Chapter 10 of 15
दो चेहरे
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
उस पुरानी तस्वीर से आन्या सारा हिसाब जोड़ लेती है, और सीधे रघु के पास पहुँचती है, ख़ानदान के पास नहीं। एक बंद कमरे में, परत दर परत, मुखौटा उतर जाता है। वो आदमी देवराज का बेटा शौर्य है, और वही बेनाम गरुड़ भी, जिसे तोड़ने की उसने ख़ुद क़सम खाई थी। धोखा दोनों तरफ़ कटता है, और ये सवाल बीच में अधूरा खड़ा रह जाता है कि उनकी मोहब्बत कभी सच थी, या सिर्फ़ एक चाल। टूटी और तपती हुई, आन्या बृज को सब बता देने उसके दफ़्तर की तरफ़ चल पड़ती है, और दरवाज़े पर हाथ रखे ठहर जाती है।
एक झूठ को बारह बरस छुपाया जा सकता है। पर उस एक आँख से नहीं, जो तुमसे मोहब्बत करने लगे। क्योंकि मोहब्बत किसी चेहरे को देखती नहीं, उसे पढ़ती है। और जो पढ़ने बैठ जाए, उससे कोई मुखौटा बहुत देर तक नहीं छुपता।
उस रात आन्या घर नहीं गई।
विरासत भंडार की धूल में सुबह के धुँधलके तक बैठी रही, फिर अपने दफ़्तर में, वो बारह साल पुरानी तस्वीर हाथ में लिए। और जैसे वो किसी डूबते होटल का हिसाब मेज़ पर बिछाती थी, वैसे ही उसने एक-एक टुकड़ा अपने ज़हन की मेज़ पर रखना शुरू किया।
हफ़्तों से वो दो चीज़ें ढूँढ रही थी। एक साफ़ टाइटल, जिसकी पूरी कहानी वो रजिस्ट्रार और विरासत के पुराने काग़ज़ों में खोज रही थी। और एक चेहरा, गरुड़, वो बेनाम दस्तख़त जो हर काग़ज़ के नीचे था। आज रात दोनों रास्ते एक ही आदमी पर आ कर मिल गए थे।
टाइटल के काग़ज़ ने उसे वो नाम दे दिया था जिसे इस ख़ानदान ने लॉबी की दीवार से पीतल समेत घिस डाला था। देवराज प्रताप। आधे का मालिक। बराबर का। वो ईमानदार साझेदार, जिसे दुनिया एक क़ातिल के नाम से जानती थी। आग। मिटाई हुई पट्टी। और उद्घाटन की उस तस्वीर में, नौजवान देवराज के बराबर, उसका हाथ थामे, एक छोटा सा लड़का।
पर आज आन्या की पकड़ उस लड़के की आँखों पर नहीं थी। आज वो उस ठहराव को पहचान रही थी। उस बच्चे के चेहरे की मासूम हैरानी बारह साल में एक आदमी के ठहराव में बदल चुकी थी। वो ठहराव, जो कोई बात कहने से पहले एक पल को रुक कर तौलता है, कि कितना कहना है और कितना दबा रखना है। यही एक आदत उसने पहले ही हफ़्ते उस अटेंडेंट में पकड़ ली थी, और बारह हफ़्ते उसी को एक हल न होने वाली पहेली समझती रही थी।
फिर वो कंपनी। गरुड़ की सबसे पुरानी, सबसे बुनियादी कंपनी, जिसका पंजीकरण उसने कल रात देखा था, ठीक उन्हीं हफ़्तों में, जिन हफ़्तों में ये होटल जला था। कल रात तक वो सिर्फ़ एक तारीख़ थी। आज वो एक नाम के बराबर आ कर बैठ गई थी।
और वो आदमी। जो दो लाइनों में करोड़ों का सौदा बचा लेता था। जो अँधेरे में, बिना देखे, ठीक वही तार छू देता था जो छूने थे। जो चंद हफ़्तों के नौकर होते हुए इस महल का हर पुराना तार, हर पुराना हिसाब, हर बंद दरवाज़ा ऐसे जानता था जैसे कोई सिर्फ़ अपने ही घर को जानता है।
तस्वीर का वो लड़का बड़ा हो गया था। दफ़न आदमी का बेटा लौट आया था। और बारह हफ़्ते से वो ठीक उसके कंधे से सटा खड़ा था।
मैनेजर का रास्ता सीधा था। बृज के पास जाओ, और जो जाना, बता दो। पर आन्या उस रास्ते पर नहीं चली। किसी आदमी को तोड़ने से पहले उसे उसी के मुँह से सुनना था। और उस ख़ाली दफ़्तर में, ख़ुद से, उसने एक और बात मानी, कि उसके अंदर एक छोटा, गद्दार सा कोना अब भी दुआ कर रहा था कि वो ग़लत निकले।
उसने अंदरूनी फ़ोन उठाया, और वेस्ट विंग का वही अटेंडेंट माँगा। आख़िरी बार।
दरवाज़ा खुला।
"जी, मैडम। आपने बुलाया?"
वही झुके कंधे, वही नीची नज़र, वही दीन आवाज़ जो बारह हफ़्ते से इस दफ़्तर में चुपचाप फ़ाइलें रखती आई थी। आन्या ने सिर नहीं उठाया। मेज़ पर एक तस्वीर औंधी पड़ी थी, और उसके पार रात की वो काली खिड़की, जिसमें रघु की परछाईं भी खड़ी थी। एक पल को आन्या को लगा कमरे में दो आदमी हैं। एक, जो सामने सिर झुकाए खड़ा था। और एक, उस काँच में, जो सीधा था, और जिसे वो अब तक देख नहीं पाई थी।
"दरवाज़ा बंद करो।"
रघु ने दरवाज़ा बंद किया।
आन्या ने तस्वीर सीधी की, और उसे मेज़ पर उसकी तरफ़ सरका दिया।
"इस तस्वीर में दो लोग हैं।" उसकी आवाज़ शांत थी, बहुत शांत, उस आदमी की तरह जो हिसाब पूरा कर चुका हो और अब सिर्फ़ नतीजा पढ़ने बैठा हो। "एक नौजवान आदमी, जिसका नाम किसी ने इसी होटल की दीवार से रेगमाल से घिस कर मिटा दिया। और उसका हाथ थामे, एक छोटा लड़का। तुम इन दोनों में से किसी को पहचानते हो, रघु?"
रघु ने तस्वीर पर एक सरसरी नज़र डाली, फिर नज़र वापस फ़र्श पर। "बहुत पुरानी तस्वीर है, मैडम। मेरा इससे क्या वास्ता?"
"उस नौजवान का नाम देवराज प्रताप है।" आन्या ने उसकी बात बीच में काट दी। "इस होटल का बराबर का मालिक। वो आदमी जिसने इसे अपने हाथों से खड़ा किया, और जिसे इसी ने एक रात में क़ातिल बना कर दफ़ना दिया।" उसकी उँगली उस नन्हे चेहरे पर टिक गई। "और ये लड़का, उसका बेटा है।"
रघु चुप रहा।
"पिछले बारह हफ़्ते मैं एक हिसाब लगा रही थी, जो किसी तरह बैठता ही नहीं था।" वो उठी, मेज़ का चक्कर काटती हुई धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ी। "एक अटेंडेंट, जो दो लाइनों में अल-रशीद का सौदा बचा लेता है। जो अँधेरे में एक मरा जेनरेटर सुन कर ज़िंदा कर देता है। जो इस इमारत का हर पुराना तार, हर बंद दरवाज़ा ऐसे जानता है जैसे किसी ने उसे ये महल विरासत में दिया हो। मैं हर बार ख़ुद से कहती, क़िस्मत। इत्तेफ़ाक़। एक अजीब, होशियार नौकर।" वो उसके सामने आ कर रुकी। "पर आज रजिस्ट्रार के पुराने काग़ज़ों में मुझे वो मिल गया जो मैं हफ़्तों से जोड़ रही थी। एक नाम। देवराज प्रताप। और उसका एक बेटा।" आवाज़ धीमी हुई। "उस लड़के को बड़ा होने में बारह बरस लगे।"
"मैडम," रघु ने एक आख़िरी बार वो टूटी, दीन आवाज़ ओढ़ी, "आप बहुत थकी हुई हैं। ये सब..."
"बस।" आन्या की आवाज़ कड़की, पर उसमें ग़ुस्सा कम और दर्द ज़्यादा था। "आज वो आवाज़ रहने दो। मैं उसे बारह हफ़्ते से सुन रही हूँ। आज मुझे वो दूसरी आवाज़ चाहिए, जो इस झूठ के नीचे दबी पड़ी है।"
वो उसके और पास आई, और बहुत धीरे, एक-एक लफ़्ज़ अलग रख कर बोली।
"तुम्हारा नाम रघु नहीं है।"
एक पल का सन्नाटा।
"शौर्य।" उसने कहा। "शौर्य प्रताप।"
और बारह साल में पहली बार, किसी ने उसका असली नाम पुकारा।
वो नाम उसने ख़ुद, उस सीलबंद फ़ाइल से भी कहीं गहरे, अपने अंदर दफ़ना दिया था। बारह साल से वो रघु था, सिर्फ़ रघु, और शौर्य प्रताप उस राख में कहीं सोता था जो उद्घाटन की रात के बाद बची थी। और आज इस औरत ने, जिसे उसने अपनी किसी बिसात पर कभी रखा ही नहीं था, उस नाम को राख से खोद निकाला था।
उसके झुके कंधे, जो बारह साल से एक नौकर के बोझ में मुड़े थे, धीरे-धीरे सीधे हुए। चेहरे से वो दीनता ऐसे उतरी जैसे कोई गीला मुखौटा त्वचा से अलग होता है। नज़र फ़र्श से उठी, और सीधी आन्या की आँखों में आ टिकी, बिना झुके, बिना तौले। जिस आदमी को आन्या बारह हफ़्ते से रघु समझती आई थी, वो उसके सामने से हट गया, और उसके पीछे से एक दूसरा आदमी निकल आया, जिससे वो आज पहली बार मिल रही थी।
"बारह साल हुए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ तक बदल गई थी, वो दीन नरमी ग़ायब, और उसकी जगह एक गहरी, सधी हुई ठंडक, "किसी ने वो नाम ज़बान पर नहीं रखा। मैंने ख़ुद भी नहीं।"
आन्या एक क़दम पीछे हटी, जैसे पैरों के नीचे ज़मीन एक पल को सरकी हो। चेहरा वही था। पर उसके पीछे कोई और खड़ा था।
"तुम्हारी आवाज़ तक..." वो रुकी, यक़ीन और बेयक़ीनी के बीच कहीं अटकी।
पर वो वहाँ नहीं रुकी। एक चेहरा गिर चुका था। एक और बाक़ी था।
"एक नाम और था जो मैं ढूँढ रही थी।" उसकी आवाज़ अब काँप रही थी, पर पीछे नहीं हट रही थी। "बारह साल से इस होटल का गला दबाता एक बेनाम दस्तख़त। गरुड़। आज रात मैंने उसकी सबसे पुरानी कंपनी का पंजीकरण देखा। वो ठीक उन्हीं हफ़्तों में बनी, जिन हफ़्तों में ये होटल जला, और देवराज प्रताप का नाम मिटा।" उसने एक काँपती साँस ली। "गरुड़ कोई बाहरी नहीं है। गरुड़ वो है जिससे ये होटल छीना गया था।"
वो उसकी आँखों में देखती रही।
"गरुड़ भी तुम हो।"
कमरे में एक लंबी, भारी ख़ामोशी पसर गई, जिसमें सिर्फ़ खिड़की के पार समंदर की दूर, थकी गूँज बची थी।
"हाँ," शौर्य ने कहा।
बस एक लफ़्ज़। और उस एक लफ़्ज़ ने आन्या के पैरों के नीचे बारह हफ़्ते की हर रात ढहा दी।
"हाँ।" उसने वो लफ़्ज़ दोहराया, जैसे उसका ज़हर अपनी ज़बान पर तौल रही हो। "बस हाँ। बारह हफ़्ते, शौर्य। बारह हफ़्ते मैं हर रात इसी मेज़ पर अपनी आँखें जलाती रही, इन चार सौ लोगों को उस गरुड़ से बचाने के लिए, जो उन्हें सड़क पर फेंकने आया था। और वो गरुड़ हर रात, ठीक यहीं, मेरे कंधे से सटा खड़ा था। मुझे फ़ाइलें थमाता हुआ। मेरे लिए दरवाज़े खोलता हुआ।" आवाज़ रुँधने लगी। "मैं एक भूत से लड़ रही थी, और वो भूत मेरे ही कमरे में, मेरे ही साथ, चाय बना रहा था।"
"उस रात," उसने कहा, और पहली बार उसकी आँखें भर आईं, पर वो रोई नहीं, "जंग के उस कमरे में, जब मैंने तुमसे कहा था कि इस पूरे महल में बस एक तुम हो जो किसी का काग़ज़ नहीं... तुम उस वक़्त भी झूठ बोल रहे थे। तुम किसी का काग़ज़ नहीं थे, शौर्य। तुम हर काग़ज़ थे। तुम वही दस्तख़त थे जिसे मैं हर रात घूर कर पूछती थी, तू है कौन। मैंने उस रात गरुड़ को चूम लिया था, और मुझे ख़बर तक नहीं थी।"
"और अब मुझे एक बात बताओ।" वो एक क़दम और पास आई, सीधे उसकी आँखों में देखते हुए। "वो रात भी एक चाल थी? मुझे पास रखना, मुझे थामना, ताकि मैं इतनी क़रीब आ जाऊँ कि देख ही न पाऊँ कि जिस गरुड़ को मैं तोड़ने निकली हूँ, वो मेरे ही हाथ में हाथ डाले खड़ा है? क्या मैं भी तुम्हारी बिसात का एक मोहरा थी? सच बोलो। आज, बस एक बार, अपने असली नाम से।"
शौर्य ने उसकी तरफ़ देखा, और बारह साल की वो ठंडक एक पल को पिघली, फिर वापस जम गई।
"तुम सच जानना चाहती हो?" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर हर लफ़्ज़ पत्थर। "तो ये भी सुनो, आन्या। तुम जिन चार सौ लोगों के लिए अपनी आँखें जला रही हो, उनके लिए मैं गरुड़ नहीं हूँ। पर तुम जिस ख़ानदान की तनख़्वाह पर हो, उसी ने मेरे बाप को ज़िंदा जला दिया। उसका नाम, उसकी इज़्ज़त, उसकी पूरी ज़िंदगी, उस दीवार की एक पीतल की पट्टी की तरह घिस डाली। तुम जिसे ये होटल बचाना कहती हो, वो असल में बृज सहगल का नाम उसी दीवार पर बनाए रखना है, जिस दीवार से मेरे बाप का नाम छीला गया।"
"तुमने मुझसे क़सम खाई थी," वो उसके और पास आया, "इस गरुड़ का चेहरा ढूँढ कर तोड़ दूँगी। ये रहा चेहरा। तोड़ दो। पर तोड़ने से पहले एक बार पूछ लो, इस आदमी ने वो होटल क्यों ख़रीदा, जो कभी आधा उसका अपना था। तुम जिसे मसीहा समझ कर बचा रही हो, और जिसे राक्षस समझ कर तोड़ रही हो, हो सकता है उन दोनों में फ़र्क़ वो न हो, जो तुम्हें ये काग़ज़ बताते हैं।"
आन्या कुछ नहीं बोली। उसकी आँखों में आँसू और आग साथ-साथ जल रहे थे।
"और जो तुमने पूछा," शौर्य की आवाज़ पहली बार ज़रा सी डगमगाई, और उसी डगमगाहट में सबसे ज़्यादा सच था, "कि क्या तुम एक मोहरा थीं। बारह साल मैंने हर चीज़ नापी है। हर लफ़्ज़, हर क़दम, हर साँस। मेरी बिसात पर हर आदमी का एक ख़ाना था। बृज, करण, मेहता, सबका।" वो रुका। "बस एक तुम थीं, जिसका मेरे पास कोई ख़ाना नहीं था। तुम मेरी किसी चाल में नहीं थीं। तुम वो एक चीज़ हो जिसका मैंने बारह साल में कभी हिसाब नहीं रखा। और यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।"
एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, आन्या के चेहरे पर कुछ काँपा। फिर उसने सिर हिला दिया, और एक तीखी, टूटी हँसी हँसी।
"मैं तुम पर यक़ीन कैसे करूँ?" उसने फुसफुसा कर कहा। "बारह हफ़्ते तुम्हारा हर लफ़्ज़ झूठ था। हर चेहरा झूठ था। और अब, ठीक इस पल, जब तुम्हें मेरी चुप्पी चाहिए, तुम कहते हो कि बस ये एक बात सच है?" उसकी आवाज़ काँप गई। "मेरे सामने दो चेहरे खड़े हैं, शौर्य। एक रघु, जिस पर मैंने अपनी पूरी जंग का भरोसा रख दिया। एक गरुड़, जिसे मैं नंगा कर के तोड़ना चाहती थी। और मैं उम्र भर लोगों के चेहरे पढ़ती आई हूँ, पर आज मैं नहीं बता सकती कि इन दोनों में से कौन सा झूठ है, और कौन सा सच। शायद दोनों झूठ हैं। शायद तुम ख़ुद नहीं जानते कि उस वर्दी के नीचे कौन सा आदमी असली है।"
"आन्या..." शौर्य ने एक क़दम बढ़ाया।
"नहीं।" उसने हाथ उठा दिया, और बस वो एक हाथ उसे रोकने को काफ़ी था। "आज नहीं। आज मेरे पास इन दो चेहरों में से किसी के लिए कुछ नहीं बचा।"
आन्या उस दफ़्तर से निकल गई।
और शौर्य प्रताप पीछे, उस अधूरी रोशनी में अकेला खड़ा रह गया, अपना असली नाम अपने ही कानों में लिए, जिसे बारह साल बाद किसी ने पुकारा था, और जो अब उसके ख़िलाफ़ एक हथियार बन सकता था। तीन मंज़िल नीचे, करण का सौंपा हुआ वो गंदा काम भी अब भी उसके हाथ में एक सुलगती डोर की तरह बँधा था, अपने वक़्त का इंतज़ार करता। पर इस पल वो किसी हिसाब, किसी चाल के बारे में नहीं सोच रहा था। वो बस उस ख़ाली दरवाज़े को देख रहा था, जिससे होकर अभी-अभी वो इकलौती औरत निकल गई थी जिसने उसका असली चेहरा देखा था, और जो अब उसका सबसे बड़ा ख़तरा थी।
बाहर, गलियारा ठंडा और ख़ाली था।
आन्या तेज़ क़दमों से चल रही थी, और हर क़दम के साथ उसके अंदर का तूफ़ान और गहरा होता जा रहा था। उसके पास एक हथियार था। बारह हफ़्ते से जिस बेनाम गरुड़ को तोड़ने की वो क़सम खा रही थी, आज उसके पास उसका चेहरा था, उसका नाम था, उसका सबसे गहरा राज़ था। और उस राज़ को तोड़ने की एक ही जगह थी। तीन गलियारे आगे, ख़ानदानी विंग में, बृज सहगल का दफ़्तर।
बस इतना करना था। उस दरवाज़े को खोलना, अंदर जाना, और बृज सहगल को बता देना कि बारह साल जिस गरुड़ के नाम से वो काँपता रहा है, और जिस नौकर को वो अपने पैरों की धूल समझता आया है, वो एक ही आदमी है। एक लफ़्ज़, और गरुड़ टूट जाता। एक लफ़्ज़, और उसकी क़सम पूरी हो जाती, मेहता का हिसाब बच जाता, चार सौ लोगों की नौकरी बच जाती।
पर जैसे-जैसे वो उस दरवाज़े के पास पहुँची, उसके क़दम भारी होते गए।
क्योंकि वो जानती थी कि उस दरवाज़े के पीछे कौन बैठा है। वो आदमी, जिसने एक बेगुनाह को क़ातिल बना कर दफ़ना दिया, जिसने एक बच्चे से उसका बाप, उसका नाम, उसकी पूरी दुनिया छीन ली। अगर वो अंदर जा कर शौर्य का राज़ खोल देती, तो वो उस लुटे हुए बेटे को सीधा उन्हीं हाथों में सौंप देती जिन्होंने उसके बाप को राख किया था। वो उस इकलौते आदमी को तोड़ देती जो शायद एक मरे हुए बेगुनाह को इंसाफ़ दिला सकता था, और जो भी आख़िरी सच इस महल में कहीं दफ़न था, वो हमेशा के लिए उन्हीं के हाथ लग जाता जिन्होंने उसे दफ़न किया था।
पर अगर वो चुप रह जाती, तो?
तो वो उस आदमी की हिमायत करती जो इस होटल को, इसके चार सौ लोगों को, बिट्टू को, फेकू काका को, सबको निगलने आया था। वो अपनी हर रात की मेहनत को, अपनी क़सम को, अपने उस पूरे मक़सद को धोखा देती जिसके लिए वो यहाँ आई थी। एक तरफ़ एक लुटा हुआ बेटा था। दूसरी तरफ़ चार सौ ज़िंदगियाँ। एक तरफ़ इंसाफ़। दूसरी तरफ़ फ़र्ज़। और दोनों एक साथ नहीं बच सकते थे।
बृज सहगल के दफ़्तर के दरवाज़े के नीचे से रोशनी की एक पतली लकीर बाहर रेंग रही थी। अंदर कोई जाग रहा था। आन्या उस बंद दरवाज़े के सामने आ कर रुकी, और उसने अपना हाथ उस ठंडे पीतल के हैंडल पर रख दिया।
और वहीं ठहर गई।
उसकी ज़िंदगी का सबसे आसान काम यही था, बस उस हैंडल को घुमा देना। और उसी एक पल में, सबसे मुश्किल भी।
उसकी उँगलियाँ पीतल पर कस गईं।
होटल सो रहा था। समंदर दूर साँस ले रहा था। और इम्पीरियल के उस ख़ामोश गलियारे में, बृज सहगल के दफ़्तर के दरवाज़े पर हाथ रखे, आन्या कपूर खड़ी रही, और उसका हाथ न आगे बढ़ा, न पीछे हटा।
दरवाज़े के उस पार एक नाम था, जो बारह साल से एक झूठ के नीचे दफ़न था। और दरवाज़े के इस पार, उसी झूठ को खोलने या हमेशा के लिए दफ़न रहने देने का फ़ैसला, एक औरत की काँपती उँगलियों में अटका था।
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