अध्याय 1 / 15
फिर वही सुबह
फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi
तनवी की आख़िरी रात जेल की एक ठंडी कोठरी में ख़त्म होती है, और फिर अचानक उसकी आँख शहनाई की आवाज़ पर खुलती है, यही उसकी शादी की सुबह है, तीन साल पीछे। जो हो चुका है उसे सब याद है, और इस बार वो किसी की क़ुर्बानी नहीं बनेगी।
तनवी सक्सेना को ठीक ठीक पता था कि वो किस दिन मरेगी। आज।
लखनऊ की जेल की उस कोठरी में जनवरी की आख़िरी रात बहुत धीरे धीरे गुज़र रही थी। ठंड अब उसके बदन का हिस्सा बन चुकी थी। वो दीवार से टेक लगाए बैठी थी, घुटनों को सीने से लगाए, और छत के उस रोशनदान को देख रही थी जिससे न रोशनी आती थी, न हवा, बस अंधेरा झाँकता था।
बाहर कहीं दूर एक मालगाड़ी गुज़री। तनवी ने उस आवाज़ को सुना और हल्के से हँसी।
"कम से कम कोई तो है," उसने ख़ाली कोठरी से कहा, "जो कहीं जा रहा है।"
सत्ताईस साल। और अख़बारों में उसका नाम। "घोटाले की मास्टरमाइंड।" वो जिसने ज़िंदगी का सबसे बड़ा जुर्म किया था।
"मेरा गुनाह बस इतना था," उसने अंधेरे से कहा, बहुत आहिस्ता, "कि मैंने भरोसा कर लिया।"
उसे आज भी उनकी आवाज़ें याद थीं। वो काग़ज़, उसके सामने रखे हुए। ससुर जी की मीठी आवाज़, "बस एक फ़ॉर्मैलिटी है बेटा, तुम तो सी ए हो, तुम्हें तो सब समझ आता है, बस यहाँ दस्तख़त।"
"फ़ॉर्मैलिटी," तनवी फुसफुसाई, और उसकी फुसफुसाहट में ज़हर था। "हाँ। बस एक फ़ॉर्मैलिटी।"
उसने दस्तख़त किए थे। और जब सब टूटा, जब छापे पड़े और कैमरे आए, तब उस घर में हर हाथ साफ़ निकला और गंदा सिर्फ़ एक रह गया। उसका। किसी ने उसका हाथ नहीं थामा। उस आदमी ने भी नहीं जिसके साथ उसने सात फेरे लिए थे।
सीने में जो दर्द उठा, वो अब जाना पहचाना था। तनवी ने उसका विरोध नहीं किया। बस इतना चाहा कि अंत आसान हो।
आँखें बोझिल होने लगीं। अंधेरा और गहरा होने लगा। और उस आख़िरी पल में तनवी ने किसी से नहीं, बस उस ख़ाली, सर्द हवा से कहा, इतने धीरे कि उसे ख़ुद भी मुश्किल से सुनाई दिया।
"अगर कभी, किसी तरह, दुबारा मौक़ा मिला... तो इस बार मैं तुम सबको पहले पहचान लूँगी। तुमसे पहले।"
फिर कुछ नहीं रहा।
फिर शहनाई बजने लगी।
तनवी की आँख झटके से खुली।
रोशनी। पीली, गर्म, चुभती हुई रोशनी। हल्दी की महक। औरतों की हँसी। कहीं ढोलक पर थाप पड़ रही थी और कोई बेसुरी आवाज़ में बन्ना गा रही थी। उसका पूरा बदन पसीने से तर था और साँस ऐसे चल रही थी जैसे वो पानी के नीचे से निकली हो।
वो एक नरम बिस्तर पर लेटी थी। हाथों पर हल्दी सूख रही थी। कलाइयों में चूड़ियाँ। और ये कमरा, ये कमरा वो जानती थी। ये उसके मायके का कमरा था। वो कमरा जो इस घर के बिकने के बाद उसने दुबारा कभी नहीं देखा था।
"उठ गई मैडम?" एक आवाज़ आई। "तीन घंटे से तुझे जगा रहे हैं। ब्यूटीशियन गुस्से में वापस जाने वाली थी। दुल्हन को सोने की इतनी आदत होती तो किसी श्मशान में ब्याह देते।"
तनवी का दिल रुक सा गया।
वो आवाज़।
उसने धीरे से सिर घुमाया। पलंग के पास, हाथ में चूड़ियों के दो डिब्बे पकड़े, अपनी वही पुरानी शरारती मुस्कान लिए, परी खड़ी थी।
परी। पारिधि। उसकी सबसे पुरानी दोस्त। वो लड़की जिसे तनवी ने आख़िरी बार एक धुंधली याद में देखा था, जेल की मुलाक़ात पर, काँच की दीवार के उस पार, रोते हुए कहते हुए कि वो वकील का इंतज़ाम कर रही है, कि सब ठीक हो जाएगा। सब ठीक नहीं हुआ था।
और अब वो यहाँ थी। जवान, हँसती हुई, बिल्कुल वैसी जैसी सालों पहले हुआ करती थी।
"परी," तनवी की आवाज़ काँपी। "तू..."
"मैं परी ही हूँ, कोई भूत नहीं। चल उठ।" परी ने डिब्बे रखे और उसका हाथ खींचा। "ऐ, तबीयत तो ठीक है तेरी? मुँह क्यों उतरा हुआ है? आज तेरी शादी है, मेरी जान, श्मशान नहीं जा रही तू।"
तनवी के मुँह से एक अजीब सी हँसी निकलते निकलते रह गई।
उसने काँपते हाथों से अपनी कलाई पकड़ी। नब्ज़ चल रही थी। तेज़, पर चल रही थी। उसने अपने हाथ देखे, हल्दी से सने, जवान, बेदाग़। वो हाथ जो उसने आख़िरी बार सलाखों को पकड़े देखे थे।
ये सपना नहीं था। सपनों में महक नहीं होती। और हल्दी की ये महक उसके फेफड़ों तक उतर रही थी।
"परी," उसने बहुत संभल कर पूछा, "आज तारीख़ क्या है?"
"हाय अल्लाह, इसकी याददाश्त चली गई।" परी ने नाटकीय ढंग से माथा पकड़ा। "चौदह दिसंबर। तेरी शादी का दिन। राणा साहब के इकलौते बेटे के साथ। पूरे शहर की नज़र जिस पर है। कुछ याद आया?"
चौदह दिसंबर।
तनवी को साँस लेना मुश्किल हो गया, पर इस बार डर से नहीं। तीन साल। पूरे तीन साल पीछे। वो वापस आ गई थी। उस सुबह पर, जहाँ से सब शुरू हुआ था। जहाँ से सब बर्बाद हुआ था।
उसने आख़िरी हवा से जो कहा था, किसी ने सुन लिया था।
"और सुन," परी आगे बढ़ी, "नीचे आंटी जी पूजा वाले कमरे में दीया जला रही हैं। अभी थोड़ी देर में वो बड़ा पीतल का दीया उनके हाथ से..."
"...गिरेगा," तनवी ने धीरे से कहा। "और मम्मी कहेंगी, शुभ शगुन है, लक्ष्मी आई है घर में।"
ठीक उसी पल नीचे से धातु के गिरने की खनखनाहट आई, और फिर तनवी की माँ की खुश आवाज़, "अरे कोई बात नहीं, शुभ शगुन है, लक्ष्मी आई है!"
परी की मुस्कान जम गई।
"...और," तनवी ने आगे कहा, नज़रें छत पर टिकाए, "अभी शांति बुआ अंदर आएँगी, मेरा गाल खींचेंगी, और कहेंगी, हाय, मेरी गुड़िया दुल्हन बन गई।"
दरवाज़ा खुला। शांति बुआ अंदर आईं, तनवी का गाल खींचा, और बोलीं, "हाय, मेरी गुड़िया दुल्हन बन गई!"
बुआ के जाते ही परी ने दरवाज़ा बंद किया, पीठ उससे सटाई, और तनवी को ऐसे देखा जैसे किसी जादूगरनी को देख रही हो।
"तनु," वो धीरे से बोली, "तू मुझे डरा रही है अब। तूने ये सब कैसे बताया?"
"अंदाज़ा था," तनवी ने नज़रें चुराईं।
"अंदाज़ा था? पीतल का दीया, मम्मी का डायलॉग, बुआ का गाल खींचना, सब अंदाज़ा था?" परी ने आँखें सिकोड़ीं। "तूने रात में कोई स्क्रिप्ट याद की है क्या?"
"यूट्यूब," तनवी ने सपाट चेहरे से कहा।
"यूट्यूब।"
"बहुत कुछ सिखाता है यूट्यूब।"
परी ने एक लंबी साँस ली और हार मान ली। "शादी से पहले लड़कियों का दिमाग़ हिल जाता है। सुना तो था। आज देख भी लिया। चल, ब्यूटीशियन के पास।"
तनवी ने सिर हिला दिया, पर उसका मन नीचे था, अपनी माँ की आवाज़ में अटका हुआ। वो खनकती, ज़िंदा आवाज़। वो आवाज़ जो अगले तीन साल में बेटी की बदनामी का बोझ उठाते उठाते बुझ गई थी। तनवी ने आख़िरी बार अपनी माँ को रोते देखा था, एक काँच की दीवार के उस पार, जहाँ छूना मना था।
और अब वो नीचे थी। हँसती हुई। दीये जलाती हुई।
"रो मत, काजल फैल जाएगा," परी ने बिना देखे कहा, सामान समेटते हुए। "जानती हूँ, माँ का घर छूट रहा है। पर तू तो रानी बनने जा रही है। राणा हाउस। पता है उस घर में कितने नौकर हैं?"
"पता है," तनवी ने कहा। उसकी आवाज़ अब अलग थी। ठंडी। "उस घर के बारे में मुझे सब पता है, परी। सब।"
परी एक पल रुकी, फिर हँस दी। "पागल।"
अगले दो घंटे रस्मों में बीते। और जैसे जैसे वो बीते, कुछ अजीब होने लगा।
पहली बार, इस घर की कोई रस्म तनवी को नहीं आती थी। वो एक मध्यवर्गीय लड़की थी जिसे राणा ख़ानदान के नख़रे नहीं आते थे, और उस घर ने इसका एहसास भी ख़ूब कराया था, हर ग़लती पर एक तंज़, एक नज़र, एक फुसफुसाहट। पर इस बार उसके हाथों में तीन साल का तजुर्बा बैठा था।
जब पंडित जी ने कलश पर हाथ रखने को कहा, तो उसने बिना बताए दाहिना हाथ आगे किया, ठीक वैसे जैसे राणा घर का रिवाज था। जब किसी ने गठजोड़ा थमाया, तो उसने वो गाँठ ख़ुद ही उस ख़ास तरीक़े से बाँध दी जो सिर्फ़ उस ख़ानदान में चलता था।
"बेटी का तो सब सीखा हुआ लगता है," एक बूढ़ी रिश्तेदार ने तारीफ़ में कहा।
परी, जो पास खड़ी थी, फुसफुसाई, "तनु। कल रात तक तू पूछ रही थी कि नारियल किस हाथ में पकड़ते हैं।"
"यूट्यूब," तनवी ने फिर कहा।
"अगर तूने एक बार और यूट्यूब बोला," परी ने दाँत भींचे, "तो क़सम से मैं तेरे घूँघट में आग लगा दूँगी।"
बीच में एक पल मिला। बस एक पल, जब तनवी अकेली थी, सीढ़ियों के मोड़ पर, सबकी नज़रों से दूर। उसने एक गहरी साँस ली।
नीचे मंडप सज रहा था। फूलों की वो ख़ुशबू। वही फेरे, जो तीन साल पहले उसकी सबसे बड़ी ग़लती की शुरुआत थे। थोड़ी देर में वो उस आग के सामने बैठेगी और एक ऐसे आदमी से सात जन्मों का वादा करेगी जिसने पिछली बार, उसी एक जन्म में, उसका हाथ छोड़ दिया था।
अरयमान राणा। अरयन। वो आदमी जिसकी ठंडी, ख़ामोश आँखें उसे आज भी याद थीं। जिसने उसकी बर्बादी पर एक लफ़्ज़ नहीं कहा था।
तनवी ने मुट्ठियाँ भींच लीं। हल्दी की पपड़ी टूटी।
"इस बार नहीं," उसने आईने में अपनी परछाईं से कहा, उतने ही धीरे जितने धीरे वो उस सर्द कोठरी में बोली थी। "इस बार मैं किसी की भेड़ नहीं बनूँगी। न तुम्हारी, न तुम्हारे घर की। इस बार जो भी काग़ज़ तुम मेरे सामने रखोगे, मैं हर लफ़्ज़ पढ़ूँगी।"
उसने एक गहरी साँस ली, और उसकी आवाज़ और ठंडी हो गई।
"और इस बार हिसाब मैं रखूँगी।"
वो मुस्कुराई। एक नई मुस्कान, जिसमें डर नहीं था।
"दुल्हन को बुलाओ!" नीचे से आवाज़ आई। "मुहूर्त निकला जा रहा है!"
परी दौड़ी आई, हाँफती हुई। "चल चल चल, सब इंतज़ार कर रहे हैं। दूल्हे राजा आ गए हैं।" फिर उसने तनवी का घूँघट ठीक किया, और उसकी आवाज़ अचानक नरम हो गई। "और सुन। जो भी है, जैसी भी है, तू दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत दुल्हन लग रही है। बस एक बार मुस्कुरा के नीचे चल, मेरी जान।"
तनवी ने उसका हाथ थाम लिया। एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, उसका सारा हौसला डगमगाया।
"परी। अगर मैं कहूँ कि मुझे पता है आगे क्या होने वाला है... कि सब बहुत बुरा होने वाला है... तो तू मेरा यक़ीन करेगी?"
परी रुकी। फिर हँस दी और उसका कंधा थपथपाया। "हर दुल्हन को शादी से पहले यही लगता है, पगली। चल।"
मंडप जगमगा रहा था। आग जल रही थी, वही पवित्र आग, सात फेरों की गवाह। मेहमानों की भीड़, कैमरों की चमक, पंडित जी के मंत्र। और वहाँ, आग के उस पार, अपने सेहरे के नीचे, दूल्हा बैठा था।
तनवी का दिल ज़ोर से धड़का। उसने ख़ुद को तैयार किया। उस चेहरे को देखने के लिए जिससे वो नफ़रत करना सीख चुकी थी। उस पत्थर जैसे चेहरे को, जो उसकी मौत पर भी नहीं पिघला था।
वो उसके बराबर में बैठी। साँसें तेज़।
रस्म के मुताबिक़, उसने धीरे से अपना घूँघट थोड़ा उठाया, बस इतना कि वो एक नज़र उसे देख सके। आख़िरी बार जब उसने ये किया था, अरयन ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं था। उसकी नज़रें कहीं और थीं, जैसे ये शादी एक बोझ हो जिसे बस निपटाना हो।
पर इस बार।
इस बार अरयन राणा पहले से उसकी तरफ़ देख रहा था।
और उसका चेहरा ठंडा नहीं था।
वो पीला पड़ा हुआ था। आँखें फटी हुई, उनमें ख़ौफ़, बेयक़ीनी, और एक ऐसी तकलीफ़ जो तनवी समझ नहीं पाई। माथे पर पसीना, जो दिसंबर की उस ठंडी रात में नहीं होना चाहिए था।
ये... ये वो चेहरा नहीं था।
वो उसे ऐसे देख रहा था जैसे कोई मरे हुए इंसान को ज़िंदा देख ले।
आग चटकी। पंडित जी की आवाज़ दूर कहीं गूँजी, "वर कन्या एक दूसरे को देखें..."
और उन दोनों की नज़रें, आग के दोनों ओर, एक दूसरे में जड़ हो गईं। दो लोग। एक ही आग। और एक सवाल जो सिर्फ़ तनवी के मन में होना चाहिए था, पर अब उस आदमी की काँपती आँखों में भी तैर रहा था।
वो इस तरह क्यों देख रहा था?
उसे कैसे पता?
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