अध्याय 10 / 15
आख़िरी बार जैसा
फिर वही फेरे द्वारा Avni Oberoi
युवराज जाल को तेज़ कर देता है। एक मनगढ़ंत संकट में तनवी को फिर वही झूठे काग़ज़ दस्तख़त करने के कगार पर ला खड़ा किया जाता है, ठीक वैसे जैसे पिछली बार हुआ था। अरयन उसे बचाता है, पर इसकी क़ीमत चुकाता है। और फिर युवराज अकेले में अपना नक़ाब उतार देता है, और जो सच सामने आता है, वो तनवी की रही सही उम्मीद भी छीन लेता है।
संकट उसी हफ़्ते आया, इतना असली कि एक पल को तनवी भूल गई कि उसने ये सब पहले जिया है।
सुबह के दस बजे राणा ग्रुप की त्रिवेणी से जुड़ी एक फ़र्म पर अचानक आयकर विभाग का छापा पड़ा। पूरी हवेली में भूचाल आ गया।
और इस तूफ़ान के बीचोंबीच बड़ी माँ अपनी कुर्सी पर पत्थर सी शांत बैठी थीं, ख़ुद इस तूफ़ान की आँख।
"बस करो ये शोर," उन्होंने धीरे से कहा, और कमरा चुप हो गया। उनकी नज़र तनवी पर टिकी। "तनवी सी ए है। ये उसका काम है। वो जाएगी, और वो काग़ज़ ठीक करेगी। आज रात तक।"
"बड़ी माँ," अरयन आगे बढ़ा, "ये काम कंपनी के वकील..."
"वकील काग़ज़ पर दस्तख़त नहीं कर सकते, बेटा। एक ज़िम्मेदार सी ए कर सकती है।" उनकी आवाज़ ज़रा भी नहीं बदली, पर उसमें कोई दरार नहीं थी। "ये घर की बहू है। आज ये साबित करेगी कि वो आख़िर किस काम की है। नहीं तो इस ख़ानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी, और वो मिट्टी इसी के हाथों उठेगी।"
ये छापा कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, वही पुराना जाल था, बस इस बार दो साल पहले बुना गया। कोई चाहता था वो जल्दी, बहुत जल्दी, ख़त्म हो जाए।
उसे ऊपर के एक कमरे में, फ़ाइलों के बीच, अकेली बिठाया गया। दरवाज़ा जान बूझकर अधखुला छोड़ा गया, ताकि वो बरामदे के अफ़सरों की परछाइयाँ देख सके। क़रीने से रखा हुआ दबाव।
युवराज का ख़ास मुनीम उसके सामने बैठा, और एक एक काग़ज़ आगे सरकाता गया।
"बस यहाँ दस्तख़त कर दीजिए, बहूरानी।" वो मीठेपन से बोला, जगह दिखाते हुए। "और यहाँ। ये पिछले साल का हिसाब है, बस थोड़ा अधूरा रह गया था। आपके दस्तख़त से सब क़ानूनी हो जाएगा। दस मिनट का काम है।"
तनवी ने काग़ज़ों पर नज़र डाली, और उसका ख़ून जम गया।
वही काग़ज़। वही झूठी एंट्रियाँ। वही त्रिवेणी होल्डिंग्स। बस तारीख़ें बदली थीं। उसने ये पन्ने पहले देखे थे, उस अदालत में, जब वकील कहता था, "ये देखिए, जज साहब, इस औरत के दस्तख़त।" आज दस्तख़त करते ही कंपनी के सारे गुनाह उसके नाम हो जाते। वो फिर से वही बकरा बन जाती।
उसने क़लम को छुआ तक नहीं।
"मुझे इन्हें पढ़ने का वक़्त चाहिए," उसने कहा, अपनी आवाज़ स्थिर रखने की कोशिश करते हुए।
"वक़्त?" मुनीम हँसा, पर उसकी मुस्कान अब सख़्त थी। "बहूरानी, अफ़सर बाहर बैठे हैं। हर मिनट जो आप पढ़ने में लगाएँगी, वो उन्हें शक़ देगा। और ये बड़ी माँ का सीधा हुक्म है।"
"मैं एक सी ए हूँ। मैं बिना पढ़े किसी काग़ज़ पर दस्तख़त नहीं करती।"
"आज करेंगी।" उसकी आवाज़ का मीठापन एक परत की तरह उतर गया। "क्योंकि अगर आज आपने नहीं किए, तो ये पूरा परिवार जेल जाएगा। बड़ी माँ। अरयन साहब। आप भी।" वो ज़रा सा आगे झुका। "और सुना है आपके पिताजी की तबीयत भी आजकल ठीक नहीं रहती। दिल के मरीज़ हैं ना? ऐसी ख़बरें, इतना तनाव, उनके दिल के लिए अच्छा नहीं होता, बहूरानी।"
और बस। वो उसके पापा को बीच में ले आया था।
तनवी के कानों में एक भिनभिनाहट उठी। पिछली बार भी ठीक यही हुआ था। एक मीठी आवाज़, एक काग़ज़, एक घुमा कर दी गई धमकी। कमरा छोटा होने लगा।
और उसका हाथ, अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, क़लम की तरफ़ बढ़ने लगा।
बस एक दस्तख़त, उसके अंदर एक थकी हुई आवाज़ फुसफुसाई, और ये कमरा, ये अफ़सर, ये डर, सब ख़त्म। बस एक बार और। आख़िरी बार जैसा।
उसकी उँगलियाँ ठंडी क़लम पर पड़ीं। उसने उसे उठाया। उसका हाथ काँपा, और एक नन्ही सी काली बूँद उस ख़ाली जगह के पास गिरी जहाँ उसका नाम जाना था।
और तभी दरवाज़ा पूरा खुला।
"रुको।"
एक ही लफ़्ज़, और तनवी का हाथ हवा में जम गया, क़लम की नोक काग़ज़ से बस एक बाल भर दूर।
अरयन दरवाज़े पर खड़ा था, और उसके पीछे आयकर विभाग के दो अफ़सर, अरयन के अपने बुलाए हुए।
अरयन तेज़ क़दमों से अंदर आया और बहुत नरमी से तनवी के हाथ से क़लम ले ली।
"तुम इन पर दस्तख़त नहीं करोगी," उसने धीरे से कहा। फिर वो सीधा हुआ, और उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी।
"ये सब झूठे काग़ज़ हैं। हर एक एंट्री गढ़ी हुई है। ये छापा कोई जाँच नहीं, एक नाटक है, मेरी पत्नी को फँसाने के लिए रचा गया। और रचने वाला कोई बाहरी नहीं, मेरे ही ख़ानदान का एक आदमी है।" उसने अफ़सरों की तरफ़ देखा, और एक पल रुका। "मैं, अरयन राणा, इस कंपनी का निदेशक, अपने ही परिवार के ख़िलाफ़ इसकी गवाही दूँगा। सरकारी गवाह बनकर। आज। अभी।"
वो जानती थी इस एक वाक्य की क़ीमत क्या थी। अपने ही ख़ानदान के ख़िलाफ़ सरकारी गवाह, इस घर में इससे बड़ा कोई गुनाह नहीं था।
"अरयन, नहीं," वो फुसफुसाई। "इस तरह नहीं। तुम नहीं जानते तुम क्या कर रहे हो।"
"मैं ठीक जानता हूँ तनवी।" उसने उसकी आँखों में देखा। "और कोई तरीक़ा नहीं बचा है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। मुनीम का चेहरा फ़क़ पड़ गया। उसने काँपते हाथों से काग़ज़ समेटे और कमरे से निकल भागा।
उस रात तनवी बच गई। पर उसकी असली क़ीमत अगली सुबह सामने आई।
बड़ी माँ ने पूरे परिवार को बड़े दालान में बुलाया। पूरा ख़ानदान खड़ा था। अरयन बीच में अकेला, जैसे किसी कठघरे में। और बड़ी माँ अपनी कुर्सी पर, पत्थर की किसी मूरत की तरह।
"मेरे पोते ने," उनकी आवाज़ इतनी शांत थी कि किसी चीख़ से ज़्यादा डरावनी लगी, "कल रात अपने ही घर की देहरी पर, बाहर के अफ़सरों को बुलाया। अपने ही ख़ानदान की पगड़ी, सरेआम, अजनबियों के पैरों में रख दी।" उन्होंने दालान पर नज़र घुमाई। "इस घर में सौ साल से कोई सिर बाहर वालों के सामने नहीं झुका। मेरे अपने पोते ने कल वो भी कर दिखाया।"
"मैंने एक बेगुनाह को बचाया, बड़ी माँ," अरयन ने कहा। उसकी आवाज़ काँपी नहीं। "अपनी पत्नी को। जिसे इसी घर के एक आदमी ने जान बूझकर फँसाने की साज़िश रची।"
"तूने अपने ख़ून को धोखा दिया।" बड़ी माँ की आवाज़ ज़रा भी ऊँची नहीं हुई, और यही सबसे ख़ौफ़नाक था। "एक औरत के लिए। एक ऐसी औरत के लिए जो इस घर में एक ख़ास मक़सद से लाई गई थी।"
तनवी से रहा नहीं गया। "मक़सद?" उसने कहा, उसकी आवाज़ काँपती हुई, पर तीखी। "कौन सा मक़सद, बड़ी माँ? मुझे बकरा बनाने का?"
बड़ी माँ ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। उनकी नज़र पोते पर थी, और पहली बार उन्होंने सीधे उसकी आँखों में देखा।
"मैंने तुझे पाला, बेटा। अपने हाथों से। तेरी हर ज़िद को सही माना, तेरे हर ऐब को अपना समझा।" एक पल को उनकी आवाज़ में कुछ काँपा, फिर वो फिर से पत्थर हो गई। "पर एक माँ जब अपने बेटे और अपने घर में से किसी एक को चुनती है, तो वो घर चुनती है। हमेशा घर चुनती है। क्योंकि बेटे आते जाते रहते हैं। घर रह जाता है।"
वो धीरे धीरे खड़ी हुईं, और पूरा दालान साँस रोककर रह गया।
"आज से, अरयन राणा का इस कंपनी के किसी फ़ैसले से कोई वास्ता नहीं। कोई पद नहीं। कोई दस्तख़त नहीं। कोई हक़ नहीं।" हर लफ़्ज़ एक कील की तरह गिरा। "कारोबार की पूरी बागडोर, इस घर की हर चाबी, आज से, युवराज के हाथ में।"
अरयन ने सिर नहीं झुकाया, सीधा अपनी दादी की पत्थर आँखों में देखता रहा। पर तनवी ने सिर्फ़ एक चीज़ देखी, उसके जबड़े की एक काँपती नस। उसने अभी अभी अपना नाम, अपनी पहचान, अपनी ताक़त, सब खो दिया था। सिर्फ़ इसलिए, ताकि वो बच जाए।
और दालान के एक कोने में, युवराज हल्के से मुस्कुरा रहा था। किसी ने नहीं देखा। सिर्फ़ तनवी ने।
बाद में रात को, जब सारा घर सो गया, तनवी ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया।
"मैंने तुमसे ये क़ीमत चुकाने को नहीं कहा था," वो धीरे से बोली। "तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी, एक पल में... मेरे लिए जला दी।"
"तुम्हें कहने की ज़रूरत नहीं थी।" अरयन की आवाज़ थकी थी, पर उसमें कोई पछतावा नहीं था। "पिछली बार मेरे पास सब कुछ था, तनवी। ताक़त, पद, नाम, पूरा राणा साम्राज्य मेरे एक इशारे पर था। और उन सबके होते हुए भी, मैं उस ठंडी कोठरी में तुम्हें मरने से नहीं बचा पाया। मैं एक पल देर से पहुँचा था। सिर्फ़ एक पल।"
"इस बार मेरे पास कुछ नहीं है। न पद, न नाम, न ताक़त। और शायद... शायद इसी 'कुछ नहीं' से मैं तुम्हें बचा लूँ। क्योंकि जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता, उसे डराया नहीं जा सकता।"
तनवी की आँखें भर आईं। उसने उसका माथा अपने माथे से लगा लिया। दो लोग जो दो ज़िंदगियों में एक दूसरे को खो चुके थे, और अब भी खोने से डरते थे।
अरयन ने उसका माथा चूमा और ज़रा पीछे हटा, उसकी आँखों में वो ठंडी सच्चाई लौट आई।
"पर एक बात सच है, तनवी। अब हम कमज़ोर हैं। मेरे हाथ से सब निकल गया। और वो," उसने रुककर कहा, "वो अब इस घर का राजा है। आज से, हम उसके रहम पर हैं।"
उसी रात, जब हवेली की सारी रोशनियाँ बुझ गईं, तनवी अकेले बाग़ में टहलने निकली। जनवरी की धुंध झाड़ियों पर जमी थी। और वहीं, सूखे फ़व्वारे के पास, अँधेरे में, युवराज खड़ा था, जैसे उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
"बधाई हो, भाभी।" उसने शराब का गिलास घुमाया, और बर्फ़ खनकी। "आज आप बच गईं। और कैसे बचीं। अरयन ने अपनी पूरी ज़िंदगी जला दी, बस आपके एक दस्तख़त को रोकने के लिए। पद, नाम, ताक़त, सब राख। कितना रोमांटिक।"
"मैं अंदर जा रही हूँ," तनवी ने कहा, और मुड़ी।
"पर एक बात मेरी समझ में नहीं आई।" उसकी आवाज़ ने उसे रोक लिया, शांत। "आपको कैसे पता था कि वो काग़ज़ झूठे हैं, इससे पहले कि आप उन्हें पढ़तीं? और उस रात छत पर, आपको कैसे पता था कि मानसून में वो बाँध टूटेगा? सूरज सीमेंट औंधे मुँह गिरेगा? आपको वो सब कैसे पता था, भाभी, जो अभी हुआ ही नहीं?"
"होशियार लोग अंदाज़ा लगा लेते हैं," तनवी ने कहा।
"अंदाज़ा।" युवराज एक क़दम पास आया, और उसकी आवाज़ बदल गई, वो रेशमी, जवान आवाज़ अचानक पुरानी हो गई, थकी हुई, भारी, किसी बहुत बूढ़े आदमी की आवाज़ की तरह। "नहीं, भाभी। अंदाज़ा नहीं। तुमने ये सब पहले देखा है। ठीक मेरी तरह।"
"तुम पागल हो," उसने फुसफुसा कर कहा।
"हाँ?" वो मुस्कुराया, और उसकी आँखों में एक पूरी ज़िंदगी का अँधेरा था। "तो फिर बताओ, मैं भी लौटकर आया हूँ, तुमसे भी पुरानी कहानी लेकर। तुम जवान मरी थीं, उस जेल में, सत्ताईस की उम्र में। पर मैं? मैं बूढ़ा हुआ। मैंने ये पूरा साम्राज्य बनाया, तुम्हारी लाश पर। और फिर मैंने इसे अपनी आँखों के सामने ढहते देखा, दशकों बाद। एक नई जाँच, नए सबूत, और वो सब किसी न किसी तरह घूम फिर कर तुम पर आ टिकता था, तुम्हारी छोड़ी हुई किसी कड़ी पर, तुम्हारे बाप की किसी गवाही पर। मैं एक बर्बाद, बेइज़्ज़त, अकेला बूढ़ा आदमी मरा, सब कुछ खोकर। तुम्हारी ही तरह।"
"नहीं।" तनवी पीछे हटी, उसका सिर हिल रहा था। "ये नहीं हो सकता। तुम नहीं। कोई और, पर तुम नहीं।"
"क्यों नहीं मैं?" उसने अपना गिलास एक ही घूँट में ख़ाली किया। "जब तुम लौट सकती हो, जब अरयन लौट सकता है, तो मैं क्यों नहीं? बस फ़र्क़ इतना है, भाभी, कि तुम दोनों आधी आधी कहानी लेकर आए हो। और मैं पूरी।" वो ज़रा और पास आया। "तो इस बार मैंने तय किया, इस बार जड़ ही नहीं छोड़ूँगा।"
"और तुम्हें लगता है मैं चुपचाप बैठ कर ये होने दूँगी?" तनवी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ काँपी नहीं। "एक बार मार चुके हो मुझे। दुबारा इतना आसान नहीं होगा।"
युवराज धीरे से हँसा। वो उसकी आँखों में झुका, और उसकी मुस्कान अब एक क़ातिल की मुस्कान थी।
"पिछली बार तुम्हें सिर्फ़ फँसाया गया था। तुम सालों बाद, धीरे धीरे, घुट घुट कर मरी थीं। इस बार इतना इंतज़ार नहीं होगा।" उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट तक गिर गई। "इस बार तुम इस साल के ख़त्म होने से पहले मर जाओगी। और इस बार, कोई कड़ी नहीं बचेगी। न कोई काग़ज़, न कोई गवाह, न तुम्हारे बाप की कोई गवाही। कुछ नहीं।"
उसने अपना ख़ाली गिलास बाग़ की दीवार पर रख दिया। फिर रुका, जैसे जाते जाते कोई आख़िरी बात याद आ गई हो।
"और एक बात, भाभी। तुम्हें लगता है तुम्हारे पास वो नक़्शा है जो मेरे पास है? नहीं।" उसने सिर हिलाया, तरस खाते हुए। "मैंने इस पूरी कहानी का अंजाम देखा है। ऊपर से। हर तरफ़ से। सिंहासन पर बैठकर। मुझे पता है ये कहानी कहाँ कहाँ मुड़ती है, कौन कब गिरता है, कौन सा पत्ता कब चलना है। और तुमने? तुमने सिर्फ़ अपना एक छोटा सा, अँधेरा कोना देखा। एक कोठरी की चार दीवारें। तुम मेरे सामने एक अंधे की तरह लड़ रही हो, और सोच रही हो कि तुम देख सकती हो।"
वो मुड़ा और धुंध में ओझल होने लगा। उसकी आवाज़ पीछे तैरती रही।
"मीठे सपने, भाभी।"
और तनवी अकेली खड़ी रह गई, उस सूने बाग़ में, उस भयानक सच के साथ जो उसके सीने पर पत्थर सा बैठ गया था।
उनका दुश्मन भविष्य जानता था। उनसे ज़्यादा। उनसे कहीं ज़्यादा।
और इस बार, मौत की कोई तारीख़ तय नहीं थी। बस एक मियाद थी। साल के ख़त्म होने से पहले।
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