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Chapter 12 of 15

आख़िरी चाल

नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi

कुछ चालें इसलिए आख़िरी होती हैं कि उन्हें चलने के लिए आदमी को अपना सबसे पुराना मुखौटा मेज़ पर रखना पड़ता है। और एक बार रखा हुआ चेहरा, दोबारा नहीं उठता।

सहगल हाउस में उस सुबह सूरज देर से चढ़ा। या शायद बृज सहगल को ऐसा लगा, क्योंकि वो रात भर एक ही वाक्य के साथ जागता रहा था, जो उसके बेटे ने कल रात उसकी मेज़ पर रख दिया था। उनका नौकर ही गरुड़ है।

हीरे की अँगूठी अब भी वहीं पड़ी थी, जहाँ रात उसकी काँपती उँगली से फिसली थी। करण खिड़की के पास खड़ा था, बाहर देखता, पर देख कुछ नहीं रहा था।

"बारह हफ़्ते वो मेरी लॉबी में मेरा पानी बाँटता रहा," बृज की आवाज़ भारी थी, "और मैंने उसके गाल पर हाथ उठाया। भरी महफ़िल में।"

"वो बात पीछे की है, पापा।" करण मुड़ा नहीं। "मैं ये सोच रहा हूँ कि वो आया क्यों।"

"मेरा महल हड़पने।"

"नहीं।" अब करण मुड़ा, चेहरा सफ़ेद। "जिस आदमी के पास इस शहर के बैंक ख़रीदने का पैसा हो, वो बारह हफ़्ते किसी की लॉबी में झाड़ू नहीं लगाता, सिर्फ़ एक इमारत के लिए, जो वो एक दस्तख़त से ले चुका है। वो इसलिए रुका रहा कि इस घर में कुछ ऐसा है जो उसके पैसे से नहीं खुलता।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "वो आग वाली फ़ाइल। उद्घाटन की रात वाली।"

"वो फ़ाइल दफ़न है," बृज की आवाज़ खुरदरी हुई। "बारह साल से सील।"

"फ़ाइल बंद होगी। पर उसका वो एक पन्ना, जो दादाजी ने निकलवा कर अलग रखवाया था, वो आज भी कहीं साँस ले रहा है। और अगर ये नौकर बारह साल सिर्फ़ उसी पन्ने के लिए बैठा रहा, तो उसे पता है कि उस पर किसका नाम है।"

बृज ने आँखें बंद कर लीं, और बारह साल बाद पहली बार एक नाम उसके होंठों तक आया, और आते ही गला सूख गया, जैसे उस नाम पर अब भी राख जमी हो। "देवराज।"

"जब तक वो पन्ना उसके हाथ नहीं," करण ने उस नाम को जल्दी से दबा दिया, "गरुड़ सिर्फ़ एक लेनदार है। पैसे वाला, पर ख़ाली हाथ। उससे हम अदालतों में बरसों लड़ सकते हैं। पर जिस दिन वो पन्ना उसके हाथ लगा, वो लेनदार नहीं, गवाह बन जाएगा। और हम मुजरिम।"

बृज उठा, और हर क़दम के साथ उसके कंधे थोड़ा और झुकते गए। "तो उसे ख़त्म करो। आज। अभी।"

"दादाजी ने उसे जलाया नहीं था।" करण की आँखों में अब वही ठंडक थी जो उसके परदादा की रही होगी। "जो लोग इंसाफ़ का गला घोंटते हैं, वो सबूत संभाल कर रखते हैं, इस उम्मीद में कि ज़रूरत पड़ी तो दोबारा घोंट सकें। वो पन्ना उसी काले बक्से में है, जो साल में एक बार बैंक जाता है।"

बृज ठिठका। "वो बक्सा अम्मा के पास है।"

"हाँ। बारह साल से उस लॉकर तक पहुँच उन्हीं के हाथ में है।"

"अम्मा को बुलाओ।" बृज की आवाज़ फिर पत्थर हुई, पर पत्थर के नीचे एक दरार। "आज मुझे वो बक्सा चाहिए। और आज सुबह बोर्ड बैठेगा। हम कहेंगे, गरुड़ ने धोखे से, एक जासूस अपने घर में बिठा कर ये क़र्ज़ हथियाया है। और उस मिले हुए वक़्त में वो पन्ना राख हो जाएगा। जिस दिन सबूत जलेगा, देवराज का बेटा सिर्फ़ एक और क़र्ज़दार रह जाएगा। और क़र्ज़दारों से सहगल डरते नहीं।"


तीन मंज़िल नीचे शौर्य उस सुबह बारह साल में पहली बार बिना मुखौटे के बैठा था। उसे किसी ने नहीं बताया था कि करण ने बृज को सब बता दिया है, पर बारह हफ़्ते किसी घर में छिप कर रहने वाला आदमी भी उस घर की साँस पढ़ना सीख जाता है, और आज सुबह इम्पीरियल की साँस बदली हुई थी। जो गार्ड कल तक उसकी तरफ़ देखते भी नहीं थे, आज उनकी नज़रें उसका पीछा कर रही थीं।

दरवाज़ा बिना दस्तक के खुला, और बिट्टू अंदर आया, पर आज उसके चेहरे पर वो लॉटरी वाली चमक नहीं थी।

"भाई।" उसकी आवाज़ दबी हुई थी, जो बिट्टू के लिए सबसे बड़े ख़तरे की निशानी थी। "पूरी रात बड़े साहब का कमरा जलता रह्या, सुबह वकील को बुलाया, बोर्ड की मीटिंग रखी ग्यी। और करण साहब का वो गंजा आदमी तेरे को ढूँढ रह्या सै। इस बार चाय मँगवाने के लिए ना, भाई, उसकी आँख में कुछ और सै।" वो और झुक गया। "और फेकू काका को सुबह ऊपर बुलाया, बेचारा काँपता लौटा। बोले, बड़े साहब दादी जी का वो काला बक्सा पूछ रहे थे, वही जो साल में एक बार बैंक जावै सै।"

शौर्य की रगों में बर्फ़ दौड़ गई। जिस गुम पन्ने को वो बारह साल से ढूँढ रहा था, वो उसी काले बक्से में था। और बृज अब उसे ढूँढने नहीं, जलाने जा रहा था।

"तूने ऐसा क्या कर दिया, भाई?" बिट्टू की आवाज़ छोटी हो गई। "मैं कुछ ना समझूँ। पर जब बड़े लोग रात भर जागैं, तो सुबह किसी छोटे आदमी की शामत आवै सै। और इस घर में तेरे से छोटा कोई ना।"

शौर्य उठ खड़ा हुआ, और बिट्टू ने पहली बार उसे अपने पूरे क़द पर सीधा खड़ा देखा, बिना झुके कंधों के। एक पल को उसे लगा उसके सामने कोई और खड़ा है। "आज मुझे तेरी मदद चाहिए, बिट्टू। पूछेगा नहीं कि क्यों?"

बिट्टू ने उस नई सीधी पीठ को देखा। "ना भाई। आज ना पूछूँगा। तू बस बता, करना क्या सै।"


जंग के उस पुराने कमरे में, जहाँ अब भी मेहता की मरी हुई मोहलत के काग़ज़ बिखरे थे, आन्या उसका इंतज़ार कर रही थी। वो भी रात नहीं सोई थी। बृज के दरवाज़े से लौट कर उसने पूरी रात वही किया था जो वो सबसे अच्छा जानती थी। हिसाब।

शौर्य अंदर आया।

"मैं तुम्हारे लिए नहीं आई।" आन्या ने तुरंत कहा, पर इस बार उसमें कल रात वाली धार नहीं, सिर्फ़ थकान थी। "मैं रात भर तुमसे नफ़रत करने की कोशिश करती रही, शौर्य, और नहीं कर पाई।"

वो मेज़ के पास आई। "वो पन्ना। बारह साल से इस खेल का असली मोहरा वही है। तुम्हारे पास सब कुछ है, बस वो एक पन्ना नहीं। और जो तुम्हारे पास नहीं, वो अब उनके पास है, और वो उसे जला देंगे।"

"मुझे पता है। आज सुबह।"

"तो हम यहाँ खड़े बातें क्यों कर रहे हैं?"

"हम?" शौर्य ने उसे देखा।

आन्या एक पल रुकी, जैसे वो लफ़्ज़ बिना इजाज़त निकल गया हो। फिर उसने उसे वापस नहीं लिया। "हाँ। हम। पर मेरी शर्त पर। मैं इंसाफ़ के साथ खड़ी हूँ, तुम्हारे बदले के साथ नहीं। तुम्हारे बाप का नाम उस दीवार पर वापस लगेगा, और बृज और करण का हिसाब क़ानून से होगा, सबके सामने। पर ये होटल नहीं गिरेगा। फेकू काका, बिट्टू, वो चार सौ लोग बचेंगे। तुम इस महल के मालिक बनोगे, शौर्य, इसे राख करने वाले नहीं। ये वादा करो, वरना मैं इन्हीं चार सौ के साथ तुम्हारे रास्ते में खड़ी मिलूँगी।"

शौर्य बहुत देर चुप रहा। कल रात इसी औरत ने उससे यही सवाल पूछा था, और उसके पास कोई जवाब नहीं था।

"कल रात तुमने पूछा था कि मुझे इंसाफ़ चाहिए या सब राख करना। जवाब नहीं था। आज है।" उसने उसकी तरफ़ देखा। "मेरे बाप ने एक बार कहा था, मालिक बनना आसान है, ईमानदार मालिक बनना मुश्किल। बारह साल मैं वो बात भूल गया। तुमने याद दिला दी। तुम्हारी हर शर्त मंज़ूर है, आन्या। चार सौ में से एक की भी छत नहीं गिरेगी। मेरा वादा।"

आन्या ने एक लंबी साँस छोड़ी, फिर उसका मैनेजर वाला दिमाग़ लौट आया। "तो सुनो, वक़्त कम है। हमें वो पन्ना जलने से रोकना है, पर लॉकर तक हम नहीं पहुँच सकते, वो सहगल के नाम पर खुलता है। तो उसे बचाने का एक ही रास्ता है। बृज के हाथ बाँधना।"

"कैसे?"

"तुम्हारा गरुड़ बहुमत लेनदार है।" उसकी आवाज़ में अब वही तेज़ी थी जो उसके सबसे अच्छे पलों की पहचान थी। "जिस पल वो अपना पूरा क़र्ज़ औपचारिक रूप से, बोर्ड के सामने वसूल करे, उस पल सहगल की हर गिरवी रखी चीज़, हर लॉकर, लेनदार की निगरानी में आ जाएगी। उसके बाद बृज उस बक्से को क़ानूनन छू भी नहीं सकता। पन्ना वहीं जम जाएगा, और हम उसे क़ानून की रोशनी में बाहर निकालेंगे।"

"पर ये काम खन्ना नहीं कर सकता," शौर्य ने धीरे से कहा।

"नहीं। बारह साल तुमने हर चाल किसी और के हाथ से चलवाई। एक बेनाम काग़ज़ को बोर्ड बरसों लटका सकता है। पर अगर गरुड़ ख़ुद, अपने पैरों पर उस कमरे में खड़ा हो जाए, तो उसे कोई नहीं रोक सकता।" वो रुकी। "तुम्हें छुपना छोड़ना होगा, शौर्य। आज। उस बोर्डरूम में, उन्हीं लोगों के सामने जिन्होंने तुम्हें नौकर बनाया।"

दोनों एक-दूसरे के बहुत पास खड़े थे, और उनके बीच वो बारिश वाली रात अब भी थी, पर अब वो न पुल थी, न दीवार, बस एक पुराना ज़ख़्म।

शौर्य का हाथ उठा, उस बारिश वाली रात की तरफ़ लौटता हुआ, आन्या के चेहरे की तरफ़।

"नहीं।" आन्या ने धीरे से कहा, पर पीछे नहीं हटी। उसने अपनी उँगलियों से उसकी कलाई छू कर उस हाथ को नरमी से नीचे कर दिया। "अभी नहीं। मेरा भरोसा अभी टूटा हुआ है। जुड़ने में वक़्त लगेगा, अगर जुड़ा तो। आज हम साथी हैं, इससे ज़्यादा मत माँगो। ये मैंने अपनी समझ से चुना है, अपने दिल की किसी कमज़ोरी से नहीं।" फिर बहुत धीरे, "पर चुना ज़रूर है। और बारह साल में पहली बार, तुम ये चाल अकेले नहीं चलोगे।"

उनकी उँगलियाँ एक पल को उलझीं, फिर अलग हुईं। ये कोई वादा नहीं था, पर इस वक़्त इतना ही काफ़ी था।

"पर एक चीज़ अभी अधूरी है।" आन्या काग़ज़ों की तरफ़ मुड़ी। "तुम पन्ने को लॉकर में जमा भले कर दो, निकालोगे कैसे? वो सहगल के नाम पर खुलता है। हमें इस घर का एक हाथ चाहिए जो उसे खोल सके, और जो हमारी तरफ़ हो। और ऐसा एक ही हाथ है।"

दोनों की नज़र एक साथ ऊपर उठी, उस मंज़िल की तरफ़ जहाँ एक बूढ़ी औरत बारह साल से एक दीये और एक पुराने गुनाह के साथ अकेली बैठी थी।


दादी का कमरा वैसा ही था, वक़्त से कटा हुआ। दीया जल रहा था, उसके पास चाँदी के फ़्रेम में वही सख़्त जबड़े वाले बूढ़े आदमी की तस्वीर, जिसने बारह साल पहले एक झूठ को आग दी थी। पर आज दादी उसकी तरफ़ पीठ किए बैठी थीं, गोद में एक पुराने दुपट्टे में लिपटी कोई चीज़ थामे।

"बृज ने मुझे बुलाया है," उन्होंने बिना सिर उठाए कहा, उस ठहराव से जो बारह साल का बोझ आख़िर उतार देने पर आता है। "सुबह से तीन बार। उसे मेरा काला बक्सा चाहिए। बारह साल में मेरे बेटे ने इस बक्से के बारे में कभी नहीं पूछा। आज पूछ रहा है। तो मैं समझ गई, वो जान गया है कि इसमें क्या है।"

"दादी जी, वो पन्ना..." आन्या आगे बढ़ी।

"बैठो, बेटी।" दादी ने सिर उठाया, और उनकी धुँधली आँखें आन्या पर, फिर शौर्य पर टिकीं। "आज मैं वो बात कहूँगी जो बारह साल से मेरे सीने में एक काँटे की तरह गड़ी है। और शायद इसके बाद मेरा अपना बेटा मुझे कभी माफ़ न करे।"

"उस रात के बाद, जब देवराज को ले गए, मेरे पति ने एक काम और किया। आग की उस सरकारी फ़ाइल में से उसने वो एक पन्ना निकलवा लिया, जिस पर लिखा था कि आग असल में किसके हुक्म पर लगी। पर जलाया नहीं। मैंने पूछा, जला क्यों नहीं देते? वो हँसा। बोला, ये मेरी बीमा-पॉलिसी है, सावित्री। जिस दिन कोई मेरा गिरेबान पकड़ेगा, मैं ये दिखा कर उसे ख़रीद लूँगा।" दादी की आवाज़ काँपी। "एक बेगुनाह का इंसाफ़, उसने एक हथियार बना कर रख लिया।"

शौर्य के जबड़े की हड्डी कस गई, पर वो चुप रहा।

"एक दिन, जब मेरे पति शहर से बाहर थे, मैंने उनकी तिजोरी खोली और वो पन्ना चुरा लिया। पर करती क्या? दिखा देती, तो मेरा बेटा बरबाद होता, मेरे घर का नाम राख होता। जला देती, तो वो इकलौता सबूत जो देवराज को बेगुनाह कह सकता था, हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता। मैं न उसे दिखा सकती थी, न मिटा सकती थी। तो मैंने उसे अपने काले बक्से में छुपा दिया, एक ऐसे लॉकर में जिसकी चाबी बारह साल से सिर्फ़ मेरे पास रही।" एक आँसू उनकी झुर्री की राह उतरा। "बारह साल मैंने एक बेगुनाह का इंसाफ़ अपनी गोद में उठाए घूमी, बेटा, साल में एक बार उसे देखती, फिर वापस अँधेरे में बंद कर देती।"

दादी ने धीरे से वो दुपट्टा खोला। अंदर कोई पन्ना नहीं था। अंदर एक छोटी, पुरानी, पीतल की चाबी थी।

"पन्ना यहाँ नहीं है। वो आज भी उसी लॉकर में है। ओरिएंटल मर्केंटाइल बैंक, फ़ोर्ट की सबसे पुरानी शाखा। लॉकर सहगल के नाम है, और ये उसकी चाबी।"

"पर ये चाबी अकेली काफ़ी नहीं," आन्या ने धीरे से कहा। "बृज भी सहगल है। उसके पास भी उस तक पहुँच है।"

"हाँ। अगर बृज पहले बैंक पहुँच गया, तो पन्ना जल जाएगा, और ये चाबी बस ज़ंग खाया लोहा रह जाएगी। पहले उसके हाथ बाँधने होंगे।"

"दादी जी, आप ये कर रही हैं, अपने ही बेटे के ख़िलाफ़?" शौर्य की आवाज़ भारी थी।

दादी ने उसकी तरफ़ देखा। "बारह साल पहले, इसी कमरे में, मैंने अपने बेटे का चेहरा देखा, और चुप रह गई, ये सोच कर कि मैं अपना घर बचा रही हूँ। पर जो घर एक बेगुनाह की हड्डियों पर खड़ा हो, वो घर नहीं, क़ब्र होता है। मैं उसमें बारह साल जी चुकी। अब और नहीं।"

उन्होंने वो चाबी शौर्य की हथेली पर रखी, और अपने दोनों काँपते हाथों से उसकी मुट्ठी बंद कर दी। "मैंने तेरे बाप को दफ़न करने में अपनी ख़ामोशी से मदद की थी। आज उसका नाम वापस लाने में अपनी आख़िरी साँस से मदद करूँगी। ये एक बूढ़ी औरत का आख़िरी गुनाह नहीं है, बेटा। उसकी पहली नेकी है।"


ग्यारह बजने में तीन घंटे थे, और जंग के उस कमरे में अब चार लोग खड़े थे।

बिट्टू, जो एक कोने में मुँह खोले सब सुन रहा था, आख़िरकार फट पड़ा। "रुको रुको। मेरा भेजा घूम रह्या सै। ये सब गरुड़-वरुड़ की बात, और बीच बीच में बार बार तेरा नाम।" उसने शौर्य की तरफ़ देखा, और उसकी आँखें बड़ी होती गईं। "भाई। तू... तू वो गरुड़ सै? वो बड़ा वाला, जिसके नाम से बड़े साहब रात को काँपैं सैं? वो, जो इस पूरे होटल का मालिक सै?"

शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

बिट्टू धम्म से एक कुर्सी पर बैठ गया। "और मैं तेरे को रोज़ अपनी टूटी खटिया पे बिठा के, अपने डिब्बे का आधा परांठा खिलाता रह्या। पूरे मुंबई के मालिक को। और एक दिन तो चाय के दो रुपये भी उधार दिए थे।" वो नक़ली ग़ुस्से से मुड़ा। "वो दो रुपये अब ब्याज समेत लौटाने पड़ेंगे, सेठ जी।"

और इस पूरे भारी माहौल में, बारह साल बाद, शौर्य प्रताप सच में हँस पड़ा, एक छोटी, थकी, पर सच्ची हँसी। "लौटाऊँगा, बिट्टू। ब्याज समेत। ये भी एक वादा रहा।"

बिट्टू उठ खड़ा हुआ, हथेलियाँ आपस में रगड़ते हुए, जैसे कुश्ती से पहले पहलवान करता है। "ठीक सै, सेठ जी। तो आज क्या उखाड़ना सै? नीचे का सारा अमला मेरा सै। रसोई, लिफ़्ट, गाड़ी, फेकू काका, सब।"

शौर्य की आवाज़ में अब वो हुक्म लौट आया था जिसे उसने बारह साल छुपाए रखा था। "फेकू काका वो बक्सा बृज को नहीं देंगे। काका से कहो, बक्सा ग्यारह बजे तक 'खो' जाए। उसके बाद बृज उसे क़ानूनन छू नहीं पाएगा। और करण के आदमी रघु को ढूँढ रहे हैं? तो ग्यारह बजे तक रघु उन्हें नीचे ही उलझाए रखेगा, हर मंज़िल पर मिलता रहेगा, बस उस एक कमरे को छोड़ कर जहाँ उन्हें चाहिए।"

बिट्टू दाँत निकाल कर हँसा। "ये काम मेरा। रघु जैसी झुकी पीठ तो मैं सोते में भी बना लूँ।"

"और मैं," आन्या ने काग़ज़ समेटे, "बोर्ड को आज का औपचारिक एजेंडा भेजूँगी, लिखित, कि बहुमत लेनदार का प्रतिनिधि आज की बैठक में अपना क़र्ज़ ख़ुद वसूल करने आएगा। फिर बृज तुम्हें उस कमरे से निकाल नहीं सकता। तुम वहाँ अपने हक़ से जाओगे।"

दादी धीरे से उठीं। "और मैं भी उस कमरे में रहूँगी। मेरा बेटा अपनी माँ को उस कमरे से बाहर नहीं कर सकता। और जब वक़्त आएगा, तो इस घर का एक सहगल हाथ उस लॉकर को खोलेगा, सच को बाहर लाने के लिए, छुपाने के लिए नहीं।"

बारह साल एक आदमी ने ये पूरी बिसात अकेले बिछाई थी, हर मोहरा अकेले चला था। आज, पहली बार, मेज़ की उसकी तरफ़ तीन और लोग खड़े थे। आख़िरी चाल अकेले चलने वाली चाल नहीं थी।


ग्यारह बजने में कुछ मिनट थे।

ख़ानदानी विंग के उस गलियारे में, जो कभी किसी नौकर के लिए नहीं था, शौर्य प्रताप अकेला खड़ा था। बारह हफ़्ते उसने रघु की वो वर्दी हर सुबह किसी उधार के कोट की तरह पहनी थी, और हर रात उतार दी थी। उस कोट के नीचे एक आदमी छुपता था जिसे दुनिया रघु कहती थी, और उस रघु के पीछे एक और, जिसका नाम बारह साल किसी ने ज़बान पर नहीं रखा। आज, पहली बार, छुपने को कोई कोट नहीं था, और उसके पीछे कोई दूसरा आदमी भी नहीं।

उसने आज एक सादा, गहरे रंग का सूट पहना था। बस वो आदमी, जो सात साल की उम्र में एक जलते महल की राख के सामने खड़ा था, और जो अब उन्तीस का होकर एक बंद दरवाज़े के सामने।

आन्या उसके पास आई, और बिना कुछ कहे उसके सूट की वो कॉलर सीधी कर दी जो ज़रा सी मुड़ी थी, उसी तरह जैसे बारह हफ़्ते पहले उसने पहली बार एक नौकर की झुकी वर्दी देखी थी और सोचा था कि ये आदमी कुछ और है।

"डरे हुए हो?" उसने धीरे से पूछा।

"नहीं।" शौर्य ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "बारह साल इसी दरवाज़े के पीछे जाने के लिए जिया हूँ। डर तो उन दिनों था, जब इसके बाहर खड़ा रहना पड़ता था।"

दरवाज़े के उस पार वो लोग बैठे थे जिन्होंने उसे नौकर बनाया था। बृज, जिसने भरी महफ़िल में उसके गाल पर हाथ उठाया था। करण, जिसने उसे अपना मोहरा समझा था। बारह हफ़्ते वो उन्हें बिना दिखे चलाता रहा था, किसी और को अपनी जीत की तालियाँ बटोरने देता। और आज, उस सबको ख़त्म करने के लिए, उसे दिखना था। पूरी रोशनी में, उन्हीं की मेज़ पर।

उसने अपना हाथ उस ठंडे, भारी दरवाज़े पर रखा।

शौर्य प्रताप ने एक गहरी साँस ली, और बोर्डरूम का दरवाज़ा धकेल दिया।

नौकर अंदर जा रहा था।

मालिक बाहर निकलेगा।

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