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अध्याय 4 / 15

धुएँ में चेहरे

फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi

राणा हवेली में युवराज के आने की ख़बर ऐसे फैली जैसे होली का रंग।

तनवी सीढ़ियों के ऊपर खड़ी थी जब नीचे हलचल मच गई। नौकर दौड़ने लगे, फूफियाँ अपनी साड़ियाँ ठीक करने लगीं, एक चाची ने तो आईने के सामने जल्दी से लिपस्टिक तक लगा ली।

"युवराज बाबा आ रहे हैं!" कमला ख़ुशी से हाँफती ऊपर आई। "रसोई में बादाम का हलवा चढ़ गया है, बहूरानी। वो सिर्फ़ युवराज बाबा के लिए बनता है। बड़े बाउजी के भाई के बेटे हैं, पर इस घर में सबसे लाडले यही हैं। बड़ी माँ की तो जान बसती है इनमें।"

"अच्छा?" तनवी ने हल्के से कहा।

"अरे, इनके आने से घर में रौनक़ आ जाती है। आप ख़ुद देख लेना। ऐसा इंसान आपने नहीं देखा होगा। फ़रिश्ता है फ़रिश्ता।"

फ़रिश्ता, तनवी ने मन में दोहराया, और उसका हाथ रेलिंग पर कस गया।

युवराज राणा।

वो नाम तीन साल उसके सीने में एक काँटे की तरह धँसा रहा था। वो मुस्कुराता चेहरा जो हर तस्वीर में सबसे आगे होता था। वो आदमी जिसने, अदालत में, गवाही दी थी कि उसने तनवी को अपने हाथों से वो काग़ज़ दस्तख़त करते देखा था। वो झूठ, इतने दुख से, इतने यक़ीन से कहा गया कि जज तक की आँखें भर आई थीं। और जब सब ख़त्म हुआ, जब तनवी जेल में थी और अरयन टूट चुका था, तो इसी फ़रिश्ते ने पूरा राणा साम्राज्य अपनी मुट्ठी में कर लिया था।

मेरा क़ातिल, तनवी ने सोचा, और मुझे इसके आगे मुस्कुराना होगा।

नीचे, बड़ी माँ अपनी ऊँची कुर्सी से उठ खड़ी हुईं, किसी के लिए, पहली बार जब से तनवी इस घर में आई थी। और तभी युवराज अंदर आया, और कमरा सच में रोशन हो गया। लंबा, ख़ूबसूरत, महँगे कोट में, बाँहें फैलाए।

"बड़ी माँ!" उसने पुकारा, और बड़ी माँ का सख़्त चेहरा पिघल गया, सच में पिघल गया।

"देर कर दी, बदमाश," उन्होंने उसका माथा चूमा।

"आपकी याद आ रही थी, इसलिए तो आया।" वो हँसा, और हर फूफी, हर चाची उस हँसी में डूब गई। "और सुना है घर में एक नई रौनक़ भी आई है।" उसकी नज़र ऊपर उठी, सीधे तनवी पर।

तनवी ने अपनी साँस को क़ाबू में किया, अपनी मुस्कान संभाली, और नीचे उतरी।

"तो ये हैं हमारी नई भाभी।" युवराज ने हाथ जोड़े, उसकी आँखों में एक गर्मजोशी जो किसी को भी पिघला देती। "अरयन की क़िस्मत हमेशा से अच्छी रही है। पर इस बार तो हद ही कर दी।"

"आप भी कम नहीं, भाई साहब," तनवी ने हाथ जोड़े, अपनी आवाज़ में उतनी ही मिठास घोलते हुए जितना उसके अंदर ज़हर था। "इतनी तारीफ़ें सुनी हैं आपकी कि लगा घर अब तक आपके बिना अधूरा था।"

"अरे वाह," युवराज ने भौंह उठाई, ख़ुश होकर। "भाभी तो ज़बान की भी तेज़ हैं।"

"बहुत तेज़," बड़ी माँ ने पीछे से कहा, और उन दोनों शब्दों में चेतावनी भी थी, तारीफ़ भी।

उस शाम दावत हुई। पूरा परिवार लंबी मेज़ के इर्द गिर्द, और बीच में युवराज, हर क़िस्से का नायक, हर हँसी का केंद्र। तनवी ने देखा कि कैसे उसने हर इंसान को छुआ, किसी की तारीफ़, किसी का मज़ाक, किसी की पुरानी बात याद रखना। लोगों को अपना बना लेना, इससे पहले कि वो उन्हें इस्तेमाल करे।

फिर उसने अपना पहला पासा फेंका।

"बड़ी माँ," युवराज ने ऊँची आवाज़ में कहा, ताकि पूरी मेज़ सुने, "अगले हफ़्ते जो परिवार की बड़ी पूजा है, सोच रहा हूँ इस बार भाभी को मेज़बानी सौंप दी जाए। नई बहू है, घर संभालना सीखेगी। क्यों, भाभी? आप तो संभाल लेंगी ना? हमारे घर की पूजा में सौ रस्में होती हैं, छोटी से छोटी ग़लती भी मेहमानों की नज़र में आ जाती है।"

मेज़ पर एक पल को सब चुप हो गए।

तनवी ने तुरंत पहचान लिया। ये कोई मेहरबानी नहीं थी। ये एक फाँसी का फंदा था, बड़ी सलीक़े से बुना हुआ। एक मध्यवर्गीय लड़की को राणा घर की उन सौ बारीक रस्मों के बीच खड़ा करना, इस उम्मीद में कि वो लड़खड़ाए, और पूरा ख़ानदान उस पर हँसे। पिछली बार जो काम बड़ी माँ ने हरी साड़ी से किया था, वही काम अब युवराज मुस्कुरा कर कर रहा था।

एक फूफी ने दबी आवाज़ में दूसरी से कहा, "देखें, बेचारी को कुछ आता भी है या नहीं।"

तनवी ने अपनी कॉफ़ी का घूँट लिया, और मुस्कुराई।

"ज़रूर, भाई साहब," उसने मीठेपन से कहा। "मेरे लिए तो सौभाग्य की बात है। एकादशी की पूजा, सही? तो पहले गणेश पूजन उत्तर दिशा में होगा, फिर कुलदेवी का आह्वान, और भोग में राणा घर की परंपरा के मुताबिक़ सिर्फ़ सात्विक, बिना प्याज़ लहसुन का। और हाँ," उसने एक पल रुककर, बहुत विनम्रता से जोड़ा, "पिछली बार शायद किसी से चूक हो गई थी, दीये की बाती दक्षिण की तरफ़ रख दी गई थी। इस बार ध्यान रखूँगी। आपको तो याद ही होगा, भाई साहब?"

मेज़ पर सन्नाटा छा गया। वो फूफी जिसने पिछली बार वो ग़लती की थी, शर्म से नीचे देखने लगी। और युवराज, एक पल को, बस एक पल को, अपनी मुस्कान भूल गया।

"वाह," बड़ी माँ ने धीरे से कहा, अपने मोती घुमाते हुए, और उनकी आँखें तनवी पर थीं, नई दिलचस्पी के साथ। "बहू को तो हमसे ज़्यादा पता है।"

"बस सुन रखा था, बड़ी माँ," तनवी ने नज़रें झुकाईं।

युवराज की हँसी लौट आई, चौड़ी और गर्म, पर उसकी आँखें अब अलग थीं। वो उसे ऐसे देख रहा था जैसे शतरंज का खिलाड़ी अचानक देखे कि सामने वाला मोहरा वो नहीं जो उसने समझा था।

"अरयन कहाँ है आजकल?" उसने हल्के से पूछा, अपना पासा बदलते हुए। "अपनी ही शादी के हफ़्ते भर बाद बीवी छोड़कर दिल्ली? कैसा लगता है भाभी, इतने बड़े घर में अकेले?"

"अकेलापन? इतने प्यार करने वाले परिवार में?" तनवी मुस्कुराई। "भाई साहब, मुझे तो साँस लेने की जगह नहीं मिलती। और अरयन का काम ही तो इस घर की शान है। मैं अपने पति के फ़र्ज़ के आड़े कैसे आऊँ?"

"समझदार बहू," युवराज ने सिर हिलाया, पर उसके दाँत थोड़े भिंचे हुए थे।

दावत के बाद बड़ी माँ ने तनवी को बरामदे में बुलाया, अपनी पान की डिबिया खोले।

"तुम्हें युवराज कैसा लगा?" उन्होंने पूछा, बिना उसकी तरफ़ देखे।

"बहुत अच्छे हैं, बड़ी माँ।"

"हम्म।" उन्होंने पान मुँह में रखा। "इस घर में दो लड़के हैं, बेटी। एक मेरा पोता, अरयन। ख़ामोश, ज़िद्दी, अपने आप में खोया। और एक युवराज, जो मेरा ख़ून नहीं, पर मेरे दिल के ज़्यादा क़रीब है।" उन्होंने तनवी की तरफ़ देखा, और उनकी आँखें पत्थर थीं। "एक दिन इस घर को चुनना होगा कि बागडोर किसके हाथ जाए। और उस दिन हर किसी को तय करना होगा कि वो किसके साथ है।"

"मैं तो इस घर की बहू हूँ, बड़ी माँ। मेरा साथ वहीं होगा जहाँ इस घर की भलाई होगी।"

"अच्छा जवाब।" बड़ी माँ मुस्कुराईं, पर उनकी मुस्कान ठंडी थी। "पर बेटी, आज तुमने मेज़ पर युवराज को मात दी। सबके सामने। होशियार लड़कियाँ अक्सर भूल जाती हैं कि इस घर में जो बहुत तेज़ चमकता है, उसे बुझा भी जल्दी दिया जाता है।" उन्होंने पान की पीक थूकी। "जाओ, आराम करो।"

तनवी अपने कमरे की तरफ़ लौटी, और पहली बार उस पूरे दिन में, अकेली हुई।

कमरा बहुत बड़ा था। बहुत ख़ाली। बग़ल का बिस्तर तीन रात से ख़ाली था। और उस ख़ामोशी में, अपनी जीत के बावजूद, तनवी को वही पुरानी तन्हाई घेरने लगी, वो तन्हाई जो इस घर ने उसे तीन साल दी थी। उसने अपने आप को एक अजीब, अनचाहे ख़याल पर पकड़ा, कि काश वो ठंडा, ख़ामोश आदमी लौट आता। कम से कम उसकी ख़ामोशी इस घर की मीठी मुस्कानों से कम ज़हरीली थी।

"पागल मत बन, तनवी," उसने ख़ुद से कहा। "वो भी उन्हीं में से एक है।"

पर मंडप वाली वो काँपती आँखें फिर उसके सामने आ गईं, और वो यक़ीन थोड़ा हिल गया।

वो अभी अपने कमरे तक पहुँची ही थी कि गलियारे में युवराज मिल गया, हाथ में दो प्याले लिए।

"भाभी।" उसने एक प्याला बढ़ाया। "नींद नहीं आ रही थी। सोचा आपके लिए भी ले आऊँ।"

तनवी ने प्याला लिया। कॉफ़ी। एक घूँट, और वो भीतर ही भीतर हल्की पड़ गई। चीनी थी इसमें। युवराज को उसकी पसंद नहीं पता थी। अच्छा है। एक तो ऐसा था इस घर में जो उसे नहीं जानता था।

"शुक्रिया।"

युवराज दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया, उसे उस आरामदेह तरीक़े से देखता हुआ जो ताक़तवर लोगों के पास होता है।

"आज मेज़ पर आपने मुझे चौंका दिया, भाभी," उसने धीरे से कहा। "इतनी छोटी छोटी बातें, इतने यक़ीन से। ऐसा लगा जैसे आप इस घर में बरसों से हों।"

"नए घर को जल्दी अपना बनाने की कोशिश है, बस।"

"हम्म।" वो मुस्कुराया, पर उसकी आँखें उस मुस्कान में शामिल नहीं हुईं। "पता है, जब मैंने आज आपको पहली बार देखा, तो एक अजीब सा एहसास हुआ। जैसे हम पहले मिल चुके हों।"

तनवी का दिल एक धड़कन के लिए रुका। "लखनऊ छोटा शहर है। किसी शादी में देखा होगा।"

"शायद।" वो सीधा हुआ, अपना ख़ाली प्याला उठाया। "आप मुझे किसी की बहुत याद दिलाती हैं, भाभी। किसी ऐसे इंसान की जिसे मैं बहुत पहले जानता था।" वो रुका, और बहुत नरमी से, लगभग फुसफुसाते हुए जोड़ा, "अजीब बात है ना। किसी से पहली बार मिलना, और लगना कि उसका हिसाब अभी बाक़ी है।"

और वो अँधेरे गलियारे में ग़ायब हो गया, अपनी हँसी पीछे छोड़ता हुआ।

तनवी वहीं खड़ी रह गई, हाथ में ठंडी कॉफ़ी का प्याला काँपता हुआ।

हिसाब अभी बाक़ी है।

वो सिर्फ़ बातें थीं। फिर वो ऐसे क्यों मुस्कुराया था, जैसे वो भी कोई राज़ जानता हो?

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