अध्याय 24 / 30 पढ़ने में 10 मिनट
आख़िरी सौदा
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
रणविजय सूर्यवंशी हवेली की बैठक में पूरा राजवंश ग्रुप 'इज़्ज़त के साथ' ख़रीदने का वो सौदा रखता है जो किसी भी धमकी से ज़्यादा ख़तरनाक है, और पहली बार पूरा घर, टूटी हुई इंदुमती समेत, बड़ी बहू के फ़ैसले का इंतज़ार करता है, जबकि रणबीर खुले आम पत्नी के बग़ल में खड़ा होता है। चर्वी सौदा ठुकरा कर अपनी शर्तों पर लड़ने का ऐलान करती है, और अकेले में सेठी से कह देती है कि ये जंग जीतने के बाद वो मिष्टी को ले कर ये घर छोड़ देगी।
जिसे किसी ने नहीं बुलाया था, उसे भी लखनऊ की तहज़ीब ने बैठक तक पहुँचा दिया। ... बड़ी बैठक के झाड़-फ़ानूस दस साल में पहली बार किसी सूर्यवंशी के सिर पर जले, और रणविजय सूर्यवंशी उस मख़मली कुर्सी पर ऐसे बैठे जैसे ख़रीदने से पहले नाप लेने आए हों।
"क्या घर है, चर्वी जी। ... लखनऊ में ऐसी बैठकें अब बनती नहीं। ... यशवंत जी की तहज़ीब उनके पत्थरों तक में उतरी हुई है।" ... "इसीलिए मैं ख़ुद आया। ... वकीलों की भाषा में तहज़ीब नहीं होती।"
"तशरीफ़ आप बिन बुलाए लाए हैं, रणविजय जी, पर मेहमान फिर भी मेहमान है। ... कहिए। ... इतनी दूर आप सिर्फ़ हमारे पत्थरों की तारीफ़ करने तो नहीं आए होंगे।"
सेठी दीवार के पास खड़े थे, हाथ में वही पुरानी डायरी, आँखें कमरे के हर लफ़्ज़ को क़लमबद्ध करती हुईं। ... दरवाज़ों की ओट से रिश्तेदार झाँक रहे थे, और सीढ़ियों के ऊपर, बरसों बाद अपने कमरे से निकली इंदुमती चुपचाप खड़ी थी, बिना गहनों के।
"मैं सौदा ले कर आया हूँ, चर्वी जी। ... आख़िरी सौदा।" ... "सूर्यवंशी ग्रुप पूरा राजवंश ग्रुप ख़रीदेगा, बाज़ार से बीस फ़ीसदी ऊपर के दाम पर। ... हवेली आपकी रहेगी, नाम आपका रहेगा, अदालत की याचिका उसी दिन वापस, और अख़बारों की सुर्ख़ियाँ उसी हफ़्ते बंद।"
"और आपके चार हज़ार मज़दूर... ... मेरी लिखित गारंटी, एक भी नौकरी नहीं जाएगी।" ... "शहर कहेगा राजवंश ने समझदारी से इज़्ज़त बचा ली। ... कोई नहीं कहेगा कि हारे। ... हारना तो तब होता है, चर्वी जी, जब लड़ाई होती है।"
चर्वी ने कनखियों से दरवाज़े की तरफ़ देखा। ... वहाँ खड़े रिश्तेदारों की आँखों में उसे वही चमक दिखी जो डूबते आदमी को रस्सी देख कर आती है। ... और वो समझ गई, ये सौदा बनाया ही इसी लिए गया था।
"बीस फ़ीसदी ऊपर। ... बड़ी मेहरबानी है, रणविजय जी। ... पर एक हिसाब समझा दीजिए।" ... "जिस ख़ानदान को आपके वकील अदालत में कारोबार चलाने के नालायक़ साबित कर रहे हैं, उसी ख़ानदान का कारोबार आप बाज़ार से महँगा क्यों ख़रीदना चाहते हैं?"
कमरे में एक पल को वो हुआ जो रणविजय सूर्यवंशी के साथ कम होता है। ... उसकी मुस्कान अपनी जगह से एक बाल भर खिसकी। ... और फिर लौट आई, पहले से ज़्यादा मुलायम।
"क्योंकि मैं बरबाद चीज़ें नहीं ख़रीदता, चर्वी जी। ... मैं बेहतरीन चीज़ें ख़रीदता हूँ, जो ग़लत हाथों में बरबाद हो रही हों।" ... "परसों अदालत में पहली सुनवाई है। ... उस सुबह तक मेरा काग़ज़ खुला है। ... उसके बाद जो होगा, वो सौदा नहीं होगा। ... वो नीलामी होगी।"
तभी बैठक का दरवाज़ा पूरा खुला, और रणबीर अंदर आया। ... सीधा चल कर, पूरे घर की आँखों के सामने, अपनी पत्नी की कुर्सी के बग़ल में खड़ा हो गया। ... दस साल में पहली बार, उसकी जगह किसी और ने नहीं, उसने ख़ुद चुनी थी।
"हमारी बैठक में तशरीफ़ रखने का शुक्रिया, रणविजय जी। ... पर जाते-जाते एक बात नोट कर लीजिए।" ... "इस घर का जवाब जो भी हो, वो देगी सिर्फ़ एक आवाज़, मेरी पत्नी की। ... और वो जो कहेगी, राजवंश का हर आदमी उसी के पीछे खड़ा मिलेगा।"
"वाह। ... दस साल जिस घर ने इन्हें रसोई में रखा, आज वही घर इनके पीछे क़तार में खड़ा है।" ... "मैं तो बरसों से कहता आया हूँ, इस शहर में अक़्ल सिर्फ़ एक मेज़ पर बैठती है। ... परसों सुबह तक का वक़्त है। ... सोचिएगा... मालकिन।"
गाड़ी फाटक से निकल गई, और हवेली ने रोकी हुई साँस छोड़ी। ... पर ये सन्नाटा नया था। ... दस साल इस घर ने चर्वी को हुक्म सुनाए थे। ... आज पूरा घर दालान में जमा था, और उसके एक लफ़्ज़ का इंतज़ार कर रहा था।
कोई कह रहा था बेच दो, इज़्ज़त बच जाएगी। ... कोई कह रहा था बाऊजी की मिट्टी है, कैसे बेच दें। ... पर हर आवाज़ घूम-फिर कर एक ही दरवाज़े पर आ कर रुकती थी। ... बड़ी बहू क्या कहती है।
रसोई में रामदुलारी ने शरबत के गिलास पटकते हुए अपना फ़ैसला पहले ही सुना दिया था, कि जो आदमी मुस्कुरा कर घर ख़रीदने आता है, वो डाकू से ज़्यादा ख़तरनाक होता है, और उसकी बिटिया रानी उसे ख़ाली हाथ ही लौटाएगी, लिख लो। ... त्रिशा ने सुना, और पहली बार उस दिन मुस्कुरा दी।
और तभी सीढ़ियों से इंदुमती उतरी। ... बरसों बाद सबके सामने, बिना गहनों के, बिना उस ग़रूर के जो कभी उसकी रीढ़ हुआ करता था। ... भीड़ आदत से बँट कर रास्ता देने लगी, पर इस बार वो रास्ता किसी डर से नहीं बना था।
"बहू।" ... "मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ भी कहने का हक़ मैं खो चुकी हूँ। ... फिर भी एक बात सुन लो। ... ये सौदा मत लेना।"
"क्यों, माँ जी? ... इज़्ज़त तो बच जाएगी। ... और इस घर में इज़्ज़त से बढ़ कर कुछ रहा है क्या?"
"इज़्ज़त...।" ... "इसी एक लफ़्ज़ के पीछे भागते-भागते मैंने अपना मायका डुबोया, तुम्हारा बच्चा छीना, अपने बेटे का घर तोड़ा। ... मैं जानती हूँ इज़्ज़त बचाने वाले सौदे कैसे होते हैं, बहू। ... ऐसे एक काग़ज़ पर दस्तख़त मैं भी कर चुकी हूँ।"
पूरा दालान पत्थर हो गया। ... जो औरत दस साल इस घर की हर साँस पर पहरा बिठाती आई थी, वो आज भरे घर के सामने अपनी हार का हिसाब ख़ुद पढ़ रही थी।
"तुम मुझसे बेहतर हो। ... ये मानने में मैंने दस साल और एक पोता गँवा दिया।" ... "जो भी फ़ैसला तुम करोगी, इस घर के लिए करोगी, अपने लिए नहीं। ... बस यही फ़र्क़ है हम दोनों में। ... और शायद यही फ़र्क़ इस घर को बचा ले।"
चर्वी ने कुछ नहीं कहा। ... न माफ़ी का एक लफ़्ज़, न तंज़ का। ... उसने बस एक पल इंदुमती की आँखों में देखा, और उस एक देखने में दस साल का सारा हिसाब चुपचाप दर्ज हो गया। ... फिर वो मुड़ी, और दालान को उसके सवाल के साथ छोड़ कर दफ़्तर की तरफ़ चली गई।
शाम को दफ़्तर में फ़ाइलों का पहाड़ फिर चर्वी के सामने था, जब रणबीर बिना दस्तक अंदर आया। ... वही आदमी जिसका भेजा एक मैसेज उसके फ़ोन में अब भी बिना जवाब पड़ा था।
"मुझे नहीं पता तुम सौदे पर क्या सोच रही हो। ... और मैं पूछने नहीं आया।" ... "मैं बस इतना कहने आया हूँ, परसों अदालत में, बोर्ड में, बाज़ार में, तुम जहाँ खड़ी होगी, मैं तुम्हारे बग़ल में खड़ा रहूँगा। ... बिना कुछ माँगे।"
"आज बैठक में तुमने जो किया, पूरा घर देख रहा था। ... अच्छा लगा, रणबीर। ... सच कहूँ, तो अच्छा लगा।" ... "पर एक ग़लतफ़हमी मत पालना। ... एक सही दोपहर, दस साल की ग़लत रातों का हिसाब नहीं होती।"
"मैं हिसाब बराबर करने नहीं खड़ा हुआ था, चर्वी। ... वो बराबर हो ही नहीं सकता।" ... "मैं बस अब उस तरफ़ खड़ा होना सीख रहा हूँ जो सही है। ... देर से सही। ... और तुम मानो या न मानो, ये मैं तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए भी कर रहा हूँ।"
मेज़ के कोने पर मिष्टी की बनाई एक ड्राइंग रखी थी। ... टेढ़ी-मेढ़ी हवेली, ऊपर बादल, और बड़े कच्चे अक्षरों में लिखा था, मेरा घर। ... चर्वी की नज़र फ़ाइलों से उठ कर उस काग़ज़ पर रुकी, और सबसे ज़्यादा देर वहीं ठहरी रही।
"सब पूछ रहे हैं मैं क्या फ़ैसला करूँगी। ... कोई ये नहीं पूछ रहा कि मैं क्या चाहती हूँ।" ... "फ़र्क़ समझते हो, रणबीर? ... दस साल में इस घर ने मुझसे हज़ार बार पूछा है, बहू क्या करेगी। ... एक बार नहीं पूछा, चर्वी क्या चाहती है।"
"तो मैं पूछता हूँ। ... तुम क्या चाहती हो, चर्वी?"
सवाल कमरे में देर तक टँगा रहा। ... चर्वी ने जवाब नहीं दिया। ... पर उस रात, बरसों में पहली बार, किसी ने उससे वो सवाल पूछा था, और पूछने वाला उसका अपना पति था। ... जवाब उसके पास था। ... बस, सुनाने की जगह ये नहीं थी। ... और सुनने वाला भी, अभी, ये नहीं था।
आधी रात के बाद चर्वी ने सेठी को दफ़्तर बुलाया। ... मेज़ पर सूर्यवंशी का काग़ज़ खुला रखा था। ... बीस फ़ीसदी ऊपर वाला, इज़्ज़त बचाने वाला, आख़िरी सौदा।
"पूरा शहर सो रहा है और आप जाग रही हैं। ... इसका मतलब फ़ैसला हो चुका है।" ... "सुनाइए, चर्वी जी। ... क़लम तैयार है। ... हाथ का काँपना मैं सँभाल लूँगा।"
"लिखिए। ... राजवंश ग्रुप बिकाऊ नहीं है। ... न बीस फ़ीसदी ऊपर, न दो सौ फ़ीसदी।" ... "बाऊजी ने ये घर मुझे बेचने के लिए नहीं दिया था, बचाने के लिए दिया था। ... हम अदालत में लड़ेंगे, बोर्ड में लड़ेंगे, और जिस बाज़ार में सूर्यवंशी ने हमारी बदनामी बोई है, उसी बाज़ार में उसकी फ़सल काटेंगे।"
"यानी जंग।" ... "बीस साल इस ख़ानदान के काग़ज़ सँभाले हैं मैंने, चर्वी जी। ... आज पहली बार लिखते हुए मज़ा आ रहा है।" ... "पर एक बात साफ़ कह दूँ। ... ठुकराया हुआ सूर्यवंशी दुगना ख़तरनाक होता है। ... परसों अदालत में वो पूरी ताक़त से संपत्ति फ़्रीज़ करवाने आएगा।"
"कुनाल का बयान कल सुबह ही क़लमबद्ध करवा लीजिए, इससे पहले कि सूर्यवंशी उस तक पहुँचे। ... त्रिशा से कहिए रिश्तेदारों का काम जारी रखे।" ... "और रणविजय सूर्यवंशी को मेरा जवाब लिख कर मत भेजिएगा। ... उसे अदालत में सुनने दीजिए। ... मेहमान-नवाज़ी का इतना हक़ तो बनता है।"
सेठी ने काग़ज़ समेटे और उठने ही वाले थे कि चर्वी की आवाज़ ने उन्हें रोक लिया। ... इस बार उस आवाज़ में चेयरपर्सन नहीं थी। ... कोई और थी। ... बहुत थकी हुई। ... और बहुत साफ़।
"एक बात और, सेठी जी। ... ये सिर्फ़ आप जानेंगे।" ... "ये जंग मैं जीतूँगी। ... राजवंश का नाम, बाऊजी का ब्रांड, चार हज़ार घरों का चूल्हा, सब बचा कर रहूँगी।" ... "पर जिस दिन आख़िरी काग़ज़ पर मुहर लगेगी...।"
"...उस दिन क्या, चर्वी जी?"
"उस दिन मैं ये घर छोड़ दूँगी।" ... "मैं दस साल राजवंश की नौकरानी रही। ... अब उसकी मालकिन हूँ। ... पर नौकरानी और मालकिन के बीच कहीं वो औरत खो गई जो सिर्फ़ चर्वी थी। ... जंग के बाद मैं उसे ढूँढने जाऊँगी, सेठी जी। ... मिष्टी को ले कर।"
सेठी के हाथ से क़लम छूटते-छूटते बची। ... जिस आदमी ने इस ख़ानदान की हर वसीयत पढ़ी थी, उसने आज वो वसीयत सुनी जो किसी काग़ज़ पर दर्ज नहीं थी। ... बड़ी बहू ये जंग जीतने जा रही थी। ... और जीत कर, ये घर छोड़ जाने का फ़ैसला कर चुकी थी।
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