अध्याय 9 / 15
बदलता हुआ कल
फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi
तनवी और अरयन को एहसास होने लगता है कि उनका सबसे बड़ा हथियार, आने वाले कल का ज्ञान, अब भरोसे के लायक़ नहीं रहा। जो होना था वो बदल रहा है, और युवराज हर बार उनसे एक क़दम आगे है। एक तीखी ज़बानी जंग में दोनों एक दूसरे को टटोलते हैं, और तनवी एक ऐसी चाल चलती है जो युवराज का असली चेहरा एक पल को बेनक़ाब कर देती है।
जो सबसे डरावनी बात थी, वो ये नहीं थी कि युवराज उनसे आगे था। वो ये थी कि तनवी का नक़्शा ग़लत होने लगा था।
उस सुबह कोहरा अभी हवेली के आँगन में उतरा हुआ था। तनवी बरामदे में बैठी अख़बार पलट रही थी, और हर पन्ने के साथ उसकी साँस थोड़ी और भारी होती जा रही थी।
"ये नहीं हो सकता," उसने आख़िर अख़बार मेज़ पर पटका। "अरयन, ये देखो। सूरज सीमेंट का सौदा।"
अरयन ने चाय का प्याला नीचे रखा और झुककर देखा। "इसमें क्या है?"
"पिछली बार ये अप्रैल में हुआ था। मुझे पक्का याद है, क्योंकि उसी हफ़्ते मेरी सालगिरह थी, और इस घर में किसी को याद नहीं रही थी।" उसकी उँगली सुर्ख़ी पर टिकी थी। "पर ये तो अभी हो गया। तीन महीने पहले।"
अरयन ने अख़बार उठाया, और उसका चेहरा गंभीर हो गया। "और ये देखो। वो बैंक मर्जर, जो इस साल होना ही नहीं चाहिए था। मेरी ज़िंदगी में ये दो साल बाद हुआ था। यहाँ लिखा है, अगले महीने।"
तनवी धीरे से बैठ गई, उसकी आवाज़ में पहली बार सच्चा डर था।
"हमारा नक़्शा टूट रहा है, अरयन। जो हमें याद है, वो अब हो ही नहीं रहा। जितना हम चलते हैं, जितना युवराज चलता है, उतना ही आने वाला कल बदल रहा है। हमारा इकलौता हथियार हमारे हाथ से फिसल रहा है।"
"पर कुछ चीज़ें अब भी सही हैं," अरयन ने कहना चाहा।
"कब तक?" वो उसकी तरफ़ मुड़ी। "वो सबसे पुरानी एंट्री याद है, जो होने से बरसों पहले लिख दी गई थी? किसी ने ये पूरी कहानी पहले से पढ़ रखी है, अरयन। हमारी तरह। और वो उसे बदल रहा है। हर वो पन्ना जो हमें याद है, वो उसके हाथ में एक चाबी है, और हमारी अपनी चाबियाँ एक एक करके बेकार हो रही हैं।"
अरयन ने उसका ठंडा हाथ अपने हाथ में ले लिया।
"तो हम रुकेंगे नहीं। हम तेज़ चलेंगे। जब तक हमारे पास थोड़ा सा भी ज्ञान बचा है, उसे आज ख़र्च कर देंगे, कल पर नहीं छोड़ेंगे।"
"कहाँ से शुरू करें?"
"जगन्नाथ वाला पैसा।" अरयन की आवाज़ धीमी हुई। "अभी वो उस चैरिटी ट्रस्ट में रुका हुआ है, मंत्री के चुनावी फंड तक पहुँचने से पहले। अगले हफ़्ते उसी ट्रस्ट के बोर्ड की मीटिंग है। अगर हम बूढ़े सदस्यों के सामने साबित कर दें कि वो पैसा कहाँ से आ रहा है, तो पूरी साज़िश को बीच में ही रोक देंगे। इससे पहले कि वो भी बदल जाए।"
तनवी की आँखें फिर चमकीं। डर के नीचे, वो पुरानी धार लौट आई। "तो चलो।"
ट्रस्ट का दफ़्तर पुराने शहर की एक हवेलीनुमा इमारत में था, ऊँची छतें, दीवारों पर मरहूम बुज़ुर्गों की पीली पड़ती तस्वीरें। बोर्ड के सदस्य ज़्यादातर बूढ़े रईस थे, जो पान चबाते और एक दूसरे को "जनाब" कहकर बुलाते थे।
पर जब अरयन और तनवी अंदर पहुँचे, तो मेज़ के सिरे पर युवराज पहले से बैठा था। मुस्कुराता हुआ। जैसे उन्हीं का इंतज़ार कर रहा हो।
तनवी के क़दम एक पल को रुक गए। "वो यहाँ क्यों है?" उसने दबी आवाज़ में पूछा। "इस बोर्ड में तो उसका कोई पद नहीं।"
"था नहीं," अरयन फुसफुसाया।
"अब है," तनवी ने कहा।
"अरे, अरयन! भाभी!" युवराज बाँहें फैलाए उठ खड़ा हुआ। "क्या बात है। आप दोनों को अचानक चैरिटी में इतनी दिलचस्पी? आइए, बैठिए।"
तनवी जानती थी कि वो जितना रुकेगी, युवराज उतना ज़्यादा कमरे को अपने हाथ में कर लेगा। उसने इंतज़ार नहीं किया।
"बुज़ुर्गों, माफ़ कीजिए कि मैं सीधे मुद्दे पर आती हूँ।" उसकी आवाज़ साफ़ और स्थिर थी। "इस ट्रस्ट में पिछले साल बारह करोड़ रुपये आए। त्रिवेणी होल्डिंग्स से निकले पैंतालीस करोड़ में से ये पहली किश्त है। एक सीमेंट कंपनी से, फिर एक ट्रांसपोर्ट फ़र्म से होते हुए, फिर यहाँ। इतना पैसा, एक चैरिटी में, इतने घुमाव से। मैं एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ, और सीधा रास्ता होते हुए इतना टेढ़ा रास्ता इंसान तभी चुनता है जब उसे कुछ छिपाना हो। मैं बस इतना जानना चाहती हूँ, ये पैसा आख़िर जा कहाँ रहा है?"
कमरे में एक फुसफुसाहट उठी। दो बूढ़े सदस्यों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा। तनवी का दिल तेज़ हुआ। तीर निशाने पर लगा था।
"मेरी पत्नी ठीक कह रही हैं," अरयन ने धीरे से जोड़ा। "ये सवाल पूछा जाना चाहिए।"
पर युवराज हँस पड़ा। खुलकर, गर्मजोशी से, जैसे उसने कोई बहुत प्यारी बात सुनी हो।
"वाह, भाभी। क्या तैयारी है।" उसने पूरे बोर्ड की तरफ़ देखा, एक नरम, माफ़ करने वाली चमक के साथ। "बुज़ुर्गों, मुझे ख़ुशी है कि इस घर में कोई इन खातों पर इतना ध्यान देता है। तो लीजिए, मैं ख़ुद बताता हूँ।"
और उसने, बिना अटके, उस ट्रस्ट के खातों की एक मोटी फ़ाइल खोल दी, और एक एक पन्ना सबके सामने रखता गया। सीमेंट की रसीदें, ट्रांसपोर्ट का अनुबंध, दान की पर्चियाँ। हर रुपये का हिसाब, साफ़, बेदाग़।
पर सिर्फ़ ऊपर की परत। असली गंदगी कहीं गहरे दबी रही, जहाँ युवराज के अलावा किसी की नज़र नहीं पहुँच सकती थी।
"ये रहा आपका जवाब, भाभी," उसने मुस्कुराकर फ़ाइल बंद की। "हर पैसा ग़रीबों के लिए। अब मेरा एक सवाल है।" वो तनवी की तरफ़ मुड़ा, पर बोला पूरे बोर्ड से। "और भारी मन से, क्योंकि बात घर की है। हमारी नई बहू सी ए हैं। बहुत तेज़। इतनी तेज़ कि शादी को मुश्किल से कुछ हफ़्ते हुए हैं, और वो पहले से इस ख़ानदान के सबसे गुप्त खातों के पीछे पड़ी हैं। बोर्ड के बाहर। बिना इजाज़त के। रात के अँधेरे में फ़ाइलें खंगालते हुए।"
कमरे की हवा बदल गई। एक बूढ़े सदस्य ने भौंह उठाई।
"अब आप ही बताइए, सज्जनों," युवराज ने नरमी से कहा, "ये एक नई बहू का प्यार है? या किसी की रची हुई जासूसी? और अगर जासूसी है, तो किसके लिए? बाहर का कौन इस घर के अंदर का हिसाब इतनी बेचैनी से जानना चाहता है?"
और तनवी ने अपनी आँखों के सामने पूरे कमरे को मुड़ते देखा। एक पल पहले जो बूढ़ी आँखें युवराज पर शक कर रही थीं, अब फुसफुसाहट उसके पक्ष से उसके ख़िलाफ़ बह चली। वो जिसे बेनक़ाब करने आई थी, वो उसे ही कठघरे में खड़ा कर गया था।
"मैं सिर्फ़ सच जानना चाहती थी," तनवी ने कहा, उसकी आवाज़ में एक बारीक दरार थी।
"और सच आपके सामने है, भाभी," युवराज ने फ़ाइल की तरफ़ इशारा किया। "बस वो आपकी कल्पना जितना दिलचस्प नहीं निकला।" फिर वो उसके पास आया और बहुत नरमी से बोला, और वो नरमी एक चाक़ू थी। "आप आराम कीजिए। घर के मामले घर के बड़े संभाल लेंगे।"
अरयन एक क़दम आगे बढ़ा। "युवराज, ये जो तुमने अभी..."
"बस, अरयन।" युवराज ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा। "तू अपनी पत्नी को घर ले जा। आज बहुत हुआ।"
उस शाम तक बात बड़ी माँ के कानों तक पहुँच गई। नई बहू घर की जासूसी कर रही है, बोर्ड के सामने तमाशा बना है। रात के खाने पर किसी ने तनवी से सीधे बात नहीं की, पर हर ख़ामोशी एक इल्ज़ाम थी। तनवी की ज़मीन उसके पैरों के नीचे से थोड़ी और खिसक गई।
रात को, अपने कमरे में, अरयन उसके पास आकर बैठा। बाहर कोहरा खिड़की के शीशों पर जमा था।
"वो हमारी चाल जानता था," अरयन ने धीरे से कहा। "हमसे पहले। हम उस कमरे में पहुँचे भी नहीं थे, और उसने पूरा बोर्ड हमारे ख़िलाफ़ तैयार रखा था। जैसे ये सब वो लिख चुका हो, और हम बस उसकी पटकथा बोल रहे हों।"
"क्योंकि वो जानता है, अरयन।" तनवी खिड़की के पास खड़ी थी, धुंध में डूबे शहर को देखती हुई, मुट्ठियाँ भिंची हुईं। "ये सिर्फ़ चालाकी नहीं है। चालाक लोग जवाब सोचते हैं। ये पहले से जानता है। जैसे उसने ये सब... पहले देख रखा हो।"
"वर्मा को याद करो," उसने मुड़े बिना कहा। "ऑडिटर वर्मा। उसे ठीक उस दिन से पहले हटा दिया गया जिस दिन उसे वो गड़बड़ी पकड़नी थी। वो लिखावट, उस वक़्त की जब हमारा रिश्ता तय भी नहीं हुआ था। हर बार वो हमसे एक क़दम नहीं, एक पूरी ज़िंदगी आगे है।"
"तनवी।" अरयन ने उसका कंधा छुआ। "मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो। और मैं नहीं चाहता कि तुम वो करो।"
वो उसकी तरफ़ मुड़ी। "मुझे उसे टटोलना होगा। मुझे पक्का करना होगा कि वो वही है जो मुझे लगता है।"
"ये ख़तरनाक है। अगर उसे पता चल गया कि तुम जानती हो, तो तुम उसके लिए एक ख़तरा बन जाओगी। और वो आदमी ख़तरों के साथ क्या करता है, ये हम दोनों जानते हैं।"
तनवी ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया। उसकी आँखों में सख़्ती के पीछे एक नरमी थी।
"मैं एक बार पहले ही मर चुकी हूँ, अरयन," उसने धीरे से कहा। "उस ठंडी कोठरी में, अकेली, जहाँ तुम एक पल देर से पहुँचे थे। उस मौत ने मुझसे सब छीन लिया, पर एक चीज़ दे भी गई। मुझे डराना अब आसान नहीं रहा।"
अरयन ने अपना माथा उसके माथे से लगाया। कुछ पल वो बस ऐसे ही खड़े रहे, और उस ठंडे कमरे में उनके बीच की हरारत ही इकलौती गर्म चीज़ थी।
"पिछली बार मैं एक पल देर से पहुँचा," उसने उसके बालों में फुसफुसाया। "इस बार एक पल भी पीछे नहीं रहूँगा। तुम उसे टटोलो, पर मैं उस अँधेरे में वहीं रहूँगा, हर पल।"
"मुझे पता है," उसने आँखें बंद कर, उसकी छाती से लगकर कहा। "तुम्हीं तो वो वजह हो जिसके बूते मैं ये कर पा रही हूँ।"
कुछ पल वो बस उससे लिपटी रही। फिर, उस भारीपन को थोड़ा हल्का करने को, उसने सिर उठाया और हल्के से मुस्कुराई। "एक बात कहूँ? दो जन्मों में मैंने यही सीखा है। हर मुसीबत एक बैलेंस शीट है। एक तरफ़ डर, दूसरी तरफ़ तुम। और हिसाब, अजीब तरह से, बराबर बैठ जाता है।"
अरयन धीरे से हँसा, उस ठंडे कमरे की पहली हल्की आवाज़। "तुम दुनिया की इकलौती औरत हो जो मोहब्बत का भी ऑडिट कर सकती है।"
"और तुम इकलौते मर्द हो जो इससे डरने के बजाय मुस्कुरा रहे हो।"
"पिछली बार डरता था।" उसने उसका माथा चूमा। "इस बार सीख गया हूँ। तुम्हारे हिसाब में एक ख़ाना हमेशा मेरे लिए ख़ाली रहता है।"
उसे मौक़ा अगली शाम मिला, हवेली की छत पर, जहाँ युवराज अकेला खड़ा सिगार पी रहा था। लखनऊ की सर्द रात नीचे फैली थी, पुराने शहर की रोशनियाँ कोहरे में काँप रही थीं, और कहीं दूर किसी शादी की शहनाई हवा में तैर रही थी।
तनवी धीरे से उसके पास गई।
"भाई साहब। आज बोर्ड में आपने मुझे अच्छा सबक़ सिखाया।"
युवराज ने धीरे से धुआँ छोड़ा, और वो कोहरे में जाकर घुल गया। "बुरा मत मानिए, भाभी।" वो मुस्कुराया, पर उसकी तरफ़ देखा नहीं। "आप समझदार हैं। समझ जाएँगी कि इस घर में कुछ रास्ते बंद होते हैं, और जो उन पर चलता है, वो दीवार से टकराता है।"
"या फिर वो रास्ता पहले से किसी ने बंद कर रखा होता है," तनवी ने हल्के से कहा, धुंध को देखते हुए, "उसके वहाँ पहुँचने से भी पहले।"
युवराज की सिगार एक पल को ठहरी। फिर चल पड़ी। "आप पहेलियों में बात करती हैं, भाभी।"
"आपसे सीखा। आप भी तो हर बात ऐसे कहते हैं जैसे उसका जवाब आपको पहले से पता हो। आज बोर्ड में भी, हर पन्ना तैयार, हर सवाल का जवाब हाथ में। जैसे आपको पता था कि मैं क्या पूछूँगी, इससे पहले कि मैं ख़ुद जानती।"
"तजुर्बा, भाभी।" उसने कंधे उचकाए। "उम्र के साथ इंसान लोगों को पढ़ना सीख जाता है। बस अंदाज़ा हो जाता है।"
"अंदाज़ा," तनवी ने दोहराया। "बस इतना ही?"
"और क्या?" वो पहली बार उसकी तरफ़ मुड़ा, मुस्कुराता हुआ। "मैं कोई जादूगर तो नहीं, भाभी, जो आने वाला कल देख लूँ।"
"नहीं," उसने धीरे से कहा। "बेशक नहीं।"
कुछ पल ख़ामोशी रही। शहनाई की धुन तैरती रही। फिर युवराज ने बहुत आराम से, जैसे मौसम की बात कर रहा हो, अपना तीर चलाया।
"वैसे, एक सलाह दूँ?" उसने सिगार की राख रेलिंग पर झाड़ी। "अपने पिताजी का ख़याल रखिए। सुना है दिल के मरीज़ हैं। ऐसे लोगों को कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता।"
तनवी का दिल रुक गया।
उसके पापा के दिल की बीमारी की बात इस घर में किसी को नहीं पता थी। अभी तो ख़ुद उसके पापा को भी नहीं पता था। वो बीमारी तो आने वाले सालों में सामने आनी थी।
पर युवराज जानता था। आगे का। बरसों आगे का।
ठीक है, उसने सोचा, और उसके भीतर का डर अचानक ठंडे, सख़्त इरादे में बदल गया। अब मेरी बारी।
"शुक्रिया, फ़िक्र के लिए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अजीब तरह से शांत थी। "बदले में मैं भी आपको एक सलाह दूँ।"
तनवी ने अपना पासा फेंका, एक ऐसी बात जो सिर्फ़ कोई लौटकर आया इंसान जान सकता था।
"सूरज सीमेंट के शेयर अभी बेच दीजिए। अगले मानसून में उस बाँध वाले प्रोजेक्ट में जो हादसा होगा, उसके बाद वो शेयर औंधे मुँह गिरेंगे। बहुत लोग बर्बाद होंगे।" उसने सीधे उसकी आँखों में देखा। "पर आपको तो ये पता ही होगा। है ना?"
युवराज का हाथ, सिगार को होंठों तक ले जाता हुआ, हवा में एक पल को रुक गया।
बस एक पल। एक धड़कन। पर तनवी ने उसे देखा। उन ठंडी, हमेशा मुस्कुराती आँखों में, एक चीज़ कौंधी, पहचान, चौंकना, वो डर जो सिर्फ़ तब आता है जब कोई आपके सबसे गहरे राज़ के पास से गुज़र जाए।
फिर वो ग़ायब हो गई।
"क्या बात है, भाभी," उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ रेशम जैसी, पर उसके नीचे अब कुछ धारदार था। "आप तो भविष्य बताने लगीं। बाँध, मानसून, हादसा। इतना यक़ीन से, जैसे आपने सब देख रखा हो।"
वो उसकी तरफ़ मुड़ा, और पहली बार, उसकी मुस्कान में कोई गर्मजोशी नहीं थी। सिर्फ़ बर्फ़।
"पर एक बात का ध्यान रखिएगा," उसने उसके बहुत पास झुकते हुए कहा। "जो लोग बहुत आगे का देख लेते हैं, वो अक्सर भूल जाते हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहराना पसंद करता है। और हम नहीं चाहेंगे ना, भाभी, कि इतिहास ख़ुद को दोहराए?"
तनवी का ख़ून जम गया।
वो जानता था। किसी न किसी तरह, वो जानता था।
और वो अभी अभी मुस्कुराते हुए, उसकी मौत की धमकी दे गया था।
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