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Chapter 6 of 15

सच का पहला घूँट

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

उस रात तनवी सो नहीं पाई।

बार बार अरयन के वो लफ़्ज़ उसके कानों में गूँजते रहे। मैं वहाँ था। मैंने तुम्हें सुना। तीन साल वो ये सोचती रही थी कि वो बिल्कुल अकेली मरी थी, उस सर्द कोठरी में। और अब पता चला कि उसी अँधेरे में, सलाखों से बस एक हाथ दूर, एक और दिल टूट रहा था।

उसका दुश्मन नहीं। उसके जैसा कोई।

सुबह तनवी नीचे आई तो अरयन नाश्ते के कमरे में था, उसी जगह, उसी कुर्सी पर। पर इस बार उसके हाथ में अख़बार नहीं था। वो उसका इंतज़ार कर रहा था।

दोनों एक दूसरे को देखते रहे, और एक नई, अजीब सी ख़ामोशी तैर गई, दो ऐसे लोगों की जो एक ही क़ब्र से लौटे हों, और अब नहीं जानते कि एक दूसरे से क्या कहें।

तनवी बैठी। नौकर ने चुपचाप प्याला रखा। कॉफ़ी, बिना चीनी, इलायची के साथ। जैसी अरयन ने पहली ही सुबह, बिना पूछे, मँगवा दी थी, और जिसने तब उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ा दी थी।

अब वो जानती थी क्यों।

"तो," उसने आख़िरकार कहा, अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश करते हुए। "कल रात के बाद... क्या नियम बदल गए?"

अरयन के कान की लौ हल्की लाल हुई। "मुझे नहीं पता। मेरे पास इसका कोई तजुर्बा नहीं। पिछली बार हम तीन साल एक छत के नीचे रहे और शायद तीन सौ शब्द बोले।"

"और अब?"

"अब," उसने उसे देखा, "मैं चाहता हूँ ये तीन सौ शब्द हर रोज़ बोलूँ।"

तनवी ने कॉफ़ी में देखा ताकि वो अपनी मुस्कान छुपा सके। "पिछली बार मैंने तुम्हें कभी इतना बोलते नहीं सुना। तुम वो आदमी थे जो पूरे कमरे में होकर भी नहीं होते थे।"

"पिछली बार मेरे पास बोलने को कुछ नहीं था। सिर्फ़ अफ़सोस था। और अफ़सोस अकेले में बोला जाता है।" उसने प्याले को घुमाया। "इस बार मेरे सामने तुम बैठी हो। ज़िंदा। तीन साल मैंने यही सपना देखा और हर सुबह ख़ाली हाथ जागा।"

तनवी का गला कुछ पल के लिए रुक गया।

"शुक्रिया," उसने धीरे से कहा। "इसके लिए।"

"मुझे और कुछ नहीं आता तुम्हारे लिए करना। बस ये। तुम्हें ज़िंदा देखना।"

"फ़िलहाल," उसने प्याला रखते हुए कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो चार्टर्ड अकाउंटेंट वाली धार लौट आई, "मुझे तुमसे एक चीज़ और चाहिए। सच। पूरा। हर वो बात जो उस रात के बाद हुई, जो मैं नहीं देख पाई।"

नाश्ते के बाद वो दोनों हवेली के पिछवाड़े अमरूद के बाग़ में गए, जहाँ कोई सुन नहीं सकता था। गिरे पके अमरूदों की सोंधी महक हवा में तैर रही थी। और वहाँ, उन दो लोगों ने पहली बार वो बात की जो वो दुनिया में किसी और से नहीं कर सकते थे।

"मुझे बताओ," तनवी ने कहा, अपनी शॉल दोनों हाथों में समेटे। "जो मेरे मरने के बाद हुआ। पूरा बताओ, अरयन। वो हिस्सा भी जो दुखेगा।"

अरयन काफ़ी देर चुप रहा।

"तुम्हारे जाने के बाद सब कुछ युवराज के पास चला गया," उसने आख़िरकार कहा। "कंपनी, हवेली, बड़ी माँ का भरोसा। तुम्हारी अर्थी उठी ही नहीं थी कि उसने मेज़ पर खड़े होकर कहा, 'देखा? मैंने पहले ही कहा था इस लड़की पर भरोसा मत करो।' और सब ने सिर हिलाया।" उसका जबड़ा कसा। "जो लोग कल तक तुम्हें बहूरानी कहते थे, वही तुम्हारी तस्वीर दीवार से उतार रहे थे।"

"और तुम?" तनवी ने पूछा।

"और मैं?" वो हँसा, पर उस हँसी में कुछ टूटा हुआ था। "मैं पीता रहा। तुम्हारे केस की फ़ाइलें खंगालता रहा, ये साबित करने के लिए कि तुम बेगुनाह थीं।" उसने रुककर उसे देखा। "और तुम्हारी माँ हर महीने मेरे दफ़्तर आती थीं, बस ये पूछने कि क्या मुझे कुछ मिला। और हर महीने मुझे उनसे आँखें चुरानी पड़तीं।"

तनवी का गला भर आया। पर उसने ख़ुद को संभाला। ये रोने का वक़्त नहीं था। ये हिसाब लगाने का वक़्त था।

"बस करो," उसने काँपती आवाज़ में कहा, फिर ख़ुद को कठोर किया। "अब मेरा हिस्सा सुनो। जो तुम्हें नहीं पता।"

"मुझे वो दिन याद है जैसे कल की बात हो," उसने कहा, नज़रें दूर बाग़ की दीवार पर टिकाए। "पंद्रह मार्च। एक झूठा लेन-देन, बारह करोड़ का। मुनीम जी ने वो काग़ज़ मेरे सामने रखा और कहा, 'बस एक फ़ॉर्मैलिटी है बेटा, तुम तो सी ए हो।' हू-ब-हू वही लफ़्ज़ जो तुम्हारे ससुर ने पहली बार इस्तेमाल किए थे। उस घर में 'फ़ॉर्मैलिटी' सबसे ख़तरनाक शब्द था।" उसने एक कड़वी साँस ली। "मुझे वो हर एंट्री याद है जिस पर मेरे दस्तख़त लिए गए, हर तारीख़, हर रक़म। क्योंकि जेल में मुझे वो हज़ार बार याद दिलाई गई।" उसने उसकी तरफ़ देखा, और अब उसकी आँखों में आँसू नहीं, एक ठंडी आग थी। "वो मेरा गुनाह नहीं था, अरयन। वो मेरी फाँसी का फंदा था, जो किसी और ने बुना और मेरे गले में डाल दिया।"

अरयन ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ जागा जो उम्मीद जैसा था। "तुम्हें पता है शुरुआत कैसे हुई। मुझे पता है अंत किसने किया।"

"तुम्हारा भविष्य। मेरा अतीत।" तनवी ने धीरे से कहा। "अलग अलग, दोनों आधे-अधूरे। पर साथ में... साथ में शायद मिलाकर एक पूरा सच बने।"

"इसीलिए," अरयन एक क़दम पास आया, "हम अकेले नहीं हार सकते। और शायद, अकेले जीत भी नहीं सकते।"

वो इतने पास खड़े थे कि सर्दियों की वो हल्की धूप दोनों के बीच काँप रही थी। और उस पल, सालों की नफ़रत के मलबे के नीचे से, कुछ और निकल आया, कुछ जो दोनों को डरा रहा था, क्योंकि वो जाना-पहचाना था।

"तुमने पिछली बार मुझसे प्यार किया था?" तनवी ने अचानक पूछा, अपनी ही आवाज़ पर हैरान। "आख़िर में?"

अरयन रुका। "मैंने तुमसे तब प्यार किया जब बहुत देर हो चुकी थी। जब तुम सलाखों के पीछे थीं और मैं बाहर खड़ा कुछ नहीं कर पा रहा था।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "मैं हर रोज़ तुम्हें उस काँच के पीछे देखता, और हर रोज़ ख़ुद से कहता कि कल बोलूँगा। और फिर एक दिन कल नहीं आया। मैं उसी पछतावे के साथ मरा।" उसने उसकी आँखों में देखा। "इस बार मुझे देर नहीं करनी।"

और फिर, बहुत धीरे, जैसे कोई बहुत नाज़ुक चीज़ छू रहा हो, अरयन ने उसका चेहरा अपनी हथेली में लिया। उसका अँगूठा उसके गाल पर ठहरा, काँपता हुआ।

तनवी हट सकती थी। उसे हटना चाहिए था। पर वो हटी नहीं। और जब अरयन ने झुककर उसके होंठों को छुआ, तो वो चुंबन तीन साल का नहीं था, एक पूरी ज़िंदगी का था, एक अधूरी, खोई हुई ज़िंदगी का जो आख़िरकार अपना हिसाब माँग रही थी। तनवी ने आँखें बंद कर लीं, उसकी शॉल कंधों से सरक गई, और एक पल को, उस बाग़ में, मौत और बदले की पूरी दुनिया कहीं बहुत पीछे छूट गई।

फिर वो अलग हुए, दोनों हाँफते हुए।

"ये बदला नहीं बदल सकता," तनवी ने काँपती आवाज़ में कहा। "मैं अब भी उन्हें बर्बाद करूँगी। एक एक को।"

"मैं जानता हूँ," अरयन ने कहा, उसका माथा अपने माथे से लगाते हुए। "इस बार हम दोनों करेंगे। तुम हिसाब रखना, मैं तुम्हारी पीठ।"

तनवी की आँखें अब भी बंद थीं, पर उसके होंठ हल्के से मुस्कुरा दिए। "सी ए और उसका पहरेदार।"

"उसका शौहर," अरयन ने धीरे से कहा।

उसी दोपहर परी का फ़ोन आया। और परी, जो तनवी को बचपन से जानती थी, ने एक ही 'हेलो' में सब पकड़ लिया।

"रुक।" परी की आवाज़ अचानक तेज़ हुई। "ये आवाज़ क्या है? ये 'हेलो' क्या था? तू मुस्कुरा क्यों रही है? मुझे फ़ोन पर तेरी मुस्कान सुनाई दे रही है। तनवी सक्सेना, सच बता।"

"कुछ नहीं," तनवी ने कहा, और उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।

"कुछ नहीं? तीन दिन पहले तू कह रही थी कि तेरा पति तुझे भूत की तरह डरता है, और आज तू फ़ोन पर कबूतर की तरह गुटर गूँ कर रही है। हे भगवान।" एक पल की भयानक ख़ामोशी। फिर वो चीख़ी। "तुम दोनों ने... तूफ़ान वाली रात... मैंने कहा था! मैंने तुझसे साफ़ साफ़ कहा था! रोमांस का मौसम! बत्ती जाएगी, तू अकेली, वो अकेला! बोला था या नहीं बोला था?"

"परी, ऐसा कुछ नहीं है।"

"मुझसे झूठ मत बोल! मैं तुझे बीस साल से जानती हूँ! तू बिल्कुल वैसे ही हँस रही है जैसे कॉलेज में उस लड़के को देखकर हँसती थी जिसका नाम लेने से भी हम डरते थे!" वो रुकी, फिर एकदम धीमी, साज़िशी आवाज़ में बोली। "अच्छा एक बात बता। सच सच। उसने तुझे ये सब कैसे सिखाया? रोमांस वग़ैरह?"

"यूट्यूब," तनवी ने एकदम सपाट चेहरे से कहा।

एक पल को लाइन पर सन्नाटा छा गया।

"यूट्यूब," परी ने दोहराया, जैसे शब्द को चख रही हो।

"बहुत कुछ सिखाता है यूट्यूब।"

"फिर वही यूट्यूब!" परी फट पड़ी। "तेरी पूरी शादी यूट्यूब से चल रही है! रस्में यूट्यूब, रोमांस यूट्यूब! अगली बार बच्चा भी यूट्यूब से डाउनलोड कर लेना!" तनवी हँसते हँसते दोहरी हो गई। "हँस मत! मुझे पूरी डिटेल चाहिए, एक एक लफ़्ज़, अभी इसी वक़्त!"

"बाद में, पगली," तनवी हँस पड़ी, और फ़ोन रख दिया, अपने गालों की गर्मी महसूस करते हुए। बरसों बाद, पहली बार, उसकी हँसी में कोई बोझ नहीं था।

उस शाम, खाने की लंबी मेज़ पर पूरा परिवार जुटा था। बड़ी माँ अपनी ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर, हर चेहरे को बारी बारी तौलती हुई। युवराज अपने क़िस्सों से महफ़िल लूटता हुआ, वो सुनहरा लड़का जिस पर पूरा घर जान छिड़कता था, नवाबी अदब की वो चादर जिसके नीचे छुरियाँ छुपी थीं।

और उस भीड़ के बीच, तनवी और अरयन ने एक दूसरे को देखा। बस एक पल। एक ऐसी नज़र जो सिर्फ़ वो दोनों पढ़ सकते थे। जब युवराज ने हँसते हुए तनवी की तरफ़ उसका मनपसंद रायता बढ़ाया, तो उसने मुस्कुराकर थाली आगे की, और मेज़ के नीचे उसका पैर हल्के से अरयन के पैर से छू गया। एक ख़ामोश इशारा। संभलो। पूरी दुनिया एक आदर्श, शर्मीला जोड़ा देख रही थी। और सिर्फ़ वो दोनों जानते थे कि उस सजी हुई मेज़ के नीचे एक जंग चल रही थी।

पर उस गर्मी को ठंडा होने में देर नहीं लगी।

रात को, जब हवेली सो गई, अरयन उसके कमरे में आया। और उसका चेहरा बता रहा था कि कुछ ग़लत है।

"क्या हुआ?" तनवी बिस्तर पर बैठी थी, गोद में एक पुराना रजिस्टर खुला। "तुम्हारा चेहरा..."

"हमें इंतज़ार नहीं करना चाहिए," उसने कहा, आवाज़ धीमी रखते हुए। "अगर हमें ये साज़िश रोकनी है, तो वहाँ चोट करनी होगी जहाँ ये अभी कच्ची है। बिल्कुल नींव पर।"

"बोलो।"

"मुझे याद है," अरयन धीरे धीरे टहलने लगा, "तुम्हारे जाने के बाद युवराज ने सबसे पहला काम जो किया, वो था एक आदमी को ख़रीदना। डी. के. वर्मा। कंपनी का चीफ़ ऑडिटर, बीस साल से इस घर का सीधा-सच्चा आदमी। पर युवराज ने उसे ख़रीद लिया, और उसी वर्मा ने आगे चलकर वो सारे झूठे ऑडिट सर्टिफ़िकेट बनाए जिन पर त्रिवेणी का पूरा घोटाला टिका था, जिनसे तुम्हें फँसाया गया।"

तनवी ने रजिस्टर एक तरफ़ रखा। "बेशक। ऑडिटर। कोई भी झूठा हिसाब तब तक झूठ नहीं बनता जब तक कोई उस पर सच का ठप्पा न लगा दे। वर्मा वही ठप्पा था।"

"और अभी," अरयन रुका, "अभी वर्मा ईमानदार है। अभी वो ख़रीदा नहीं गया। अगर हम उस तक पहले पहुँचें, उसे अपनी तरफ़ कर लें, तो पूरी साज़िश की नींव हिल जाएगी। युवराज कितने भी झूठे काग़ज़ बना ले, अगर ऑडिटर हमारा हुआ, तो वो सब रेत का महल है।"

तनवी की आँखें चमक उठीं, वही चमक जो हिसाब बैठते वक़्त आती थी। "एक गवाह। शुरू से अंदर बैठा एक ईमानदार गवाह। ये तो उनका सारा खेल पलट सकता है।"

"तो चलो," तनवी खड़ी हो गई। "वर्मा से मिलते हैं।"

"मैंने पता लगाया।" अरयन की आवाज़ धीमी हो गई। "वर्मा पिछले हफ़्ते इस्तीफ़ा देकर शहर छोड़ गया। अचानक। बिना किसी को बताए।"

तनवी रुक गई। "पर पिछली बार तो वो दो साल बाद तक कंपनी में था। तुमने ख़ुद कहा।"

"हाँ।" अरयन ने उसकी आँखों में देखा, और उसमें वही दहशत थी जो मंडप में थी। "पिछली बार वो दो साल बाद ख़रीदा गया था। इस बार उसे अभी हटा दिया गया। कोई उसे रास्ते से हटा चुका है, हमसे पहले।"

बाग़ की वो सारी गर्मी तनवी के बदन से निकल गई। "त्रिवेणी का खाता दो साल पहले खुल गया," उसने जोड़ते हुए कहा। "वर्मा वक़्त से पहले ग़ायब हो गया। अरयन, जो होना था वो सब वक़्त से पहले हो रहा है।"

"जैसे कोई और भी," अरयन ने कहा, और उसकी आवाज़ बर्फ़ हो गई, "इस खेल का नक़्शा पहले से जानता हो।"

दोनों एक दूसरे को देखते रह गए, उस कमरे में, उसी डर के साथ।

तनवी के पास इस दुनिया में एक ही हथियार था, एक ही फ़ायदा, कि वो आने वाला कल जानती थी। पर अगर कोई और भी उसे जानता था, अगर कोई और भी उनसे आगे चल रहा था, तो वो हथियार अब उसका अकेला नहीं रहा था।

और सबसे डरावना सवाल अँधेरे में लटका रह गया। वो कौन था?

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