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Chapter 3 of 15

जो पहले हुआ था

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

राणा हवेली का नाश्ते का कमरा एक जंग का मैदान था, बस यहाँ हथियारों की जगह चाय के प्यालों ने ले रखी थी।

तनवी जब नीचे आई, तो अरयन पहले से वहाँ था, अख़बार के पीछे छुपा हुआ, मेज़ के दूसरे सिरे पर। तीन साल बाद, पहली बार, वो उसे दिन की रोशनी में देख रही थी। वही चेहरा। वही ठंडी ख़ामोशी। पर मंडप वाली वो दहशत अब उसमें नहीं थी, उसकी जगह एक सख़्त, सधी हुई दीवार थी।

उसने कुर्सी खींची और बैठ गई। न उसने कुछ कहा, न अरयन ने।

एक नौकर ने उसके सामने प्याला रखा।

तनवी ने एक घूँट लिया, और रुक गई।

कॉफ़ी। बिना चीनी की। थोड़ी सी इलायची के साथ। बिल्कुल वैसी जैसी वो पीती थी। जैसी उसने इस घर में किसी को कभी नहीं बताई थी। पिछली बार उसे ये कॉफ़ी पाने में महीनों लगे थे, झगड़ों के बाद, क्योंकि इस घर में सब दूध वाली चाय पीते थे।

उसने धीरे से अख़बार की तरफ़ देखा। "आपको कैसे पता मैं कॉफ़ी ऐसे पीती हूँ?"

एक पल को अख़बार रुका। फिर सीधा हुआ। "मुझे नहीं पता। रसोई से पूछ लो।"

पर रसोई को कैसे पता? तनवी का दिल तेज़ हो गया। उसने प्याला नीचे रखा।

"अजीब है," उसने हल्के से कहा। "एक ऐसे घर में जहाँ सब दूध वाली चाय पीते हैं, किसी को ठीक मेरी पसंद की कॉफ़ी बनानी आ गई। पहले ही दिन। बिना मेरे बताए।"

अरयन ने आख़िरकार अख़बार नीचे रखा। उसकी आँखें मिलीं तनवी की आँखों से, और तनवी ने वहाँ फिर वही चीज़ देखी, एक पल को, जो मंडप में थी। एक तकलीफ़। एक एहतियात। जैसे वो किसी ऐसी चीज़ को छूने से डर रहा हो जो टूट सकती है।

"इस घर में बहुत कुछ अजीब है, मिसेज़ राणा," उसने कहा, आवाज़ नीची और सपाट। "आप जितना कम सवाल पूछेंगी, उतनी सलामत रहेंगी।"

"ये धमकी है?"

"ये सलाह है।"

"पतियों की सलाह आम तौर पर शादी की पहली रात पर मिलती है," तनवी ने मुस्कुरा कर कहा, "जब वो आते हैं। पर आप तो बहुत व्यस्त थे।"

अरयन का जबड़ा कसा। "मुझे लगा आपको अकेले रहना ज़्यादा पसंद आएगा।"

"आपको मेरे बारे में और भी बहुत कुछ लगता है, ऐसा महसूस होता है।"

ये एक तीर था, और वो ठीक निशाने पर लगा। अरयन की आँखें एक पल को नीची हो गईं। उसने अपनी मुट्ठी मेज़ पर कसी, फिर ढीली की।

"मसलन?" तनवी ने झुककर पूछा, अपनी कोहनी मेज़ पर टिकाते हुए। "बताइए ना। आप और क्या क्या जानते हैं मेरे बारे में? मेरी कॉफ़ी जानते हैं। और?"

"नाश्ता कर लीजिए," उसने कहा, और उठ खड़ा हुआ। उसकी कुर्सी पीछे घिसटी। "ग्यारह बजे आपको बड़ी माँ के साथ मंदिर जाना है। और..." वो रुका, पीठ उसकी तरफ़, "...हरे रंग की साड़ी मत पहनिएगा। उन्हें पसंद नहीं।"

वो चला गया।

तनवी काफ़ी देर वहीं बैठी रही, अपने ठंडे होते प्याले को घूरती हुई।

हरे रंग की साड़ी मत पहनिएगा।

पिछली बार, अपने दूसरे ही हफ़्ते में, उसने एक हरी साड़ी पहनी थी, और बड़ी माँ ने भरी महफ़िल में उसे शर्मिंदा किया था। पर वो बात अरयन को कैसे पता थी? वो उस दिन शहर में भी नहीं था। और ये बात तो अभी हुई ही नहीं थी।

तनवी की आँखें सिकुड़ गईं। ठीक है। अगर वो इतना ही जानता है, तो देखते हैं।

मंदिर जाते वक़्त, उसने जान-बूझकर हल्के हरे रंग की किनारी वाली साड़ी पहनी।

गाड़ी में बड़ी माँ बीच में बैठीं, अपने मोतियों के साथ, और तनवी और अरयन दोनों ओर। बड़ी माँ ने तनवी की साड़ी देखी, उसकी किनारी देखी, और एक पल को उनकी भौंह उठी, पर कुछ कहा नहीं। पर तनवी अरयन को देख रही थी।

और अरयन ने, खिड़की से बाहर देखते हुए, बहुत धीरे से अपनी साँस छोड़ी। राहत की साँस। जैसे उसने सोचा हो कि वो पूरी हरी पहनेगी, और हादसा हो जाएगा, और जब ऐसा नहीं हुआ, तो वो हल्का पड़ गया।

वो उस हादसे को रोकने की कोशिश कर रहा था जो अभी हुआ ही नहीं था।

मंदिर में बड़ी माँ ने पूरी दुनिया के सामने आदर्श सास का अभिनय किया, बहू का हाथ थामे, पंडित से उसके सुखी भविष्य की बात करते हुए। तनवी ने उतनी ही ख़ूबसूरती से आदर्श बहू का। दोनों के होंठों पर शहद, दोनों के पीछे चाक़ू।

फिर बड़ी माँ दान-दक्षिणा की बात करने पंडित जी के साथ आगे बढ़ गईं, और एक पल को तनवी और अरयन घंटियों के नीचे अकेले रह गए, अगरबत्ती के धुएँ और दूर बजते शंख के बीच।

"आप मंदिर नहीं आते," तनवी ने धीरे से कहा, हाथ जोड़े, सामने मूरत को देखते हुए। "मुझे ऐसा लगता है।"

अरयन ने उसे तिरछी नज़र से देखा। "आपको मेरे बारे में भी अब बहुत कुछ लगने लगा है।"

"बस उधार चुका रही हूँ।" वो हल्के से मुस्कुराई। "आप भगवान को नहीं मानते, फिर भी हाथ जोड़े खड़े हैं। किसके लिए?"

अरयन की नज़र एक पल को मूरत पर ठहरी। जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद वो ख़ुद से ही कह रहा था। "किसी ऐसी चीज़ के लिए जो शायद हो ही न सके।"

"दूसरा मौक़ा?" तनवी ने पूछा।

अरयन का सिर झटके से उसकी ओर घूमा। उसकी आँखों में वो दहशत फिर थी, वही मंडप वाली। "आपने क्या कहा?"

"मैंने पूछा, क्या माँग रहे हैं। मन्नत?" तनवी ने मासूमियत से पलकें झपकाईं, पर उसका दिल धड़क रहा था। उसने उसे फिर हिलते देखा था, ठीक उसी एक लफ़्ज़ पर, जो आने वाले किसी कल से जुड़ा था।

"कुछ नहीं," अरयन ने नज़रें हटा लीं। "मैं यहाँ सिर्फ़ बड़ी माँ की वजह से हूँ।"

झूठ, तनवी ने मन में कहा। पर ज़ोर से बोली, "ठीक है।"

बड़ी माँ लौट आईं, और उनकी नज़र सीधे उन दोनों पर पड़ी, उस फ़ासले पर जो अब पहले से थोड़ा कम था। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपने मोती घुमाए, और मुस्कुराईं, उस तरह जैसे कोई शिकारी मुस्कुराता है जब उसे लगे कि शिकार ख़ुद जाल की तरफ़ आ रहा है।

सीढ़ियों पर, जहाँ पत्थर घिसकर फिसलन भरे हो गए थे, तनवी का पैर एक पल को डगमगाया।

और अरयन का हाथ बिजली की तरह उठा और उसकी कोहनी थाम ली।

बस एक पल। फिर उसने झट से हाथ खींच लिया, जैसे आग छू ली हो। पर वो उस तीसरी सीढ़ी पर पहले से तैयार खड़ा था। वो जानता था कि वो वहीं फिसलेगी।

"शुक्रिया," तनवी ने धीरे से कहा, उसकी आँखों में देखते हुए।

"संभल कर," उसने रुखाई से कहा, और आगे बढ़ गया। पर उसके कान की लौ लाल थी।

बड़ी माँ ने ये सब देखा। उन्होंने दोनों को देखा, उस झिझकते हाथ को, उस खिंचाव को, और उनकी आँखों में एक नई दिलचस्पी जागी, जो दिलचस्पी ख़तरनाक थी।

घर लौटकर तनवी ने ख़ुद को कमरे में बंद कर लिया और परी को फ़ोन लगाया। उसे किसी सामान्य आवाज़ की ज़रूरत थी।

"तो?" परी चहकी। "रहस्यमयी राजकुमार से आज क्या बात हुई?"

"परी, वो... वो ऐसी चीज़ें जानता है जो उसे नहीं पता होनी चाहिए। मेरी पसंद। मेरी आदतें। आज मंदिर में, मेरे फिसलने से पहले ही उसने मुझे थाम लिया। जैसे उसे पता हो।"

"हाय!" परी चीख़ी। "ये तो फ़िल्मी रोमांस है! बंदा तुझे चुपके चुपके देखता है, तेरी हर अदा याद कर रखी है। ये तो हीरो वाली बात है।"

"नहीं, परी, ये रोमांस नहीं है। इसमें कुछ डरावना है। जैसे वो मुझे पहले से जानता हो।"

"अरे तो टेस्ट कर ले ना," परी ने लापरवाही से कहा, मानो दुनिया की सबसे आसान बात हो। "कोई ऐसी चीज़ पूछ जो उसे पता ही नहीं होनी चाहिए। फँसा उसको अपने ही जाल में। अगर पलक भी झपकाए, तो समझ जा कि दाल में कुछ काला है। आख़िर बीवी है तू, या जासूस?"

तनवी रुक गई।

टेस्ट कर ले। कोई ऐसी चीज़ पूछ जो उसे पता ही नहीं होनी चाहिए।

"परी," उसने धीरे से कहा, "तू कभी कभी सच में काम की बात कह देती है।"

"मैं हमेशा काम की बात कहती हूँ, लोग सुनते नहीं," परी ने नाक चढ़ाई। "अब बता, और कुछ? सास से बची कि नहीं?"

बात ख़त्म करके तनवी छत पर चली गई।

लखनऊ की सर्दियों की वो धुंधली शाम, दूर गोमती के किनारे जलती रोशनियाँ। और उस ख़ाली छत पर खड़े होकर, एक पुरानी याद उसके सीने में उठी, तेज़ और साफ़।

अदालत का वो आख़िरी दिन। काँच की दीवार। उस पार उसकी माँ, हाथ शीशे पर रखे, बस इतना पूछती हुई, "बेटी, तूने ये किया क्यों?" और तनवी, उस पार से, चीख़ चीख़ कर कहती हुई कि उसने कुछ नहीं किया, और उसकी आवाज़ काँच को पार नहीं कर पा रही थी। कोई उसका यक़ीन नहीं कर रहा था। कोई नहीं।

उसने आँखें भींच लीं। ये थी उसकी सबसे बड़ी सज़ा। मरना नहीं। अकेले होना। एक ऐसा सच लिए जिसे कोई मानने को तैयार न हो।

"इस बार अकेली नहीं रहूँगी," उसने अँधेरे से कहा। "इस बार मैं इस घर का हर राज़ खींच कर बाहर निकालूँगी। और इसकी शुरुआत उससे होगी।" उसने नीचे, अरयन के दफ़्तर वाले कमरे की रोशनी की तरफ़ देखा। "तू जो भी है, मैं तुझे साबित करवाऊँगी।"

अगले दिन उसे मौक़ा मिला। बाउजी के स्टडी के बाहर, गलियारे में, जहाँ अरयन कुछ फ़ाइलें लिए जा रहा था।

"एक बात पूछूँ?" तनवी ने रास्ता रोका।

अरयन रुका। "पूछिए।"

तनवी ने उसकी आँखों में देखा, और बहुत आराम से, बहुत साफ़ कहा, "त्रिवेणी होल्डिंग्स। ये नाम सुना है आपने?"

हवा रुक गई।

अरयन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसके हाथ की फ़ाइलें एक पल को काँपीं। उसकी आँखों में कुछ गुज़रा, बिजली की तरह, पहचान, दहशत, और एक ऐसा दर्द जैसे किसी ने पुराना ज़ख़्म छू दिया हो। उसके होंठ खुले, जैसे कुछ कहने को हों, कोई नाम, कोई रक़म, कुछ जो उसके भीतर से अपने आप निकल आना चाहता था।

फिर उसने ख़ुद को रोका। एक झटके से। उसका जबड़ा कसा, और जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ पत्थर थी।

"ये नाम मैंने कभी नहीं सुना।"

पर उसका चेहरा कुछ और कह रहा था।

"नहीं सुना," तनवी ने दोहराया, धीरे से। "तो फिर आपका रंग क्यों उड़ गया, मिस्टर राणा?"

"मुझे देर हो रही है।" वो उसके पास से निकल गया, तेज़ क़दमों से, फ़ाइलें सीने से चिपकाए।

तनवी वहीं खड़ी रही, उसे जाते देखती हुई, और उसका दिल बर्फ़ बन गया।

त्रिवेणी होल्डिंग्स का वजूद अभी काग़ज़ों पर बमुश्किल आया था। वो घोटाला अभी शुरू नहीं हुआ था। उस नाम को इस घर में सिर्फ़ वही जान सकता था जो उस साज़िश का हिस्सा हो।

जो डर उसने देखा था, वो किसी अजनबी का डर नहीं था। वो एक मुजरिम का डर था।

"तो ये बात है," उसने ख़ुद से फुसफुसाया, और उसकी आवाज़ में अब कोई उलझन नहीं थी, सिर्फ़ एक ठंडी आग थी। "तुम भी उन्हीं में से एक हो। मेरे पति। मेरे क़ातिल।"

उसे नहीं पता था कि वो कितनी ग़लत थी।

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