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Chapter 5 of 15

दो अजनबी, एक राज़

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

युवराज के उस एक वाक्य ने तनवी की नींद उड़ा दी थी। हिसाब अभी बाक़ी है।

उस दिन के बाद से वो हर चीज़ गिनने लगी थी। हर वो बात जो अरयन को नहीं पता होनी चाहिए थी। कॉफ़ी। हरी साड़ी। वो सीढ़ी। त्रिवेणी। एक एक करके उसने उन्हें अपने मन में जमा किया, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की तरह, एक ऐसा बही-खाता जिसका हिसाब किसी तरह बैठ नहीं रहा था।

और उस शाम, उसे एक और एंट्री मिली। सबसे डरावनी।

वो बाउजी के स्टडी के पास से गुज़र रही थी जब उसने मुनीम जी को किसी से फ़ोन पर बात करते सुना। "...पर छोटे मालिक ने ख़ुद मना किया है। कह रहे हैं त्रिवेणी होल्डिंग्स वाला खाता अभी मत खोलो, कोई पैसा उस तरफ़ मत भेजो। पता नहीं क्या हो गया है उन्हें, पहले तो ख़ुद ही..."

तनवी दीवार से सटकर खड़ी रह गई।

छोटे मालिक। अरयन।

वो त्रिवेणी को रोक रहा था। उस घोटाले को, जो अभी शुरू भी नहीं हुआ था, वो अभी से बंद कर रहा था। एक ऐसी साज़िश को नाकाम कर रहा था जिसके बारे में उसे जानने का कोई रास्ता नहीं था।

अगर वो उस साज़िश का हिस्सा होता, तो उसे बढ़ाता। पर वो उसे मिटा रहा था।

तनवी का पूरा सिद्धांत, उसकी सारी नफ़रत की इमारत, एक पल को डगमगा गई। अगर अरयन दुश्मन नहीं है, तो वो क्या है? और सबसे डरावना सवाल, उसे ये सब कैसे पता?

रात को जवाब ख़ुद उसके पास आया, एक तूफ़ान की शक्ल में।

तूफ़ान शाम ढलते ही आया, जैसे आसमान को किसी पुरानी बात पर ग़ुस्सा हो। तनवी फ़ोन पर परी से बात कर रही थी जब पहली बिजली कड़की।

"...तो मैं कह रही थी," परी की आवाज़ कर्र कर्र करती आ रही थी, "ये युवराज वाला 'हिसाब बाक़ी है' डायलॉग मुझे एक रात सोने नहीं दे रहा। कौन ऐसे बात करता है? और तेरा पति? वो तो पूरी मिस्ट्री वेब सीरीज़ है। तनु, सच बता, तूने ऐसे आदमी से शादी कैसे कर ली जो तुझे देखकर ऐसे डरता है जैसे भूत देख लिया हो?"

"मुझे नहीं पता, परी।" तनवी खिड़की के पास खड़ी थी, बाहर पेड़ों को झूमते देखती हुई।

"देख, मेरी थ्योरी सुन। या तो वो तुझसे छुपके छुपके प्यार करता है, या उसने पिछले जनम में तेरा क़त्ल किया था और अब पछता रहा है।" परी हँसी अपने ही मज़ाक़ पर। "और सुन, आज तूफ़ान है, बत्ती जाएगी, तू अकेली, वो अकेला। रोमांस का मौसम है, समझी? एक दिन ये बंदा तुझे कुछ ऐसा बताएगा कि तेरे होश उड़ जाएँगे, याद रखना मेरी बात..."

और तभी, एक ज़ोरदार कड़क के साथ, पूरी हवेली अँधेरे में डूब गई। फ़ोन की लाइन कट गई। तनवी के हाथ में बस एक मरी हुई स्क्रीन रह गई।

बत्ती चली गई थी। और परी की आवाज़, उसकी आख़िरी लौ, बुझ गई।

तनवी कुछ पल अँधेरे में खड़ी रही, अपने दिल की धड़कन सुनती हुई। फिर उसने टटोलकर मोमबत्ती ढूँढी, ऊपर वाली अलमारी के तीसरे ख़ाने से, जहाँ वो हमेशा रखी होती थी, एक छोटी सी लौ जलाई।

हवेली में हलचल थी। नौकर "जनरेटर, जनरेटर" चिल्ला रहे थे। बड़ी माँ अपनी फूफियों के साथ नीचे पूजा घर में थीं। और इस सब के बीच, मोमबत्ती लिए, तनवी ऊपर के उस लंबे बरामदे में आ गई जहाँ बारिश की बौछारें खुली खिड़कियों से अंदर आ रही थीं।

वहाँ अरयन खड़ा था।

अकेला, अँधेरे में, खिड़की के पास, बाहर तूफ़ान को देखता हुआ। तीन दिन की थकान थी उस चेहरे पर, और कुछ और भी, एक बोझ जो वो हमेशा ढोता रहता था।

"बत्ती आने में वक़्त लगेगा," उसने कहा, बिना मुड़े। "इस इलाक़े में तूफ़ान के बाद घंटों रहती है।"

"मुझे पता है," तनवी ने कहा। और फिर रुक गई। उसे ये कैसे पता था? उसने ख़ुद को सुना, और देखा कि अरयन के कंधे एक पल को कसे।

"हाँ," उसने धीरे से कहा। "तुम्हें पता है।"

कुछ था उसकी आवाज़ में। तनवी मोमबत्ती लिए पास गई, बारिश की आवाज़ के बीच।

"मुझे आपसे बात करनी है," उसने कहा। "और इस बार आप अख़बार के पीछे नहीं छुप सकते।"

अरयन मुड़ा। मोमबत्ती की लौ उन दोनों के बीच काँप रही थी, उनके चेहरों को सोने में रंगती हुई। बाहर बिजली चमकी, और एक पल को पूरा बरामदा सफ़ेद रोशनी में नहा गया, फिर वापस अँधेरे में। वो इतने पास थे कि तनवी उसकी साँस की गर्मी महसूस कर सकती थी। एक अजीब सी, जानी पहचानी सी गर्मी, जो उसे समझ नहीं आई।

"पूछो," उसने कहा।

"आज शाम मैंने मुनीम जी को सुना।" तनवी ने सीधे उसकी आँखों में देखा। "आप त्रिवेणी होल्डिंग्स को रोक रहे हैं। उस घोटाले को बंद कर रहे हैं जो अभी शुरू भी नहीं हुआ। जो एक राज़ है जिसे आपके सिवा किसी को नहीं पता होना चाहिए। तो आप उसका हिस्सा नहीं हैं। आप उसे मिटा रहे हैं।" उसकी आवाज़ काँपने लगी। "कॉफ़ी। हरी साड़ी। वो सीढ़ी। आप ऐसी चीज़ें जानते हैं जो अभी हुई नहीं। तो मैं आख़िरी बार पूछ रही हूँ, अरयन राणा। आप क्या हैं?"

"मैंने कहा था," उसका जबड़ा कसा, "कम सवाल पूछो।"

"और मैंने कहा था," तनवी एक क़दम और पास गई, अब उनके बीच बस वो काँपती लौ थी, "कि मैं डरती नहीं।" सालों का दबा हुआ दर्द बाहर आने लगा। "मुझे लगा था आप मुझे बर्बाद करेंगे। पर अब मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। आप बचा रहे हैं या मार रहे हैं? आप कौन हैं? बता दीजिए। मेरे मुँह पर।"

"बस!"

ये लफ़्ज़ अरयन के मुँह से एक तड़प की तरह निकला। उसने उसकी कलाई पकड़ ली, और मोमबत्ती दोनों के हाथों के बीच काँप उठी। वो इतने पास थे कि तनवी उसकी छाती की तेज़ धड़कन महसूस कर सकती थी। एक पल को, बारिश और बिजली के बीच, कोई पुरानी, भूली हुई गर्मी दोनों को एक साथ खींच रही थी। तनवी की साँस अटक गई। अरयन की नज़र एक पल को उसके होंठों पर गई, और तनवी ने ख़ुद को उसकी तरफ़ झुकते महसूस किया, जैसे कोई बहुत पुरानी आदत।

फिर अरयन ने ख़ुद को रोका, जैसे किसी आग के किनारे से पीछे हटा हो। पर उसने कलाई नहीं छोड़ी।

"तुम्हें लगता है मैं तुम्हें बर्बाद करूँगा," उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी। "तुम नहीं जानतीं मैं किस चीज़ से तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूँ।"

"तो बताइए! साबित कीजिए!"

"कैसे?" वो लगभग चीख़ पड़ा, और उस चीख़ में इतना दर्द था कि तनवी सहम गई। "कैसे साबित करूँ, तनवी? कि मैं तुम्हारी कॉफ़ी इसलिए जानता हूँ क्योंकि मैंने तीन साल तुम्हारे साथ एक मेज़ पर बैठकर पी है? कि मैं जानता हूँ तुम उस हरी साड़ी में कितनी अकेली लगी थी क्योंकि मैं वहाँ था? कि मैं जानता हूँ तुम उन सीढ़ियों पर फिसलोगी क्योंकि एक ज़िंदगी पहले तुम फिसली थीं, और मैं तुम्हें थाम नहीं पाया था?"

तनवी का पूरा जिस्म जम गया।

मोमबत्ती की लौ काँपी। बाहर बिजली कड़की।

"क्या...?" उसकी आवाज़ बमुश्किल निकली। "आप... आप क्या कह रहे हैं?"

अरयन ने उसकी कलाई छोड़ दी। उसने पीछे हटकर खिड़की का सहारा लिया, जैसे खड़े रहने की ताक़त ख़त्म हो गई हो। और जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ कहीं बहुत दूर से आ रही थी, किसी और वक़्त से, किसी और ज़िंदगी से।

"तुम एक ठंडी कोठरी में मरी थीं, तनवी। जनवरी की आख़िरी रात। अकेली। बदनाम। उस घर के लिए जिसने तुम्हें बकरा बना दिया था।"

तनवी की साँस रुक गई। ये उसने किसी को नहीं बताया था। ये तो हुआ ही नहीं था। अभी तक।

"नहीं," उसने फुसफुसाया। "ये झूठ है।"

"तुमने मरने से पहले कुछ कहा था।" अरयन की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर उसकी आवाज़ भयानक रूप से स्थिर थी। "तुमने सोचा तुम अकेली हो। तुमने वो लफ़्ज़ उस ख़ाली अँधेरे से कहे, किसी से नहीं। पर तुम अकेली नहीं थीं, तनवी।"

वो एक क़दम पास आया।

"मैं वहाँ था। मैं उस अँधेरे में खड़ा था, उस कोठरी के बाहर। मैं अपने ही ख़ानदान के ख़िलाफ़ हो चुका था, मैं तुम तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था, और मैं एक पल देर से पहुँचा। तुमने मुझे देखा नहीं। पर मैंने तुम्हें सुना।"

उसकी आवाज़ टूट गई।

"तुमने कहा था," और अब उसने वो लफ़्ज़ दोहराए, एक एक करके, जैसे उन्हें तीन साल सीने में संभाल कर रखा हो, "'अगर कभी, किसी तरह, दुबारा मौक़ा मिला... तो इस बार मैं तुम सबको पहले पहचान लूँगी। तुमसे पहले।'"

बरामदे में सिर्फ़ बारिश की आवाज़ रह गई।

तनवी की दुनिया घूम गई। वो लफ़्ज़। उसके आख़िरी लफ़्ज़, जो उसने उस सर्द हवा से कहे थे, ये सोचकर कि कोई नहीं सुन रहा। ये दुनिया में किसी को पता नहीं हो सकते थे। किसी को भी नहीं।

सिवाय उसके जो वहाँ था।

मोमबत्ती उसके हाथ से छूटते छूटते बची। उसकी टाँगें काँप रही थीं। पूरी एक ज़िंदगी, उसने सोचा था कि वो अकेली मरी थी, बिल्कुल अकेली, और कोई नहीं था जो उसकी आख़िरी साँस का गवाह बने। और अब पता चला कि कोई था। ये आदमी था। वो उस अँधेरे में खड़ा था और उसने सब देखा, सब सुना, और फिर वो उन लफ़्ज़ों को तीन साल अपने सीने में लिए जिया।

"तुमने मुझे मरते देखा," उसने काँपती आवाज़ में कहा, और अब उसके भी आँसू बह रहे थे, ग़ुस्से के, दर्द के, और एक ऐसी राहत के जिस पर उसे शर्म आ रही थी। "तुम वहाँ थे। और तुमने मुझे बचाया नहीं।"

"मैं एक पल देर से पहुँचा," अरयन ने कहा, उसकी आवाज़ बिखर गई। "और उस एक पल ने मुझे एक पूरी मौत दी। मैं वो लफ़्ज़ लिए जिया, तनवी। हर रात। जब तक मैं ख़ुद नहीं मर गया। और फिर मैंने भी आँख खोली, उसी सुबह, उसी मंडप में, तुम्हारे सामने।"

तनवी अरयन को देख रही थी, और पहली बार, उस ठंडे, पत्थर चेहरे के पीछे उसे वो आदमी दिखा जो तीन दिन नहीं, तीन साल नहीं, एक पूरी ज़िंदगी का दुख ढो रहा था। उसका दुश्मन नहीं। उसके जैसा कोई। दुनिया में अकेला दूसरा इंसान जो उस अँधेरे को जानता था।

"तुम भी," उसने फुसफुसाया। "तुम भी वापस आए हो।"

"मैं तुम्हें बचाने आया हूँ," अरयन ने कहा, उसकी आवाज़ टूटी हुई। "इस बार। चाहे जो हो जाए।"

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