अध्याय 6 / 15
पुराना गुनाह
नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi
बारह साल की क़ैद तोड़ कर निकली दादी सावित्री रघु को अपने कमरे में ले जाती हैं और अपना सबसे पुराना गुनाह खोल देती हैं, उस आग का सच जो उनके पति ने लगाई और देवराज पर मढ़ दी गई। वो रघु का सबसे बड़ा ख़तरा भी हैं और ख़ानदान की आख़िरी उम्मीद भी। उधर आन्या और रघु की क़ुरबत एक दहलीज़ तक पहुँचती है। फिर गरुड़ के वकीलों का काग़ज़ आन्या को होटल को एक दुश्मन क़ब्ज़े के लिए तैयार करने का हुक्म देता है, और आन्या उसी रघु से क़सम खाती है कि वो इस बेनाम गरुड़ को तोड़ देगी।
गलियारे की वो मद्धम इमरजेंसी रोशनी अब भी काँप रही थी, और रघु की आस्तीन पर दादी की उँगलियाँ उससे भी ज़्यादा।
"दादी जी," रघु ने हर लफ़्ज़ ऐसे रखते हुए कहा जैसे कोई काँच के फ़र्श पर पैर रखता है, "रात बहुत हो चुकी है। मैं किसी नौकरानी को बुला देता हूँ, वो आपको कमरे तक..."
"मेरा कमरा मुझे पता है, बेटा।" दादी की आवाज़ काँपती थी, पर उसके नीचे एक चट्टान थी। "मुझे बहला मत। मेरी आँखें बूढ़ी हैं, अंधी नहीं। जो चेहरा मैंने अभी देखा, उसे मैं बारह साल से हर रात आँखें बंद करके देखती आई हूँ।"
रघु का दिल रुका। बारह साल का ये लोहे का मुखौटा करण की जाँच और अल-रशीद की नज़र से टकरा कर सलामत लौटा था। और आज वो एक बूढ़ी औरत की धुँधली पुतलियों के सामने मोम हुआ जा रहा था।
"आप कुछ ग़लत समझ रही हैं," उसने आख़िरी कोशिश की।
"फिर मेरी आँखों में देख कर कह।" दादी ने काँपते हाथ से उसका चेहरा अपनी तरफ़ मोड़ा। "देख, और कह कि तू देवराज का बेटा नहीं है।"
और रघु कह नहीं पाया। बारह साल में पहली बार झूठ उसके गले में आ कर अटक गया, जैसे किसी ने अचानक उसका असली नाम पुकार लिया हो।
दादी ने उसकी ख़ामोशी पढ़ ली। उनकी आँखें भर आईं, पर वो रोईं नहीं। उन्होंने गलियारे के दोनों सिरों पर नज़र दौड़ाई, और रघु ने देखा कि इस झुकी कमर के नीचे अब भी एक रानी ज़िंदा थी।
"यहाँ नहीं। इन गलियारों में रात को भी पहरा रहता है।" उनकी आवाज़ फुसफुसाहट हो गई। "मेरे साथ चल। और वो जग उठा ले, जैसे तू सच में पानी देने आया हो।"
दादी का कमरा वक़्त से कटा हुआ एक टापू था, ख़ामोश और अधबुझा। चंदन की मेज़ पर दीया जल रहा था, उसके पास चाँदी के फ़्रेम में किसी सख़्त जबड़े वाले बूढ़े आदमी की तस्वीर। हवा में दवा और अगरबत्ती की महक थी। दादी ने दरवाज़ा भेड़ा।
"बैठ।"
"दादी जी, नौकर मालिक के सामने नहीं बैठता।"
"इस कमरे में आज कोई नौकर नहीं है।" उनकी आवाज़ टूट सी गई। "और कोई मालिक भी नहीं। बस दो लोग हैं, जिनके बीच एक ही मुर्दा खड़ा है। बैठ, बेटा।"
रघु बैठ गया। दादी ने काँपते हाथ से उसका हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया, इतने हलके से जैसे वो काँच का हो।
"देवराज," उन्होंने वो नाम ऐसे लिया जैसे कोई बरसों से बंद खिड़की खोलता है। "तेरे पिता। साफ़ आँखों वाला लड़का, जो हर बात आँख में आँख डाल कर कहता था। मेरे पति को वो फूटी आँख नहीं सुहाता था। जानता है क्यों? क्योंकि देवराज झूठ नहीं बोल सकता था। और जो आदमी झूठ नहीं बोल सकता, वो इस घर के लिए हमेशा सबसे बड़ा ख़तरा रहा है।"
रघु बिल्कुल स्थिर बैठा था, पर उसकी रगों में बारह साल पुरानी राख फिर गरम हो रही थी।
"वो आग," दादी की आवाज़ अब बहुत धीमी थी, "तेरे पिता ने नहीं लगाई थी, बेटा। मैं जानती हूँ। क्योंकि वो आग मेरे ही घर ने लगाई थी। मेरे पति ने। उसने उद्घाटन की जल्दी में सस्ते तार लगवाए, घटिया सामान। देवराज ने उसे रोका था, बार-बार। चीख़ा कि इस कंजूसी में किसी की जान जाएगी। और एक रात, सच में, एक आदमी की जान चली गई।" एक आँसू उनकी झुर्री की राह उतरा। "और फिर मेरे पति ने वो सारा गुनाह उस इकलौते आदमी के सिर मढ़ दिया जिसने उसे रोका था। क्योंकि एक ईमानदार आदमी को फँसाना सबसे आसान होता है, बेटा। वो अपनी सफ़ाई में इतना यक़ीन रखता है कि बचने के झूठ गढ़ना ही भूल जाता है।"
"और आप जानती थीं।" रघु की आवाज़ नीची थी, और उसमें बारह साल की एक धार थी जिसे वो रोक नहीं पाया। "आप उस रात कहाँ थीं, दादी जी?"
दादी ने आँखें झुका लीं। "यहीं थी। मैंने अपने पति को फ़ोन पर पुलिस से वो झूठ बोलते सुना। मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी थी। मैं चाहती तो आगे आ कर कह सकती थी, ये आदमी बेगुनाह है..." उनका गला रुँध गया। "पर मैंने अपने बेटे का चेहरा देखा, अपने घर का नाम देखा, और मैं चुप रह गई। आग मेरे पति ने लगाई थी, बेटा। पर उस आग को बारह साल ज़िंदा मैंने रखा है, अपनी ख़ामोशी से। यही मेरा गुनाह है। इस घर का सबसे पुराना गुनाह।"
कमरे में एक लंबी ख़ामोशी छा गई, जिसमें सिर्फ़ दीये की लौ काँप रही थी।
फिर दादी ने सिर उठाया, और उनकी आँखों में एक डरी हुई उम्मीद थी। "देवराज... वो अब कहाँ है, बेटा? जेल से तो कब का छूट गया होगा। मैं उससे एक बार माफ़ी माँगना चाहती हूँ। मरने से पहले, बस एक बार।"
रघु ने उनकी तरफ़ देखा, और कुछ नहीं कहा। पर उसकी ख़ामोशी ने सब कह दिया।
दादी का हाथ अपने मुँह पर चला गया। "नहीं," वो फुसफुसाईं।
"छह साल पहले," रघु ने कहा, और बारह साल में पहली बार उसकी अपनी आवाज़ पूरी तरह टूट गई। "जेल से वो बाहर आए थे, हाँ। पर एक टूटे हुए आदमी की तरह। एक बेगुनाह आदमी रोज़ सुबह उठ कर ये जानता था कि पूरी दुनिया उसे क़ातिल समझती है। ये बोझ किसी आग से ज़्यादा धीरे जलाता है, दादी जी। और एक दिन वो अंदर ही अंदर जल कर ख़त्म हो गए। मेरे सामने। और मैं उन्हें बचा नहीं पाया।"
दादी अब बेआवाज़ रो रही थीं, उस तरह जैसे बहुत बूढ़े लोग रोते हैं, जिनके पास आँसुओं के लिए भी ताक़त कम बची होती है।
"तो मैंने एक नहीं," उन्होंने काँपते हुए कहा, "दो आदमी मारे। एक उस रात की आग में। और एक अपनी ख़ामोशी से, धीरे-धीरे, बारह साल में।"
रघु ने अपना हाथ धीरे से छुड़ाया और सीधा बैठ गया। उसके अंदर का बेटा एक पल को पीछे हटा, और वो आदमी आगे आ गया जो बारह साल से हर ख़तरा तौलता आया था।
"दादी जी, अब आप जानती हैं कि मैं कौन हूँ।" उसकी आवाज़ फिर शांत थी, पर बेबसी वाली। "आप इस घर की इकलौती इंसान हैं जो मेरा असली चेहरा पहचानती हैं। आपके एक लफ़्ज़ से बृज को कल पता चल जाएगा कि उसका नौकर कौन है। बारह साल की मेरी हर चाल, एक पल में राख। आज से, मेरी जान आपके हाथ में है।"
दादी ने उसे देखा, और उनके चेहरे पर एक अजीब सा दर्द उभरा। "और तेरे हाथ में मेरे घर की जान है। तू यहाँ क्या लेने आया है, बेटा? मैं बूढ़ी हूँ, बेवक़ूफ़ नहीं। तू नौकरी करने नहीं, बदला लेने आया है। और बदले की आग भी उस रात वाली आग जैसी होती है, बेटा। वो ये नहीं देखती कि नीचे ईमानदार खड़ा है या बेईमान। बृज, करण, उनका हिसाब होना चाहिए, मैं जानती हूँ। पर इस घर की दीवारों में चार सौ और लोग भी साँस लेते हैं। फेकू जैसे। तू उन्हें भी अपनी आग में झोंक देगा?"
रघु चुप रहा। क्योंकि इस सवाल का जवाब वो ख़ुद से भी छुपाता आया था।
बाहर गलियारे में एक दरवाज़ा खुलने की आहट हुई, और किसी नौकरानी की दबी आवाज़, "दादी जी? आप जाग रही हैं?"
दादी की पकड़ रघु की कलाई पर एक पल को कसी, फिर ढीली पड़ गई। "जा। उस पीछे वाले दरवाज़े से। आज की रात मैंने तुझे नहीं देखा, बेटा। आज की रात इस घर का गुनाह थोड़ी देर और सो लेगा।" उनकी आँखों में आँसुओं के पीछे माफ़ी की भीख थी। "पर मुझसे ये मत पूछ कि कल सुबह मैं क्या करूँगी। मैं ख़ुद नहीं जानती। एक तरफ़ मेरा ख़ून है, और दूसरी तरफ़ मेरा गुनाह। और एक बूढ़ी औरत को आज तक नहीं पता चला कि इन दोनों में से कौन भारी है।"
रघु पीछे के दरवाज़े पर रुका, बिना मुड़े। "मेरे पिता आपको कभी बुरा नहीं कहते थे, दादी जी। वो कहते थे, इस घर में एक ही इंसान है जिसकी आत्मा अभी ज़िंदा है। आज मुझे समझ आया, वो आप थीं।"
और वो उस अँधेरे दरवाज़े से निकल गया, एक बूढ़ी औरत को उसके दीये और उसके पुराने गुनाह के साथ अकेला छोड़ कर।
सुबह के धुँधलके में, सर्विस सीढ़ियों के मोड़ पर, एक भारी हाथ ने रघु को कोहनी से खींच कर दीवार की ओट में किया।
"भाई! इधर आ, और पीछे मत देख।" बिट्टू की फुसफुसाहट किसी और की चीख़ के बराबर थी।
"क्या हुआ, बिट्टू?"
"वो भनोट का आदमी। लंबू, गंजा सा।" बिट्टू ने आँखें घुमा कर इशारा किया, उस 'चुपके से' अंदाज़ में जिसमें पूरा मोहल्ला समझ जाता कि कुछ गड़बड़ है। "कल से तेरे पीछे साये की तरह लग्या सै। तू जहाँ जावै, वो उधर। करण साहब ने तेरे पीछे अपना कुत्ता छोड़ दिया, भाई।"
रघु ने चाय का घूँट भरा, बिना घबराए। "मुझे पता है, बिट्टू।"
"पता सै? और तू ऐसे चाय पी रया जैसे शादी का न्योता आ गया हो?" बिट्टू आगे झुका। "मेरे पास ज़बरदस्त प्लान सै..."
"कुछ नहीं करेगा तू।" रघु ने हलके से उसका कंधा थपका। "जो पीछा कर रहा है, उसे करने दे। जो आदमी सबको दिखा-दिखा कर नज़र रखता है, वो असल में अपनी आँखें ख़ुद बंद कर लेता है। उसे लगेगा वो मुझे देख रहा है, और मैं उसके सामने आराम से वही करूँगा जो उसे दिखाना चाहता हूँ।"
बिट्टू ने हार मान कर सिर हिलाया। "तेरी बात मेरे सिर के ऊपर से ऐसे निकल जावै सै ना भाई, जैसे लॉन्ड्री की भाप।" फिर उसकी आँखों में शरारत आई। "अच्छा एक बात बता। वो मैडम कपूर कल रात तेरे को ढूँढ री थी, और जिस ढंग से 'रघु कहाँ है' बोली ना..." बिट्टू ने लंबी सीटी जैसी आवाज़ निकाली। "उसमें काम कम, कुछ और ज़्यादा था।"
"बकवास मत कर, बिट्टू।"
"मैं तो भोला छोरा हूँ, भाई।" बिट्टू ट्रे उठा कर चल दिया, और जाते-जाते बुदबुदाया, "पर इतना जानूँ सै कि चाय वाला राघु आजकल शीशे में दो बार देखने लग्या सै।"
रघु कुछ नहीं बोला। पर उसने जो अगला घूँट भरा, उसमें एक हल्की मुस्कान घुली थी, जिसे उसने ख़ुद से भी छुपा लिया।
उस रात मुंबई पर बारिश आने को थी। आसमान भारी था, हवा में नमक और बिजली दोनों, और इम्पीरियल की पुरानी सर्विस छत पर, समंदर की तरफ़ मुँह किए, आन्या अकेली खड़ी थी, हाथ में ठंडी चाय का कप और रेलिंग पर मेहता वाली वो फ़ाइल, जिसके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे।
रघु ऊपर एक नई फ़ाइल देने आया था। दरवाज़े पर रुका, और एक पल को वो मालिक नहीं, बस एक आदमी रहा, जो एक थकी हुई औरत को बारिश से पहले की उस राख जैसी रोशनी में खड़ा देख रहा था।
"फ़ाइल यहाँ रख दूँ, मैडम?"
"रखो।" फिर, "रघु, एक बात पूछूँ? तुम थकते नहीं?" वो मुड़ी, आँखों के नीचे नींद की कमी की लकीरें। "बृज लड़ रहा है अपने घमंड के लिए, करण अपनी जेब के लिए, मैं अपनी फ़ीस के लिए। पर तुम? तुम्हें न फ़ीस मिलती है, न नाम। इस होटल ने तुम्हें थप्पड़ के सिवा कुछ नहीं दिया। और फिर भी हर रात मैं तुम्हें इसी की दीवारें थामते देखती हूँ। कोई इस इमारत से इतना प्यार क्यों करेगा, जिसने उससे इतनी नफ़रत की हो?"
रघु ने फ़ाइल रेलिंग पर रखी। हवा का एक झोंका आया, समंदर से भारी और गीला, और उनके बीच की जगह को एक पल के लिए और छोटा कर गया।
"क्योंकि इमारत ने नफ़रत नहीं की, मैडम। लोगों ने की। कोई दीवार उठाता है, तो उसमें अपनी जान का एक टुकड़ा भी चुन देता है। मैं उस आदमी की जान बचा रहा हूँ, इन दीवारों में, जिसने इसे बनाया था। बाक़ी सब तो बाद में आए, और एक दिन चले जाएँगे।"
"तुम हर बार ऐसे बोलते हो," आन्या ने धीरे से कहा, एक क़दम पास आते हुए, "जैसे तुम इस होटल के नौकर नहीं, इसके वारिस हो।"
रघु के सीने में कुछ धक् से रुका। वो एक शब्द, वारिस, उसके और सच के बीच इतना पतला परदा रह गया था कि वो एक पल को सच में डर गया।
"वारिस तो वो होता है, मैडम, जिसे कोई विरासत मिले।" उसने नज़र समंदर की तरफ़ मोड़ ली। "मुझे बस एक बात विरासत में मिली। मेरे पिता एक ईमानदार आदमी थे। और इस दुनिया में ईमानदारी का क़र्ज़ आदमी ज़िंदगी भर चुकाता है, फिर भी आख़िर में बाक़ी रह जाता है।"
"तुम्हारे पिता... वो कहाँ हैं?" आन्या की आवाज़ से पहली बार शिकारी ग़ायब था, सिर्फ़ एक इंसान बचा था।
"जहाँ सब सच्चे लोग एक दिन चले जाते हैं, मैडम। इस दुनिया के झूठ से थक कर।"
बारिश की पहली बूँद रेलिंग पर गिरी, फिर दूसरी। आन्या ने उसे नहीं देखा। वो रघु को देख रही थी, और रघु उसे, और उनके बीच वो भारी, बिजली से भरी हवा अब एक तने हुए तार की तरह थी, जिसे छेड़ने भर की देर थी।
"तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे ख़तरनाक बात क्या है, रघु?" उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट थी, पर पीछे हटने वाली नहीं। वो और पास आई, इतने पास कि बारिश की महक के नीचे से उसे रघु के कपड़ों में बसी पुरानी फ़ाइलों की महक आई। "तुम्हारा झूठ नहीं। तुम्हारा सच है। तुम जब भी कोई सच बोलते हो, उसे ऐसे छुपा कर बोलते हो जैसे वो कोई जुर्म हो। और मैं हर रात उसी एक जुर्म को सुलझाने में लगी रहती हूँ।"
रघु ने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल से उसने हर क़दम, हर लफ़्ज़, हर साँस नापी थी। और इस एक पल में, पहली बार उसका नाप-तौल उसका साथ छोड़ गया। उसका हाथ अपने आप उठा, और आन्या के चेहरे पर चिपकी बालों की एक भीगी लट को उसने बहुत हलके से किनारे किया। आन्या ने साँस रोक ली। उसने न हाथ हटाया, न नज़र।
उनके चेहरों के बीच अब बस बारिश थी, और वो भी कम होती जा रही थी।
"मैडम कपूर!"
आवाज़ नीचे सीढ़ियों से आई, और उनके बीच की वो तनी हुई डोर एक झटके से टूट गई। दोनों अलग हुए, जैसे दो लोग किसी सपने से अचानक जगा दिए गए हों। रात का सिक्योरिटी गार्ड हाँफता हुआ छत पर आया, हाथ में एक मोटा, सफ़ेद लिफ़ाफ़ा।
"मैडम, माफ़ कीजिए। ये अभी-अभी आया। एक वकील का आदमी ख़ुद छोड़ कर गया, इतनी रात को। बोला, सुबह का इंतज़ार नहीं कर सकता। ऊपर 'अति आवश्यक' लिखा है। और..." गार्ड ने घबरा कर लिफ़ाफ़े पर छपा नाम पढ़ा। "भेजने वाले का नाम गरुड़ कैपिटल है, मैडम।"
बारिश की एक मोटी बूँद उस सफ़ेद लिफ़ाफ़े पर गिरी, और गरुड़ के नाम की स्याही को थोड़ा सा फैला गई।
आन्या ने लिफ़ाफ़ा खोला। मोटा काग़ज़, घनी क़ानूनी ज़बान, ऊपर किसी बड़ी वकील कंपनी की मोहर, सबसे नीचे वही नाम, गरुड़ कैपिटल। बारिश तेज़ हो चुकी थी, पर आन्या उसे बिजली की चमक में पढ़ती रही, और जैसे-जैसे पढ़ती गई, उसका चेहरा सख़्त होता गया।
रघु पास खड़ा था। उसे पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी। वो उस काग़ज़ का एक-एक लफ़्ज़ जानता था। क्योंकि वो काग़ज़ उसी ने लिखवाया था।
"ये कमीने।" आन्या की आवाज़ काँप रही थी, डर से नहीं, ग़ुस्से से। "सुनो, रघु। गरुड़ कैपिटल अपना सारा क़र्ज़ एकमुश्त, अभी, वापस माँग रहा है। और चूँकि सहगल वो चुका नहीं सकते, ये काग़ज़ मुझे हुक्म दे रहा है कि मैं इम्पीरियल को 'क़ब्ज़े के लिए तैयार' करूँ। एक 'व्यवस्थित हस्तांतरण।' मतलब समझते हो?"
"मुझे बताइए, मैडम।"
"मतलब ये कि वो बेनाम ख़रीदार इस पूरे होटल को हड़पने जा रहा है। यहाँ लिखा है, स्टाफ़ की 'पुनर्संरचना', ग़ैर-ज़रूरी 'परिसम्पत्तियों' की बिक्री। ग़ैर-ज़रूरी परिसम्पत्ति, ये बस एक ठंडा काग़ज़ी लफ़्ज़ है फेकू काका के लिए, बिट्टू के लिए, उन चार सौ लोगों के लिए जो अपने हाथों से इस इमारत को साँस देते हैं।"
रघु कुछ नहीं बोला। पर उसके सीने में एक अजीब सी चीज़ हिली। उसने ये काग़ज़ बारह साल के सब्र के बाद चला था, सहगलों का गला ठीक उस वक़्त कसने के लिए जब मेहता का पैसा उन्हें उसके शिकंजे से छुड़ाने ही वाला था। उसने ये कभी नहीं सोचा था कि उस हथियार की नोक के ठीक बीच में ये औरत खड़ी होगी। और फेकू काका। और वो हर चेहरा, जिनके लिए उसके अपने पिता उस रात आग की तरफ़ भागे थे।
"मैडम, हो सकता है ये गरुड़..." रघु ने बहुत संभल कर शुरू किया, जैसे किसी अँधेरे कमरे में एक छोटी सी रोशनी रखने की कोशिश कर रहा हो, "...इस होटल को ख़त्म नहीं, बचाना चाहता हो। हो सकता है उसका कोई और मक़सद हो, जो इस काग़ज़ की ज़बान से न दिखे।"
"बचाना?" आन्या तीखी, बेयक़ीन हँसी हँसी। "जो अपना चेहरा छुपाता है, रघु, वो बचाने नहीं आता। बचाने वाला सामने आ कर हाथ बढ़ाता है। ये गरुड़ बारह साल से एक काली कोठरी में बैठा, बेनाम, इस शहर का गला दबा रहा है, और किसी ने आज तक इसका चेहरा नहीं देखा। ऐसा आदमी मसीहा नहीं, कसाई होता है, जो अँधेरे में बैठ कर अपनी छुरी तेज़ करता है।"
हर लफ़्ज़ रघु के सीने में उतरता गया, क्योंकि हर लफ़्ज़ उसी के बारे में था, और हर लफ़्ज़ झूठ भी था और सच भी।
आन्या ने वो काग़ज़ मोड़ कर मुट्ठी में भींच लिया। बारिश उसके चेहरे पर बह रही थी, पर उसकी आँखों में एक आग जल रही थी जिसे बारिश छू भी नहीं पा रही थी।
"पर मैं हार नहीं मानूँगी।" उसकी आवाज़ अब पत्थर थी। "मेहता का पैसा अभी ज़िंदा है, मेरे पास अब भी एक हफ़्ता है। मैं इस होटल को इस गिद्ध के हाथ में नहीं जाने दूँगी। मैं इस गरुड़ का चेहरा ढूँढ निकालूँगी, इसकी हर परत उधेड़ूँगी। और जिस दिन मुझे इस बेनाम कायर का चेहरा मिल गया, मैं उसे पूरी दुनिया के सामने खींच लाऊँगी, और ठीक उसी तरह तोड़ूँगी जैसे ये इस होटल को तोड़ने चला है। मेरी क़सम।"
फिर वो रघु की तरफ़ मुड़ी, और उसका सारा फ़ौलाद एक पल को पिघल गया, और उसके पीछे एक थकी, अकेली औरत रह गई, जो इस पूरे महल में बस एक इंसान पर भरोसा कर सकती थी।
"तुम मेरे साथ हो ना, रघु?" उसने उसका हाथ थाम लिया, उसी हाथ को जिसने थोड़ी देर पहले उसके चेहरे से बारिश की लट हटाई थी। "इस घर में सब झूठे हैं, सब किसी न किसी के ख़रीदे हुए। बस तुम हो, जिसने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा, जो हर बार चुपचाप सही जगह खड़ा होता है। मुझे इस लड़ाई में एक सच्चा आदमी चाहिए। तुम मेरे साथ मिल कर इस गरुड़ को तोड़ोगे ना?"
बारिश बरस रही थी। समंदर गरज रहा था। और रघु उस औरत की आँखों में देख रहा था, जो उससे, गरुड़ से, उसका हाथ थाम कर, गरुड़ को तोड़ने की क़सम माँग रही थी।
"हाँ, मैडम," उसने आख़िरकार धीरे से कहा। "मैं आपके साथ हूँ।"
आन्या ने राहत की एक लंबी साँस ली, और एक पल को अपना माथा उसके कंधे के बहुत पास झुका दिया, इस यक़ीन के साथ कि इस तूफ़ान में उसने आख़िर एक मज़बूत सहारा थाम लिया है।
उसे नहीं पता था कि जिस सच्चे आदमी का सहारा उसने अभी थामा था, वही गरुड़ था। उसने अभी-अभी जिस चेहरे को ढूँढ कर तोड़ने की क़सम खाई थी, वो चेहरा इस वक़्त, बारिश में, उसके अपने कंधे से चंद इंच दूर झुका हुआ था।
नौकर ने सिर हिला दिया था। और मालिक ने उसका एक-एक लफ़्ज़ सुन लिया था।
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