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Chapter 14 of 15

राख से उठना

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

बत्ती लौटी, और तनवी ने जो देखा, उसने उसका दिल चीर दिया।

अरयन फ़र्श पर था, उसके पैरों के पास। उसके कुर्ते पर कंधे के पास एक लाल दाग़ फैल रहा था। और उसके हाथ में युवराज की कलाई थी, जिसे उसने अब भी जकड़ रखा था, वो बंदूक़ दूर फ़र्श पर गिरी हुई।

अँधेरे में, जब युवराज ने तनवी पर निशाना साधा था, अरयन दरवाज़े से अंदर आया था, और उसके और गोली के बीच आ खड़ा हुआ था।

एक पल को तनवी का सारा वजूद रुक गया। एक फ़र्श पर पड़ा जिस्म, एक फैलता लाल दाग़। पिछली बार वो जिस्म उसका था। इस बार, वो उसका था।

"अरयन!" तनवी उसके पास गिरी, उसका सिर अपनी गोद में लेते हुए, उसका चेहरा काँपते हाथों से थामते हुए। "नहीं, नहीं, मेरी तरफ़ देखो... आँखें मत बंद करना, सुन रहे हो? मेरी तरफ़ देखते रहो।"

"मैंने कहा था ना।" उसकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर वो उस ख़ून के बीच भी मुस्कुरा रहा था। "इस बार मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रहूँगा। एक पल भी देर नहीं करूँगा।" उसका हाथ काँपते हुए उठा और उसने उसका आँसू पोंछा। "पिछली बार मैं एक पल देर से पहुँचा था। उस कोठरी के बाहर, बस एक पल। सलाख़ें हमारे बीच थीं, और मैंने तुम्हें मरते सुना, और छू तक नहीं पाया।" उसने एक टूटी साँस ली। "इस बार... इस बार मैं वक़्त पर था।"

तनवी का गला रुँध गया। तीन साल उसने ये कहानी आधी जानी थी, अकेले मरने की कहानी। और अब उसका दूसरा आधा, उस आदमी की ज़ुबानी जो दरवाज़े के उस पार खड़ा उसकी आख़िरी साँस गिन रहा था।

"तुम मरोगे नहीं," तनवी ने भर्राई आवाज़ में कहा, अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उसके ज़ख़्म पर पूरी ताक़त से दबाते हुए। "इस बार मैं दरवाज़े के अंदर हूँ। इस बार सलाख़ें हमारे बीच नहीं हैं। तुमने मुझे दो जन्म इंतज़ार कराया है, अब तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगे।"

बड़ी माँ पहले ही नौकरों को, डॉक्टर को पुकार चुकी थीं, उनकी आवाज़ हवेली के गलियारों में गूँज रही थी, उस मालकिन की आवाज़ जो आज पहली बार किसी के लिए गिड़गिड़ा रही थी। और फ़र्श पर, अपनी टूटी कलाई पकड़े, युवराज हाँफ रहा था।

अगले कुछ घंटे एक धुंध थे, पर तनवी अब दर्शक नहीं थी। वो हर धागा अपने हाथ से खींच रही थी।

सुबह की पहली सफ़ेदी के साथ गाड़ियाँ और पुलिस आईं, और वो लोग आए जिन्हें तनवी ने रात ही बुला भेजा था। हवेली का बड़ा दालान, जहाँ कभी राणा ख़ानदान की शान सजती थी, अब गवाहों से भर गया। ख़ानदान के लोग, मुनीम, पुराने नौकर, दो वकील, और एक कोने में परी, फ़ोन पर किसी से बात करती हुई।

और वहाँ, सबके सामने, उस भरे दालान के बीचों बीच, तनवी ने वो दस्तावेज़ मेज़ पर रखा।

"मैं चाहती हूँ हर कोई ये सुने," उसने ऊँची, साफ़ आवाज़ में कहा, और कमरे की हर फुसफुसाहट थम गई। "तीन साल से इस घर में मेरा नाम एक ही तरह लिया जाता रहा है। चोर। घोटाले की मास्टरमाइंड। आज मैं वो काग़ज़ आपके सामने रख रही हूँ जिसने मुझे ये नाम दिया।"

उसने दस्तावेज़ उठाया, और कोने में लगी तारीख़ पर उँगली रखी।

"इस काग़ज़ पर मेरे दस्तख़त हैं। पूरी सफ़ाई से बनाई गई, मेरे अपने हाथ की हूबहू नक़ल। पर इस पर जो तारीख़ है," उसकी उँगली थमी, "उस दिन मैं इस कंपनी में थी ही नहीं। उस दिन मेरी शादी तक नहीं हुई थी। मैं इन काग़ज़ों के सौ मील पास भी नहीं हो सकती थी।" उसकी आवाज़ पत्थर पर पत्थर की तरह पड़ रही थी। "तो आप ख़ुद सोचिए। एक औरत उस काग़ज़ पर दस्तख़त कैसे कर सकती है, जो इस घर में उसके आने से पहले ही बन चुका था? किसी ने मेरे दस्तख़त की नक़ल की, और उसे एक नामुमकिन तारीख़ पर लगा दिया, ये भूलकर कि एक झूठ कभी कभी सबसे छोटी जगह से पकड़ा जाता है। एक तारीख़ से। ये पूरा घोटाला, जिसका इल्ज़ाम मुझ पर मढ़ा गया, एक रचा हुआ जाल है। और इसे रचने वाला इसी घर में बैठा है।"

दालान में एक लहर दौड़ गई। फुसफुसाहट, फिर बेचैनी, फिर एक भारी ख़ामोशी। एक पुराने मुनीम ने काग़ज़ झुककर देखा, फिर तारीख़ देखी, और उसके चेहरे का रंग उड़ गया। ये बात अब फैल रही थी, और हर चेहरा धीरे धीरे युवराज की तरफ़ मुड़ने लगा।

और तभी, कमरे के दूसरे छोर पर, एक कुर्सी पीछे घिसटी।

बड़ी माँ खड़ी हुईं।

सत्तर साल की वो मालकिन, जिसने इस घर में कभी झुककर बात नहीं की थी, अपनी छड़ी पर टेक लगाए दालान के बीचों बीच आकर रुकीं। और उन्होंने वो किया जो उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। सच कहा। ऊँची आवाज़ में, सबके सामने।

"मैं, रजेश्वरी राणा," उनकी आवाज़ पत्थर जैसी थी, पर उसके नीचे कुछ टूट चुका था, "इस घर की मुखिया। आज मैं एक आख़िरी फ़ैसला सुनाने आई हूँ, अपने ही ख़ून के ख़िलाफ़।"

एक हाँफती हुई ख़ामोशी छा गई।

"ये पूरी साज़िश," उन्होंने एक एक लफ़्ज़ पर ज़ोर देते हुए कहा, "युवराज राणा ने रची थी। राणा ग्रुप की तिजोरी की चाबी पच्चीस साल मेरे पल्लू में बँधी रही, और मैंने उसे कभी किसी के हाथ में नहीं दिया। उसने ये सब मेरे पीछे किया, मेरी मुहर की नक़ल करके।" उनकी नज़र अपने उस लाडले पर पड़ी जिसे उन्होंने अपने हाथों से पाला था, और एक पल को आवाज़ काँपी, फिर सँभल गई। "और इस बेगुनाह लड़की को उसने अपने गुनाहों का बकरा बनाया। मैं ये गवाही अदालत में भी दूँगी। काग़ज़ पर भी। और भगवान के सामने भी।"

"बड़ी माँ!" युवराज की आवाज़ फटी, उसकी वो मशहूर मीठी मुस्कान अब कहीं नहीं थी। "आप जानती हैं आप क्या कह रही हैं?"

"मैं अपने घर को बचा रही हूँ, युवराज," उन्होंने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। "तुझसे।"

और बाहर, सुबह की पहली रोशनी के साथ, परी ने अपना फ़ोन नीचे किया और तनवी की तरफ़ एक छोटा सिर हिलाया। उसका पत्रकार दोस्त विकास शहर के हर अख़बार, हर चैनल पर वो कहानी ले आया था। त्रिवेणी होल्डिंग्स। चैरिटी ट्रस्ट। पैसे का वो पूरा रास्ता जो एक कंपनी से दूसरी, फिर एक ट्रस्ट, और फिर सीधे मंत्री जगन्नाथ के चुनावी फ़ंड तक जाता था, वो रास्ता जिसने पिछली बार तनवी का मुक़दमा ज़मीन में दबा दिया था। जो जाल युवराज ने तनवी के लिए बुना था, उसका हर धागा अब उसी के गले में कस गया था।

बाहर सायरन गूँजा। पुलिस तनवी को पकड़ने नहीं आई थी। इस बार वो युवराज राणा को पकड़ने आई थी।

जब उन्होंने उसके हाथों में हथकड़ियाँ डालीं, तो दालान में पत्थर जैसी ख़ामोशी थी। और जब उसे बाहर निकाला जा रहा था, तो वो तनवी के पास से गुज़रा, और रुका।

तनवी उसके सामने खड़ी हुई।

और पहली बार, दो जन्मों में पहली बार, उसमें उस आदमी का कोई डर नहीं था। उसने इस पल की बहुत कल्पना की थी, उस ठंडी कोठरी में अकेले मरते हुए, सोचा था वो चीख़ेगी, टूट पड़ेगी। पर अब जब वो पल आया, तो उसके भीतर कोई शोर नहीं था। बस एक गहरी, ठंडी शांति।

"तुम्हें पता है मैं सी ए हूँ, युवराज," उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ शांत और बर्फ़ जैसी। "और सी ए हर उधार का हिसाब रखते हैं। हर बकाया, हर पाई। दो जन्म पहले तुमने मुझसे मेरी ज़िंदगी उधार ली थी। मेरा नाम। मेरी माँ की हँसी, जो मेरी बदनामी ढोते ढोते बुझ गई। मेरे पापा का वो सिर, जो शर्म से झुक गया था। तुमने सब उधार लिया, और लौटाया कुछ नहीं।" उसने उसकी आँखों में सीधे देखा। "मैंने एक बार, अँधेरे में, अकेले मरते हुए कहा था, अगर कभी मौक़ा मिला, तो मैं हिसाब रखूँगी। तुमसे पहले।"

वो उसके और क़रीब आई।

"आज वो हिसाब बराबर हुआ। पूरा। एक एक पाई।"

युवराज के चेहरे पर वो ग़ुस्सा या डर नहीं था जिसकी तनवी ने उम्मीद की थी। एक अजीब, ठंडी मुस्कान उसके होंठों पर धीरे धीरे फैल रही थी।

"शाबाश, भाभी। तुम जीत गईं। इस बार।" वो हँसा, और उस हँसी में कुछ ऐसा था जिसने तनवी की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ा दी। "पर एक बात बताऊँ, जाते जाते? तुम्हें लगता है ये ख़त्म हो गया। तुम्हें लगता है तुम और अरयन, बस तुम दो ही हो जो लौटकर आए।"

वो उसके क़रीब झुका, और उसकी आवाज़ बस एक फुसफुसाहट रह गई, इतनी धीमी कि बस वो दोनों सुन सकें।

"तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि हम कितने हैं।"

तनवी की साँस अटकी।

"और तुम्हें ये भी नहीं पता कि हमें वापस भेजा किसने। या क्यों।" उसकी आँखें चमकीं, उस गहरी, ठंडी चमक से जो उसने इस घर में कभी नहीं देखी थी। "तुमने सोचा ये तुम्हारा दूसरा मौक़ा है, तुम्हारा इनाम। पर अगर मैं कहूँ कि ये किसी का खेल है? कि ये बिसात किसी ने बिछाई है, और हम सब, तुम, मैं, अरयन, सब बस मोहरे हैं? बार बार उसी बिसात पर बिठाए जाते, यही सोचते हुए कि हम ख़ुद चल रहे हैं?"

तनवी का गला सूख गया। उसके भीतर वो जीत की ख़ुशी, जो अभी एक पल पहले इतनी ठोस थी, धीरे धीरे एक अनजाने डर में पिघलने लगी।

"तुम झूठ बोल रहे हो," उसने कहा, पर उसकी अपनी आवाज़ उसे कमज़ोर लगी। "तुम बस मुझे डराना चाहते हो।"

"डरना तो तुम्हें चाहिए, भाभी।" उसकी हँसी और धीमी हो गई। "तुमने एक मोहरा हराया है। एक।" उसकी आँखें उसकी आँखों में गड़ गईं। "खिलाड़ी अभी बाक़ी है।"

पुलिस ने उसे खींचा।

"सोचती रहना!" उसकी आवाज़ गलियारे में गूँजी, हँसती हुई। "ये पहला जनम नहीं था। और ये आख़िरी भी नहीं होगा!"

और फिर वो चला गया, उसकी वो हँसी हवेली की दीवारों में देर तक गूँजती रही, और तनवी अकेली खड़ी रह गई, उसकी जीत की ख़ुशी में एक नया, अनजाना डर घुल गया।

उसने युवराज को हराया था। उसने जाल तोड़ा था। पर उसके आख़िरी लफ़्ज़ उसके भीतर एक नया सवाल छोड़ गए थे, जो हर जीत से बड़ा था। उन्हें वापस भेजा किसने था? और क्यों? वो खिलाड़ी कौन था?

पर वो सवाल इंतज़ार कर सकता था। अभी एक और जंग बाक़ी थी, एक अस्पताल के गलियारे में।

तनवी उस गलियारे में घंटों बैठी रही, हाथ जोड़े, बंद आँखों से। उसकी साड़ी पर अब भी अरयन का ख़ून सूख रहा था। उसने पिछली बार इसी तरह इंतज़ार किया था, एक काँच की दीवार के उस पार, किसी के आने का जो कभी नहीं आया था।

और फिर, सुबह के उजाले में, एक डॉक्टर बाहर आया और मुस्कुराया, और तनवी की टाँगें राहत से काँप गईं।

"गोली कंधे से निकल गई," डॉक्टर ने कहा। "कोई बड़ी नस नहीं कटी। ख़ून बहुत बहा है, पर ख़तरे से बाहर हैं। आपके पति बहुत जल्दी ठीक हो जाएँगे। आप मिल सकती हैं।"

तनवी ने उस डॉक्टर का हाथ थाम लिया, और बस सिर हिलाया, बार बार, जैसे शुक्रिया का कोई लफ़्ज़ बचा ही न हो।

वो अंदर गई। अरयन बिस्तर पर था, कमज़ोर, पीला, उसका कंधा पट्टियों में बँधा। पर ज़िंदा। साँस लेता हुआ। उसकी छाती धीरे धीरे उठ रही थी, गिर रही थी, और तनवी को दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत मंज़र वही धीमी, थकी साँस लगी।

उसने उसका हाथ थामा। अरयन की आँखें धीरे से खुलीं, और जब उन्होंने उसे पहचाना, तो उनमें एक थकी हुई मुस्कान तैर गई।

"तुम यहाँ हो," उसने फुसफुसाया।

"मैं यहीं हूँ," तनवी ने कहा, उसकी आँखों से आँसू बहते हुए। "इस बार मैं दरवाज़े के अंदर हूँ। और मैं कहीं नहीं जा रही।" उसने उसके हाथ को अपने होंठों से लगाया। "तुमने मेरे लिए गोली खाई, अरयन। तुमने अपने आप को मेरे और मौत के बीच रख दिया।"

"पिछली बार मैं तुम्हें नहीं बचा पाया," अरयन ने धीरे से कहा, हर लफ़्ज़ पर रुकते हुए। "उस एक पल की देरी ने मुझे मार डाला, तुम्हारे मरने के बाद भी।" उसकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में कसीं। "इस बार जब उसने तुम पर निशाना साधा, तो मैंने सोचा भी नहीं। बस इतना पता था, इस बार वो पल मेरा है।" उसकी आँखें भर आईं। "इस बार मैंने तुम्हें बचा लिया। अब हम बराबर हैं।"

तनवी हँसी और रोई एक साथ। "नहीं," उसने भर्राई आवाज़ में कहा। "हम बराबर नहीं हैं। तुमने मुझे दो बार बचाया। एक बार आज, और एक बार उस मंडप में, जब तुमने मेरी तरफ़ उस डरे हुए चेहरे से देखा था, और मुझे पहली बार लगा था कि मैं अकेली नहीं हूँ।"

उसने अपना माथा उसके माथे से लगा दिया, बहुत धीरे। दो लोग, दो जन्मों के पार, आख़िरकार एक दूसरे तक पहुँचे थे, और इस बार बीच में कोई सलाख़ न थी।

उन दिनों में, जब अरयन धीरे धीरे सँभलता गया, तनवी के पापा सबसे पहले आए। और जब उन्होंने अपनी बेटी को देखा, तो वो आदमी जो पच्चीस साल एक ख़ामोश एहसान का बोझ ढोते ढोते झुक गया था, पहली बार सीधा खड़ा था।

"तेरा नाम साफ़ हो गया, बेटी," उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। "तू अब चोर नहीं। तू वो है जिसने सच को बाहर निकाला।"

और उसकी माँ, पीछे खड़ी, अपने आँचल से आँखें पोंछती, हँसती और रोती एक साथ। वो खनकती, ज़िंदा आवाज़, जो दूसरी ज़िंदगी में बेटी की बदनामी ढोते ढोते बुझ गई थी, इस बार ज़िंदा थी, हँस रही थी। और तनवी ने उस हँसी को सुना, और महसूस किया कि सबसे बड़ी जंग वही थी।

घंटों बाद, उस गलियारे की एक खिड़की से तनवी बाहर देख रही थी। अरयन अंदर गहरी, सुकून भरी नींद में था। उसके पापा का सिर ऊँचा था। उसकी माँ हँस रही थी। उसका नाम साफ़ था।

युवराज के लफ़्ज़ अब भी कहीं भीतर गूँज रहे थे। ये पहला जनम नहीं था। और ये आख़िरी भी नहीं होगा। वो सवाल वहीं था, और किसी दिन वो लौटेगा।

पर आज नहीं।

बाहर, उस खिड़की से, सुबह की पहली रोशनी आ रही थी, सुनहरी और गर्म। और उस रोशनी में तनवी कुछ देर बस खड़ी रही, साँस लेती हुई। न कोई जेल। न कोई बदनामी। न कोई डर।

पहली बार दो जन्मों में, वो आज़ाद थी.

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