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Chapter 7 of 15

पहली दहलीज़

नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi

कुछ दरवाज़े बारह साल इसलिए बंद रहते हैं, ताकि किसी एक ख़ास रात अपने आप खुल जाएँ।

बारिश वाली उस रात के बाद इम्पीरियल सोया नहीं। गरुड़ का वो मोटा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा, जिसकी स्याही बारिश में फैल गई थी, अगली सुबह तक पूरे महल में डर की तरह फैल चुका था। क़ब्ज़े का हुक्म। व्यवस्थित हस्तांतरण। और इन दो ठंडे लफ़्ज़ों ने बृज सहगल को बारह साल में पहली बार वो करने पर मजबूर कर दिया जिसकी उसने क़सम खाई थी कि कभी नहीं करेगा। उसने तिजोरी खोली।

मेहता की मोहलत हर घंटे छोटी हो रही थी, और गरुड़ को रोकने का, या कम से कम वक़्त ख़रीदने का, एक ही रास्ता था। बैंक के सामने होटल का साफ़ टाइटल रखना। और वो काग़ज़ उसी काली लकड़ी के दरवाज़े के पीछे थे।

बृज के दफ़्तर के पीछे वो दरवाज़ा एक कमरे में खुलता था जिसे ख़ानदान रिकॉर्ड रूम कहता था। सौ साल की फ़ाइलों से अटी अलमारियाँ, धूल, और पुराने काग़ज़ की वो महक जो असल में वक़्त की होती है। और उसी कमरे की पिछली दीवार में लोहे का एक दूसरा दरवाज़ा था। असली तिजोरी, जो सिर्फ़ दो चाबियों से खुलती थी। एक बृज की, एक दादी की।

उस सुबह, बारह साल में पहली बार, दोनों चाबियाँ एक साथ घूमीं।

वकील आए, अकाउंटेंट आए, और वो बाहरी कमरा रातों-रात एक जंग का कमरा बन गया। मेज़ों पर बारह साल पुराने दस्तावेज़ खुले पड़े थे, और उनके बीच, इस पूरी लड़ाई की कमान सँभाले, आन्या कपूर। और आन्या जहाँ थी, वहीं, फ़ाइलों का गट्ठर उठाए, अंदर-बाहर आता वो आदमी भी था जिसे वो इस जंग का अपना इकलौता सच्चा साथी समझती थी।

वो आदमी, जो उस गरुड़ के ख़िलाफ़ छिड़ी इस लड़ाई के बीचों-बीच खड़ा था, जो वो ख़ुद था। और कमरे के बाहर, गलियारे के मोड़ पर, भनोट का वो गंजा आदमी अब भी था। चौबीस घंटे की एक थकी हुई परछाईं, इस इंतज़ार में कि नौकर कब फिसले।


रात के डेढ़ बज चुके थे जब आख़िरी वकील अपना बैग समेट कर निकला।

जंग के उस कमरे में अब सिर्फ़ दो लोग बचे थे, एक मेज़ की पीली लैंप, और चारों तरफ़ बारह साल पुराने काग़ज़ों के पहाड़।

आन्या ने आँखें मलीं। उँगलियों पर स्याही के नीले धब्बे, बालों की एक लट जो घंटों से कान के पीछे टिकने से इनकार कर रही थी। सामने एक लंबी पीली शीट, गरुड़ के काग़ज़ की काट में बनी उसकी पूरी रणनीति।

"यहाँ," उसने पेन की नोक एक लाइन पर रखी, थकान से भारी आवाज़ में। "गरुड़ की एक ही कमज़ोरी है, रघु। जल्दी। वो पूरा क़र्ज़ एकमुश्त इसलिए माँग रहा है क्योंकि उसे डर है कि मेहता का पैसा हमें बचा न ले। मतलब, ये गिद्ध जितना ताक़तवर दिखता है, उतना सब्र वाला नहीं। जो आदमी बारह बरस अँधेरे में बैठ कर इंतज़ार करता रहा, वो अचानक इतनी जल्दी में क्यों है? कहीं न कहीं इसे भी कुछ चाहिए, इसी होटल से, जो ये खोना नहीं चाहता।"

रघु की उँगलियाँ एक फ़ाइल पर रुक गईं।

बारह साल उसने अपनी हर चाल को इतनी गहराई में दफ़न किया था कि कोई उसे छू न सके। और आज रात, उसी की दी हुई स्याही से, ये औरत उसके दिल की सबसे गहरी परत पर उँगली रख कर पढ़ रही थी। हाँ, उसे कुछ चाहिए था इसी होटल से। एक पन्ना। एक नाम।

"आप थक गई हैं, मैडम," रघु ने धीरे से कहा। "सुबह मेहता को साफ़ हिसाब भेजना है। थोड़ा आराम..."

"आराम?" आन्या हँसी, पर हँसी में दम नहीं था। "छह दिन हैं मेरे पास, रघु। छह दिन में या तो मैं इन चार सौ लोगों की नौकरी बचा लूँगी, या उस बेनाम गरुड़ को इन्हें सड़क पर फेंकते देखूँगी। और सबसे बुरी बात पता है क्या है?" उसने पेन रख दिया। "मुझे नहीं पता मैं किससे लड़ रही हूँ। कोई चेहरा नहीं, कोई नाम नहीं। बस एक दस्तख़त, हर काग़ज़ के नीचे। गरुड़। मैं रोज़ रात इसी दस्तख़त को घूरती हूँ और सोचती हूँ, तू है कौन।"

रघु ने उस दस्तख़त को देखा। अपने ही दस्तख़त को, उसकी उँगलियों के नीचे। और बारह साल में पहली बार उसे अपने ही नाम से एक अजीब सी चुभन हुई।

"शायद," उसने बहुत संभल कर कहा, "वो आदमी इतना बुरा न हो जितना ये काग़ज़ दिखाते हैं। शायद उसकी अपनी कोई वजह हो।"

"वजह?" आन्या ने सिर उठाया, और उसकी थकी आँखों में एक तीखी चमक आई। "हर ज़ालिम के पास एक वजह होती है, रघु। यही तो सबसे ख़तरनाक बात है। वो रात को अपने आप से कहता है कि मैं सही हूँ, और सुबह किसी और का घर गिरा देता है। मुझे उसकी वजह नहीं चाहिए। मुझे बस उसका चेहरा चाहिए।"

वो उठी, मेज़ का चक्कर काटती हुई उसके पास आई, और थक कर मेज़ के किनारे टिक गई, रघु से बस एक हाथ दूर।

"इस पूरे महल में," उसने कहा, आवाज़ अब धीमी, "सब किसी न किसी का काग़ज़ हैं। बृज अपनी शान का, करण अपनी जेब का। और मैं?" उसने एक थकी मुस्कान दी। "मैं इस होटल को बचाने आई थी, और अब लगता है इसे बचाते-बचाते ख़ुद इसी में कहीं खो गई हूँ। बस एक तुम हो, रघु, जो किसी का काग़ज़ नहीं। जिसके पास खोने को कुछ नहीं, और फिर भी जो हर रात यहीं, मेरे साथ, इस मरते होटल की दीवारें थामे खड़ा रहता है।"

रघु ने उसकी तरफ़ देखा। उसके पास खोने को कुछ नहीं, उसने सोचा। उसके पास तो खोने को सब कुछ था, और सबसे पहले, ठीक इसी पल, यही औरत।

"मैडम..." उसने कहना शुरू किया, पर लफ़्ज़ बीच में ही खो गया।

क्योंकि आन्या आगे झुक चुकी थी। बहुत थोड़ा। बस इतना कि लैंप की वो पीली रोशनी अब दोनों के चेहरों को एक ही छोटे से घेरे में समेट ले। उसकी स्याही से सनी एक उँगली रघु की कलाई पर आ टिकी, जहाँ नौकर की वर्दी की आस्तीन ख़त्म होती थी, और वहाँ की नब्ज़, जो बारह साल से कभी नहीं भटकी थी, एक पल को लड़खड़ा गई।

"चुप," आन्या ने फुसफुसा कर कहा। "आज रात कोई सच मत बोलो। आज रात बस... यहाँ रहो।"

और फिर बारह साल की वो दहलीज़, जिसे रघु ने हर रात अपने पैरों के नीचे रोके रखा था, टूट गई।

किसने पहले फ़ासला तय किया, ये बाद में दोनों में से कोई नहीं बता सकता था। बस इतना कि अगले पल पुराने काग़ज़ों की वो महक, पीली रोशनी का वो घेरा, मेहता की मोहलत, गरुड़ का काग़ज़, सब पीछे छूट गया, और रह गई सिर्फ़ आन्या के होंठों की वो गर्म, थरथराती नरमी, उसके बालों की उस ज़िद्दी लट का रघु के माथे से छू जाना, और उसकी साँस, जो रघु की साँस में घुल गई।

रघु का एक हाथ अपने आप उठा और आन्या की गर्दन के पीछे, उन बालों में ठहर गया। बारह साल से उसने हर चीज़ नापी थी, हर लफ़्ज़, हर क़दम, हर साँस। और इस एक पल में, पहली बार, उसने नापना छोड़ दिया।

पर ठीक उसी पल, जब दूरी सबसे कम थी, सच सबसे भारी हुआ। क्योंकि जिस औरत को वो इस वक़्त थामे हुए था, उसी ने कुछ घंटे पहले, इसी बारिश में, उसका हाथ पकड़ कर क़सम खाई थी कि वो गरुड़ को ढूँढ कर तोड़ देगी। और गरुड़ यहीं था, उसके अपने होंठों पर, उसकी अपनी उँगलियों के नीचे। वो उस आदमी को चूम रही थी जिसे उसने मिटाने की क़सम खाई थी, और उसे ये पता तक नहीं था। ये दुनिया का सबसे क़रीबी पल था, और सबसे अकेला भी। रघु जानता था। आन्या नहीं। और यही फ़ासला, जो दोनों के बीच एक इंच भी नहीं था, असल में पूरी एक उम्र जितना चौड़ा था।

फिर, धीरे-धीरे, जैसे कोई गहरे पानी से ऊपर आता है, दोनों अलग हुए। माथे एक-दूसरे से टिके रहे, साँसें उलझी हुईं। आन्या की आँखें बंद थीं, होंठों पर एक हैरान सी, नई मुस्कान।

"ये..." उसने काँपती हँसी के साथ कहा, "ये मेरी रणनीति में नहीं था।"

"कुछ चीज़ें रणनीति में नहीं होतीं, मैडम," रघु ने धीरे से कहा, और उसकी अपनी आवाज़ उसे किसी और की लगी।

आन्या एक पल और रुकी, फिर उसने अपना माथा पीछे किया और उस लट को कान के पीछे किया जो अब भी टिकने से इनकार कर रही थी। उसके चेहरे पर वो औरत लौट आई जो छह दिन में चार सौ ज़िंदगियाँ बचाने की ज़िम्मेदारी उठाए थी।

"मेहता," उसने धीमे से कहा, जैसे ख़ुद को याद दिला रही हो। "साफ़ हिसाब। सुबह तक। अगर मैंने आज रात वो शीट उसे नहीं भेजी, तो ये सब..." उसने कमरे में बिखरे काग़ज़ों की तरफ़ देखा, "बेकार है।" उसने रघु की तरफ़ देखा, और उस नज़र में अब एक नई चीज़ थी, नरम और डरी हुई दोनों। "मैं नीचे, अपने दफ़्तर से भेज दूँगी।"

"मैं यहाँ समेट देता हूँ, मैडम," रघु ने कहा। "इतने काग़ज़ खुले छोड़ कर जाना ठीक नहीं। मैं सब वापस ठीक जगह रख दूँगा, और दरवाज़ा बंद कर दूँगा।"

आन्या ने एक पल उसे देखा, फिर हल्के से सिर हिलाया। एक नौकर का सबसे मामूली काम, कमरा समेटना। उसने दूसरी बार नहीं सोचा। "शुक्रिया, रघु।" दरवाज़े पर पहुँच कर वो एक पल रुकी, बिना मुड़े। "और... आज रात के लिए भी।" फिर वो चली गई, और उसके क़दमों की आवाज़ गलियारे में दूर होती चली गई।

रघु अकेला रह गया, जंग के उस कमरे में, बारह साल पुराने काग़ज़ों के बीच, और उस औरत की गर्मी अब भी अपने होंठों पर लिए, जो उसे तोड़ने निकली थी।


रघु ने दरवाज़े की तरफ़ एक नज़र डाली। गलियारे के उस पार, मोड़ पर, गंजे आदमी की परछाईं अब भी थी, दीवार से टिकी, ऊँघती हुई। चौबीस घंटे की चौकीदारी का सबसे कमज़ोर पहर यही होता है, जब रात इतनी लंबी हो जाए कि आँख ख़ुद धोखा देने लगे। और आज उस आदमी को जो दिख रहा था, वो बिल्कुल सही था। एक थका नौकर, मैडम के हुक्म पर, काग़ज़ समेटता हुआ। दुनिया का सबसे बेमानी मंज़र।

रघु ने काग़ज़ समेटने शुरू किए, सच में, इत्मीनान से, एक नौकर की तरह। और समेटते-समेटते, फ़ाइल दर फ़ाइल, वो उस कमरे की पिछली दीवार की तरफ़ बढ़ता गया, जहाँ लोहे का वो दूसरा दरवाज़ा था। असली तिजोरी।

और वहाँ पहुँच कर वो ठिठक गया।

दरवाज़ा बंद था, पर सील नहीं। दादी की चाबी का वो आख़िरी घुमाव, जो आज रात इस लोहे को फिर से मुहरबंद कर देता, नहीं हुआ था।

रघु को समझते देर नहीं लगी। बारह साल से इस दरवाज़े को सिर्फ़ एक हाथ रोज़ छूता था, सावित्री सहगल का। आज दोपहर बृज और दादी, दोनों की चाबियों ने इसे खोला था, टाइटल के काग़ज़ निकालने को। और रात को इसे फिर मुहरबंद करना दादी का काम था। पर दादी की वो थकी, काँपती चाबी आज नहीं घूमी। ये इजाज़त नहीं थी, रघु जानता था। ये एक बूढ़ी औरत की वो आधी-अधूरी ख़ामोशी थी, जो उस रात उसने उसे बख़्शी थी और जो अब तक उसका पीछा कर रही थी। आज की रात मैंने तुझे नहीं देखा। दादी इस दरवाज़े को बंद करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी, क्योंकि बंद करना अपने ही गुनाह पर एक बार फिर मुहर लगाना होता। उसने उसे अधखुला छोड़ दिया था, और फ़ैसला रघु पर।

रघु ने एक गहरी साँस ली, और लोहे के उस दरवाज़े को धकेला।

अंदर एक छोटी सी, दम घोंटती कोठरी थी। एक नंगा बल्ब, अलमारियों में चमड़े के पुराने रजिस्टर, और हवा में बहुत बरस पुरानी, बंद पड़ी ख़ामोशी की महक।

बारह साल। बारह साल वो इस एक कमरे से चंद क़दम दूर खड़ा रहा था, और आज, पहली बार, वो उसके अंदर था। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे। पर उसका दिल, जो बारह साल से बर्फ़ था, अब किसी हथौड़े की तरह बज रहा था।

सबसे ऊपर के ख़ाने में एक चमड़े का बस्ता था, जिस पर सुनहरे हर्फ़ अब घिस चुके थे। उसने उसे खोला। और वहाँ, सबसे पहले काग़ज़ पर, बारह साल पुरानी स्याही में, साझेदारी का असली दस्तावेज़ था। द ग्रैंड इम्पीरियल। और सबसे नीचे, दो दस्तख़त। एक, सहगल। और दूसरा, उसके ठीक बराबर, उतना ही बड़ा, उतनी ही शान से लिखा, देवराज प्रताप।

रघु की उँगली उस नाम पर ठहर गई।

बारह साल से दुनिया कहती आई थी कि उसका बाप एक नौकर से ज़्यादा कुछ नहीं था। एक मुजरिम, एक दाग़। और यहाँ, इस काग़ज़ पर, काली स्याही में, लिखा था कि इस महल का आधा हिस्सा देवराज प्रताप का था। बराबर का। मालिक का। ये उसका सबूत था। आधा सबूत।

पर आधा काग़ज़ आधी कहानी कहता है। ये दस्तावेज़ साबित करता था कि उसका बाप मालिक था। वो नहीं, जो उसे सबसे ज़्यादा चाहिए था, कि उसका बाप बेगुनाह था। उसके लिए एक और चीज़ चाहिए थी। आग की वो सीलबंद जाँच फ़ाइल, जिसमें लिखा था कि उस रात असल में क्या हुआ था, और किसने किया था।

रघु की नज़र नीचे के ख़ाने पर गई। और वहाँ वो थी। एक मोटी, भूरी फ़ाइल, जिस पर लाल मोम की एक पुरानी सील थी, अब टूटी हुई, ऊपर सरकारी मोहर, और एक लफ़्ज़, जिसे पढ़ कर रघु की रगों में बारह साल पुरानी आग दौड़ गई। अग्निकांड जाँच। द ग्रैंड इम्पीरियल। उद्घाटन रात्रि।


रघु ने वो फ़ाइल उठाई, और एक पल को बस उसे थामे खड़ा रहा। बारह साल की पूरी ज़िंदगी इसी एक फ़ाइल के लिए थी। इसी एक काग़ज़ के लिए उसने अपना नाम छोड़ा था, अपना चेहरा छोड़ा था, अपनी हर रात इन्हीं लोगों की ग़ुलामी में जलाई थी।

उसने फ़ाइल खोली।

पन्ने पुराने थे, पीले, किनारों से भुरभुरे। गवाहों के बयान, बिजली के पैनल की रिपोर्ट, उस मरे हुए बूढ़े कर्मचारी का नाम, सब उसकी आँखों के सामने से गुज़रता गया, और हर पन्ने के साथ उसका दिल तेज़ होता गया, क्योंकि वो उस एक पन्ने की तरफ़ बढ़ रहा था। उस आख़िरी पन्ने की, जिस पर लिखा होता है कि आग किसने लगाई।

वो पन्ना नहीं था।

जहाँ वो होना चाहिए था, वहाँ सिर्फ़ एक पतली, साफ़ कटी हुई कोर बची थी। किसी ने, बहुत पहले, किसी तेज़ ब्लेड से, ठीक उस एक पन्ने को जड़ से काट कर निकाल लिया था। बाक़ी पूरी फ़ाइल सलामत थी। सिर्फ़ वही एक पन्ना ग़ायब था, जिस पर असली मुजरिम का नाम था।

रघु बहुत देर उस ख़ाली कोर को घूरता रहा।

बारह साल। हर चाल, हर सब्र, हर ज़लालत, सब इसी एक फ़ाइल पर टिकी थी। और फ़ाइल यहाँ थी, उसके हाथ में, और खोखली थी। किसी ने उसकी ज़िंदगी का सबसे ज़रूरी पन्ना, उसके बाप का इंसाफ़, बहुत पहले ही चुरा लिया था।

पर ठीक उस कटी हुई कोर के साथ, फ़ाइल की जिल्द में एक चीज़ और टँकी थी। एक छोटा, पीला परचा, फ़ाइल के अंदर की चीज़ों का इंदराज, जिस पर हर पन्ने का हिसाब था। और उस फ़ेहरिस्त में, उस एक ग़ायब पन्ने के सामने, किसी ने पुरानी स्याही में एक लाइन लिखी थी।

रघु ने उसे बल्ब के नीचे किया।

आधी लाइन जल चुकी थी, या जलाई गई थी। किनारा भूरा, हर्फ़ राख। पर जो बचा था, वो काफ़ी था कि रघु की साँस रुक जाए। पन्ना फाड़ा नहीं गया था। संभाल कर निकाला गया था। और भेज दिया गया था, किसी जगह, जिसका नाम अब उस जली कोर पर सिर्फ़ एक अधूरा निशान था। एक चाबी का छोटा सा चित्र, और उसके नीचे एक ही पढ़ा जाने वाला लफ़्ज़।

सहगल।

रघु पीछे हटा, और लोहे की ठंडी अलमारी से टिक गया।

वो पन्ना इस तिजोरी में नहीं था। वो किसी और जगह था, एक ऐसी जगह जो सिर्फ़ सहगल नाम के एक दस्तख़त, एक मुहर पर खुलती थी। कोई ख़ानदानी लॉकर, जहाँ कोई बाहरी नहीं पहुँच सकता था। कोई नौकर तो हरगिज़ नहीं।

और यही इस पूरी रात का सबसे ज़हरीला मज़ाक़ था।

उसके पास इस शहर के बैंक ख़रीदने का पैसा था। उसके पास वकीलों की फ़ौज थी, उसके पास गरुड़ था, उसके पास इस पूरे महल का क़र्ज़ था। दुनिया की हर तिजोरी उसके पैसे से खुल सकती थी। पर वो एक पन्ना, जो उसके बाप को बेगुनाह साबित कर सकता था, जो साबित कर सकता था कि नौकर असल में मालिक है, उस एक काग़ज़ तक पहुँचने के लिए उसे ठीक वही होना पड़ता, जो इन लोगों ने उससे छीना था... इस घर का एक मालिक। एक सहगल। या कम से कम, कोई ऐसा, जिसे ये घर अपना ख़ून मान कर वो दरवाज़ा अपने हाथ से खोल दे।

बारह साल के सफ़र के आख़िर में, वो सबसे क़रीब आ कर, सबसे दूर खड़ा था।

उसने सीलबंद फ़ाइल को धीरे से बंद किया, ठीक वैसे ही वापस रखा जैसे वो थी, और लोहे के दरवाज़े को फिर अधखुला छोड़ दिया, जैसे दादी ने छोड़ा था। फिर वो जंग के उस कमरे में लौट आया, बाक़ी काग़ज़ समेटे, और एक थके नौकर की तरह बत्ती बुझा दी।

बाहर, गलियारे में, गंजे आदमी की परछाईं अब भी ऊँघ रही थी। उसने एक नौकर को कमरा समेट कर निकलते देखा, और कुछ नोट तक नहीं किया।

रघु के सीने में, उस रात, दो आगें एक साथ जल रही थीं। एक, उस औरत की, जिसके होंठ अब भी उसके होंठों पर थे, और जो उसे तोड़ने की क़सम खा चुकी थी। और दूसरी, उस एक ग़ायब पन्ने की, जो उसके बाप का इंसाफ़ अपने साथ ले कर, एक ऐसे दरवाज़े के पीछे चला गया था, जिसकी चाबी उसके हाथ में, और सिर्फ़ उसके हाथ में, कभी नहीं आने वाली थी।

दहलीज़ पार हो चुकी थी। दोनों। और दोनों के उस पार, रघु को इंतज़ार सिर्फ़ एक और बंद दरवाज़े का मिला।

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