और जो आज पहली बार, खुल कर, उनके सामने खड़ी थी।

"ये टाउनशिप के बैंक काग़ज़ हैं। ... पिछले सात महीनों में, इन सब पर बाऊजी के दस्तख़त हैं।" ... "वही बाऊजी, जो पिछले सात महीनों में एक बार भी दफ़्तर नहीं आए। ... जो तीन हफ़्ते पहले गुज़र गए। ... और जिनके हाथ, आख़िरी साल भर, एक गिलास तक सीधा नहीं पकड़ पाते थे।" ... "ये दस्तख़त बाऊजी के नहीं हैं, कुनाल। ... ये तुम्हारे हैं। ... बैंकों को चुप रखने के लिए, महीनों से बनाए हुए।"

"ये... ये बेबुनियाद इल्ज़ाम है! ... तुम कोई भी काग़ज़ छाप कर ले आओगी और ये बोर्ड मान लेगा?" ... "आप सब जानते हैं ये औरत सालों से मेरे ख़िलाफ़ है!"

"बैंक की अपनी फ़ोरेंसिक रिपोर्ट कहती है, कुनाल, कि ये सारे दस्तख़त एक ही हाथ के बनाए हैं, और वो हाथ यशवंत जी का नहीं है।" ... "और ये सौदा, जो आज रात पास करवाया जा रहा है, ये कोई नया ख़रीदार नहीं है, डायरेक्टर साहबान। ... ये सूर्यवंशी ग्रुप है। ... वही, जिनसे बाऊजी उम्र भर लड़ते रहे।" ... "कुनाल ने महीनों पहले उनके लिए चुपके से डेटा-रूम खोल दिया था। ... राजवंश का ताज, बाऊजी के हाथों खड़ा किया फ़्लैगशिप, वो अपने घर के सबसे पुराने दुश्मन को थमा रहा है। ... और इसकी गवाह इसी घर की बेटी है, त्रिशा।"

"त्रिशा? ... त्रिशा को इसमें मत घसीटो! ... वो कुछ नहीं जानती, वो बच्ची है!" ... "माँ... माँजी, आप कुछ कहती क्यों नहीं? ... इसे रोकिए ना!"

मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे डायरेक्टरों की नज़रें अब सौदे के काग़ज़ों से हट कर कुनाल के उतरे हुए चेहरे पर टिक गई थीं। ... और कोने में रखे स्पीकरफ़ोन पर सूर्यवंशी के आदमी ने बिना एक शब्द कहे लाइन काट दी, जैसे डूबते जहाज़ से पहला चूहा चुपचाप उतर गया हो।

"मैं ये सब आज इसलिए नहीं खोल रही कि मुझे कुर्सी चाहिए। ... मुझे तो कभी नहीं चाहिए थी।" ... "मैं इसलिए खोल रही हूँ, क्योंकि इस सौदे के पास होते ही चार हज़ार मज़दूर सड़क पर आ जाएँगे, और बाऊजी की उम्र भर की मेहनत सूर्यवंशी के लॉकर में चली जाएगी।" ... "ये फ़्लैगशिप बिकने के लिए नहीं है। ... आज रात नहीं। ... कभी नहीं।"

कुनाल का चमकता हुआ ताज मेज़ पर बिखर चुका था। ... डायरेक्टर हाथ खींच चुके थे, सौदा साँसें गिन रहा था। ... पर चर्वी की फ़ाइल में एक आख़िरी काग़ज़ अब भी बाक़ी था, वो जो आज की जंग नहीं, दस साल पुरानी जंग का फ़ैसला करने वाला था।

"बहुत हो गया, चर्वी! ... कुनाल की ग़लती है तो उसे सज़ा दो, बात यहीं ख़त्म करो। ... इस फ़ाइल को अभी बंद कर।" ... "मीटिंग ख़त्म हो चुकी है। ... मैं ख़त्म करती हूँ इसे।"

"अभी नहीं, माँजी। ... एक काग़ज़ और बाक़ी है।" ... "ये दस साल पुरानी वो मूल गारंटी है, जिसका इल्ज़ाम मैंने अपने सिर लिया था। ... जिसकी वजह से इस घर ने मुझे दस साल चोर कहा।" ... "इस पर कुनाल के जाली दस्तख़त तो हैं ही। ... पर उनके नीचे, एक और दस्तख़त है। ... पुराना। ... असली। ... उस हाथ का, जिसने ये पूरा घोटाला रचा था।"

पूरा बोर्डरूम एक साँस में उस काग़ज़ की तरफ़ झुक गया। ... कुनाल की आँखें फैल गईं, जैसे उसे भी नहीं मालूम था कि वो दूसरा दस्तख़त वहाँ मौजूद है। ... और मेज़ के सिरे पर, इंदुमती का चेहरा, पहली बार, सफ़ेद पड़ गया।

"वो... वो काग़ज़ कुछ साबित नहीं करता।" ... "कोई भी दस्तख़त कर सकता है उस पर! ... तू एक पुराने, पीले पड़े काग़ज़ के दम पर पूरे घर को बदनाम करेगी?"

"पूरे घर को नहीं, माँजी। ... सिर्फ़ एक हाथ को।" ... "दस साल पहले जो पैसा राजवंश से निकल कर आपके डूबते मायके में गया, वो कुनाल ने नहीं भेजा था। ... कुनाल तो सिर्फ़ आगे का चमकता चेहरा था। ... घोटाला आपने रचा, माँजी। ... अपने भाइयों का घर बचाने के लिए, इस घर को डुबो कर।" ... "और जब वो सब फटने को हुआ, तो सबका इल्ज़ाम अपने सिर लेने के लिए, आपने एक ही औरत चुनी। ... घर की बड़ी बहू। ... मुझे।"

मेज़ पर रखे काग़ज़ अब ख़ुद बोल रहे थे। ... बाऊजी की वसीयत की उस भूली शर्त के तहत, जो चर्वी के नाम चुपचाप दुगने वोट देती थी, फ़्लैगशिप बेचने का वो प्रस्ताव अब बिना एक भी वोट डले, वहीं मर चुका था। ... और उसी पल, उस शीशे के कमरे में, दस साल पलट गए। ... जिस औरत को यह घर रसोई की नौकरानी समझता रहा, वो आज पूरे बोर्ड के सामने, उस साम्राज्य की असली मालकिन साबित हो चुकी थी, जिसे उसने दो बार बचाया था।

बोर्डरूम के दरवाज़े पर, छाया में, एक और चेहरा खड़ा था, जो कब से वहाँ आ चुका था। ... रणबीर। ... वो अपनी अधूरी बात लिए चर्वी के पीछे-पीछे यहाँ तक चला आया था, और दहलीज़ पर ठिठक कर उसने वो सब सुन लिया था, जो उसकी माँ ने दस साल मिट्टी के नीचे दबा रखा था। ... अब वो धीरे-धीरे अंदर आया, उसकी नज़र अपनी माँ के उतरे हुए चेहरे पर गड़ी हुई।

"माँ... ... ये सच है?" ... "दस साल... दस साल आप मुझसे कहती रहीं कि इस घर को इसने डुबोया, कि ये चोर है, कि इसने हमें बरबाद किया। ... और असल में... वो पहला दस्तख़त आपका था?" ... "मैं जिससे दस साल नफ़रत करता रहा, वो इस पूरे वक़्त आपका गुनाह ढो रही थी?"

"हाँ! ... हाँ, रणबीर, वो दस्तख़त मेरा था! ... कारोबार मैंने डुबोया, इसने बचाया, ये सच है, ले, सुन ले!" ... "पर एक सच और भी है, बेटा, जो ये तुझे कभी नहीं बताएगी। ... पैसे की बात अलग है। ... पर उस रात, तेरे बेटे के साथ जो हुआ, वो..."

"माँजी, बस। ... रणबीर के सामने नहीं। ... रुक जाइए, ख़ुदा के लिए।"

"क्यों रुक जाऊँ? ... तू दस साल चुप रही, आज मैं बोलूँगी।" ... "उस रात, जब सब कुछ फट रहा था, मैंने इसे इस घर से निकाल दिया था, रणबीर। ... भरी बरसात में, फाटक के बाहर, अकेला। ... ये पेट से थी, तेरा बच्चा इसके पेट में था, और मैंने अपने ग़ुस्से में इसे उस तूफ़ान में धकेल दिया।" ... "तेरा बेटा, राजवंश का वारिस, इसकी महत्वाकांक्षा ने नहीं... ... मेरे ग़ुस्से ने छीना था तुझसे। ... उस रात, उस बारिश में, इसी घर के फाटक के बाहर।"

एक पल के लिए बोर्डरूम में इतनी गहरी ख़ामोशी उतरी कि लगा शीशे की दीवारें भी साँस लेना भूल गई हों। ... रामदुलारी की वो अधूरी याद, तूफ़ान, ऊपर से आती तेज़ आवाज़ें, और फाटक के पास भीगी हुई मिली बहू, आज पूरी हो कर उस कमरे के बीचोंबीच खड़ी थी, नंगी, और किसी के इनकार की पहुँच से बाहर।

"आप... ... आपने..." ... "चर्वी... ... तुम उस रात... इस बारिश में... इस फाटक के बाहर... अकेली..."

"मैंने तुमसे कहा था, रणबीर। ... अपनी माँ से पूछो, उस रात उन्होंने क्या दस्तख़त किया था।" ... "मैंने कभी बच्चे और कारोबार में से कारोबार नहीं चुना था। ... वो चुनाव मुझसे किसी ने कराया ही नहीं।"

दस साल जिसका ग़म रणबीर ने अपनी पत्नी के नाम लिख रखा था, उसका असली क़र्ज़दार आज उसके सामने खड़ा था, उसकी अपनी माँ। ... राजवंश की असली मालकिन उस रात बोर्ड जीत चुकी थी, अपना नाम, अपना साम्राज्य, अपना खोया हुआ सच, सब वापस पा चुकी थी। ... पर उसकी सबसे बड़ी जीत, उसके सबसे गहरे ज़ख़्म के ठीक ऊपर खड़ी थी, और उस काले आसमान के नीचे रणबीर की आँखें अपनी माँ से हट कर, दस साल में पहली बार, उस औरत पर ठहर गईं जिसे उसने कभी सचमुच देखा ही नहीं था।

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