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अध्याय 2 / 15

पैरों की धूल

नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi

सुबह के साढ़े छह बजे।

ऊपर, संगमरमर की उस लॉबी में जहाँ कल रात झूमर जगमगा रहे थे, अब सन्नाटा था। पर तीन मंज़िल नीचे, जहाँ कोई मेहमान कभी नहीं आता, इम्पीरियल का असली दिल पहले से धड़क रहा था। भाप, बर्तनों की खनक, और सौ आवाज़ें जो एक साथ चिल्ला रही थीं। यही वो दुनिया थी जो ऊपर के महल को महल बनाए रखती थी।

उसी शोर के एक कोने में, हाथ में चाय की भारी केतली थामे, झुके कंधों वाला वही आदमी खड़ा था। रघु।

"अरे ओ राघुउ!"

एक भारी, हरियाणवी आवाज़ ने पूरे किचन को हिला दिया। बिट्टू। बेलबॉय, छह फुट का पहाड़, और दिल उससे भी बड़ा। वो धड़धड़ाता हुआ आया और रघु को ऐसे जकड़ लिया जैसे कोई खोया भाई मिला हो।

"तू ज़िंदा है! मन्नै तो लाग्या था तेरा काम तमाम हो गया। सारा होटल कह रहा है, कल रात बड़े सहगल साहब ने तेरे थोबड़े पे ऐसा हाथ जमाया कि..."

"बस, थोड़ा सा," रघु ने हल्के से कहा।

"थोड़ा सा?" बिट्टू ने आँखें फाड़ीं। "भाई, थप्पड़ बारहवीं मंज़िल पे पड़ा और गूँज नीचे लॉन्ड्री तक आई। और तू कह रहा है थोड़ा सा।" फिर उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "पर तू यहाँ कैसे, भाई? साहब ने तो कह दिया था, कल से इसकी शक्ल मत दिखे। और आज तो... कल हो गया।"

रघु कुछ कहता, उससे पहले एक तीसरी आवाज़ बिजली की तरह कड़की।

"क्योंकि मेरे पास इन नौटंकियों के लिए वक़्त नहीं है, इसलिए!"

मिश्रा जी। वेस्ट विंग के सर्विस सुपरवाइज़र, चेहरे पर बारह साल की नींद की कमी। "बैंक्वेट वालों ने कल रात किसी राघु को निकाला। बढ़िया। पर मेरे वेस्ट विंग में आज दो आदमी कम हैं, और एजेंसी ने सुबह सुबह ये काग़ज़ मेरे सिर पे दे मारा।" उसने फ़ाइल रघु की तरफ़ उछाली। "ट्रांसफ़र ऑर्डर। बैंक्वेट से हाउसकीपिंग सर्विस। मुबारक हो। अब तू मेरा सिरदर्द है, बैंक्वेट का नहीं।"

बिट्टू की आँखें गोल हो गईं। "पर सुपरवाइज़र साहब, ये तो वही राघु है ना जिसको कल..."

"बिट्टू।" मिश्रा जी ने उसे ऐसे घूरा जैसे घूरने से किराया कम हो जाएगा। "इस होटल में चार राघु हैं, तीन रामू हैं, और एक मैनेजर है जिसे आज ग्यारह कमरे तैयार कराने हैं और एक नई जनरल मैनेजर का स्वागत करना है जो आज ही जॉइन कर रही है। मुझे मतलब नहीं कि कल रात बैंक्वेट में किसका गाल लाल हुआ। मुझे मतलब है कि बारह सौ चार का नाश्ता अभी तक ठंडा पड़ा है। तो राघु, हिल।"

रघु ने झुक कर फ़ाइल उठाई। और सिर्फ़ बिट्टू सुन सका, जब उसने बहुत धीरे कहा, "देखा बिट्टू? निकाला बैंक्वेट से गया था। मैं अब वेस्ट विंग में हूँ। साहब ने कहा था, उनकी नज़र के सामने न दिखूँ।" उसके होंठ हल्के से मुड़े। "तो मैं उनकी नज़र के सामने हूँ ही नहीं।"

बिट्टू ने मुँह खोला, फिर सिर खुजाया। "ये... ये तो ग़ज़ब का जुगाड़ है, भाई।"

"जुगाड़ नहीं," रघु ने केतली उठाई और चलने लगा। "क़िस्मत।"

बेशक, ये क़िस्मत नहीं थी। कल रात जिस वक़्त गार्ड रघु को बाहर फेंक रहे थे, उसी वक़्त गरुड़ की एक ईमेल स्टाफ़िंग एजेंसी तक पहुँच चुकी थी। एक छोटा सा ट्रांसफ़र, इतना छोटा कि किसी सहगल की नज़र उस तक पहुँचती ही नहीं। मालिक को अपने ही महल में घुसने के लिए जुगाड़ नहीं, धैर्य चाहिए था।


बारह सौ चार का नाश्ता पहुँचा कर रघु लौट रहा था, तभी लॉबी के पिछले रास्ते पर उसे एक छोटा सा भूचाल मिला।

"ये कैसे हो सकता है?!"

करण सहगल कंसीयज डेस्क के सामने खड़ा था, और उसके सामने एक नौजवान रिसेप्शनिस्ट, चेहरा सफ़ेद, हाथ काँपते हुए।

"प्रेसिडेंशियल सूट एक साथ दो लोगों को बुक कैसे हो गया? एक तरफ़ मिस्टर अल-रशीद, दुबई का इन्वेस्टर, जो आज दोपहर लैंड कर रहा है, और दूसरी तरफ़ कोई शादी वाला ख़ानदान? अगर अल-रशीद को कमरा नहीं मिला तो पापा क्या करेंगे, और गरुड़ क्या सोचेगा?"

"स... सर, सिस्टम में दोनों बुकिंग दिख रही हैं..."

"सिस्टम तुम चलाते हो, सिस्टम तुम्हें नहीं! ये तुम्हारी ग़लती है!" करण ने डेस्क पर मुक्का मारा।

रघु डेस्क के पीछे से गुज़रा। एक पल को स्क्रीन पर नज़र पड़ी, और वो देख लिया जो डर के मारे किसी ने नहीं देखा था।

वो रुका, सिर झुका, और दबी आवाज़ में बोला, "साहब... माफ़ कीजिए... मैं तो कुछ नहीं जानता... पर वो तारीख़..."

"तू बीच में मत बोल!" करण गुर्राया। "तेरी औक़ात है यहाँ खड़े होने की?"

"जी नहीं, साहब।" रघु ने तुरंत सिर और झुका लिया। पर रिसेप्शनिस्ट के पास से गुज़रते हुए उसने इतना धीरे कहा कि सिर्फ़ वो लड़का सुने, "बेटा, तारीख़ का फ़ॉर्मैट देख। एक जगह छह बटा सात लिखी है, एक जगह सात बटा छह। एक अंग्रेज़ी तरीक़ा, एक अपना। दोनों एक दिन नहीं हैं।"

रिसेप्शनिस्ट की आँखें स्क्रीन पर दौड़ीं, और मुँह खुला रह गया। "सर, रुकिए! ये दोनों अलग अलग तारीख़ की हैं! छह जुलाई, और सात जून! सिस्टम ने फ़ॉर्मैट उलट पढ़ा था! कोई टकराव है ही नहीं!"

करण एक पल को चुप रहा। फिर कॉलर ठीक किया, जैसे तूफ़ान उसी ने रोका हो। "देखा? इतनी सी बात थी। मुझे हर चीज़ ख़ुद पकड़नी पड़ती है इस होटल में।" वो पलटा, और तभी उसकी नज़र रघु पर पड़ी, जो चुपचाप किनारे खड़ा था। "और तू? तू अभी तक इस होटल में है? पापा ने तुझे कल रात..."

"वेस्ट विंग में ट्रांसफ़र हो गया हूँ, साहब।" रघु ने धीरे से कहा। "हाउसकीपिंग।"

करण ने उसे ऐसे देखा जैसे जूते में फँसा कोई कंकड़ हो। "हुह। तुम लोग ना, बस फ़र्श की धूल हो। जहाँ झाड़ू मारो, वहाँ से उड़ कर दूसरी जगह बैठ जाती है।" वो अपनी ही बात पर हँसा। "चल, नज़रों से दूर रह। और अल-रशीद का सूट ख़ुद तैयार करवा। पर ख़बरदार जो उसके सामने पड़ा।"

"जी, साहब।"

करण चला गया। रघु वहीं खड़ा रहा, सिर झुका, और बहुत धीरे, सिर्फ़ अपने लिए बोला, "धूल, साहब? धूल तो आपके इस पूरे महल के नीचे की ज़मीन है। और ज़मीन हिल जाए, तो महल को गिरने में देर नहीं लगती।"


ठीक उसी वक़्त, लॉबी के दूसरे सिरे से, इम्पीरियल में एक ऐसी चीज़ दाख़िल हुई जो इस थके महल ने बरसों से नहीं देखी थी। रफ़्तार।

आन्या कपूर। उम्र यही कोई अट्ठाईस-उनतीस। कलफ़ लगा कुरता, कंधे पर लैपटॉप बैग, और चाल में वो भरोसा जो उधार का नहीं होता।

तभी करण सामने आ गया, चेहरे पर वो मुस्कान जो वो नई औरतों के लिए बचा कर रखता था। "मिस कपूर! वेलकम टू इम्पीरियल। सुना है आप डूबते होटलों को तैरना सिखाती हैं। दिलचस्प हॉबी है।"

"डूबते नहीं, मिस्टर सहगल," आन्या ने मुस्कुरा कर कहा, पर आँखें नहीं हँसीं। "जिन्हें कोई जानबूझ कर डुबो रहा हो, सिर्फ़ उन्हें बचाती हूँ। और ये हॉबी नहीं, फ़ीस है। मोटी फ़ीस। जो आपका परिवार इसलिए दे रहा है क्योंकि और कोई चारा नहीं बचा।"

करण की मुस्कान फिसली। "हम सिर्फ़ थोड़ी मदद चाहते हैं। इम्पीरियल राजा है। राजा को बस..."

"राजा को बस ये नहीं पता कि उसका ख़ज़ाना ख़ाली है," आन्या ने बात पूरी की और चल पड़ी। "अगले तीन दिन मैं हर डिपार्टमेंट देखूँगी, हर रजिस्टर, हर चेहरा। और हाँ, अपने स्टाफ़ पर चिल्लाना बंद कीजिए। जो मैनेजर डरा कर काम लेता है, उसके आदमी ग़लतियाँ छुपाते हैं, बताते नहीं। और छुपी हुई ग़लती ही होटल डुबोती है। चिल्लाहट नहीं।"

करण के होंठ खुले ही थे कि वो अचानक ठिठक गई। किनारे एक आदमी खड़ा था, झुके कंधे, नीची नज़र, हाथ में सूट की चाबियाँ। पर कुछ ठीक नहीं बैठ रहा था। बाक़ी सब उसे देख कर सिकुड़ रहे थे। ये आदमी सिकुड़ नहीं रहा था। बस... इंतज़ार कर रहा था।

"तुम।" आन्या उसके पास गई। "नाम?"

"रघु, मैडम।" नज़र फ़र्श पर।

"रघु, अभी कंसीयज पर तारीख़ वाली ग़लती किसने पकड़ी?"

लॉबी में सन्नाटा छा गया। रिसेप्शनिस्ट का गला सूख गया।

"करण साहब ने, मैडम," रघु ने तुरंत कहा। "उनकी नज़र बहुत तेज़ है।"

आन्या ने एक भौंह उठाई। उसे झूठ की महक आ गई थी, पर ये अजीब झूठ था, एक नौकर अपने मालिक को अपना श्रेय दे रहा था। लोग तो इसका उल्टा करते हैं।

"मुझे एक चीज़ झूठ से भी ज़्यादा चुभती है, रघु," आन्या की आवाज़ ज़रा सख़्त हुई। "बेमतलब की चापलूसी। ख़ास तौर पर तब, जब वो इतनी सफ़ाई से बोली जाए।" रघु के चेहरे पर कुछ नहीं बदला, पर उसकी ख़ामोशी ज़रा और गहरी हो गई, और यही बात आन्या को और खटक गई।

"हम्म।" उसने एक पल को सीधे रघु की आँखों में देखा। रघु ने नज़र नहीं हटाई, और आन्या को लगा जैसे किसी ने बहुत गहरे, शांत पानी में कंकड़ डाला हो। "ठीक है, रघु। काम करो।"

वो आगे बढ़ गई। पर एक बार, चलते हुए, उसने मुड़ कर पीछे देखा।


दोपहर तीन बजे, मिस्टर अल-रशीद आ गया। और उसके साथ आया तूफ़ान।

मीटिंग रूम में, मेज़ के एक सिरे पर अल-रशीद बैठा था, सख़्त चेहरा, सामने इम्पीरियल के हिसाब का मोटा पुलिंदा। दूसरे सिरे पर करण और दो मैनेजर, पसीने में तर। एक तरफ़ आन्या। और दरवाज़े के पास, कॉफ़ी की ट्रे लिए, रघु।

अल-रशीद ने काग़ज़ मेज़ पर पटका।

"This is a joke," उसने ठंडी, कड़ी अंग्रेज़ी में कहा। "Your revenue sheet says occupancy is seventy percent. But your own electricity and laundry numbers say it cannot be more than forty. Either your hotel is half empty, or someone in this room is lying to me. And I did not fly in from Dubai to be lied to."

करण का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "Mister Al-Rashid, sir, please, there must be some typing mistake. My team will fix..."

"Your team has made the same mistake on every single page," अल-रशीद उठ खड़ा हुआ। "I am done here. Garuda holds your debt. Let Garuda clean up this mess. Good day."

आन्या आगे बढ़ी। "Mister Al-Rashid, give me one hour. I joined only this morning..."

"Madam, I do not have one hour. I have a plane."

और तभी, उस तनाव भरे कमरे में, एक नई आवाज़ उठी, शांत और इत्मीनान से।

"Mr. Al-Rashid. With respect, the occupancy figure is not the lie."

सब घूमे। कॉफ़ी की ट्रे लिए वो मामूली सा अटेंडेंट दरवाज़े पर खड़ा था, और जो अंग्रेज़ी उसके मुँह से निकल रही थी, वो किसी बोर्डरूम की थी, किसी सर्विस लिफ़्ट की नहीं।

"The seventy percent is real," रघु ने आगे कहा, बिल्कुल आराम से। "But it also counts your banquet and conference guests. They use the halls, not the rooms, so they run almost no laundry and very little power. Your forty and their seventy are both correct, sir. Page eleven. The footnote that explains it was left out of the print. Without it, the numbers read like a lie."

अल-रशीद ने बैठ कर पन्ना ग्यारह पलटा। आँखें संख्याओं पर दौड़ीं। फिर उसने ऊपर देखा, इस बार ग़ुस्से से नहीं, हैरानी से।

"And the cost line," रघु ने बहुत हल्के से जोड़ा, जैसे माफ़ी माँग रहा हो, "on the same page. Your laundry cost is entered as eighteen lakh. It should read one point eight. Somebody slid the decimal one place. It makes your whole margin look ten times worse than it is. May I, sir?"

बिना इजाज़त के, रघु ने ट्रे रखी, मेज़ पर झुका, और एक पेन से उस छपे पन्ने पर एक दशमलव को उसकी सही जगह सरका दिया। वो नंबर, जो दोनों मैनेजर महीनों से नहीं पकड़ पाए थे।

फिर उसने पेन रखा, ट्रे उठाई, कंधे फिर झुका लिए, नज़र फिर फ़र्श पर, और उसी दीन आवाज़ में बोला, "माफ़ कीजिए साहब, मैंने बस... कॉफ़ी ठंडी हो रही थी, सोचा रख दूँ।"

पर ये पूरा सच नहीं था। रघु को सहगलों से नफ़रत थी, ऐसी नफ़रत जो बारह साल बाद भी राख की तरह सुलगती थी। पर उसे ये होटल चाहिए था, साबुत और साँस लेता हुआ। एक डूबा हुआ इम्पीरियल किसी काम का नहीं था, क्योंकि उसके पिता का इंसाफ़ इन्हीं दीवारों में कहीं दफ़न था, और बिखरे हुए मलबे में से कोई राज़ नहीं निकाला जा सकता। और एक बात और थी, जो वो ख़ुद से भी नहीं कहता था। हिसाब में झूठ उससे देखा ही नहीं जाता था। ठीक अपने बाप की तरह।

अल-रशीद कुछ देर उस सही नंबर को देखता रहा, फिर आन्या की तरफ़। "Madam. Forget the one hour. Send me a clean sheet by tonight, and I will reconsider." वो उठा, और जाते जाते एक बार उस अटेंडेंट को देखा, जो दरवाज़े पर वैसे ही दीन खड़ा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। फिर ज़रा सा सिर हिलाया, और चला गया।

करण ने लंबी साँस ली। "देखा? मैंने कहा था ना, बस थोड़ा समझाने की देर थी।" वो काग़ज़ समेटता हुआ बाहर निकल गया, ये देखे बिना कि असल में उसे समझाया किसने था।

पर कमरे में एक इंसान ऐसा था जो ये नहीं भूली।

आन्या वहीं खड़ी रही, रघु को सिर से पाँव तक देखती हुई। वो झुकी गर्दन, वो घिसी जूतियाँ, वो वर्दी जिस पर लिखा था, रघु, अटेंडेंट। और वो अंग्रेज़ी, वो करोड़ों का सौदा जो एक चाय वाले की दो लाइनों से बच गया, वो दशमलव जो दो ट्रेंड मैनेजर महीनों से नहीं पकड़ पाए।

कोई अटेंडेंट ये नहीं कर सकता।

"रघु।" उसकी आवाज़ में अब हुक्म नहीं, एक सवाल था। रघु ने सिर उठाया। "जी, मैडम?"

आन्या उसके क़रीब आई, और बहुत धीरे, सीधे उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, जैसे पहेली का आख़िरी टुकड़ा बिठाने की कोशिश कर रही हो।

"तुम... आख़िर हो कौन?"

रघु की आँखें एक पल को बिल्कुल शांत हो गईं। फिर उसने नज़र झुका ली, और एक दीन, टूटी सी मुस्कान के साथ कहा, "रघु, मैडम। अटेंडेंट। और कौन हूँगा?"

पर आन्या हिली नहीं। उसकी नज़र उस पहेली पर जमी रही, जो हल नहीं हो रही थी। उस आदमी पर, जो हिसाब से कहीं ज़्यादा था।

और रघु को बारह साल में पहली बार ऐसा लगा कि इस महल में एक जोड़ी आँखें ऐसी हैं जो सच में देख रही हैं।

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