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अध्याय 11 / 15

टूटा भरोसा

नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi

पीतल ठंडा था, और आन्या की हथेली गरम। बस यही एक फ़ासला बारह साल के एक राज़ और सारी दुनिया के बीच बचा था।

उसकी उँगलियाँ हैंडल पर थीं, पर घूमी नहीं। उस बंद दरवाज़े के पीछे एक आदमी जाग रहा था, और उसे बस एक वाक्य चाहिए था, ताकि वो उस लुटे हुए बेटे को ठीक उन्हीं हाथों में सौंप दे जिन्होंने उसके बाप को राख किया था। एक वाक्य, और उसकी क़सम पूरी।

फिर आन्या ने अपना हाथ हैंडल से उठा लिया। उस तरह नहीं जैसे कोई किसी गरम चीज़ से हाथ खींचता है, बल्कि उस तरह जैसे कोई एक बोझ नीचे रख देता है जो हलका इसलिए नहीं हुआ कि वो उठा नहीं सकती थी, बल्कि इसलिए कि उसे उठा कर जिस तरफ़ जाना था, वो रास्ता उसे क़बूल नहीं था।

उसने वो दरवाज़ा शौर्य पर तरस खा कर नहीं छोड़ा, न इसलिए कि उसके झूठ माफ़ हो गए थे। उसने इसलिए छोड़ा क्योंकि उस लकड़ी के पार जो इंसाफ़ रखा था, वो इंसाफ़ नहीं था, सिर्फ़ बदले का एक उल्टा रुख़ था। और उसने उम्र भर एक बात सीखी थी, कि एक झूठ को दूसरे झूठ से नहीं काटा जाता।

पर इसका मतलब ये नहीं था कि वो उसकी हो गई।


शौर्य उसी जंग के कमरे में था, जहाँ अब भी मेहता की मोहलत के आख़िरी घंटे काग़ज़ों के ढेर पर बिखरे थे। वो खिड़की के पास खड़ा था, पीठ दरवाज़े की तरफ़, और दरवाज़ा खुला तो वो मुड़ा नहीं। आहट से जान गया था कि कौन है।

"तुमने बृज को नहीं बताया," उसने धीरे से कहा।

"नहीं।" आन्या ने दरवाज़ा अपने पीछे बंद किया। "और तुम अपने आप को ये मत समझाना कि ये तुम्हारे लिए था।"

शौर्य पलटा। बारह हफ़्ते की वो दीन वर्दी अब भी उसके बदन पर थी, पर उसके नीचे का आदमी अब छुपा नहीं था।

"फिर किसके लिए था?"

"मेरे लिए।" उसकी आवाज़ थकी थी। "मैं उस कमरे में जा कर एक बेगुनाह के बेटे को उन क़ातिलों के हवाले कर सकती थी, और फिर ज़िंदगी भर आईने में एक ऐसी औरत को देख सकती थी जिसने इंसाफ़ के नाम पर वही किया जो बारह साल पहले बृज के बाप ने किया था। मैंने वो दरवाज़ा तुम्हें बचाने के लिए नहीं छोड़ा, शौर्य। अपने आप को बचाने के लिए छोड़ा।"

शौर्य कुछ नहीं बोला।

"पर अब मेरी बात ध्यान से सुनो।" वो उसके सामने आई। "बारह हफ़्ते मैं तुम्हारे एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हुई, बिना जाने। मेरी हर जीत के पीछे तुम्हारा चुपका हाथ था, और मुझे लगता रहा मैं ये लड़ाई ख़ुद लड़ रही हूँ। वो आज से बंद। मैं तुम्हारा हथियार नहीं बनूँगी, शौर्य। न जान कर, न अनजाने। तुम गरुड़ बन कर इस होटल को निगलोगे, तो उस मेज़ पर मैं तुम्हारे साथ नहीं बैठूँगी।"

"और मेरी तरफ़?" उसने पूछा।

"तुम्हारी तरफ़ भी नहीं।" उसने सिर हिलाया। "मैं तुम्हें बृज के हवाले नहीं करूँगी, पर तुम्हारे गुनाह पर परदा भी नहीं डालूँगी। मैं बीच में खड़ी हूँ, एक ऐसी जगह जहाँ दोनों तरफ़ से तीर आते हैं।"


"तो तुम मुझे बचाने नहीं आई," शौर्य ने आख़िरकार कहा। "और मेरे साथ खड़े होने भी नहीं। फिर आई क्यों हो?"

"एक सवाल पूछने।" उसने एक काँपती साँस ली। "वो सवाल, जिसका जवाब तुमने बारह साल में ख़ुद को नहीं दिया। तुम्हें असल में चाहिए क्या, शौर्य? इंसाफ़? या बस ये पूरा महल, ये पूरा ख़ानदान, जला कर राख कर देना?"

"मेरे बाप का नाम..."

"मैं तुम्हारे बाप के नाम की बात नहीं कर रही।" उसने उसे काटा। "वो नाम लॉबी की दीवार पर वापस लगाने में मैं ख़ुद तुम्हारा हाथ बँटाऊँगी, अगर वो सच है, और मुझे यक़ीन है वो सच है। इंसाफ़ एक साफ़ काम है। एक झूठ उघाड़ो, एक बेगुनाह का नाम लौटाओ, एक मुजरिम को सज़ा दो। बृज को। करण को। मैं तुम्हारे साथ हूँ। पर तुम सिर्फ़ इतना नहीं चाहते, है ना?"

शौर्य की जबड़े की हड्डी कसी।

"तुम पूरा महल गिराना चाहते हो।" आन्या ने हर लफ़्ज़ एक कील की तरह रखा। "गरुड़ का जो काग़ज़ तुमने भेजा, वो सिर्फ़ बृज को नहीं काटता। उसमें लिखा है, स्टाफ़ की पुनर्संरचना। ग़ैर-ज़रूरी परिसंपत्तियों की बिक्री। चार सौ लोग। तुमने अपने बाप के लिए जो आग जलाई है, उसने बारह साल बाद आँखें खोलीं, और उसे नहीं दिखता कि नीचे कौन खड़ा है। आग हिज्जे नहीं पढ़ती, शौर्य। वो नहीं पूछती कि जिस छत को वो चाट रही है, उसके नीचे एक ज़ालिम है या एक बेगुनाह।"

"वो लोग..." उसने शुरू किया।

"फेकू काका।" उसने वो नाम मेज़ पर एक सबूत की तरह रखा। "जिसने इस होटल की नींव की ईंट अपने हाथ से उठाई थी। तुम्हारे गरुड़ की 'ग़ैर-ज़रूरी परिसंपत्ति।' बिट्टू, जो तुम्हें भाई कहता है, जिसका घर उसकी तनख़्वाह पर टिका है। और ऊपर वो बूढ़ी औरत, अपने दीये के साथ, जिसने तुम्हारा चेहरा पहचान कर तुम्हें बृज के हवाले नहीं किया। दादी। तुम्हारी आग में वो भी है। तुम एक क़ब्र गरम करने के लिए चार सौ ज़िंदा छतें जला दोगे, और अपने आप से कहोगे कि ये इंसाफ़ था।"


शौर्य ने उसकी तरफ़ देखा, और बारह साल में पहली बार उसके पास कोई नापा-तौला जवाब नहीं था।

"मैंने ये आग नहीं चुनी, आन्या," उसने नीची आवाज़ में कहा। "ये उन्होंने जलाई। उस रात। मैं सात साल का था, और मैंने अपने बाप को राख के सामने टूटते देखा।"

"नहीं।" आन्या की आवाज़ अचानक नरम हुई, और यही नरमी सबसे ज़्यादा चुभी। "तुमने वो आग नहीं जलाई, ये सच है। पर उसे बुझाने के बजाय तुमने उसे अपने सीने में पाला। बारह साल रोज़ खिलाया, रोज़ बड़ा किया। और अब वो इतनी बड़ी है कि तुम ख़ुद नहीं जानते वो कहाँ रुकेगी। मैं ये नहीं पूछ रही कि आग किसने जलाई। मैं ये पूछ रही हूँ कि अब उसे बुझाने वाला कौन है। तुम वो आदमी हो, या तुम भी एक और आदमी हो जो आग को अपना औज़ार समझता है, ठीक बृज के बाप की तरह?"

शौर्य ने आँखें झुका लीं। और ये ख़ामोशी, जो बारह साल उसकी सबसे बड़ी ढाल थी, आज उसके ख़िलाफ़ एक गवाही बन गई।

"देखा?" आन्या फुसफुसाई, और उसकी आँखें भर आईं। "तुम्हारे पास इसका जवाब नहीं है। और यही वो जवाब है जिससे मैं डर रही थी।"

वो उसके बहुत पास खड़ी थी, इतने पास कि उस बारिश वाली रात की याद उन दोनों के बीच एक तीसरे इंसान की तरह खड़ी थी। पर अब उस याद का रंग बदल चुका था।

"वो बारिश अब भी मेरी हथेली में है, शौर्य।" उसका हाथ एक पल को उठा, उसके चेहरे की तरफ़, फिर बीच रास्ते रुक गया। "पर अब वो जलाती है। तुमने मुझे उस रात थामा था, और मैं तुम्हारा ही हाथ पकड़ कर उस गरुड़ को तोड़ने की क़सम खा रही थी जो तुम थे। तुमने मुझे चूमा था, और तुम जानते थे मैं किसे चूम रही हूँ, और मैं नहीं जानती थी। सबसे बुरा धोखा ये नहीं था कि तुमने झूठ बोला। सबसे बुरा ये था कि उस पल भी, जब हम सबसे क़रीब थे, तुम अकेले थे, और मैं अंधी।"

"वो पल झूठ नहीं था।" पहली बार उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "मेरी पूरी बिसात में एक तुम थीं जिसका कोई ख़ाना नहीं था। तुम मेरी चाल नहीं थीं, आन्या।"

"शायद नहीं।" उसने एक टूटी हँसी हँसी। "पर अब मैं किसी भी पल पर यक़ीन नहीं कर सकती, क्योंकि हर पल के नीचे एक दूसरा आदमी खड़ा था जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।"


उसने एक क़दम पीछे लिया, और उनके बीच की वो तनी हुई हवा ठंडी हो गई।

"मेहता को मैं ख़ुद हिसाब भेजूँगी।" उसकी आवाज़ फिर पत्थर हो गई। "साफ़, सच्चा। न तुम्हारे गरुड़ की मदद से, न करण की चोरी से। अगर इस होटल को बचाया जा सकता है, तो मैं उसे ईमानदारी से बचाऊँगी, ताकि उन चार सौ की साँस न तुम्हारी आग पर टिके, न बृज के घमंड पर।"

"मेहता का हिसाब भेजते ही तुम गरुड़ के, यानी मेरे, सीधे रास्ते में आ जाओगी।" उसने धीरे से कहा। "पता है ना?"

"पता है।" वो दरवाज़े पर रुकी, बिना मुड़े। "बारह साल तुम राख के सामने खड़े रहे, शौर्य, और एक ही चीज़ सीखी, इमारतें कैसे गिराई जाती हैं। मैं उम्र भर एक ही चीज़ सीखती रही, उन्हें कैसे बचाया जाता है। आज पहली बार हम आमने-सामने हैं। और मुझे नहीं पता कि इस लड़ाई के बाद हम दोनों में से कोई बचेगा भी या नहीं।"

वो निकल गई। और शौर्य उस आधे-अँधेरे कमरे में अकेला खड़ा रहा, अपने बाप का इंसाफ़ एक हाथ में, उस औरत का जाता साया दूसरे में, और पहली बार ये न जानते हुए कि किसे थामे, किसे जाने दे।


दो मंज़िल नीचे, करण सहगल के दफ़्तर में परदे खिंचे थे। मेज़ पर एक मोटा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था, अभी आया हुआ, और उस पर वही मोहर थी जिससे पूरा ख़ानदान काँपता था। गरुड़ कैपिटल।

"ये आज दोपहर आया," भनोट ने कहा। "खन्ना का आदमी छोड़ कर गया। बड़े साहब के नाम। हस्तांतरण का अगला काग़ज़।"

"खोलूँगा मैं।" करण ने लिफ़ाफ़ा उठाया, और उसकी मुस्कान सर्द थी। "क्योंकि इसमें मेरे बाप के लिए सिर्फ़ ख़बर है। और मेरे लिए एक जवाब।"

भनोट की भौंह उठी।

"कुछ रोज़ पहले मैंने अपने झाड़ू वाले के हाथ एक संदेसा भेजा था," करण ने काग़ज़ निकाला। "गरुड़ के आदमियों तक। मेरे बाप के पीछे। कि जिस दिन ये महल गिरे, करण सहगल मलबे के नीचे नहीं, मेज़ के उस पार खड़ा मिले। और मैं किसी पर यक़ीन नहीं करता, भनोट। उस झाड़ू वाले पर तो हरगिज़ नहीं। इसलिए उस संदेसे में मैंने एक काँटा छुपा दिया था।"

"काँटा?"

"एक लफ़्ज़।" करण की आवाज़ धीमी हुई। "मैंने उससे कहा था, इस सौदे का एक नाम है जो सिर्फ़ तेरे और मेरे बीच रहेगा। सत्रह। बस सत्रह। मैंने वो लफ़्ज़ कहीं लिखा नहीं। सिर्फ़ बोला था, इसी कमरे में, सिर्फ़ उस एक आदमी के सामने। ताकि अगर कभी गरुड़ का जवाब आए और उसमें ये लफ़्ज़ हो, तो मुझे पता चले कि मेरा संदेसा सच में गरुड़ तक पहुँचा, किसी बिचौलिए की जेब में नहीं मरा।"

करण ने पढ़ना शुरू किया। फिर रुक गया।


"भनोट। इधर आ। ये पढ़।"

भनोट झुका। करण की उँगली क़ानूनी ज़बान की एक भारी लाइन के नीचे एक छोटे से लफ़्ज़ पर टिकी थी।

"...धारा सत्रह के अंतर्गत, पक्षकारों के हित सुरक्षित रहेंगे," भनोट ने पढ़ा। "इसमें क्या है, साहब? कोई क़ानूनी धारा..."

"कोई धारा सत्रह नहीं है, भनोट।" करण की आवाज़ में रंग नहीं था। "मैंने पूरा काग़ज़ पढ़ा। इसमें कोई धारा गिनती में नहीं है। ये अकेला सत्रह है, बीच में रखा हुआ, ताकि सिर्फ़ वो आदमी इसे पहचाने जिसने इसे भेजा था। गरुड़ ने मेरे संदेसे का जवाब दे दिया है। मेरे ही लफ़्ज़ में। सौदा मंज़ूर। तेरा हित सुरक्षित।"

भनोट सीधा हुआ। "तो आपका संदेसा गरुड़ तक पहुँच गया, साहब। ये तो अच्छा है। आपका झाड़ू वाला..."

"रुक।" करण ने हाथ उठाया, और उसके माथे की लकीर गहरी हुई। "मैंने वो लफ़्ज़ लिखा नहीं था। बोला था। इस कमरे में, एक ही आदमी के सामने। तेरा आदमी, जो उस झाड़ू वाले के पीछे चौबीस घंटे लगा है, पंद्रह दिन से। वो काग़ज़ मेरे हाथ से उसके हाथ में गया। उसके बाद वो किस-किस से मिला?"

भनोट ने जेब से एक मुड़ी कॉपी निकाली, और उसका सपाट चेहरा पहली बार हिला। "साहब, मेरा आदमी कहता है, वो किसी से नहीं मिला। उन पंद्रह दिनों में नहीं। न कोई बाहरी, न कोई वकील, न कोई फ़ोन जो हमने न सुना हो, न कोई चिट्ठी जो हमने न देखी हो। वो रोज़ तीन जगह जाता है, साहब। नीचे स्टाफ़ का हिस्सा, मैडम कपूर का दफ़्तर, और अपनी खटिया। बस। हमने तो लिखा है कि इस आदमी की ज़िंदगी में कुछ है ही नहीं।"


करण बहुत देर चुप खड़ा रहा।

"तो तू मुझे ये बता रहा है," उसने आख़िरकार कहा, और हर लफ़्ज़ ऐसे आया जैसे किसी ने उसे बहुत ठंडे पानी से खींच कर निकाला हो, "कि मैंने एक लफ़्ज़ सिर्फ़ बोला, एक आदमी के सामने, और वो आदमी पंद्रह दिन किसी से नहीं मिला। और फिर भी आज वो लफ़्ज़ गरुड़ की अपनी चिट्ठी पर, गरुड़ की अपनी मोहर के नीचे, मेरे सामने छपा खड़ा है।"

"साहब, हो सकता है हमारे आदमी से कोई चूक..."

"पंद्रह दिन की चूक नहीं होती, भनोट!" करण की आवाज़ गूँजी, फिर एकदम एक फुसफुसाहट तक गिर गई, जो चीख़ से ज़्यादा डरावनी थी। "एक संदेसा एक आदमी के कान में जाता है, वो आदमी किसी से नहीं मिलता, और वो संदेसा गरुड़ बन कर बाहर आता है। इसका एक ही मतलब है। वो आदमी, जिसके कान में मैंने वो लफ़्ज़ डाला, और गरुड़, दो नहीं हैं। एक हैं।"

उसने भनोट की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में एक ऐसी चीज़ थी जो भनोट ने उसमें कभी नहीं देखी थी। डर।

"मेरा संदेसा गरुड़ तक गया नहीं, भनोट। गरुड़ के पास पहले से था। मैंने अपनी ग़द्दारी की चिट्ठी ख़ुद गरुड़ के हाथ में थमाई, और उसे एक नौकर समझ कर ख़ामोशी का एक नोट पकड़ा दिया।"


करण लड़खड़ाते हुए कुर्सी पर बैठ गया, और बारह हफ़्ते उसके सामने एक नई रोशनी में खुलने लगे, हर खिड़की के पीछे वही झुके कंधों वाला चेहरा।

"अल-रशीद का सौदा जिस दिन मरते-मरते बचा, कमरे में कॉफ़ी की ट्रे किसके हाथ में थी? जिस दिन आन्या के हाथ आंधेरी का पता आया, गलियारे में फ़ाइल लिए कौन खड़ा था? जिस रात पूरा होटल अँधेरे में डूबा और मेहता रुक गया, अँधेरे में बत्ती किसने लौटाई? हर बार वो वहीं था। पास। चुप। कॉफ़ी देता हुआ।"

करण के होंठों पर एक बेजान, पागल सी हँसी आ गई।

"मेरा बाप हर रात गरुड़ के नाम की माला जपता है। दुआ करता है कि गरुड़ एक बार सामने आ जाए, ताकि वो उसके आगे हाथ जोड़ सके। और गरुड़ हर रोज़, इसी महल में, उसका जूठा गिलास उठाता रहा। उसने उसी गरुड़ का प्याला अपने हाथ से भरा, और नज़र उठा कर देखा तक नहीं। उसने भरी महफ़िल में उसी गरुड़ के गाल पर थप्पड़ मारा।" करण की आवाज़ टूट गई। "वो आदमी हमारी एक-एक ईंट का मालिक है, भनोट। और हमने उसे बारह हफ़्ते अपने पैरों की धूल समझा।"

"साहब, अगर ये सच है, तो आपने उसके हाथ में अपनी ग़द्दारी की चिट्ठी दे दी है। वो आपको कभी भी..."

"पता है।" करण की आँखें मेज़ पर रखे उस अकेले लफ़्ज़ पर जमी थीं। सत्रह। "जिस मोहरे को मैं अपनी बिसात समझ कर खेल रहा था, वो पूरी बिसात का मालिक निकला, और मैं उसका मोहरा।" फिर, धीरे-धीरे, उसकी रीढ़ सीधी हुई, और डर के नीचे वो ठंडी चीज़ जागी जो आख़िर में हमेशा सहगल के ख़ून में जाग जाती थी। "पर वो एक बात भूल गया। बारह साल उसकी सबसे बड़ी ताक़त उसका छुपा चेहरा था। और जिस दिन सब जान जाएँगे कि गरुड़ कौन है, उसी दिन उसकी आधी ताक़त राख हो जाएगी।"


बृज सहगल का दफ़्तर रात के उस पहर में भी जल रहा था। वो कुर्सी पर झुका बैठा था, सामने गरुड़ के काग़ज़, उँगलियों में हीरे की वही अँगूठी, जिसे वो अब घुमाता नहीं था, बस पकड़े रहता था, जैसे वो आख़िरी ठोस चीज़ हो जो अब भी उसके हाथ में बची थी।

दरवाज़ा बिना दस्तक के खुला।

"करण? इस वक़्त?" बृज ने सिर उठाया। "और तेरा ये चेहरा... क्या हुआ? बैंक ने फिर..."

"पापा।" करण ने दरवाज़ा अपने पीछे बंद किया। हाथ में वही काग़ज़ था। चेहरा सफ़ेद, पर आवाज़ बहुत शांत, उस शांति से जो किसी आख़िरी फ़ैसले के बाद आती है। "बैठे रहिए। और जो मैं कहने आया हूँ, उसे एक बार में सुन लीजिए, क्योंकि मैं इसे दोबारा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाऊँगा।"

बृज की उँगली अँगूठी पर रुक गई। उसने अपने बेटे को कभी ऐसा नहीं देखा था। न घमंड, न लालच। सिर्फ़ एक ठंडा, सपाट डर।

"बारह साल से हम एक नाम के आगे काँपते आए हैं, पापा। गरुड़। हमने उसकी रहम की भीख माँगी। आपने उसके आदमी के सामने अपना सिर झुकाया, हाथ बढ़ाया, और कहा कि बृज सहगल ये एहसान कभी नहीं भूलेगा।"

"करण, बात क्या है?"

"बात ये है कि हम एक भूत से डरते रहे, और भूत हमारे अपने घर में था।" करण ने सीधे अपने बाप की आँखों में देखा। "वो जिसका चेहरा हमने कभी नहीं देखा। वो जो हमारी एक-एक ईंट का मालिक है। वो गरुड़।"

करण रुका। पूरा कमरा एक साँस के लिए रुक गया।

"वो हमारा नौकर है, पापा।"

बृज की अँगूठी वाली उँगली काँपी।

"वो झाड़ू वाला। राघु। जिसे आपने भरी महफ़िल में थप्पड़ मार कर बाहर फिंकवाया था। जिसे हम बारह हफ़्ते अपने पैरों की धूल समझते रहे, जिसका जूठा हम उससे उठवाते रहे।" करण की आवाज़ अब बस एक फुसफुसाहट थी। "वही गरुड़ है। वही इस पूरे महल का मालिक है। और वो बारह हफ़्ते से हमारी लॉबी में, हमारे बीच, हाथ में पानी की ट्रे लिए हमें डूबते हुए देख रहा है।"

बृज सहगल कुछ नहीं बोला।

उसकी हीरे की अँगूठी काँपती उँगली से फिसली, और चमकदार मेज़ पर गिर कर एक धीमी, गोल आवाज़ के साथ देर तक घूमती रही, उस सन्नाटे में, जो अब हमेशा के लिए बदल चुका था।

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