Chapter 5 of 15
पहचाना चेहरा
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
करण की जाँच रघु का रिकॉर्ड बिल्कुल साफ़ निकालती है, और उसका शक और गहरा हो जाता है। उसी दिन इम्पीरियल की क़िस्मत तय करने आए एक संप्रभु कोष के सामने, ऐन मौक़े पर पूरा होटल अँधेरे में डूब जाता है। रघु तहख़ाने से, किसी की नज़र में आए बिना, उसे बचा लेता है, और सहगल खुलेआम वाहवाही लूट लेते हैं। पर अब आन्या को पक्का यक़ीन है कि उसकी इमारत में एक दिमाग़ चुपचाप चल रहा है। और तभी, एक गलियारे में, बूढ़ी दादी रघु का हाथ थाम लेती हैं, क्योंकि उन्होंने उसके चेहरे में देवराज को देख लिया है।
बारह साल किसी झूठ को ज़िंदा रखना एक हुनर है। उसे किसी की जाँच में मरने न देना, उससे बड़ा।
दो दिन बाद, करण के दफ़्तर में, भनोट एक पतली नीली फ़ाइल लिए खड़ा था, और उसका सपाट चेहरा पहली बार थोड़ा उलझा हुआ था।
"बोल। क्या निकला उस झाड़ू वाले के बारे में?"
"सब साफ़ है, साहब।" भनोट ने फ़ाइल मेज़ पर रखी। "एम्पायर स्टाफ़िंग एजेंसी से पूरा रिकॉर्ड मँगवाया। पिता का नाम, गाँव का पता, आधार। पिछले छह साल में तीन होटलों में काम किया, पुणे, नासिक, एक क्रूज़ लाइन पर। हर जगह से रेफ़रेंस है, हर जगह यही लिखा है, चुपचाप काम करता है, ईमानदार है। एक भी दाग़ नहीं।"
करण ने फ़ाइल पलटी, एक एक पन्ना, जैसे काग़ज़ को घूरने से उसमें से कोई झूठ टपक पड़ेगा।
"एक भी दाग़ नहीं," उसने दोहराया, आवाज़ में तारीफ़ नहीं, और गहरा शक। "भनोट, जिस आदमी की पूरी ज़िंदगी में एक भी दाग़ न हो, वही सबसे ख़तरनाक है। असली ज़िंदगी इतनी साफ़ नहीं होती। इस झाड़ू वाले की कैसे है?"
"हो सकता है वो सच में बस एक मामूली..."
"नौकर हो? जो धड़कते सौदे बचा लेता है? जो आंधेरी के पते पहचान लेता है?" करण खिड़की के पास गया, नीचे लॉबी में जहाँ दूर एक कोने में वही झुके कंधों वाला आदमी पीतल की रेलिंग चमका रहा था। "काग़ज़ साफ़ होने का मतलब आदमी साफ़ नहीं, इसका मतलब काग़ज़ बहुत अच्छी तरह बनाया गया है। और इतना अच्छा काग़ज़ एक झाड़ू वाला नहीं बनवा सकता। कोई और है इसके पीछे।"
"उस पर नज़र रख। चौबीस घंटे। एक दिन ये फिसलेगा। और जिस दिन फिसला..." करण मुड़ा, और मुस्कुराया, बर्फ़ से। "...उस दिन मुझे ये नहीं चाहिए कि ये साफ़ निकले। उस दिन मुझे वो चाहिए, जो ये छुपा रहा है।"
और इस तरह गरुड़ का बारह साल में बुना झूठ करण की जाँच के सामने बेदाग़ अड़ा रहा। पर जिस शिकारी को शिकार न मिले, वो शिकार करना बंद नहीं करता। वो धीरज सीख लेता है। और धीरज वाला शिकारी सबसे ख़तरनाक होता है।
फिर इम्पीरियल पर वो दिन आया जिसने बारह सौ कमरों की साँस रोक दी।
"राघु भाई! राघु!" बिट्टू भागता हुआ आया, साँस फूली हुई, चेहरा ऐसे चमकता हुआ जैसे लॉटरी लग गई हो। "सुना तूने? कल बहुत बड़ी पार्टी आ री है। कोई बड़ा फ़ंड है, खाड़ी का। समंदर पार का पैसा। उनका भारत वाला बड़ा अफ़सर, कोई मिस्टर मेहता, कल पूरा होटल देखने आ रहा है। और अगर उसने हाँ कह दी ना, तो इतना पैसा आएगा कि होटल का सारा क़र्ज़ एक झटके में चुक जाएगा। बैंक भी ख़त्म, और वो... वो गरुड़ वाला डर भी ख़त्म।"
रघु का हाथ एक पल को रुका। तो ये थी सहगलों की आख़िरी उम्मीद। एक नया मसीहा, जिसके पैसे से वो गरुड़ के शिकंजे से निकल भागें। और जिस मसीहा को ढूँढने वो समंदर पार देख रहे थे, वो उनके अपने तहख़ाने में, उनका ही गुलदान चमका रहा था।
"और करण साहब का तो भाई दिमाग़ ही घूम गया है," बिट्टू आगे बढ़ा। "हुक्म दिया है, कल इम्पीरियल का एक एक झूमर जलेगा। हर बत्ती, हर फ़व्वारा, बड़ी स्क्रीन, सब एक साथ। बोले, मेहता को दिखाना है कि इम्पीरियल राजा है। और राजा अँधेरे में नहीं रहता।"
रघु ठिठक गया। उसने इस महल की हर ईंट याद की थी, और हर ईंट के साथ हर तार भी। वही पुराना ट्रांसफ़ॉर्मर, वही सस्ते तार जो उसके पिता ने बारह साल पहले बदलवाने को कहा था और बदले कभी नहीं गए। गर्मी का मौसम, हर एसी पूरी ताक़त पर, और उसके ऊपर हर झूमर, हर स्क्रीन एक साथ।
"बिट्टू, ये नहीं चलेगा," उसने धीरे से कहा। "इतना सारा एक साथ नहीं चलेगा। ट्रांसफ़ॉर्मर बैठ जाएगा। ऐन उसी वक़्त, जब सब रोशनी सबसे ज़्यादा होगी।"
"तुझे कैसे बेरा? तू तो झाड़ू..."
रघु ने तुरंत सिर झुका लिया, आवाज़ फिर दीन हो गई। "बस... पुराना नत्थू बोल रहा था। जो लिफ़्ट भी देखता है, और नीचे का स्विचरूम भी।"
"तो ये बात ऊपर बता ना!"
"कौन सुनेगा, बिट्टू? आजकल नीचे से जो भी ऊपर एक लफ़्ज़ कहे, करण साहब को उसमें साज़िश दिखती है। नीचे का आदमी अगर आग की चेतावनी भी दे, तो ऊपर वाले उसे आग लगाने वाला समझते हैं।"
बिट्टू चुप हुआ। "तो... होगा क्या?"
रघु ने गुलदान उठाया। "वही जो होना है। बत्तियाँ बुझेंगी, ऐन उस वक़्त जब सहगल अपनी सबसे बड़ी रोशनी दिखा रहे होंगे।" वो रुका, आवाज़ और धीमी हुई। "तू एक काम कर। नीचे जा के नत्थू से कह, आज रात पुराना जेनरेटर भरा रहे, तेल पूरा, और स्विचरूम की चाबी अपने पास रख ले। बस... एहतियात। फिर देखते हैं, अँधेरे में कौन रास्ता जानता है।"
बिट्टू के जाने के बाद रघु एक पल वहीं खड़ा रहा, और वो सवाल उसके मन में कौंधा जो बिट्टू पूछना भूल गया था: जो आदमी इस होटल को निगलने के लिए बारह साल से बैठा है, वो इसे डूबने से क्यों बचाए? पर जवाब वो जानता था। मेहता का पैसा सहगलों का क़र्ज़ चुका सकता था, पर गरुड़ की चाबी मेहता के पास नहीं थी, वो उसकी अपनी जेब में थी। और डूबा हुआ होटल अपने मलबे में उसके पिता की बेगुनाही भी दफ़न कर देता, वो सीलबंद फ़ाइल हमेशा के लिए राख हो जाती। उसे ये इमारत चाहिए थी, साँस लेती हुई, सीधी खड़ी, ताकि जिस दिन वो इसे सहगलों से छीने, छीनने को कुछ बचा हो। इसलिए आज वो उन्हें बचाएगा, और साथ में एक हफ़्ता और झूठी उम्मीद बेच देगा।
अगले दिन दोपहर, इम्पीरियल अपनी पूरी जवानी पहन कर खड़ा था। हर झूमर दहक रहा था, हर फ़व्वारा नाच रहा था। दरारें मोटे कालीनों के नीचे छुपी थीं, और थकान ताज़ी पॉलिश के नीचे।
बॉलरूम में, लंबी मेज़ पर, खाड़ी के उस संप्रभु कोष का भारत-प्रमुख बैठा था। मिस्टर मेहता। सधा हुआ चेहरा, ठंडी आँखें, एक ऐसा आदमी जो होटल नहीं, हिसाब ख़रीदता था। मेज़ के सिरे पर आन्या खड़ी थी।
"मिस्टर मेहता," उसने अगला चार्ट लाते हुए कहा, "इम्पीरियल डूबता जहाज़ नहीं है। ये एक राजा है जो थोड़ा थक गया है।"
मेहता ने उँगली उठाई। "मिस कपूर, आपके चार्ट अच्छे हैं। पर मैं चार्ट ख़रीदने नहीं आया। होटल हमेशा अपने सबसे अच्छे कपड़ों में दिखाया जाता है। मैं उसके सबसे बुरे पल में उसका दम देखना चाहता हूँ।"
करण आगे झुका, मुस्कान चमकाते हुए। "इम्पीरियल का कोई बुरा पल नहीं होता, मिस्टर मेहता। ये रोशनी, ये शान, बारह साल से एक दिन भी नहीं रुकी।"
ठीक उसी पल, जैसे करण के घमंड ने ही उसे बुलाया हो, इमारत ने एक गहरी, थकी हुई आह भरी।
पहले स्क्रीन काँपी। फिर झूमर एक पल को मद्धम हुए, जैसे साँस लेना भूल गए हों। और फिर एक धीमी, भारी 'धक्क' की आवाज़ कहीं बहुत नीचे से उठी, और पूरा बॉलरूम अँधेरे में डूब गया।
हर झूमर बुझ गया, हर स्क्रीन काली, एसी की गूँज थम गई। उस दम घोंटते अँधेरे में सिर्फ़ दो चीज़ें बचीं, मेहमानों की घबराई फुसफुसाहट, और गर्मी, जो पहले ही सेकंड से दीवारों में रेंगने लगी।
अँधेरे में बृज की कुर्सी पीछे खिसकी, पर आवाज़ करण की फटी। "ज... जेनरेटर! कोई बैकअप चलाओ! भनोट! कहाँ है कोई?" पर बैकअप ने जवाब नहीं दिया। मेन ट्रांसफ़ॉर्मर के बैठते ही पुराना ऑटोमैटिक सिस्टम भी खाँस कर बुझ गया था।
मेहता शांत बैठा रहा, अँधेरे में सिर्फ़ उसकी घड़ी चमक रही थी। फिर वो उठ खड़ा हुआ, और उसकी आवाज़ में रत्ती भर गर्मी नहीं थी, सिर्फ़ सूखा हिसाब।
"मिस्टर सहगल। मैं समंदर पार से सात घंटे उड़ कर आया हूँ, एक ऐसे होटल में पैसा लगाने जो अपनी बत्तियाँ भी नहीं जला सकता। मेरी गाड़ी मँगवाइए।"
"मिस्टर मेहता, एक मिनट!" आन्या की आवाज़ अँधेरे को चीरती हुई आई, पर पहली बार उसमें दरार थी। "ये बस एक फ़्यूज़... मैं अभी..." पर वो जानती थी कि ये सिर्फ़ फ़्यूज़ नहीं था। ये पूरी इमारत की वो थकी रीढ़ थी, जो ऐन उस पल टूटी थी जब इम्पीरियल को सबसे सीधा खड़ा होना था।
सौदा, और उसके साथ होटल की आख़िरी उम्मीद, उस अँधेरे में दम तोड़ रही थी।
तीन मंज़िल नीचे, इम्पीरियल के पेट में, जहाँ रोशनी कभी मेहमानों के लिए नहीं जलती, एक झुके कंधों वाला आदमी पहले से अँधेरे में दौड़ रहा था।
रघु को रोशनी की ज़रूरत नहीं थी। जो इमारत बंद आँखों से बना सकता था, वो उसे बंद आँखों से बचा भी सकता था।
"राघु भाई!" बिट्टू टॉर्च लिए पीछे हाँफता आया, नत्थू को घसीटते हुए। "ऊपर तो क़यामत आ गई! वो बड़ा मेहता जा रहा है!"
"चाबी।" रघु ने हाथ बढ़ाया, और उसकी आवाज़ अब दीन नहीं थी। वो किसी और की आवाज़ थी, साफ़, तेज़, हुक्म देती हुई। बिट्टू ने बिना सोचे चाबी थमा दी, और बाद में सोचता रहा कि इतनी जल्दी क्यों थमाई।
रघु ने लोहे का भारी दरवाज़ा खोला। अंदर, पुराने स्विचबोर्ड पर आधे फ़्यूज़ काले पड़े थे।
"नत्थू, मेन लोड गिराओ। बॉलरूम के आधे झूमर, सारे फ़व्वारे, बड़ी स्क्रीन, सब काट दो।" रघु के हाथ तारों पर ऐसे चल रहे थे जैसे कोई पुराना गाना बजा रहा हो। "बोझ हलका करो, तभी ट्रांसफ़ॉर्मर साँस लेगा। फिर जेनरेटर हाथ से चालू करेंगे। बिट्टू, वो लाल वाला हैंडल, मेरे इशारे पर पूरी ताक़त से खींचना।"
"पर भाई, ये सब तुझे..."
"बिट्टू।" रघु ने उसकी तरफ़ देखा, बस एक पल। "आज सवाल मत पूछ। आज बस खींच।"
नत्थू ने लोड गिराया। रघु ने तारों को नई राह दी, ज़रूरी रोशनी एक तरफ़, फ़िज़ूल की चमक दूसरी तरफ़। फिर उसने हाथ उठाया। "अब। खींच।"
बिट्टू ने पूरी ताक़त से लाल हैंडल खींचा। एक पल कुछ नहीं हुआ। फिर, कहीं बहुत गहरे, पुराना जेनरेटर खाँसा, गुर्राया, और जाग गया।
और ठीक उसी पल, बारह साल पहले जो आदमी ऊपर, आग की तरफ़, अपने लोगों को बचाने भागा था, उसका बेटा नीचे, अँधेरे के पेट में, उसी इमारत को बचा रहा था। बाप ऊपर गया था, और लौटा नहीं। बेटा नीचे आया था, और उसने इमारत को साँस लौटा दी।
ऊपर, बॉलरूम में, झूमर एक एक कर के जागने लगे।
रोशनी लौटी, तो पहले से भी तेज़ लग रही थी, जैसे अँधेरे ने उसे धो दिया हो। और उस लौटती रोशनी में, सबसे पहले जो आदमी सँभला, वो बृज सहगल था।
"देखिए, मिस्टर मेहता!" बृज खड़ा हो गया, बाँहें फैलाए, जैसे रोशनी उसी ने लौटाई हो। "यही तो इम्पीरियल है! आधा मिनट में सहगल का होटल ख़ुद को सँभाल लेता है। ये इमारत गिरती नहीं, मिस्टर मेहता। ये सिर्फ़ ज़रा झुक कर फिर खड़ी हो जाती है।"
मेहता ने बृज की तरफ़ देखा, और उसकी ठंडी आँखों में पहली बार थोड़ी दिलचस्पी थी, पर शक अभी बाक़ी था। "आधा मिनट तेज़ था। पर एक अच्छे होटल को बत्ती बुझानी ही नहीं चाहिए।"
"और अब बुझेगी नहीं।" आन्या ने तुरंत बात लपक ली, आवाज़ में फिर वही फ़ौलाद। "जो अभी हुआ, वो इस इमारत की पुरानी बिजली थी, और मेरी पूरी योजना का पहला काम यही रीढ़ बदलना है। आपने आज कमज़ोरी नहीं देखी, मिस्टर मेहता, आपने पता देखा, ठीक वो जगह जहाँ आपका पैसा सबसे तेज़ बढ़ेगा। एक थका राजा सस्ता मिलता है। और सस्ता राजा सबसे अच्छा सौदा होता है।"
मेहता कुछ देर उसे देखता रहा। फिर पहली बार, उसके होंठ ज़रा से मुड़े। "आपका होटल थका है, मिस कपूर। पर आप नहीं।" उसने फ़ाइल बंद की। "ठीक है। एक हफ़्ता और देता हूँ। साफ़ हिसाब भेजिए, मैं फिर आऊँगा। और इस बार... बत्तियाँ जलती रहें।"
वो निकल गया। और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, बृज ने करण के कंधे पर हाथ रखा। "देखा? मैंने सँभाल लिया। ये होटल कभी नहीं गिरेगा, करण। क्योंकि सहगल कभी नहीं गिरता।"
और होटल के पेट में, तेल और पुराने लोहे के बीच, वो आदमी अपने हाथ पोंछ रहा था जिसने अभी अभी सहगलों का महल गिरने से बचाया था। उसने ऊपर की तालियों की गूँज सुनी, जो किसी और के नाम जा रही थी, और उसके होंठ के कोने में वही पुरानी, हल्की मुस्कान आई।
"वाहवाही आप रख लीजिए, सहगल साहब," उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि सिर्फ़ अँधेरा सुने। "मैं बस इमारत रखता हूँ।"
पर एक जोड़ी आँखें थीं जो तालियों की तरफ़ नहीं, अँधेरे की तरफ़ देख रही थीं।
आन्या ने वो आधा मिनट दूसरों की तरह नहीं जिया था। जब सब घबरा रहे थे, उसका दिमाग़ हिसाब लगा रहा था। बैकअप अपने आप नहीं चला। किसी ने उस अँधेरे में, बिना देखे, ठीक वही तार छुए जो छूने थे। और वो कोई सहगल नहीं था, वो तो फ़ोन की रोशनी में आपस में टकरा रहे थे।
सब के जाने के बाद आन्या नीचे उतरी, उन्हीं गलियारों में जहाँ कोई मैनेजर नहीं जाता। और सर्विस सीढ़ियों के पास उसने उसे पाया। वही झुके कंधों वाला अटेंडेंट, हाथों पर काली कालिख, आस्तीन तेल से सनी, माथे पर पसीना जो फ़र्श पोंछने का नहीं था।
"रघु।"
रघु रुका, तुरंत हाथ पीछे किए, सिर झुकाया। "जी, मैडम। बस... नीचे थोड़ा काम था।"
"हाथ दिखाओ।"
"मैडम?"
"हाथ। दिखाओ।"
रघु ने हाथ आगे किए। आन्या ने उन्हें देखा, वो कालिख, वो जली सी गंध। फिर उसका चेहरा।
"ऊपर, अभी, खाड़ी का संप्रभु कोष इसलिए नहीं गया," उसने बहुत धीरे कहा, "क्योंकि किसी ने तीन मंज़िल नीचे, अँधेरे में, एक मरा हुआ जेनरेटर हाथ से ज़िंदा कर दिया। एक ऐसा काम जो इस होटल का चीफ़ इंजीनियर भी रोशनी में नहीं कर पाता। और वो आदमी, जिसके हाथ अभी तेल से काले हैं, मुझे बता रहा है कि उसका बस... नीचे थोड़ा काम था।"
रघु चुप रहा।
"पहले मैंने सोचा क़िस्मत। फिर सोचा इत्तेफ़ाक़।" आन्या एक क़दम आगे आई, और उसकी आवाज़ में अब ग़ुस्सा नहीं था, उससे कहीं ख़तरनाक कोई चीज़ थी, यक़ीन। "एक अटेंडेंट जो सौदे बचाता है, दशमलव पकड़ता है, चोर सूँघता है, और अब अँधेरे में बत्तियाँ लौटाता है। मैं हर बार ख़ुद को समझाती रही कि ये सब अपने आप हो रहा है। पर आज मैंने ख़ुद से झूठ बोलना बंद कर दिया।"
वो और क़रीब आई, इतने पास कि रघु उसकी साँस सुन सकता था।
"इस इमारत में एक दिमाग़ है, रघु। एक, जो जानबूझ कर चल रहा है। जो हर बार सही जगह, सही पल पर होता है, और फिर पीछे हट जाता है ताकि कोई और तालियाँ बटोरे। ये क़िस्मत नहीं है, ये कोई है।" उसकी नज़र सीधे उसकी आँखों में थी। "और मुझे अब पूरा यक़ीन है कि वो कोई... तुम हो।"
रघु ने सिर उठाया।
"अगर सच में कोई ऐसा आदमी होता, मैडम," उसने बहुत धीरे कहा, "जो ये सब करता और फिर छुप जाता... तो आप उसका क्या करतीं?"
"मैं उसे ढूँढ निकालती," आन्या ने फुसफुसा कर कहा, "और पूछती कि वो छुपता क्यों है। क्योंकि जो आदमी अँधेरे में किसी और के घर की बत्ती जलाता है और इनाम नहीं माँगता, वो या तो सबसे अच्छा इंसान होता है... या किसी बहुत बड़ी आग का इंतज़ार कर रहा होता है।"
रघु की आँखों में कुछ हिला। आग का लफ़्ज़ उसकी रगों में बारह साल पुरानी राख जगा गया।
"और तुम," आन्या ने और धीरे कहा, "मुझे आग वाले आदमी लगते हो।"
फिर वो पीछे हटी। पर इस बार उसकी नज़र नहीं हटी। "मैं अब इंतज़ार नहीं करूँगी कि तुम बताओ, रघु। इस बार मैं ख़ुद ढूँढूँगी।" वो मुड़ी, फिर रुकी। "और जिस दिन मैं तुम्हारा असली चेहरा देख लूँगी, मुझे उम्मीद है कि उसके पीछे वही आदमी निकले जिसे मैं अभी देख रही हूँ।"
वो तेज़ क़दमों से चली गई। और रघु वहीं खड़ा रहा। बारह साल में पहली बार उसके सीने में डर नहीं, कुछ और था। एक औरत, जो सच में देख सकती थी, अब आँखें खोल कर सीधे उसकी तरफ़ चल पड़ी थी।
उस रात इम्पीरियल देर तक नहीं सोया।
जली हुई तार की वो हल्की गंध अब भी ऊपरी गलियारों में टँगी थी। वही गंध, जो बारह साल पहले एक रात पूरे शहर ने सूँघी थी।
रघु ऊपर गया। किसी काम से नहीं। बस उसके पैर उसे फिर उसी तरफ़ ले गए, बृज के दफ़्तर के पीछे वाले उस गलियारे की तरफ़, जहाँ काली लकड़ी का वो दरवाज़ा था, और उसके पीछे उसके पिता का नाम, उसकी बेगुनाही, और वो सीलबंद फ़ाइल। आन्या के लफ़्ज़ अब भी उसके कान में थे। किसी बहुत बड़ी आग का इंतज़ार।
ख़ानदानी विंग में सन्नाटा था, सिर्फ़ इमरजेंसी की मद्धम रोशनी जल रही थी। और उसी अधूरी रोशनी में, गलियारे के दूसरे सिरे पर, एक परछाईं हिली। एक बूढ़ी औरत।
रघु ठिठक गया। वो जानता था ये कौन है, हालाँकि इस चेहरे को उसने बारह साल से नहीं देखा था। सावित्री सहगल। बृज की माँ। वो औरत, जिसके बारे में उसका अपना बेटा कहता था कि अब वो किसी से नहीं मिलती। और जो उस अँधेरे और जली गंध से घबरा कर, बरसों में पहली बार अपने कमरे से बाहर निकल आई थी।
रघु ने तुरंत सिर झुकाया, दीवार से सट गया। "माफ़ कीजिए... दादी जी। मैं बस... अभी जाता हूँ।"
पर दादी हिली नहीं। उनकी थकी, धुँधली आँखें उस मद्धम रोशनी में रघु के चेहरे पर जम गईं। और जैसे जैसे वो देखती गईं, उनके चेहरे का रंग उड़ता गया।
"रुको।" उनकी आवाज़ लरज़ रही थी, फूल की डंडी जैसी पतली। "ज़रा ठहरो, बेटा। रोशनी में आओ।"
रघु का दिल एक पल को रुका। "दादी जी, मैं तो बस एक..."
"मैंने कहा, रोशनी में आओ।"
किसी पुरानी, भूली हुई ताक़त ने उस थकी आवाज़ में जान भर दी। रघु एक क़दम आगे बढ़ा, उस पीली रोशनी में, और चेहरा उठाया।
दादी की साँस अटक गई।
उनका एक हाथ, झुर्रियों से भरा, काँपता हुआ, अपने मुँह पर चला गया। और दूसरा हाथ धीरे धीरे हवा में उठा, और रघु की आस्तीन पर आ टिका, इतने हलके से जैसे कोई पुराना ज़ख़्म छू रही हों, इस डर से कि कहीं वो सच न निकल आए।
"ये आँखें..." वो फुसफुसाईं, और उनकी अपनी आँखें भर आईं। "ये माथा। ये... ये ठीक वैसे ही खड़े होने का ढंग।" उनका हाथ रघु की आस्तीन पर थरथरा रहा था। "बारह साल। बारह साल मैंने ये चेहरा हर रात अपनी आँखों के पीछे देखा है। और आज वो मेरे सामने खड़ा है।"
रघु पत्थर हो गया। बारह साल का वो मास्क, जिसे करण की जाँच न तोड़ सकी, जिसकी आँखों में बृज ने कभी झाँका भी नहीं, वो इस बूढ़ी, काँपती औरत की धुँधली आँखों के सामने काँच की तरह दरक रहा था।
"दादी जी, आप कुछ ग़लत समझ रही हैं," उसने कहा, पर पहली बार, बारह साल में पहली बार, उसकी अपनी आवाज़ काँपी।
"नहीं।" दादी ने सिर हिलाया, और एक आँसू उनकी झुर्री की राह उतर गया। उनकी पकड़ रघु की आस्तीन पर ज़रा और कस गई, जैसे उसे छोड़ देंगी तो वो फिर बारह साल के लिए राख में खो जाएगा।
"मैं तुम्हें जानती हूँ, बेटा," उन्होंने कहा, और हर लफ़्ज़ बारह साल पुरानी एक राख के नीचे से निकल कर आया। "तुम्हारे पिता को जानती थी।"
गलियारे की वो मद्धम रोशनी थरथराई। और रघु, जो इस पूरे महल का मालिक था, जिसकी एक ईमेल बैंकों को हिला सकती थी, उस बूढ़ी औरत की लरज़ती उँगलियों के नीचे, बिल्कुल बेबस खड़ा था।
क्योंकि बारह साल में पहली बार, किसी ने नौकर के नीचे छुपे चेहरे को पहचान लिया था। और वो चेहरा पहचानने वाली अकेली ज़िंदा इंसान वही थी, जिसके पास उस तिजोरी की दूसरी चाबी थी।
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