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Chapter 15 of 15

इस जनम के फेरे

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

बहार लखनऊ में जल्दी आ गई थी उस साल।

हवेली के पुराने आँगन में, जहाँ कभी सर्दियों की धुंध और दबी हुई फुसफुसाहटें ठहरी रहती थीं, अब अमलतास के फूल झर रहे थे। सुबहें लंबी हो गई थीं, धूप नरम, और वो डर जो तीन साल, या कहें दो जन्म, तनवी की रीढ़ में एक ठंडी सलाख़ की तरह बैठा रहा था, धीरे धीरे पिघलकर बह गया था।

युवराज की गिरफ़्तारी के बाद के महीने एक नई दुनिया की तरह थे। अदालत ने, उस जाली दस्तावेज़ के सामने, उस एक नामुमकिन तारीख़ के सामने जिस पर तनवी के दस्तख़त उसके इस घर में आने से भी पहले पड़ चुके थे, तनवी सक्सेना का नाम पूरी तरह साफ़ कर दिया। 'घोटाले की मास्टरमाइंड' अब कहानी की नायिका थी, वो बहू जिसने एक रसूख़दार ख़ानदान की साज़िश को बेनक़ाब किया।

उसके पापा सबसे पहले आए थे, उस सुबह की पहली बस से, बिना किसी को बताए। और जब उन्होंने अपनी बेटी को गले लगाया, तो पच्चीस साल का वो बोझ, वो ख़ामोश एहसान जो उन्होंने एक उम्र राणाओं के आगे ढोया था, उनके कंधों से उतर गया।

"मुझे माफ़ कर दे, बेटी," उन्होंने रोते हुए कहा। "मेरी एक ग़लती की क़ीमत तुझे..."

"कुछ नहीं चुकानी पड़ी, पापा," तनवी ने कहा, उन्हें थामते हुए। "अब नहीं। अब हम दोनों आज़ाद हैं।"

पापा कुछ पल बोल नहीं पाए। फिर उन्होंने उसका चेहरा अपने दोनों काँपते हाथों में लिया, जैसे यक़ीन कर रहे हों कि वो सच में वहाँ खड़ी है, ज़िंदा, बेदाग़।

"पच्चीस साल मैंने सिर झुकाकर जिया," उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा। "एक ग़लती की थी मैंने, जवानी में, और उस घर ने उसे मेरे गले की ज़ंजीर बना दिया। मैं हर बार चुप रहा, इस डर से कि कहीं उस पुरानी बात की आँच तुझ तक न पहुँच जाए। और आँच फिर भी तुझ तक पहुँची। सबसे बुरी तरह।"

"पर इस बार नहीं पहुँची, पापा," तनवी ने कहा, उनके आँसू पोंछते हुए। "आपका कोई कर्ज़ अब किसी के पास नहीं। और आपका सिर अब किसी के आगे नहीं झुकेगा। किसी के भी नहीं।"

उन्होंने पहली बार, बरसों में पहली बार, सीधा खड़े होकर एक लंबी साँस ली, जैसे फेफड़ों में हवा भरने के लिए अब किसी की इजाज़त न चाहिए हो।

और उसकी माँ। उसकी माँ, जो दूसरी ज़िंदगी में बेटी की बदनामी का बोझ उठाते उठाते बुझ गई थी, जिसकी हँसी एक काँच की दीवार के उस पार हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई थी, अब उस घर में सिर उठाए घूमती थी, अपनी बेटी पर गर्व करती हुई। तनवी उसे घंटों देखती रहती, उस हँसती हुई, ज़िंदा आवाज़ को सुनती हुई, और हर बार उसका दिल भर आता।

"क्या देखती रहती है मुझे ऐसे?" एक दोपहर माँ ने हँसकर पूछा, उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए। "जैसे बरसों बाद देख रही हो।"

तनवी कुछ कह नहीं पाई। बस उनकी गोद में सिर रख दिया, वैसे ही जैसे बचपन में रखती थी, और उस ज़िंदा, धड़कती हुई आवाज़ को सुनती रही, जिसे उसने एक पूरी ज़िंदगी खोकर दुबारा पाया था।

बड़ी माँ अब भी उस हवेली की मालकिन थीं, पर कुछ बदल गया था। उन्होंने अपने ख़ानदान को बचाने के लिए अपने सबसे प्यारे को क़ुर्बान किया था, और उस क़ुर्बानी ने उन्हें थोड़ा झुका दिया था। एक शाम उन्होंने तनवी को अपने पास बुलाया।

"तुमने मुझे हराया, बहू," उन्होंने कहा, बिना किसी कड़वाहट के। "इस घर में सत्तर साल में कोई मुझे नहीं हरा पाया। तुमने हरा दिया। और सबसे बुरी बात?" उनके होंठ एक हल्की, थकी मुस्कान में मुड़े। "मुझे ख़ुशी है कि तुमने हराया। शायद इस घर को एक ऐसी ही बहू की ज़रूरत थी। एक चीज़ की नहीं। एक इंसान की।"

तनवी कुछ देर ख़ामोश रही। फिर उसने कहा, "आपने मुझे एक मोहरा समझकर इस घर में बुलाया था, बड़ी माँ। एक ऐसी लड़की जो भरोसा कर ले, बिना पढ़े दस्तख़त कर दे, और एक दिन सारा इल्ज़ाम चुपचाप अपने सिर ले ले।"

"हाँ," बड़ी माँ ने आँख नहीं चुराई। "यही समझा था।"

"पर मैं रुक गई," तनवी ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई जीत नहीं थी, सिर्फ़ एक शांत सच्चाई। "मैं चाहती तो जा सकती थी। पर मैं रुकी, क्योंकि अब ये घर सिर्फ़ आपका नहीं रहा। मेरा भी है।"

बड़ी माँ ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर, बहुत धीरे, उन्होंने अपना झुर्रियों भरा हाथ बढ़ाया और तनवी के हाथ पर रख दिया, सत्तर साल में पहली बार किसी बहू का हाथ इस तरह थामते हुए।

"अरयन का ख़याल रखना," उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा। "और इस घर का। मुझसे बेहतर।"

और फिर, गर्मियों की एक सुबह, उन्होंने दुबारा शादी की।

ये किसी ने तय नहीं की थी। कोई एहसान नहीं था, कोई क़र्ज़ नहीं, कोई जाल नहीं। बस अरयन ने एक रात तनवी से कहा था, हवेली की उसी छत पर, जब शहर सो रहा था और सिर्फ़ तारे जाग रहे थे।

"हमारी पहली शादी उन्होंने रची थी, अपने फ़ायदे के लिए। मैं चाहता हूँ हम एक बार और शादी करें। इस बार सिर्फ़ अपने लिए।"

"तुम्हें पता है हम पहले से शादीशुदा हैं ना?" तनवी ने मुस्कुराकर पूछा था।

"पता है। पर वो शादी एक काग़ज़ थी, एक सौदा। मैं वो फेरे दुबारा लेना चाहता हूँ, इस बार हर लफ़्ज़ का मतलब समझकर।"

और तनवी के पास इसका कोई जवाब नहीं था, सिवाय हाँ के।

वही मंडप। वही पवित्र आग। वही सात फेरे। पर इस बार सब कुछ अलग था।

इस बार भीड़ छोटी थी। कोई कैमरे नहीं, कोई शहर भर की नज़रें नहीं, कोई रसूख़ की नुमाइश नहीं। सिर्फ़ वो लोग जो सच में अपने थे। तनवी के पापा एक कोने में बैठे फूले नहीं समा रहे थे, उसकी माँ हर आने वाले को रोककर बता रही थी कि दुल्हन उसकी बेटी है, और बड़ी माँ अपनी छड़ी पर हाथ टिकाए सब कुछ एक शांत, नरम नज़र से देख रही थीं।

ऊपर के कमरे में, परी दुल्हन को तैयार कर रही थी, और बीस मिनट में पाँच बार रो चुकी थी।

"इधर देख, ऊपर देख, साँस मत ले," वो उसका काजल आख़िरी बार ठीक करते हुए बड़बड़ा रही थी, जबकि उसका अपना काजल कब का बह चुका था। "दूसरी बार। उसी आदमी से। कौन करता है ऐसा, बता तो?"

"वो जो पहली बार ग़लत वजह से कर बैठी हो," तनवी ने आईने में अपनी परछाईं से कहा।

परी एक पल रुकी, फिर उसकी आँखें फिर से भर आईं।

"रोना बंद कर, परी, काजल फैल जाएगा," तनवी हँसी।

"मैं नहीं रो रही, तेरा झूमर रो रहा है," परी ने नाक पोंछते हुए कहा। "देख, बस इतना बता। ये जो पूरी रेबर्थ वाली, पिछले जनम वाली कहानी थी, ये सच में सच थी ना? तूने सच में दो ज़िंदगियाँ जी हैं?"

"हाँ, पगली।"

"तो फिर एक काम कर," परी ने उसका घूँघट ठीक किया, और उसकी आँखों में शरारत लौट आई। "इस जनम में मेरा जन्मदिन मत भूलना। पिछले जनम में तो शायद भूल जाती होगी।"

तनवी ज़ोर से हँस पड़ी, और उस हँसी में दो जन्मों का बोझ हल्का हो गया।

"चल अब," परी ने आँखें पोंछीं और उसका घूँघट खींचकर ठीक किया, इस बार एक काँपती मुस्कान के साथ। "नीचे वो आदमी कब से इंतज़ार कर रहा है। और इस बार, मेरी जान, उसे देर नहीं हुई।"

मंडप में, आग के सामने, अरयन उसका इंतज़ार कर रहा था। और जब तनवी ने अपना घूँघट उठाया, तो इस बार उस आदमी के चेहरे पर ख़ौफ़ नहीं था, बेयक़ीनी नहीं थी। सिर्फ़ प्यार था, और एक गहरी, शांत राहत।

पंडित जी ने मंत्र शुरू किए, और दोनों उठे, उस आग के गिर्द घूमने के लिए जिसने एक बार उन्हें एक झूठ में बाँधा था, और अब एक सच में बाँधने वाली थी।

"मैं सोच रहा था," अरयन ने धीरे से कहा, जब उन्होंने पहला फेरा लिया, "पिछली बार, इसी आग के सामने, मैंने तुम्हारी तरफ़ देखा तक नहीं था।"

"और इस बार?"

"इस बार मैं तुमसे नज़र नहीं हटा पा रहा।"

दूसरे फेरे पर तनवी ने फुसफुसाकर कहा, "पिछली बार इन्हीं सात फेरों से मुझे डर लगता था। हर फेरा एक और ज़ंजीर लगता था। और अब हर फेरा एक वादा लगता है, जो मैं ख़ुद, अपनी मर्ज़ी से, कर रही हूँ।"

तीसरे और चौथे फेरे पर वो ख़ामोश रहे, बस उनके हाथ एक दूसरे में और कसते गए। पाँचवें फेरे पर अरयन की आवाज़ धीमी हुई।

"पिछले जनम में मैंने तुम्हें मरते देखा था, उस आग से बहुत दूर। और उसके बाद हर रात मैं यही सोचता था, काश एक बार मैंने उस मंडप में तुम्हारी आँखों में देख लिया होता।"

"अब देख लो," तनवी ने कहा, उसकी आँखों में आँसू और हँसी एक साथ। "जी भर के देख लो। अब हमारे पास वक़्त ही वक़्त है।"

छठे और सातवें फेरे पर पंडित जी की आवाज़ गूँजी, सात जन्मों के वादे, और इस बार दोनों ने वो वादे सच में सुने, हर एक लफ़्ज़, बस उन्हीं दोनों के लिए।

उस रात, जब हवेली सो गई और कोई डर उनके बीच नहीं था, कोई जाल नहीं, कोई आने वाली मौत नहीं, अरयन उसके कमरे में आया और दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।

"तुम्हें याद है," उसने धीरे से कहा, उसके माथे पर से एक लट हटाते हुए, "उस रात, जब मैंने कहा था कि मैं इंतज़ार करूँगा? जब तक तुम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जातीं?"

"याद है," तनवी ने फुसफुसाकर कहा। "उस वक़्त मुझे लगा था तुम पागल हो। उस घर में, उस डर के बीच, और तुम इंतज़ार की बात कर रहे थे।"

"मैंने तुम्हें एक बार खो दिया था, तनवी," अरयन ने कहा। "मैं चाहता था कि जब मैं तुम्हें पाऊँ, तो पूरा पाऊँ। बिना किसी डर के, बिना किसी अधूरेपन के।"

तनवी ने उसका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। "अब कोई साया नहीं है, अरयन।"

"अब कोई साया नहीं है," उसने धीरे से दोहराया।

और फिर, पहली बार, इस बार चोरों की तरह नहीं, अँधेरे में नहीं, बल्कि उस पूरे हक़ के साथ जो दो जन्मों के इंतज़ार से कमाया गया था, वो एक दूसरे के पास आए। अरयन ने उसका चेहरा थामा, जैसे कोई बहुत क़ीमती चीज़, और तनवी ने पहली बार ख़ुद को पूरी तरह, बिना किसी डर के, किसी और के हवाले किया। उसने उसके कान के पास, बहुत धीरे, उसका नाम लिया, जैसे वो कोई दुआ हो। बाहर बहार की रात थी, और अंदर, दो ऐसे दिल जो मौत को हराकर एक दूसरे तक लौटे थे, आख़िरकार घर पहुँच गए थे।

सब कुछ ठीक था।

लगभग।

क्योंकि कभी कभी, अपनी सबसे ख़ुशी के पलों में भी, तनवी को युवराज के वो आख़िरी लफ़्ज़ याद आ जाते। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि हम कितने हैं। हमें वापस भेजा किसने। या क्यों।

एक रात उसने अरयन से पूछा, उसके सीने पर सिर रखे, "तुम्हें कभी डर लगता है? कि शायद युवराज सही था? कि ये हमारा दूसरा मौक़ा नहीं, किसी और का खेल है? कि कोई और भी कहीं है, जो सब याद रखता है?"

अरयन कुछ देर ख़ामोश रहा, छत को देखते हुए।

"पता नहीं," उसने आख़िरकार कहा। "शायद कोई हमें देख रहा है। शायद ये सच में किसी की बिसात है। पर तनवी," उसने उसे अपनी ओर खींचा, "अगर हमें ये जनम किसी ने दिया है, या हमने ख़ुद छीना है, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ इससे पड़ता है कि हम इसका क्या करते हैं। और मैं इसे डर में नहीं, तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।"

तनवी मुस्कुराई। "मैं भी," उसने धीरे से कहा। और उसने वो सवाल, फ़िलहाल के लिए, परे रख दिया।

कहीं दूर, किसी और शहर में, किसी और कहानी में, शायद कोई और भी इसी तरह आँख खोल रहा होगा, उसी पुरानी सुबह पर, उसी अधूरे हिसाब के साथ। शायद ये खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ था।

पर वो कल की बात थी।

आज, उस सुबह की पहली रोशनी में, तनवी ने अपने पति का हाथ थामा, और उस आग को याद किया जिसके सामने उन्होंने दो बार वादे किए थे। एक बार किसी और के लिए। और एक बार, आख़िरकार, अपने लिए।

फिर वही फेरे। वही आग। वही दो लोग।

पर इस बार, इस जनम में, वो वादे सच में उनके अपने थे।

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