Chapter 1 of 15
राख का वादा
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
बारह साल पहले द ग्रैंड इम्पीरियल की उद्घाटन की रात लगी आग में एक आदमी मारा गया, और उसका सारा इल्ज़ाम होटल के ईमानदार सह-संस्थापक देवराज पर मढ़ दिया गया। आधा हिस्सा छिन गया, नाम मिटा दिया गया, और उसके सात साल के बेटे शौर्य ने राख के सामने एक वादा किया। आज, बारह साल बाद, वही बेटा एक मामूली नौकर की वर्दी में उसी होटल में लौटा है, जहाँ सहगल ख़ानदान एक बेनाम कंपनी गरुड़ से रहम की भीख माँग रहा है, यह जाने बिना कि गरुड़ कौन है।
कुछ इमारतें ख़ून पर खड़ी होती हैं।
द ग्रैंड इम्पीरियल उनमें से एक थी। पर जिस रात मुंबई के समंदर किनारे उसका नाम पहली बार जगमगाया, ये किसी को नहीं पता था। सिवाय एक आदमी के।
बारह साल पहले। आतिशबाज़ी से भरे आसमान के नीचे, संगमरमर की उस नई लॉबी में जहाँ झूमर सितारों की तरह चमक रहे थे और शैम्पेन के गिलास टकरा रहे थे, एक छोटा सा लड़का, सात साल का, अपने पापा का हाथ थामे खड़ा था। मुँह खुला, आँखें बड़ी।
"पापा, ये अपना है? पूरा अपना?" लड़के ने पूछा।
देवराज ने झुक कर बेटे को गोद में उठा लिया। "आधा अपना, शौर्य। और आधा सहगल अंकल का। हम दोनों ने मिल कर बनाया है इसे। अपनी मेहनत से, अपने नाम से।"
"और जब मैं बड़ा हो जाऊँगा?"
"तब ये पूरा तेरा होगा।" देवराज हँसा। "पर एक शर्त है। मालिक बनना आसान है, बेटा। ईमानदार मालिक बनना मुश्किल है। तू वही बनेगा। वादा?"
"वादा।"
ठीक उसी पल, होटल की सबसे ऊँची मंज़िल पर, एक चिंगारी जागी।
देवराज को पता था वो चिंगारी कहाँ से आई थी। उसने महीनों पहले मना किया था। सस्ते तार, घटिया सामान, बिना जाँच के लगे बिजली के पैनल। उसने सहगल साहब के सामने फ़ाइल पटकी थी। "ये कटौती नहीं, ये क़त्ल का इंतज़ाम है। मेरी इमारत में मेरे लोग जलेंगे, ये मुझसे नहीं होगा।" और सहगल साहब ने मुस्कुरा कर कहा था, "तुम बहुत भावुक हो, देवराज। पैसा भावना से नहीं बनता।"
अब वो भावना धुएँ में बदल रही थी।
पहले एक चीख। फिर दस। फिर वो गहरी, काली लपट जो परदों को चाट गई। संगमरमर की लॉबी में अफ़रा-तफ़री मच गई। लोग दरवाज़ों की तरफ़ भागे। शैम्पेन के गिलास फ़र्श पर बिखर गए। और ऊपर, उस ऊँची मंज़िल पर, होटल का एक पुराना कर्मचारी, एक बूढ़ा आदमी जो सबको बाहर निकाल रहा था, धुएँ में फँस गया।
वो आदमी उस रात बाहर नहीं आया।
देवराज ने शौर्य को एक नौकर के हाथ में थमाया और ख़ुद ऊपर की तरफ़ भागा। वो आख़िरी आदमी था जो उस आग की तरफ़ गया, बचाने के लिए। पर जब पुलिस की गाड़ियाँ आईं, जब कैमरे आग से मुड़ कर तमाशे की तरफ़ घूमे, तो कहानी पहले से लिखी जा चुकी थी।
"यही है," सहगल साहब ने पुलिस से कहा, उँगली देवराज की तरफ़, और आवाज़ में आँसू भी सजाए हुए। "बिजली का सारा काम इसी के ज़िम्मे था। मैंने इसे कितनी बार समझाया, साहब। पर ये पैसे बचाने के चक्कर में... एक आदमी मर गया। एक आदमी।"
देवराज पलटा, काला, काँपता हुआ। "तुम... तुमने वो फ़ाइल देखी थी। मेरी चिट्ठियाँ हैं तुम्हारे पास। मैंने तुम्हें रोका था।"
"कौन सी फ़ाइल?" सहगल साहब ने सर्द आवाज़ में कहा। "कौन सी चिट्ठी? यहाँ कोई फ़ाइल नहीं है, देवराज। सिर्फ़ एक लाश है और एक मुजरिम।"
हथकड़ी की आवाज़ संगमरमर पर गूँजी।
छोटा शौर्य भीड़ में से निकल कर भागा। एक पुलिसवाले ने उसे रोका। उसने अपने पापा को देखा, सिर झुका, हाथ बँधे, उस इमारत के सामने जो आधी उसकी थी। उसने देखा कि किस तरह अगले कुछ ही हफ़्तों में देवराज का आधा हिस्सा काग़ज़ों में सहगल के नाम चढ़ गया। उसने देखा कि किस तरह लॉबी की उस दीवार से उसके पापा की तस्वीर उतार दी गई, और नीचे लगी पीतल की पट्टी से एक नाम घिस कर मिटा दिया गया। जैसे देवराज कभी था ही नहीं।
जेल की गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ। शौर्य उस बंद दरवाज़े को देखता रहा।
वो रोया नहीं।
बस उसने अपनी छोटी सी मुट्ठी इतनी ज़ोर से भींची कि नाख़ून हथेली में गड़ गए, और उस जलते हुए होटल की राख की तरफ़ देखते हुए, बहुत धीरे, किसी से नहीं, सिर्फ़ अपने आप से, उसने कहा।
"ये महल आपने बनाया है, सहगल अंकल। पर मरूँगा मैं तभी, जब इसकी एक एक ईंट मेरी मुट्ठी में होगी। और उस दिन आप मेरे पैरों में होंगे। मेरा वादा।"
आग बुझ गई। राख रह गई। और एक वादा, राख से भी ठंडा।
आज। द ग्रैंड इम्पीरियल, मुंबई। बारह साल बाद।
वही लॉबी। वही झूमर, अब थोड़े धुँधले। वही संगमरमर, जिस पर अब महीन दरारें थीं जिन्हें मोटे कालीनों के नीचे छिपा दिया गया था। आज रात फिर एक जलसा था, और हवा में फिर शैम्पेन की महक थी। पर इस बार चमक के नीचे एक चीज़ और थी। डर।
मंच पर खड़े थे बृज सहगल। उसी सहगल के बेटे जिसने देवराज को फँसाया था। साठ के क़रीब, चाँदी जैसे बाल, हीरे की कफ़लिंक, और एक ऐसी मुस्कान जो कभी आँखों तक नहीं पहुँचती थी।
"दोस्तो," बृज ने गिलास उठाया, "लोग कहते हैं इम्पीरियल बूढ़ा हो गया है। मैं कहता हूँ, इम्पीरियल राजा है। और राजा बूढ़े नहीं होते। बस ताज बदलते हैं।"
तालियाँ बजीं। एक मेहमान, हीरों से लदी एक महिला, बृज के पास झुकी।
"बृज जी, सच बताइए। ये जो आजकल चर्चा है... गरुड़ कैपिटल। वो बेनाम कंपनी जो आधा शहर ख़रीद रही है। सुना है इम्पीरियल का सारा क़र्ज़ उन्हीं के पास है। सच है?"
बृज की मुस्कान एक पल को जमी, फिर और चौड़ी हो गई। "सच ये है कि गरुड़ हमारे साथ निवेश करना चाहता है। ख़ुशनसीब हैं वो। हर कोई इम्पीरियल का हिस्सा नहीं बन सकता।"
"पर वो हैं कौन? किसी ने उनका चेहरा देखा है?"
"चेहरे की क्या ज़रूरत है," बृज ने हँस कर कहा, पर उसकी उँगलियाँ गिलास पर कस गईं। "पैसा जब बोलता है, तो चेहरा नहीं देखा जाता।"
भीड़ हँसी। पर बृज के पीछे, मंच के परदे की ओट में, उसका बेटा करण फुसफुसाया, "पापा, बैंक वाले कल फिर फ़ोन कर रहे थे। तीन किश्तें रह गई हैं। अगर गरुड़ ने अगले महीने क़र्ज़ माँग लिया, तो..."
"तो कुछ नहीं होगा," बृज ने दाँतों के बीच से कहा, चेहरे पर मुस्कान कायम रखते हुए। "गरुड़ हमें बचाएगा। उसे हमारी ज़रूरत है। और जब वो सामने आएगा, तो वो हमसे हाथ मिलाएगा, हमारे पैर नहीं पकड़ेगा। हम सहगल हैं, करण। हम झुकते नहीं।"
और ठीक उसी वक़्त, उसी लॉबी में, एक मामूली सी वर्दी पहने एक आदमी, हाथ में पानी की ट्रे, चुपचाप मेहमानों के बीच से गुज़र रहा था।
वर्दी पर लिखा था, रघु। अटेंडेंट।
रघु। उम्र यही कोई अट्ठाईस, उनतीस। झुके कंधे, नीची नज़र, चेहरे पर वो आदत वाली दीनता जो नौकरों के चेहरे पर बरसों की डाँट उगा देती है। वो किसी से नज़र नहीं मिलाता था। वो बस ट्रे थामे चलता रहता था, "जी साहब, जी मैडम" कहता रहता था।
पर रघु की आँखें कुछ और कर रही थीं।
वो उस दरार को देख रहा था जो परदे के पीछे दीवार पर थी। वो उस दुबई वाले मेहमान को देख रहा था जिसके जूते बता रहे थे कि उसे होटल में नहीं, किसी सौदे में दिलचस्पी है। और वो दूर, लॉबी की उस दीवार पर लगी पीतल की पट्टी को देख रहा था, जहाँ कभी एक नाम घिस कर मिटाया गया था।
मेहमान औरत ने गरुड़ का नाम लिया, और रघु के होंठों के कोने में, बस एक पल को, एक हल्की सी मुस्कान आई और चली गई।
क्योंकि गरुड़ कोई और नहीं था। गरुड़ वो ट्रे थामे, उन्हीं की लॉबी में, उन्हीं का पानी बाँट रहा था।
"ऐ! लड़के!" करण की आवाज़ कड़की। "इधर। पानी।"
रघु ने ट्रे झुकाई। करण ने एक गिलास उठाया, घूँट भरा, और मुँह बिचकाया। "ये पानी गरम है। तुझे इतना भी नहीं आता? मेहमान क्या सोचेंगे, कि सहगल के घर में बर्फ़ भी नहीं?"
"माफ़ कीजिए, साहब," रघु ने सिर झुका कर कहा, आवाज़ में रत्ती भर भी शिकायत नहीं। "अभी ठंडा लाता हूँ।"
"रहने दे। तेरे जैसों से उम्मीद ही क्या।"
रघु मुड़ा। और मुड़ते हुए, बहुत धीरे, इतने धीरे कि सिर्फ़ हवा सुने, उसने कहा, "जैसा मालिक रखेगा, वैसा ही पानी मिलेगा, साहब।"
करण ने सुना नहीं। सुनता भी तो समझता नहीं।
फिर वो लम्हा आया।
मंच के पास, बृज एक बड़े मेहमान को, उसी दुबई वाले निवेशक को, इम्पीरियल का इतिहास सुना रहे थे। एक वेटर ने रघु को इशारा किया कि शैम्पेन की ट्रे ले कर वहाँ पहुँचाए। रघु ट्रे ले कर बढ़ा। भीड़ घनी थी। किसी का कोहनी लगा, ट्रे डगमगाई, और एक गिलास छलका। बस एक गिलास। और उसकी चंद बूँदें बृज सहगल की बेदाग़ सफ़ेद शेरवानी की आस्तीन पर गिर गईं।
पूरी लॉबी जैसे एक पल को रुक गई।
बृज ने धीरे से अपनी आस्तीन देखी। फिर रघु को।
"तुम्हें पता है ये कितने की है?" बृज की आवाज़ शहद की तरह मीठी थी, और उतनी ही ज़हरीली। "नहीं, तुम्हें क्या पता होगा। तुम्हारी पूरी ज़िंदगी की कमाई इस एक आस्तीन के बराबर नहीं है।"
"माफ़ी, साहब," रघु ने सिर झुका लिया। "ग़लती हो गई।"
"ग़लती?" बृज की आवाज़ अब ऊँची हो गई थी, ताकि हर मेहमान सुने। ताकि वो दुबई वाला निवेशक देखे कि सहगल अपने घर में कैसे राज करते हैं। "तुम जैसे लोग ग़लती नहीं करते। तुम जैसे लोग ख़ुद एक ग़लती होते हो। किसने रखा तुम्हें? किसकी हिम्मत हुई कि मेरे जलसे में ऐसा... कूड़ा खड़ा कर दे।"
रघु चुप रहा। नज़र फ़र्श पर।
और फिर बृज सहगल ने हाथ उठाया, और भरी महफ़िल में, हर कैमरे, हर हीरे, हर मुस्कान के सामने, रघु के गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया।
आवाज़ संगमरमर की लॉबी में गूँजी, ठीक वैसे जैसे बारह साल पहले हथकड़ी की आवाज़ गूँजी थी।
रघु का चेहरा एक तरफ़ झुक गया। गाल पर लाल निशान उभर आया। एक पल, सिर्फ़ एक पल को, उसकी झुकी हुई नज़र ऊपर उठी और बृज की आँखों से टकराई। और उस एक पल में, उस नौकर की आँखों में दीनता नहीं थी। बर्फ़ थी। एक ऐसी गहरी, शांत बर्फ़ कि अगर बृज सहगल ने ध्यान दिया होता, तो उसकी रीढ़ में कँपकँपी दौड़ जाती।
पर बृज ने ध्यान नहीं दिया। बड़े लोग नौकरों की आँखों में नहीं देखते।
"निकालो इसे," बृज ने रूमाल से आस्तीन पोंछते हुए कहा, मुँह फेर कर। "और कल से इसकी शक्ल मुझे इस होटल में न दिखे।"
दो गार्ड आए। रघु को बाँह से पकड़ा। उसने कोई विरोध नहीं किया। वो चुपचाप, सिर झुकाए, उस लॉबी से बाहर खींच लिया गया जो आधी उसके पिता की थी, और पूरी अब उसकी होने वाली थी। पीछे, मेहमान फिर हँसने लगे, गिलास फिर टकराने लगे, और बृज सहगल फिर गरुड़ की शान में क़सीदे पढ़ने लगा, उस गरुड़ की, जिसे गार्ड अभी अभी दरवाज़े से बाहर फेंक कर आए थे।
रात के दो बजे।
समंदर के किनारे, इम्पीरियल से कुछ ही दूर, एक काली गाड़ी खड़ी थी। उसके अंदर, पीछे की सीट पर, अब कोई झुके कंधों वाला नौकर नहीं बैठा था।
रघु की वर्दी उतर चुकी थी। बैठा था शौर्य प्रताप। पीठ सीधी, कंधे ताने हुए, और चेहरे पर वो शांति जो सिर्फ़ बहुत गहरे ग़ुस्से या बहुत पुराने वादे से आती है। गाल पर अब भी थप्पड़ का हल्का निशान था। उसने उसे छुआ तक नहीं।
उसके सामने, गोद में रखे लैपटॉप की नीली रोशनी में, एक दस्तावेज़ खुला था। ऊपर लिखा था, गरुड़ कैपिटल। और नीचे, क़ानूनी भाषा की कई परतों के बाद, एक आख़िरी लाइन।
इस तारीख़ से, द ग्रैंड इम्पीरियल होटल का सम्पूर्ण ऋण गरुड़ कैपिटल के अधिकार में स्थानांतरित किया जाता है। बहुमत लेनदार। निर्णय का अधिकार। गरुड़।
ड्राइवर ने पीछे देखे बिना कहा, "सर, बैंक ने आख़िरी काग़ज़ भी भेज दिए हैं। बस आपके दस्तख़त बाक़ी हैं। एक बार आपने साइन किया, तो इम्पीरियल की हर ईंट क़ानूनन गरुड़ के हाथ में होगी। सहगल को पता तक नहीं चलेगा, जब तक आप न चाहें।"
शौर्य ने स्क्रीन की तरफ़ देखा। फिर खिड़की से बाहर, अंधेरे में डूबे उस होटल की तरफ़, जिसकी एक एक खिड़की वो बंद आँखों से बना सकता था।
उसने अपने गाल पर उभरे निशान पर एक उँगली रखी, बहुत हल्के से, जैसे कोई किसी पुराने ज़ख़्म को नहीं, किसी नए वादे को छू रहा हो।
"थप्पड़ अच्छा था, सहगल साहब," उसने धीरे से कहा, उस ख़ाली गाड़ी से, जैसे बारह साल पहले एक बच्चे ने एक ख़ाली रात से कहा था। "ब्याज समेत लौटाऊँगा।"
और फिर शौर्य प्रताप ने उँगली उठाई, और स्क्रीन पर, उस आख़िरी लाइन के नीचे, अपने दस्तख़त कर दिए।
होटल की लॉबी में, उसी वक़्त, बृज सहगल अपने मेहमानों से कह रहा था कि गरुड़ ख़ुशनसीब है जो इम्पीरियल का हिस्सा बनेगा।
उसे नहीं पता था कि जिस नौकर को उसने अभी अभी थप्पड़ मार कर बाहर फिंकवाया था, अब वही उसके महल की एक एक ईंट का मालिक था।
नौकर नहीं। मालिक।
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