Chapter 12 of 15
पासा पलटना
तनवी के पास एक ऐसा पत्ता है जो युवराज के पास नहीं, और अब वो पासा पलटने की ठान लेती है। अरयन आधी रात लौटता है, दरार भर जाती है, और दो लौटे हुए लोग मिलकर तीसरे के ख़िलाफ़ एक जाल बुनते हैं। पर आख़िरी सबूत वहीं बंद है जहाँ सिर्फ़ बड़ी माँ की चाबी चलती है, और तनवी को उसी औरत के पास वापस जाना होगा जिसने उसकी मौत रची थी।
अरयन आधी रात को लौटा।
वो दरवाज़े पर खड़ा था, उसी जनवरी की धुंध में लिपटा। आँखों में वो थकान, वो डर जो अब भी था। पर उसके पीछे कुछ और भी था। उम्मीद।
"मैं गाड़ी तक गया," उसने कहा, आवाज़ भारी। "पर हर बार एक ही ख़याल आया। कि मैं तुम्हें इस दुनिया से तो बचा लूँगा, पर उस तनवी को मार दूँगा जो आईने में देखकर ख़ुद से वादे करती है। और मैं उस तनवी से उतना ही प्यार करता हूँ जितना उस साँस लेती हुई से।"
तनवी का गला रुँध गया। "अंदर आओ। ठंड है।"
वो अंदर आया, और मोमबत्ती की काँपती लौ के बीच दोनों का फ़ासला एक क़दम रह गया।
"मुझे माफ़ कर दो," तनवी ने कहा, और इस बार नज़रें नहीं चुराईं। "इस ज़िद के लिए नहीं। उस तरीक़े के लिए जिससे मैंने तुम्हारा डर ठुकराया। वो दर्द मेरा नहीं था छीनने का।"
"और तुम सही थीं," अरयन ने उसका माथा अपने माथे से लगाया। "मैं तुम्हें ज़िंदा रखकर एक भगोड़ी बना देता, और रोज़ थोड़ा थोड़ा खो देता। मैंने एक मरी हुई तनवी तीन साल ढोई है। एक डरी हुई तनवी मैं पचास साल नहीं ढो सकता था।"
"तो हम भागेंगे नहीं," तनवी ने फुसफुसाया।
"नहीं। हम लड़ेंगे। साथ। और अगर हारे, तो इस बार मैं अंदर रहूँगा, तुम्हारे साथ। दरवाज़े के बाहर देर से नहीं।"
तनवी ने उसका हाथ अपने गाल से भींच लिया। दो जन्मों में पहली बार, कोई हाथ उसे छोड़ने नहीं, थामने आया था।
"हम हारेंगे नहीं," उसने कहा, और आवाज़ में आग लौट आई। "क्योंकि मेरे पास वो है जो युवराज के पास कभी नहीं हो सकता।"
वो मेज़ की तरफ़ गई। "तुमने मेरे केस की फ़ाइलें तीन साल पढ़ीं। बताओ, उन पर सबसे बड़ा सबूत क्या था?"
अरयन की आँखें उन तीन सालों में चली गईं। "एक दस्तावेज़। त्रिवेणी होल्डिंग्स की पहली ट्रांसफ़र अथॉरिटी। तुम्हारे दस्तख़त वाला, सबसे पुराना। पैंतालीस करोड़ की बुनियाद, और उस पर तुम्हारा नाम।"
"वही।" तनवी की आँखें चमक उठीं। "अब मैं तुम्हें वो बताती हूँ जो सिर्फ़ मैंने देखा। उस आख़िरी दिन, मैंने उस दस्तावेज़ पर अपने दस्तख़त देखे। ऐसे दस्तख़त जो मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं किए। मेरे नाम की नक़ल, पर वो आख़िरी की छोटी सी लूप नहीं जो सिर्फ़ मैं बनाती हूँ।"
"जाली दस्तख़त," अरयन ने धीरे से कहा।
"और उसकी तारीख़, अरयन।" उसकी आवाज़ काँपी। "वो उस वक़्त की थी जब मैं राणा कंपनी में थी ही नहीं। शादी से भी पाँच महीने पहले की। एक ऐसा दिन जब मेरा उस दफ़्तर से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था।"
अरयन जम गया। "एक नामुमकिन तारीख़। ऐसी CA जिसने उस काग़ज़ पर दस्तख़त किए जो उसके कंपनी में आने से पहले के हैं।"
"जो साबित करता है कि पूरा फंदा झूठा है," तनवी ने हर लफ़्ज़ पर ज़ोर डाला। "किसी ने जल्दबाज़ी में वो जाली काग़ज़ एक ऐसी तारीख़ पर लगा दिया जब तनवी सक्सेना का राणा होल्डिंग्स से कोई वास्ता ही नहीं था। ये भौतिक रूप से नामुमकिन है। और जो एक नामुमकिन है, वो पूरी इमारत को झूठा साबित कर देता है।"
"मैंने उसका अंत देखा," अरयन ने धीरे से कहा। "ये कभी नहीं सोचा कि वो दस्तावेज़ ख़ुद झूठ बोल रहा था।"
"तुमने उसका अंत देखा, मैंने उसका अंदर देखा। तुम्हारे पास नक़्शा है, मेरे पास वो एक दरार जो नक़्शे पर कभी नहीं छपी। दोनों मिलाकर, ये एक हथियार है।"
"और सबसे अच्छी बात?" अरयन के होंठों पर एक ख़तरनाक मुस्कान आई।
"युवराज को नहीं पता कि मैंने वो ग़लती पकड़ी।" तनवी मुस्कुराई। "उसने ये जाल सिंहासन से, ऊपर से बुना। पर वो कभी उस कुर्सी पर नहीं बैठा जिस पर मैं बैठी थी। जो पिंजरा बाहर से बनाता है, वो वो एक सलाख कभी नहीं देख पाता जो अंदर से ढीली है। उसे नहीं पता कि अंदर बैठी क़ैदी ने वो ढीली सलाख देख ली थी, और चुपचाप याद रख ली थी, दो जन्मों के लिए।"
मोमबत्ती की लौ काँपी। और इस बार, उस छोटे से कमरे में, उन्होंने पहली बार ख़ुद को डर से नहीं, उम्मीद से एक दूसरे के क़रीब आने दिया।
अरयन ने उसकी एक लट उँगलियों में ली। "पता है," उसने फुसफुसाया, "पिछली बार जब मैंने तुम्हें छुआ था, तो वो डर था। तुम्हें खोने का। मैं तुम्हें हर बार ऐसे थामता था जैसे ये आख़िरी बार हो।"
"और आज?" तनवी ने धीरे से पूछा, उसकी साँस उसके गले के पास।
"आज..." अरयन की आवाज़ भर्राई। उसने उसके माथे पर अपने होंठ रखे। "आज पहली बार मैं तुम्हें इसलिए छू रहा हूँ क्योंकि तुमने रुकने का, लड़ने का फ़ैसला किया।" उसका अँगूठा उसके होंठ पर रुका। "मैंने कहा था, जब तक तुम महफ़ूज़ नहीं हो जातीं, मैं रुकूँगा।"
"तुम अब भी इंतज़ार करोगे?"
"नहीं।" अरयन ने उसकी कमर पर हाथ रखा, उसे क़रीब खींचा। "क्योंकि आज पहली बार तुम लड़ रही हो, और मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ, बराबर में। और इस तनवी को मैं और इंतज़ार नहीं करवा सकता।"
"तो फिर रुको मत," तनवी ने फुसफुसाया, और उसकी उँगलियाँ उसके कोट के कॉलर में उलझ गईं।
और इस बार कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, कोई चोरी नहीं, कोई डर का साया नहीं। उसने उसे ऐसे चूमा जैसे कोई एक प्यास दो जन्मों से लिए घूम रहा हो। तनवी ने उसकी क़मीज़ की सिलवटों को मुट्ठी में भरा, और अरयन की साँस उसके गले के मोड़ पर टूटी। बस दो लोग जो दो जन्मों से एक दूसरे को ढूँढ रहे थे, और आख़िरकार, एक झूठी शादी की राख पर, पहली बार सच में एक दूसरे को पा रहे थे। बाहर जनवरी की धुंध थी, और अंदर मोमबत्ती बहुत धीरे धीरे पिघलती रही।
बहुत बाद में, तनवी अँधेरे में जागती रही, उसका सिर अरयन के सीने पर। पहली बार सालों में उसकी धड़कन उसे डराती नहीं थी। पर एक चेहरा था जो उसे सोने नहीं दे रहा था।
वो धीरे से उठी, खिड़की के पास गई, और वो नंबर मिलाया जो उसकी उँगलियाँ दो जन्मों बाद भी नहीं भूली थीं।
दूसरी घंटी पर एक नींद में डूबी आवाज़ आई। "हैलो? बेटा? इतनी रात? सब ठीक है?"
तनवी की आँखें भर आईं। माँ। ज़िंदा। साँस लेती हुई। वो आवाज़ जो सालों में बेटी की बदनामी का बोझ उठाते उठाते बुझ गई थी।
"कुछ नहीं, मम्मी," उसने ख़ुद को संभाला। "बस आपकी आवाज़ सुनने का मन था। पापा कैसे हैं?"
एक पल की महीन ख़ामोशी रही। "ठीक हैं," माँ ने कहा, और तनवी ने उस "ठीक" के नीचे वो थकान पहचानी जो एक ऐसे आदमी की थी जिसका सिर किसी और के एहसान के बोझ से झुका रहता था। "तेरे ससुराल वालों का फ़ोन आया था। तेरे पापा भावुक हो गए, बोले, बस अब और कोई एहसान नहीं चाहिए इन लोगों का। बहुत हो गया।"
तनवी की मुट्ठी कस गई। उसके पापा का वो झुका हुआ सिर, पच्चीस साल से किसी और के एहसान के नीचे। उस चुप्पी की क़ीमत तनवी की शादी थी, उसका नाम, उसकी जान।
"मम्मी," उसने धीरे से कहा, आवाज़ अचानक फ़ौलाद, "एक दिन, बहुत जल्द, पापा का वो सिर ऊँचा उठेगा। किसी के एहसान के नीचे नहीं, अपनी सच्चाई के साथ। वादा। और आप हँसती रहिएगा। आपकी हँसी मेरे लिए दुनिया की सबसे क़ीमती चीज़ है।"
जब उसने फ़ोन रखा, तो अरयन जाग चुका था। "तुम रोई?"
"नहीं। मैंने तय किया।" तनवी ने खिड़की के बाहर की धुंध को देखा। "ये लड़ाई सिर्फ़ मेरे नाम की नहीं है। ये उस आवाज़ की है जो अभी भी हँसती है, और उस आदमी की जिसका सिर पच्चीस साल से झुका है। मैं इन्हें छोड़कर भाग नहीं सकती।"
अरयन उसके पीछे आकर खड़ा हुआ। "तो हम इन्हें नहीं छोड़ेंगे। अब बताओ, हम ये पासा पलटते कैसे हैं?"
"वो जाली दस्तावेज़ अकेला कुछ नहीं," तनवी ने कहा। "उसे झूठ साबित करने के लिए मुझे अपना नियुक्ति पत्र चाहिए, जो दिखाए कि उस तारीख़ पर मेरा कंपनी से कोई नाता नहीं था। वो मेरे पास है। पर असली दस्तावेज़ भी चाहिए, वरना अदालत फ़ोटोकॉपी पर नहीं चलेगी।"
"और वो असली दस्तावेज़ कहाँ है?" अरयन ने पूछा।
"राणा परिवार अपने सबसे ख़तरनाक काग़ज़ एक ही जगह रखता है।" तनवी रुकी। "बड़ी माँ की तिजोरी। दीवार वाली, पुरानी तस्वीर के पीछे। और उसकी चाबी सिर्फ़ एक के पास है।"
"बड़ी माँ।" अरयन का चेहरा गंभीर हुआ। "वो चाबी अपनी साड़ी के पल्लू में रखती हैं, सोते वक़्त भी। उन्हें राज़ी किए बिना तुम उस तिजोरी के दस फ़ुट पास नहीं जा सकतीं।"
"तो हम उन्हें राज़ी करेंगे। मैं उन्हें दिखाऊँगी कि उनका लाडला युवराज उनकी पीठ पीछे चल रहा है, कि उसने उनके दस्तख़त से पहले की एंट्रियाँ बनाईं। बड़ी माँ इस घर से प्यार करती हैं, युवराज से नहीं। मैं उन्हें चुनने पर मजबूर कर दूँगी, अपना बच्चा या अपना घर।"
"और अगर वो युवराज को चुन लें?" अरयन की आवाज़ में वो डर था जो वो छुपा नहीं पाया। "तुम उस औरत के कमरे में अकेली होगी। अगर वो एक पल को भाँप ले कि तुम उसके ख़िलाफ़ हो, अगर वो युवराज को बुला ले..."
"तो मैं पहले ही मर चुकी होऊँगी।" दोनों एक पल उस भार के नीचे ख़ामोश रहे। फिर तनवी ने सिर उठाया। "इसीलिए हमें बैकअप चाहिए। काग़ज़ मिलते ही वो उसी रात बाहर पहुँचना चाहिए, इससे पहले कि कोई उसे फिर 'गुम' कर सके। एक भी सुबह की देर, और युवराज उसे आग में फेंक देगा।"
अरयन ने धीरे से सिर हिलाया। "एक रात में, बिना किसी दरार के। और इसके लिए हमें परी चाहिए।"
तनवी मुस्कुराई। "हमें हमेशा परी चाहिए।"
सुबह परी ने फ़ोन पर अपना मोर्चा संभाला।
"बोल, बोल, बोल," उसकी आवाज़ चहक रही थी। "मैं बत्तीस मिनट से इस फ़ोन के इंतज़ार में जाग रही हूँ, चाय भी ठंडी कर दी। तो प्लान क्या है, जेम्स बॉन्ड? कोई बम है? हेलिकॉप्टर?"
"परी, तेरा वो पत्रकार दोस्त। विकास।"
"हाँ, जिसने मेरी वजह से नौकरी बचाई थी। उसका क्या?"
"उसे तैयार रख। जिस दिन मैं इशारा करूँ, उसे एक ऐसी कहानी मिलेगी जो पूरे राणा हाउस को हिला देगी। त्रिवेणी होल्डिंग्स, पैंतालीस करोड़, मंत्री जगन्नाथ का चुनाव फंड, और एक जाली दस्तख़त जो एक बेगुनाह औरत के गले बाँधा गया था।"
फ़ोन पर एक पल ख़ामोशी रही, और जब परी फिर बोली, तो चहक ग़ायब थी। "तनु," उसने धीरे से कहा। "तू मुझे एक रेबर्थ वाली पागल कहानी सुनाती है, और अगले ही दिन कहती है एक अरबपति ख़ानदान के ख़िलाफ़ मीडिया तैयार कर। मेरी ज़िंदगी तेरी वजह से बहुत दिलचस्प हो गई है।"
"डर लग रहा है?" तनवी ने नरमी से पूछा।
"मज़ाक कर रही है?" और परी की वो हँसी फूटी, वही पुरानी, गरजती हुई, जो दो जन्मों में नहीं बदली थी। "बीस साल मैंने तुझे उस घर में घुटते देखा है। और अब जब तू पलटकर वार करने को कह रही है, तो मैं डरूँगी? तू बस इशारा कर। मैं ऐसा तूफ़ान लाऊँगी कि राणा हाउस की उन ऊँची दीवारों में भूचाल आ जाए। और विकास मेरे एक फ़ोन पर आधी रात दौड़ा आएगा।"
तनवी की आँखें नम हो गईं। "तू दुनिया की सबसे शानदार दोस्त है, परी। दो जन्मों में।"
"ये रोमांटिक बातें अपने पति के लिए बचाकर रख," परी ने नकली नाराज़गी से कहा, पर आवाज़ काँप रही थी। "और सुन। ये जाल बंद हो जाए, तू सुरक्षित हो जाए, तो उस रात मेरे घर आना। समोसे, ख़राब फ़िल्म, घटिया मज़ाक। वही जो बीस साल पहले करते थे। वादा कर।"
"वादा।"
फिर सब अपनी जगह सरकने लगा। नियुक्ति पत्र निकाला गया, तारीख़ें मिलाई गईं, विकास को "तैयार रहने" का इशारा दे दिया गया।
आख़िरी रात आ गई।
जब सब तैयार था, अरयन ने उसका हाथ थामा। "तुम सच में अकेली जाओगी? उसी औरत के पास जिसने तुम्हें मरने के लिए चुना?"
"उसी के पास। और उस चाबी तक पहुँचने का एक ही रास्ता है, कि मैं उन्हें यक़ीन दिला दूँ कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन उनकी अपनी गोद में पल रहा है। ये यक़ीन किसी भीड़ में नहीं दिलाया जाता। तुम वहाँ होगे, तो वो दीवार खड़ी कर लेंगी। मुझे अकेले जाना होगा।" उसने एक गहरी साँस ली। "और अरयन, कल वो तारीख़ है। जनवरी की आख़िरी रात। वही रात जब मैं पिछली बार मरी थी।"
अरयन का हाथ कस गया। "तो हम कल नहीं, आज..."
"नहीं। मुझे उन्हें उसी रात तोड़ना है, जब क़िस्मत को लगता है कि वो जीतने वाली है। जिस तारीख़ पर वो मुझे वापस माँगने आई है, उसी रात मैं उसके मुँह पर ये पासा पलटूँगी।"
अरयन ने अपना माथा उसके माथे से लगाया। "मुझे डर लग रहा है। पहली बार, इतने सालों में।"
"मुझे भी," तनवी ने धीरे से कहा। पर इस बार वो उस रात में अकेली नहीं, हथियार लेकर जा रही थी।
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, फिर रुकी, और पलटकर अरयन को देखा।
"अगर मैं वहाँ से वापस न आऊँ, तो याद रखना, इस बार मैं ख़ुशी से गई।"
"तुम वापस आओगी," अरयन ने कहा, उसकी आवाज़ भर्राई हुई। "क्योंकि इस बार मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रहूँगा। एक पल भी देर नहीं करूँगा।"
तनवी मुस्कुराई, और हवेली के उस सबसे पुराने हिस्से की तरफ़ चल पड़ी, उस कमरे की तरफ़ जहाँ उसकी मौत रची गई थी।
वो बड़ी माँ के दरवाज़े पर रुकी। दरवाज़े के नीचे से अगरबत्ती की महक रिस रही थी। उसने आँखें बंद कीं, अपनी माँ की हँसी याद की, अपने पापा का झुका सिर, अरयन का वो वादा।
उसने एक गहरी साँस ली।
और उसने दस्तक दी।
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