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अध्याय 13 / 15

वही तारीख़

फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi

जनवरी की आख़िरी रात।

तनवी को वो तारीख़ अपनी हड्डियों में महसूस हो रही थी, जैसे कोई ठंडी उँगली रीढ़ पर फिर रही हो। यही वो रात थी। पिछली बार, इसी रात, इसी अँधेरे में, उसने एक जेल की कोठरी में आख़िरी साँस ली थी। और तभी, कहीं दूर, एक मालगाड़ी की सीटी गूँजी, लंबी और अकेली, वही आवाज़ जो उस आख़िरी रात भी उसने सुनी थी। आज वो भी कहीं जा रही थी, और इस बार वो जानती थी कहाँ। क़िस्मत को ये तारीख़ पसंद थी, इसी रात उसने अपना सबसे बड़ा दाँव लगाया था। और अब तनवी इसी रात पर हिसाब वसूलने आई थी।

बड़ी माँ अपनी कुर्सी पर बैठी थीं, अगरबत्ती और चंदन की महक के बीच। एक अकेले दीये की काँपती लौ में उनका चेहरा आधा रोशन, आधा अँधेरे में डूबा था। उन्होंने धीरे से नज़रें उठाईं।

"इस वक़्त? अकेली?" उन्होंने भौंह उठाई। "रात के इस पहर में मेरे कमरे में। तुममें हिम्मत है, बहू।"

"मैं हिम्मत के लिए नहीं आई, बड़ी माँ।" तनवी दहलीज़ पर रुकी। "मैं आपको आपके ही लाडले से बचाने आई हूँ।"

बड़ी माँ की उँगलियाँ माला पर रुक गईं। फिर उनके होंठों पर एक पतली, ठंडी मुस्कान आई। "सोच लो कि तुम क्या कहने जा रही हो। क्योंकि इस घर में मेरे लाडले के ख़िलाफ़ कहा गया हर लफ़्ज़ वापस नहीं लिया जा सकता।"

"मुझे कुछ वापस नहीं लेना।" तनवी ने अपने पल्लू से काग़ज़ों की एक पतली तह निकाली, और उन्हें ठीक दीये की रोशनी में मेज़ पर रखा। "ये राणा ग्रुप की सबसे गुप्त एंट्रियाँ हैं। त्रिवेणी। वो पैसा जो एक कंपनी से दूसरी तक, फिर एक ट्रस्ट, और फिर एक चुनाव तक जाता है। आप समझती हैं ये सब आपके इशारे पर हो रहा है।"

"होता ही है।" बड़ी माँ ने काग़ज़ों को छुआ तक नहीं। "इस घर का एक पत्ता भी मेरी मर्ज़ी के बिना नहीं हिलता।"

"फिर इन तारीख़ों को देखिए।" तनवी की उँगली एक पंक्ति पर रुकी। "ये पहली एंट्री, जिससे ये पूरी साज़िश निकली, इसकी तारीख़ आपके उस दस्तख़त से पहले की है जिससे आपने इसे मंज़ूरी दी। आपके पीछे। आपसे पहले।"

बड़ी माँ की नज़र अब काग़ज़ पर थी। बहुत देर तक वो हिलीं नहीं। फिर उन्होंने धीरे से वो काग़ज़ उठाए, और तनवी ने पहली बार उस पथरीले चेहरे पर एक बारीक दरार देखी।

"ये झूठ है," उन्होंने कहा। पर उनकी आवाज़ में वो फ़ौलाद नहीं था।

"आप जानती हैं ये झूठ नहीं है, बड़ी माँ। आप इस घर का हर हिसाब पढ़ सकती हैं, और आप पढ़ चुकी हैं।" तनवी आगे झुकी। "युवराज बरसों से आपसे पूछे बिना, आपसे आगे चल रहा है। उसने ये पूरा खेल आपके पीछे बुना, और आपको लगता रहा कि चाबी आपके हाथ में है। उसने आपको एक मोहरा बना दिया है।" उसने उनके ही लफ़्ज़ धीरे से लौटाए। "और मोहरे इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाते हैं। ये आपने मुझे सिखाया था।"

"बस!"

बड़ी माँ खड़ी हो गईं, और कुर्सी पीछे घिसटी। पहली बार उनकी आवाज़ काँपी।

"तुम नहीं जानतीं तुम क्या कह रही हो।" वो दीये की तरफ़ मुड़ीं, उनकी पीठ तनवी की तरफ़। "मैंने उस बच्चे को अपने इन हाथों से पाला है। जब उसकी माँ इस घर से जनाज़े की तरह निकली, तो वो दो दिन का था। और वो मेरी गोद में इतनी ज़ोर से रोया था कि लगा साँस ही न टूट जाए। उसका पहला लफ़्ज़ मेरा नाम था, उसकी माँ का नहीं।"

वो पलटीं, और उनकी आँखें चमक रही थीं, पर वो चमक आँसुओं की नहीं, ग़ुस्से की थी। "और तुम मेरे पास आकर कह रही हो कि मेरा युवराज मुझे धोखा दे रहा है?"

तनवी ने नज़र नहीं झुकाई। "मैं कह रही हूँ कि वो इस घर को ले डूबेगा।"

"वो इस घर के लिए जान दे देगा!"

"नहीं, बड़ी माँ।" तनवी की आवाज़ नरम हुई, पर अटल। "वो इस घर के लिए आपको दे देगा, ख़ुद को नहीं। फ़र्क़ समझिए। आप सत्तर साल से इस घर की रखवाली कर रही हैं। और आज, इस एक रात, आपको चुनना है। अपना सबसे प्यारा बच्चा। या वो घर, जिसके लिए आपने अपनी पूरी ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी।"

बड़ी माँ की आँखें उन काग़ज़ों पर जमी रहीं। और तनवी ने उनके भीतर वो जंग देखी, एक माँ और एक मालकिन के बीच की जंग, दो औरतें एक ही बूढ़े जिस्म में लड़ रही थीं।

"तुम जानती हो तुम मुझसे क्या माँग रही हो?" उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, और अब उनकी आवाज़ बहुत बूढ़ी थी। "तुम मुझसे कह रही हो कि मैं अपने ही हाथों से अपने बच्चे का गला घोंट दूँ। मेरे अंदर की माँ का गला घोंट दूँ।"

"नहीं।" तनवी का गला भर आया, पर उसने अपनी आवाज़ को संभाला। "मैं कह रही हूँ कि आप अपने घर को बचा लें, इससे पहले कि वो उसे, और आपको भी अपने साथ ले डूबे। मैं चली जाऊँगी, बड़ी माँ। पर ये तारीख़ लौटकर आएगी। तारीख़ें लौटती हैं।"

बहुत देर तक कमरे में सिर्फ़ अगरबत्ती की लौ काँपती रही, और बड़ी माँ की धीमी, भारी साँसें।

फिर बड़ी माँ ने आँखें बंद कीं। उनके चेहरे पर एक पल को सब कुछ आया, सत्तर साल का बोझ, एक बच्चे का चेहरा, एक माँ की हार। और जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनमें आँसू नहीं थे, सिर्फ़ वो ठंडी, पथरीली गणना थी जिसने उन्हें सत्तर साल इस घर की मालकिन बनाए रखा था। माँ हार चुकी थी। मालकिन जीत चुकी थी।

"मैंने इस घर को सत्तर साल खड़ा रखा है," उन्होंने बहुत धीरे से कहा। "मैंने इसके लिए अपने दोनों बेटों के जनाज़े उठते देखे, और रोई नहीं, क्योंकि घर की मालकिन रोती नहीं। मैंने इसके लिए एक बेगुनाह लड़की को सलाखों के पीछे भेज दिया, और रात को चैन से सोई।" उनकी नज़र एक पल को तनवी से मिली, और उसमें कोई माफ़ी नहीं थी। "और आज..." उनकी आवाज़ पूरी तरह टूटी। "और आज मैं अपने युवराज को भी छोड़ दूँगी। क्योंकि घर किसी एक इंसान से बड़ा होता है। चाहे वो इंसान मेरी अपनी जान ही क्यों न हो।"

वो उठीं, और एक थके हुए हाथ से अपने पल्लू की गाँठ खोली। उसमें से एक छोटी, पुरानी पीतल की चाबी निकली, जो बरसों उस गाँठ की गर्मी में रही थी।

वो दीवार की उस धुँधली तस्वीर की तरफ़ बढ़ीं जिसमें राणा ख़ानदान की तीन पीढ़ियाँ खड़ी थीं। उन्होंने तस्वीर को एक तरफ़ झुकाया, और उसके पीछे, दीवार में धँसी, एक लोहे की तिजोरी थी।

"ये चाबी मैंने पच्चीस साल किसी को नहीं दी," उन्होंने बिना तनवी की तरफ़ मुड़े कहा। "मुझे लगता था, जब तक ये मेरे पल्लू में है, इस घर का दिल मेरे पास है।" चाबी ताले में घूमी, और एक भारी, पुराना क्लिक हुआ। "उसने ये सब इसके बिना ही कर लिया। मेरे दिल को छुए बिना।"

तिजोरी का दरवाज़ा खुला, और काग़ज़ों और लोहे की एक पुरानी गंध बाहर आई। अंदर फ़ाइलें थीं, गहने की एक डिबिया, और एक तह किया हुआ, पीला फ़ोल्डर। बड़ी माँ ने वो फ़ोल्डर निकाला, एक पल को थामे रखा, जैसे ख़ुद का ही कुछ सौंप रही हों, फिर उसे तनवी की तरफ़ बढ़ाया।

तनवी के हाथ काँप रहे थे जब उसने वो फ़ोल्डर लिया, खोला। ऊपर राणा कंपनी के एक पुराने दफ़्तर की तस्वीर थी, उसके नीचे, वो दस्तावेज़।

वहीं था।

उस पर उसके जाली दस्तख़त थे, उसके अपने हाथ की नक़ल, इतनी सफ़ाई से बनाई गई कि एक पल को तनवी को ख़ुद शक हुआ। और ऊपर, कोने में, वो नामुमकिन तारीख़। एक ऐसा दिन जब उसकी शादी तक नहीं हुई थी, जब वो इन काग़ज़ों के सौ मील पास भी नहीं हो सकती थी। उसकी ढीली सलाख।

उसके हाथ और काँपे। आँखें भर आईं। ये था। उसके हाथ में उसकी आज़ादी थी, उसकी माँ की वो हँसी जो तीन साल बेटी की बदनामी ढोते ढोते बुझ गई थी, और उस एक कोठरी में बीती आख़िरी रात का सच।

"मिल गया," तनवी ने फुसफुसाया, और फ़ोल्डर को सीने से लगा लिया।

और तभी दरवाज़ा खुला।

"वाह, बड़ी माँ।"

युवराज दहलीज़ पर खड़ा था, उसके होंठों पर वही प्यारी मुस्कान जिस पर पूरा शहर जान देता था। पर उसकी आँखें बर्फ़ थीं।

"पच्चीस साल मैंने ये चाबी आपसे माँगी, और आपने हर बार मना किया," उसने धीरे से कमरे में क़दम रखा। "और आज, एक भगोड़े की बेटी के कहने पर, आपने ये तिजोरी अपने हाथों से खोल दी। आपने मुझे चुना था। और आज आपने मुझे छोड़ दिया।"

"युवराज, तुमने मुझसे झूठ बोला।" बड़ी माँ की आवाज़ अब फिर पत्थर थी। "मेरे पीछे। बरसों मेरे पीछे।"

"मैंने आपको बचाया!" वो एक क़दम और आगे बढ़ा, और पहली बार उसकी मुस्कान दरकी। "जो फ़ैसले लेने की हिम्मत आपमें नहीं बची थी, वो मैंने लिए। मैंने अपने हाथ गंदे किए ताकि आपके साफ़ रहें। और आप इसका बदला एक औरत की बातों में आकर दे रही हैं!"

वो बड़ी माँ की तरफ़ मुड़ा, और उसकी आवाज़ अचानक बदल गई, मीठी, मनाने वाली।

"बड़ी माँ। मुझे देखिए। आपके युवराज को। ये औरत आपके दिमाग़ में ज़हर घोल रही है। हम दोनों ने मिलकर इस घर को सत्तर साल संभाला है। इसे इस बाहर की लड़की के लिए मत तोड़िए।" वो उनके और क़रीब गया। "वो काग़ज़ मुझे दे दीजिए। और हम भूल जाएँगे कि ये रात कभी हुई थी।"

एक पल को बड़ी माँ झिझकीं। उनकी नज़र उस चेहरे पर ठहरी जो कभी दो दिन का था, और तनवी ने अपना दिल रुकते महसूस किया।

"बड़ी माँ," युवराज ने और धीरे से कहा, और अपना हाथ उनकी तरफ़ बढ़ाया। "आपका बच्चा।"

बड़ी माँ ने उस हाथ को बहुत देर तक देखा। फिर नज़र हटा ली।

"नहीं, युवराज।" उनकी आवाज़ फ़ौलाद थी, पर उसके नीचे कहीं कुछ टूट रहा था। "तुमने मुझे एक मोहरा समझा, अपनी ही बड़ी माँ को। और जो इस घर की मालकिन को मोहरा समझे, वो इस घर का राजा नहीं हो सकता।"

युवराज का बढ़ा हुआ हाथ हवा में रुक गया, फिर धीरे धीरे नीचे गिरा। और उसके चेहरे की आख़िरी मिठास भी सूख गई। जो रह गया, वो ठंडा और सपाट था।

उसकी नज़र तनवी के सीने से लगे फ़ोल्डर पर पड़ी, और उसे एहसास हो गया कि वो क्या था।

"तो ये थी तुम्हारी ढीली सलाख," उसने बहुत धीरे से कहा, और तनवी की तरफ़ एक क़दम बढ़ाया। उसकी हँसी बेजान थी। "मैंने ये जाल बाहर से बुना, भाभी। और तुमने इसे अंदर से जिया। मैं भूल गया कि एक क़ैदी अपनी सलाखों को मुझसे बेहतर जानती है।"

"हम दोनों भूल गए थे, युवराज।" तनवी ने फ़ोल्डर और कसकर पकड़ा। "तुम भूल गए कि मैंने ये देख लिया। और मैं भूल गई थी कि एक मरी हुई औरत भी वापस आ सकती है।"

युवराज रुक गया। उसकी आँखों में एक पहचान आई।

"वापस," उसने दोहराया, धीरे से, जैसे शब्द को चख रहा हो। "हाँ। हम दोनों जानते हैं ना, भाभी, कि आज कौन सी रात है। जनवरी की आख़िरी। तुम्हारी तारीख़। वो रात जब, पिछली बार, तुमने एक ठंडी फ़र्श पर अकेले दम तोड़ा था।" वो और क़रीब आया, उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट हो गई, ऐसी जो सिर्फ़ दो लौटे हुए लोग समझ सकते थे। "क़िस्मत को ये तारीख़ बहुत पसंद है। उसने तुम्हें एक बार इसी रात माँगा था। और वो तुम्हें फिर माँग रही है।"

"क़िस्मत को मायूस होना पड़ेगा," तनवी ने कहा, अपनी आवाज़ को काँपने नहीं दिया। "इस बार मैं अकेले नहीं हूँ।"

"देखते हैं।"

युवराज की जेब से कुछ निकला, और दीये की काँपती रोशनी में धातु की एक ठंडी चमक उभरी।

"युवराज, रुको!" बड़ी माँ चीख़ीं, और उनकी आवाज़ में पहली बार एक माँ का सच्चा ख़ौफ़ था। "ये क्या कर रहे हो, बच्चे! रुक जा!"

और उसी पल, जैसे क़िस्मत ने ख़ुद हस्तक्षेप किया हो, पूरी हवेली की बत्ती एक झटके से चली गई। अँधेरा। पूरा, घना, ठोस अँधेरा। दीया भी बुझ गया।

और उस अँधेरे में तनवी एक पल को कहीं और थी। वो फिर उसी कोठरी में थी, उसी ठंडी, नम फ़र्श पर, और एक आवाज़ उसके भीतर फुसफुसा रही थी, इसी अँधेरे में, इसी रात को तुम फिर मरोगी। तुम कभी इस कोठरी से निकली ही नहीं।

"नहीं," तनवी ने अँधेरे में बहुत धीरे से कहा, अपने ही डर से। "मैं निकल गई थी।"

उसने फ़ोल्डर को सीने में जकड़ा और अँधेरे में पीछे हटी। उसका कंधा किसी फ़र्नीचर से टकराया, और दर्द ने उसे वापस इस कमरे में खींचा। कहीं उसके सामने युवराज की साँसें थीं, भारी, पास आती हुई। बड़ी माँ की घबराई पुकार कमरे में भटक रही थी।

"रोशनी! कोई रोशनी लाओ! युवराज, बेटा, रुक जा, छोड़ दे ये सब, मेरी बात सुन!"

तनवी ने दीवार टटोली, पीछे और पीछे हटी, पर अँधेरे में दीवार हर तरफ़ थी और कहीं नहीं। एक पल को उसे लगा कि अगर वो अभी, इसी अँधेरे में मर भी जाए, तो ये सच रह जाएगा, उसका सच।

फिर एक हाथ अँधेरे में से निकला और उसकी कलाई पर पड़ा। ठंडा, मज़बूत। उसने तनवी को फ़ोल्डर की तरफ़ खींचा।

तनवी चीख़ी और पीछे को झटका दिया। दो जिस्म अँधेरे में टकराए, उलझ गए। बड़ी माँ की चीख़ अब लगातार थी, "छोड़ो उसे! युवराज! भगवान के लिए!" फ़र्श पर कोई चीज़ गिरी। एक जद्दोजहद। दो साँसें, गुत्थमगुत्था। एक चीख़, पर किसकी, ये अँधेरे में खो गई।

और फिर, उस घनघोर अँधेरे को बीच से चीरती हुई, एक गोली चली।

आवाज़ पूरी हवेली में गूँज गई, और फिर एक भयानक, पत्थर जैसी ख़ामोशी छा गई।

अँधेरे में कोई गिरा था।

पर कौन, ये कोई नहीं जानता था।

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