अध्याय 11 / 15
सबसे लंबी रात
फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi
सबसे अँधेरा वक़्त। दुश्मन भविष्य जानता है, अरयन की ताक़त छिन चुकी है, और मौत की मियाद क़रीब है। अरयन चाहता है तनवी सब छोड़कर उसके साथ भाग जाए, पर तनवी एक और ज़िंदगी भागते हुए नहीं काटना चाहती, और दोनों के बीच दरार पड़ जाती है। उसी रात परी आख़िरकार उस नामुमकिन सच पर यक़ीन कर लेती है, और तनवी को वो एक चीज़ सूझती है जो युवराज के पास कभी नहीं हो सकती।
हार का अपना एक स्वाद होता है। तनवी उसे पहचानती थी। उसने उसे एक बार पहले चखा था, एक ठंडी कोठरी में, जब सलाखों के उस पार पूरी दुनिया उससे मुँह मोड़ चुकी थी।
अब वो स्वाद फिर लौट आया था। और इस बार और भी कड़वा, क्योंकि इस बार उसने लड़ने की हिम्मत की थी। और हिम्मत के बाद की हार सबसे गहरी होती है।
अरयन के पास अब कोई पद नहीं था, कोई ताक़त नहीं। बड़ी माँ ने उसके हाथ से सब छीनकर युवराज की झोली में डाल दिया था। युवराज अब पूरे राणा साम्राज्य का मालिक था, और वो भविष्य जानता था, उनसे ज़्यादा। एक बूढ़ा होकर, सब देखकर मरा था, और पूरा नक़्शा अपने सीने में लिए लौटा था। उनके पास अब बस एक अधूरी याद थी, और एक घटती हुई मोहलत।
और मौत की वो मियाद, जनवरी की वो आख़िरी रात, अब बहुत दूर नहीं थी। बस गिनती के दिन। वही तारीख़ जिस पर वो पिछली बार मरी थी।
उस रात अरयन उसके कमरे में आया, और उसने एक बैग मेज़ पर रखा। ज़िप खोली। पैसों की गड्डियाँ। दो पासपोर्ट। और दो हवाई टिकट, जिन पर वक़्त छपा हुआ था, जैसे वक़्त भी अब उनके ख़िलाफ़ दौड़ रहा हो।
"हम आज रात निकल सकते हैं," उसने कहा, उसकी आवाज़ बेचैन, फुसफुसाहट और चीख़ के बीच अटकी हुई। "दिल्ली से सुबह की उड़ान है। मेरे पास अब भी कुछ पैसा है, और कुछ दोस्त विदेश में जो सवाल नहीं पूछेंगे। हम ये देश छोड़ देंगे। युवराज, बड़ी माँ, ये पूरी साज़िश, सब इस धुंध में पीछे छूट जाएगी। और जब अगली जनवरी आएगी, तो तुम किसी और नाम से, ज़िंदा साँस ले रही होगी। बस यही मायने रखता है।"
तनवी ने बैग को देखा, फिर अरयन को। और बहुत धीरे से पूछा।
"और मेरा नाम?"
"क्या?"
"मेरी बेगुनाही, अरयन। मेरी माँ का वो सच जिसका वादा हमने एक दूसरे से किया था। मेरे पापा का वो सिर, जो पच्चीस साल से किसी के एहसान के बोझ से झुका है।" वो खड़ी हुई। "अगर हम आज रात भाग गए, तो दुनिया की नज़र में मैं वही रहूँगी जो पिछली बार थी। घोटाले की मास्टरमाइंड। भगोड़ी। मेरी माँ फिर सिर झुकाकर जिएगी।"
"पर तुम ज़िंदा रहोगी!" अरयन ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा, और उसकी पकड़ में डर था। "मुझे तुम्हारी बेगुनाही नहीं चाहिए। कोई काग़ज़ नहीं, कोई इंसाफ़ नहीं। मुझे बस तुम चाहिए। ज़िंदा। साँस लेती हुई। सुबह मेरे सामने चाय में चीनी की शिकायत करती हुई। बस इतना।"
"और मैं एक बार पहले ही चुपचाप मर चुकी हूँ।" उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया। "बेगुनाह, बदनाम, अकेली। और अगर मैं अब भाग गई, तो मैं फिर वही मौत मरूँगी, बस धीरे धीरे। किसी अजनबी देश में, हर दस्तक पर काँपती हुई। वो भी एक तरह की क़ब्र है, अरयन। बस उसमें एक खिड़की होती है।"
"तो तुम अपनी ज़िद में मर जाओगी!"
"शायद।" तनवी की आवाज़ नहीं काँपी। "पर इस बार सिर उठाकर। पिछली बार मैं झुकी हुई मरी थी। इस बार अगर मरना है, तो खड़े होकर मरूँगी।"
और तभी अरयन टूट गया।
जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ काँपी, और उसमें अचानक तीन साल का दबा हुआ दर्द फट पड़ा।
"सिर उठाकर।" उसने दोहराया, और हँसा, पर वो हँसी रोने से भी बुरी थी। "कितने ख़ूबसूरत लफ़्ज़ हैं, तनवी। बताऊँ मैंने तुम्हारा सिर उठा हुआ आख़िरी बार कब देखा था? उस कोठरी में। उस ठंडी फ़र्श पर। जब मैं एक पल देर से पहुँचा था।"
तनवी के होंठ खुले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली।
"मैं भागते हुए पहुँचा था, अपना पूरा ख़ानदान पीछे छोड़कर। पर जब मैं उस अँधेरे गलियारे में पहुँचा, तो दो सलाखें मेरे और तुम्हारे बीच थीं, और तुम फ़र्श पर थीं। मैं चिल्ला भी नहीं सकता था।" उसकी आँखें लाल थीं, और उनमें वो रात तैर रही थी। "मैंने तुम्हें अँधेरे में किसी से कुछ फुसफुसाते सुना, और फिर तुम्हारी आख़िरी साँस सुनी। उन सलाखों के उस पार से। और मैं तुम्हें छू भी नहीं पाया।"
"अरयन..." तनवी का गला रुँध गया।
"तुम्हें पता है मैंने उसके बाद के तीन साल कैसे काटे?" वो रुका नहीं। "हर रात तुम्हें दफ़नाकर। हर सुबह तुम्हारे बिना उठकर। और जब मैं भी मरा, तो मेरी आख़िरी ख़्वाहिश यही थी कि काश एक बार और मौक़ा मिले, बस इतना कि मैं उस गलियारे में एक पल पहले पहुँच जाऊँ।" उसकी आवाज़ फट गई। "और मुझे वो मौक़ा मिला। उसी मंडप में आँख खुली। और मैंने क़सम खाई कि इस बार मैं तुम्हें उन सलाखों तक नहीं पहुँचने दूँगा।"
अब उसकी आवाज़ एक भीख थी।
"तुम मुझसे बेगुनाही माँग रही हो, और मैं तुमसे बस इतना माँग रहा हूँ कि मुझे वो दुबारा न देखना पड़े। वो फ़र्श। वो ठंडक। पर तुम्हारे लिए तुम्हारा नाम तुम्हारी साँसों से बड़ा है।" वो हाँफ रहा था। "तो मुझे एक बात साफ़ बता दो। तुम मुझसे जीतना चाहती हो, या ज़िंदा रहना? क्योंकि आज की रात, इन दोनों में से सिर्फ़ एक मिल सकता है।"
तनवी के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
उसने हाथ बढ़ाया, उस दर्द को छूने के लिए जो उसी की वजह से था। पर अरयन ने हल्के से सिर पीछे खींच लिया, और वो छोटी सी हरकत किसी थप्पड़ से ज़्यादा गहरी थी। और वो ख़ामोशी, जो उन दोनों के बीच गिरी, एक दीवार की तरह खड़ी हो गई।
"मैं तुम्हें फिर नहीं दफ़ना सकता," अरयन ने आख़िर में फुसफुसाते हुए कहा। उसने बैग वहीं छोड़ा, टिकट, पासपोर्ट, सब, जैसे कह रहा हो कि रास्ता खुला है, और चला गया। दरवाज़ा उसके पीछे बहुत आहिस्ता से बंद हुआ, जो किसी धमाके से ज़्यादा चुभा।
और तनवी पहली बार समझी कि दो लोग एक दूसरे से कितना ही प्यार करें, अगर वो एक दूसरे को अलग अलग तरीक़ों से बचाना चाहें, तो वो प्यार भी टूट सकता है।
उस रात हवेली असामान्य रूप से ख़ामोश थी। बाहर जनवरी की धुंध खिड़कियों पर जमी थी, वही जनवरी जो हर घंटे उसकी मियाद की तरफ़ रेंग रही थी। अरयन नाराज़, दूर। दुश्मन ताक़तवर, हँसता हुआ। मौत क़रीब। और कोई नहीं जिससे वो ये सब कह सके।
सिवाय एक के।
उसने काँपते हाथों से फ़ोन उठाया और परी का नंबर मिलाया। और इस बार, दो जन्मों में पहली बार, उसने ख़ुद को नहीं रोका।
"परी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूटने लगी, "जो मैं तुझे बताने वाली हूँ, तू उस पर यक़ीन नहीं करेगी। पर आज की रात मेरे पास तेरे सिवा कोई नहीं है।"
और फिर उसने सब बता दिया। एक ही साँस में, रोते हुए, बिना रुके। वो जेल की कोठरी, वो आख़िरी जनवरी, वो दस्तख़त। तीन साल की बदनामी, उसकी मौत। फिर शहनाई, हल्दी, वही सुबह तीन साल पीछे। अरयन का लौटना, युवराज जो उन सबसे पुरानी कहानी लेकर आया था। पूरी नामुमकिन कहानी, शुरू से आख़िर तक, जैसे कोई बरसों का बंद बाँध आख़िरकार टूट गया हो।
जब वो ख़त्म हुई, तो फ़ोन पर बहुत देर ख़ामोशी रही, इतनी देर कि तनवी की धड़कन उसके कानों में गूँजने लगी।
"परी?" उसने डरते हुए कहा। "तू सोच रही होगी मैं पागल हो गई हूँ।"
"तनु।" परी की आवाज़ बहुत धीमी थी। "एक मिनट। मुझे सोचने दे।"
"बीस साल," परी आख़िर में बोली। "बीस साल से मैं तुझे जानती हूँ। और इन बीस सालों में तूने मुझसे एक झूठ नहीं बोला। याद है, जब तूने मेरी नई पीली ड्रेस फाड़ दी थी और कह दिया था कि कुत्ता कर गया? वो झूठ भी दो घंटे में तुझसे ख़ुद कबूल हो गया था।" एक हल्की, काँपती हँसी फ़ोन पर तैरी। "तू दुनिया की सबसे ख़राब झूठी है, तनु। इसीलिए मैं ये नहीं कह सकती कि तू झूठ बोल रही है।"
"पर ये नामुमकिन है, परी।"
"हाँ। मेरा दिमाग़ कह रहा है ये नहीं हो सकता।" परी रुकी। "पर तेरी आवाज़ में जो डर है, वो किसी कहानी का डर नहीं है। ये उस इंसान का डर है जिसने सच में कुछ देखा है। और बीस साल का भरोसा एक रात की समझ से बड़ा होता है।"
तनवी की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार उनमें कुछ और भी था। "तो... तो तू मेरा यक़ीन करती है?"
"मुझे समझ नहीं आ रहा, पर हाँ, मैं तेरा यक़ीन करती हूँ। पूरा।" परी की आवाज़ अब फ़ौलाद होने लगी थी। "और सुन। अब तू अकेली नहीं है। समझी? ये जो भी युवराज है, इस जनम का हो या पिछले का, उसने ग़लत लड़की के पीछे पंगा लिया है। क्योंकि अब उसके सामने तू अकेली नहीं, हम दोनों हैं।"
और उस एक पल में, उस सबसे लंबी रात के बीच, तनवी को लगा जैसे किसी ने अँधेरे में एक दीया जला दिया हो। एक छोटा सा, काँपता हुआ दीया, पर रोशनी रोशनी होती है। और उस रोशनी में उसका वो सी ए वाला ठंडा, तेज़ दिमाग़, जो डर के नीचे दब गया था, फिर से चलने लगा।
"परी, रुक।" वो अचानक सीधी होकर बैठ गई। "तूने अभी कुछ कहा। उसने ग़लत लड़की के पीछे पंगा लिया।"
"तो? मैंने तेरी तारीफ़ की।"
"नहीं, तू समझी नहीं।" तनवी की आवाज़ बदलने लगी। "युवराज भविष्य जानता है, मुझसे ज़्यादा, अरयन से ज़्यादा। उसने आज मेरा हौसला तोड़ने के लिए कहा कि उसने ये पूरी कहानी ऊपर से देखी है, सिंहासन पर बैठकर, और मैंने सिर्फ़ अपना एक छोटा, अँधेरा कोना देखा।"
"कमीना। और तू उसकी बात मान गई?"
"पूरी शाम मान गई थी।" तनवी की साँस तेज़ हुई। "पर अब सुन। वो ठीक कह रहा था, और इसी में उसकी सबसे बड़ी ग़लती है।"
"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। पर बोल, बोल, बोल।"
"उसने ये पूरा जाल बाहर से बुना।" तनवी धीरे धीरे खड़ी हो गई। "अपने महल से, ऊपर से सब चलाते हुए। पर वो कभी उस कुर्सी पर नहीं बैठा जिस पर मैं बैठी थी। उसने कभी वो क़लम नहीं उठाई जो मेरे हाथ में थी, वो काग़ज़ कभी अंदर से नहीं देखे, वो सलाखें कभी नहीं छुईं।"
"और तूने छुईं," परी ने धीरे से कहा।
"मैंने छुईं। मैं उस जाल के अंदर थी, परी, वो शिकार जो फंदे के बीचों बीच खड़ी थी।" उसकी आँखें चमक उठीं। "और जो इंसान पिंजरा बाहर से बनाता है, वो वो एक सलाख कभी नहीं देख पाता जो अंदर से ढीली होती है। पर अंदर बैठा क़ैदी उसे देख लेता है।"
"तनु।" परी की साँस रुक सी गई। "तू कह क्या रही है?"
"मैं कह रही हूँ कि मैंने वो ढीली सलाख देखी थी।" तनवी की आवाज़ अब काँप रही थी, पर डर से नहीं। "उस आख़िरी दिन, जब उन्होंने मेरे सामने सबूत रखे थे, तो एक चीज़ थी उन काग़ज़ों में। एक झूठ जो ख़ुद को छुपा नहीं पाया था। तब मैं इतनी टूटी हुई थी कि उसका मतलब नहीं समझ पाई। पर मैंने उसे देखा था। और एक सी ए की आँख कुछ चीज़ें कभी नहीं भूलती।"
"और युवराज को नहीं पता?"
"युवराज को नहीं पता कि वो चीज़ मेरी आँखों के सामने से गुज़री है, और मेरे ज़हन में जम गई है, दो जन्मों के लिए।" तनवी हँसी, एक धीमी, ख़तरनाक हँसी। "वो सोचता है उसका जाल बेदाग़ है, क्योंकि उसने उसे सिर्फ़ बाहर से देखा है।"
"तनु," परी की आवाज़ में अब वो उत्साह लौट आया था जो किसी तूफ़ान से पहले आता है, "मतलब तेरे पास सच में कुछ है?"
"मेरे पास वो पत्ता है जो उस आदमी के पास कभी नहीं हो सकता, चाहे वो कितने भी जन्म जी ले।" तनवी खिड़की की तरफ़ बढ़ी। "वो एक हारा हुआ राजा है, जो सोचता है उसके पास पूरा नक़्शा है। पर पूरा उसके पास नहीं है। क्योंकि नक़्शे का एक कोना सिर्फ़ अंदर से दिखता है। और उस कोने में वो रास्ता है जो उसे घर तक नहीं, फाँसी तक ले जाएगा।"
"मेरे रोंगटे खड़े हो गए," परी फुसफुसाई। "क़सम से, तनु।"
तनवी ने एक पल आँखें बंद कीं। "तू सही कह रही थी, परी। उसने ग़लत लड़की के पीछे पंगा लिया। उसने उस लड़की को चुना जो मर चुकी थी। और ये नहीं सोचा कि एक मरी हुई औरत अपने साथ क्या याद लेकर लौटती है।"
उसने फ़ोन रखा, और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर वो जनवरी की धुंध अब भी थी, गाढ़ी, ठंडी, उसकी मियाद की तरफ़ रेंगती हुई। कुछ घंटे पहले वो उस धुंध से डर रही थी। अब नहीं।
"इस बार नहीं," उसने उस धुंध से कहा, ठीक उतने ही धीरे जितने धीरे एक बार उसने आईने से, और उससे भी पहले एक सर्द कोठरी की ख़ाली हवा से कहा था। "इस बार मियाद तेरी है, मेरी नहीं। इस बार मैं हिसाब रखूँगी।"
उसका हाथ मेज़ पर रखे उस बैग के पास से गुज़रा, उस भागती ज़िंदगी के न्योते के पास से, और रुका नहीं।
उसने फ़ोन उठाया और अरयन का नंबर मिलाया।
एक घंटी। दो घंटी। और फिर उसकी थकी हुई, टूटी हुई आवाज़, "तनवी?"
"वापस आओ," उसने कहा, और पहली बार कई दिनों में, उसकी आवाज़ में डर नहीं, आग थी। "हम भाग नहीं रहे। हम लड़ रहे हैं। और मुझे पता है कैसे।"
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