Chapter 15 of 15
नया मालिक
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
बारह साल बाद इम्पीरियल पर एक नई सुबह उतरती है। लॉबी की दीवार पर देवराज प्रताप की तस्वीर लौट आती है, और पीतल की पट्टी पर उनका नाम फिर से उसी जगह गढ़ा जाता है जहाँ से बारह साल पहले उसे छील दिया गया था। बृज और करण क़ानून के हवाले, दादी को इज़्ज़त के साथ घर में जगह, और बिट्टू को उसके दो रुपये ब्याज समेत, एक नई ज़िंदगी की शक्ल में। अब न नौकर का फ़ासला, न मालिक का, शौर्य और आन्या बराबर हो कर एक-दूसरे को चुनते हैं। पर एक तीसरी परछाईं अब भी शहर के ऊपर खड़ी है।
बारह साल पहले इस होटल की एक रात थी, जिसने एक सात साल के बच्चे से उसका बाप, उसका नाम और उसकी पूरी दुनिया छीन ली थी। आज, बारह साल बाद, इसी होटल की एक सुबह थी। रातें छीनती हैं। सुबहें कभी-कभी लौटा देती हैं।
रोशनी समंदर की तरफ़ से बहुत धीरे चढ़ी, जैसे बारह साल बाद वो भी एक पल को ठिठकी हो, ये देखने को कि इस बार इम्पीरियल की सबसे ऊँची मंज़िल पर कोई लपट तो नहीं जाग रही। वहाँ कोई लपट नहीं थी। बस एक साफ़, ठंडा उजाला, जो काँच की ऊँची खिड़कियों से छन कर उस संगमरमर पर बिछ गया, जिस पर बारह साल पहले एक रात हथकड़ी की आवाज़ गूँजी थी।
लॉबी के झूमर आज बुझे थे। बारह साल वो हर सुबह जलते रहे थे, इसलिए नहीं कि रोशनी की कमी थी, बल्कि इसलिए कि उनकी चमक के नीचे दीवारों की महीन दरारें छिप जाती थीं। आज पहली बार किसी ने उन्हें बुझा रहने दिया था। और दिन के सच्चे उजाले में इम्पीरियल बूढ़ा ज़रूर दिख रहा था, पर पहली बार बेईमान नहीं। ये एक ऐसे घर की सुबह थी जिसने आख़िरकार अपनी रोकी हुई साँस छोड़ दी हो।
बीते हफ़्तों ने बहुत कुछ बदला था। अदालत का वो फ़ैसला, जो बारह साल देर से आया, अब पूरे शहर के काग़ज़ों में छप चुका था। बृज सहगल और करण, दोनों अब क़ानून की उस मेज़ के उस पार थे, जिसे वो उम्र भर अपनी जेब में रखते आए थे। शौर्य ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा था। जिस आदमी ने अपना पूरा बचपन एक झूठे इल्ज़ाम की आग में जलते देखा हो, वो जानता है कि सच्चे इंसाफ़ की आवाज़ धीमी होती है। चीख़ती तो सिर्फ़ बदले की आग है।
और उसी लॉबी में, उस सुबह, एक आदमी अकेला खड़ा था। सादा, गहरे रंग का सूट, पीठ सीधी। न कोई पानी की ट्रे, न झुके कंधे, न वर्दी पर सिला हुआ कोई उधार का नाम। बारह हफ़्ते इसी फ़र्श पर वो दूसरों का गिराया उठाता रहा था, और आज इसी फ़र्श पर उसके अपने क़दमों की आवाज़ गूँज रही थी। दूर, कर्मचारियों के दरवाज़े से सुबह की पहली पाली अंदर आने लगी, वही चार सौ लोग, जिनकी छत एक रात पहले एक क़लम की नोक पर टिकी थी, और जो आज भी, बिना जाने, उसी आदमी की छाँव में काम पर लौट रहे थे जिसे वो कभी रघु कहते थे।
लॉबी की उत्तर वाली दीवार पर, जहाँ संगमरमर सबसे ऊँचा उठता था, एक चीज़ बारह साल से अधूरी थी, और किसी की नज़र उस अधूरेपन पर कभी नहीं पड़ती थी।
वहाँ संस्थापकों की एक पुरानी पीतल की पट्टी जड़ी थी। उस पर एक नाम था, सहगल। और उसके ठीक बराबर, कभी एक दूसरा नाम रहा होगा, क्योंकि वहाँ अब भी एक चिकना, घिसा हुआ निशान था, जहाँ किसी ने बहुत बरस पहले रेगमाल और छेनी से एक नाम को पीतल से छील डाला था। बारह साल वो ख़ाली जगह वहीं थी, संस्थापक के नाम के बराबर, एक न पूछे गए सवाल की तरह।
आज उस दीवार के नीचे एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। फेकू काका, जिसने इस होटल की नींव की पहली ईंट अपने हाथ से रखी थी, और जो बारह साल इसी लॉबी में झाड़ू लगाता आया था। उसके हाथ में एक मुलायम कपड़ा था, और वो उस पीतल को धीरे-धीरे चमका रहा था, जैसे कोई किसी बहुत पुराने ज़ख़्म पर मरहम रख रहा हो।
पट्टी पर, उस ख़ाली, घिसे हुए निशान के ऊपर, एक कारीगर झुका था, और उसकी छेनी पीतल पर चल रही थी। पर इस बार वो किसी नाम को छील नहीं रही थी। वो एक नाम को वापस गढ़ रही थी। एक अक्षर, फिर दूसरा, और बारह साल की वो ख़ाली जगह धीरे-धीरे भरती गई, जब तक संस्थापक के नाम के ठीक बराबर, उतने ही बड़े, उतने ही गहरे, एक दूसरा नाम पीतल में फिर से चमक न उठा।
देवराज प्रताप।
और उसके ठीक ऊपर, दीवार पर, एक तस्वीर वापस अपनी जगह लग चुकी थी। एक नौजवान आदमी, खुली हँसी, चेहरे पर वो रोशनी जो सिर्फ़ अपने हाथ और अपने ईमान से कुछ खड़ा करने वालों के पास होती है। बारह साल पहले इसी दीवार से ये तस्वीर उतार दी गई थी, जैसे वो आदमी कभी था ही नहीं। आज वो वापस वहीं था, अपने ही बनाए महल को देखता हुआ।
शौर्य उस तस्वीर के सामने बहुत देर चुप खड़ा रहा।
फिर उसने अपनी जेब से एक चीज़ निकाली। पीतल का एक छोटा, घिसा हुआ टुकड़ा। उद्घाटन की रात के बाद, जब उन्होंने नींव की पट्टिका से उसके बाप का नाम छेनी मार कर अलग किया था, तो ये टुकड़ा फ़र्श पर गिरा रह गया था, और एक सात साल के बच्चे ने उसे चुपचाप उठा कर मुट्ठी में बंद कर लिया था। बारह साल वो उसकी जेब में पड़ा रहा, एक अधूरे नाम के टूटे सिरे की तरह।
उसने वो टुकड़ा एक पल हथेली में तौला। आज पहली बार उसका वज़न पूरा था।
फिर उसने तस्वीर की तरफ़ देखा, और बहुत धीरे, जैसे कोई बरसों बाद किसी से बात कर रहा हो, कहा। "आपने कहा था, ये पूरा मेरा होगा। पर मुझे ये महल कभी नहीं चाहिए था, पापा। मुझे बस आपका नाम चाहिए था। वहीं, जहाँ से उन्होंने उसे छीला था।"
उसके कानों में बारह साल पुरानी एक आवाज़ गूँजी, उसी रात की, जब आसमान की आतिशबाज़ी अभी आग नहीं बनी थी। मालिक बनना आसान है, बेटा। ईमानदार मालिक बनना मुश्किल। तू वही बनेगा। वादा?
"वादा निभा दिया," शौर्य ने कहा।
थोड़ी दूर, एक खंभे के सहारे, दादी सावित्री खड़ी थीं, छड़ी पर दोनों हाथ टिकाए, और उस चमकते नाम को देखती उनकी आँखें भर आई थीं।
"मेरे पति ने इसे मिटाया था," उन्होंने धीरे से कहा। "और मैं, बारह साल, इस ख़ाली जगह के सामने से रोज़ गुज़रती रही, और हर बार नज़र फेर लेती रही।" उनकी आवाज़ काँपी। "आज पहली बार मैं इस दीवार की तरफ़ सीधी देख पा रही हूँ, बेटा।"
शौर्य उनके पास गया। "अब ये आपका भी घर है, दादी। उस आदमी का घर, जिसका नाम आपने बारह साल बचाए रखा।"
दादी ने सिर हिलाया, और उनकी झुर्रियों में बरसों बाद एक चैन उतरा। ये घर अब क़ब्र नहीं, फिर से एक घर था।
उसी दोपहर, सबसे ऊँची मंज़िल के उस दफ़्तर में, जो कभी बृज सहगल का था, एक नई आवाज़ गूँज रही थी, और वो आवाज़ हरियाणवी थी।
"भाई... मेरा मतलब, सेठ जी... मेरा मतलब, साहब।" बिट्टू दरवाज़े पर खड़ा अपनी ही ज़बान में उलझ रहा था। "देख, मेरे को समझ ना आवै, तेरे को बुलाऊँ तो क्या बुलाऊँ। कल तक तू मेरी टूटी खटिया पे बैठ के मेरा परांठा खावै था, और आज तू इस पूरे होटल का..."
"बिट्टू।" शौर्य ने कहा। "अंदर आ। और दरवाज़ा बंद कर।"
बिट्टू अंदर आया, पर उस आलीशान कमरे में ऐसे क़दम रखे जैसे फ़र्श काँच का हो। "भाई, सच कहूँ? मेरे को ये कमरा डरावना लागै। इत्ती बड़ी मेज़, इत्ती सारी किताबां। और तेरे बड़े साहब वाली कुर्सी पे तू बैठा सै, और मेरा भेजा अब भी मानै ना कि तू ही वो गरुड़ सै।"
शौर्य उठा, मेज़ का चक्कर काट कर उसके सामने आया, और एक थकी पर सच्ची हँसी के साथ जेब से कुछ निकाला। दो रुपये का एक पुराना, मुड़ा हुआ सिक्का।
"पहले एक पुराना हिसाब, बिट्टू।"
बिट्टू ने सिक्के को देखा। "ये क्या सै?"
"तेरे दो रुपये।" शौर्य ने कहा। "वो चाय वाले। याद है? पहले हफ़्ते, जब मेरी जेब में कुछ नहीं था, तूने बिना पूछे चाय के दो रुपये थमा दिए थे। मैंने उस दिन कहा था, ब्याज समेत लौटाऊँगा।"
बिट्टू हँसा। "अरे छोड़ ना भाई, दो रुपये का क्या ब्याज..."
"बारह साल की दर से नहीं," शौर्य ने उसकी बात काटी, और उसकी आँखों में एक शरारत थी जो रघु की वर्दी कभी बाहर नहीं आने देती थी। "सिर्फ़ बारह हफ़्ते की दोस्ती की दर से। और दोस्ती का ब्याज, बिट्टू, सबसे ऊँचा होता है।"
उसने मेज़ पर से एक काग़ज़ उठाया और बिट्टू की तरफ़ बढ़ाया।
"ये क्या सै?" बिट्टू ने काग़ज़ को ऐसे थामा जैसे वो काट लेगा।
"इम्पीरियल का नया हुक्मनामा। आज से नीचे का पूरा अमला, रसोई से लेकर दरवाज़े तक, एक आदमी के ज़िम्मे है। उसका नाम है... बिट्टू।" शौर्य ने कहा। "हेड ऑफ़ स्टाफ़। अपनी एक टीम, अपना एक दफ़्तर, और एक तनख़्वाह, जिससे तेरे गाँव वाले घर का वो पूरा क़र्ज़ इसी महीने उतर जाएगा, जिसकी फ़िक्र में तू हर पहली तारीख़ को चुप हो जाता था।"
बिट्टू का मुँह खुला रह गया। काग़ज़ उसके हाथ में काँपा।
"भाई..." उसकी आवाज़ भर्रा गई, फिर उसने ज़ोर से नाक सुड़की और नक़ली ग़ुस्से से मुँह फेर लिया, क्योंकि उसके गाँव में मर्द रोते नहीं, बस नाक सुड़कते हैं। "ये... ये तो दो रुपये का बहुत ज़्यादा ब्याज हो ग्या, सेठ जी। इत्ता तो मैंने माँगा भी ना था।"
"माँगने वाली चीज़ें छोटी होती हैं, बिट्टू।" शौर्य ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तूने एक नौकर को, जिसके पास कुछ नहीं था, भाई कहा था। ये जाने बिना कि वो कौन है। इस पूरे महल में सिर्फ़ दो लोग थे जिन्होंने रघु को इंसान समझा। एक मैडम कपूर। और एक तू। तूने उसके साथ अपना आधा परांठा बाँटा। ये उसी का हिसाब है।"
बिट्टू ने आँखें पोंछीं, और धीरे-धीरे उसके चेहरे पर वो पुरानी लॉटरी वाली चमक लौट आई।
"एक बात बता, भाई।" उसने धीमे से पूछा, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ पूछ रहा हो। "अब जब मैं हेड बन ग्या... तो वो जो गंजा भनोट था, करण साहब वाला, जो तेरे को चौबीस घंटे घूरता रह्या... वो अब किसके नीचे काम करैगा?"
शौर्य की आँख में वो शरारत लौटी। "तेरे।"
बिट्टू ने एक लंबी, गहरी, संतुष्ट साँस ली, जैसे बारह साल का कोई हिसाब उसका भी आज पूरा हुआ हो। "तो ठीक सै।" उसने टोपी वापस सिर पर रखी, इस बार ज़रा अकड़ के साथ, और दरवाज़े पर दाँत निकाल कर रुका। "और गरम पानी अब वो बाँटेगा, सेठ जी। इस घर में ठंडे-गरम का हिसाब बदल ग्या।"
उस शाम, जब आसमान समंदर के ऊपर सुनहरे से गुलाबी होता जा रहा था, आन्या उस ऊँचे दफ़्तर में आई। उसके हाथ में कोई फ़ाइल नहीं थी, और यही सबसे बड़ी बात थी। बारह हफ़्ते वो इस आदमी के सामने हमेशा कोई न कोई काग़ज़ ले कर आई थी, कोई हिसाब, कोई जंग, कोई बचाने लायक़ चीज़। आज पहली बार उसके दोनों हाथ ख़ाली थे।
शौर्य खिड़की के पास खड़ा था। उसने मुड़ कर देखा, और एक पल को दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। बिना किसी मेज़ के, बिना किसी मुखौटे के, बिना किसी ऐसे गरुड़ के, जिसे एक को बचाना था और दूसरे को छुपाना।
"कंधा कैसा है?" उसने पूछा।
"सत्रह टाँके थे," उसने कहा। "अब सिर्फ़ एक लकीर बची है।"
आन्या पास आई। उसने अपनी हथेली उठाई, वही हथेली जिसने एक रात आग में हाथ डाल कर एक जलते पन्ने को बचाने की कोशिश की थी। उस पर अब भी जलने का एक हल्का, चमकीला निशान था। उसने वो हथेली बहुत धीरे उसके कंधे पर रखी, ठीक वहाँ, जहाँ कोट के नीचे वो लकीर थी।
"दो निशान," उसने कहा। "एक ही रात के। एक ही आग के।"
"उस रात तुमने मुझसे एक सवाल पूछा था," शौर्य ने कहा। "कि उस वर्दी के नीचे कौन सा आदमी असली है। रघु, या गरुड़।"
"मुझे जवाब मिल गया।" आन्या उसकी आँखों में देखती हुई पास आई। "वो दोनों कोट थे, एक डर का, एक ग़ुस्से का। असली आदमी वो है जिसे मैंने उस मेज़ पर देखा। जो अपने ही ख़ून में पड़ा, पहले अपने सबूत का नहीं, दो जानों का हिसाब पूछता है। बारह हफ़्ते मैं कभी एक नौकर के सामने थी, कभी एक सर्द मालिक के। आज मैं बस एक आदमी के सामने हूँ। और पहली बार, मुझे ये डर नहीं कि उसके पीछे एक और छुपा है।"
"हम मिले थे एक नौकर और उसकी बॉस की तरह," शौर्य ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक नहीं थी जो बारह साल उसकी ढाल रही थी। "मैं तुम्हें फ़ाइलें थमाता था, और सिर झुका कर जी मैडम कहता था।"
"और मुझे वो जी मैडम याद आएगी," आन्या ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा। "तुम बहुत अच्छे नौकर थे, शौर्य प्रताप। सबसे ख़तरनाक तरीक़े से अच्छे।"
वो हँसा, खुल कर, बिना तौले, और वो हँसी आन्या ने पहली बार सुनी।
"पर अब मैं तुम्हारी बॉस नहीं हूँ," उसने कहा, आवाज़ धीमी करते हुए। "और तुम मेरे नौकर नहीं हो। आज इस कमरे में कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं। बस दो लोग, जो शुरू से बराबर थे, और जिन्हें ये मानने में बारह हफ़्ते और एक पूरी आग लग गई।"
उनके बीच का वो आख़िरी फ़ासला, जो हर रात थोड़ा और कम होता आया था, अब बस एक साँस का था। बारिश वाली उस रात उन्होंने इसे एक बार पार किया था, पर तब एक झूठ उन दोनों के बीच एक तीसरे की तरह खड़ा था। आज वहाँ कोई तीसरा नहीं था। न रघु, न गरुड़, न कोई गुम पन्ना। सिर्फ़ वो दोनों, वो शाम, और वो शहर जो नीचे रोशनी से जलने लगा था।
इस बार किसने पहले वो आख़िरी फ़ासला तय किया, ये जानना ज़रूरी नहीं था। क्योंकि इस बार दोनों पूरी तरह जानते थे कि वो किसे चुन रहे हैं। आन्या की वही जली हथेली उसके कॉलर तक उठी, और शौर्य का हाथ, जो बारह साल हर चीज़ नापता आया था, बिना नापे उसके चेहरे को थाम बैठा। उनके माथे छुए, साँसें उलझीं, और इस बार उनके बीच कोई राज़ नहीं था जो इस क़ुरबत को झूठा कर सके।
और कहानी को यहीं रुक जाना चाहिए। कुछ पल सिर्फ़ उन दो लोगों के होते हैं जिन्होंने उन्हें बहुत महँगी क़ीमत पर कमाया है, और बाक़ी दुनिया को, बहुत नरमी से, उस कमरे का दरवाज़ा बाहर से भेड़ देना चाहिए।
खिड़की के बाहर, मुंबई की पहली बत्तियाँ एक-एक कर जल उठीं।
अगली सुबह, इम्पीरियल फिर रोशन था, और इस बार उसकी रोशनी में कोई डर नहीं था। शौर्य अपने दफ़्तर में था, जब खन्ना अंदर आया, हाथ में एक छोटा, सादा डिब्बा।
"सर, ये अभी आया। किसी कूरियर से। भेजने वाले का कोई नाम नहीं।"
शौर्य ने डिब्बा खोला। अंदर, मख़मल के एक टुकड़े पर, एक चीज़ रखी थी जिसे देख कर उसकी रगों में बारह साल बाद वही पुरानी ठंडक लौट आई।
पीतल का एक छोटा, घिसा हुआ टुकड़ा। बिल्कुल वैसा ही, जैसा बारह साल उसकी अपनी जेब में पड़ा रहा था। पर ये उसका टुकड़ा नहीं था, वो उसकी जेब में महफ़ूज़ था। ये कोई और टुकड़ा था, किसी और कहानी का।
डिब्बे में एक छोटा कार्ड भी था, उस पर सिर्फ़ एक लाइन, बहुत पुरानी, बहुत साफ़ लिखावट में।
"तुम्हारे बाप का नाम वापस अपनी जगह लग गया। बधाई। उसे मैं भी जानता था।"
कोई दस्तख़त नहीं। कोई नाम नहीं।
शौर्य बहुत देर उस कार्ड को देखता रहा। ये धमकी नहीं थी, और यही सबसे बुरी बात थी। बारह साल जिस आदमी ने हर सरकारी काग़ज़ से अपना नाम मिटाए रखा था, वो आज, बहुत नरमी से, उसे बता रहा था कि वो देख रहा है। चुपचाप। बहुत ऊपर से।
उसी वक़्त, शहर के दूसरे सिरे पर, शीशे के एक ऊँचे मीनार में, एक आदमी अपनी खिड़की के सामने, नीचे इम्पीरियल की उस छत को देख रहा था, जो आज पहली बार उसके सही नाम के नीचे साँस ले रही थी।
"उसने नाम वापस लगा दिया," उसने धीरे से, किसी फ़ोन में कहा। "अच्छा है। एक बेटे को इतना तो मिलना ही चाहिए।" वो रुका, और उसकी आवाज़ में न जल्दी थी, न डर। "सहगल एक दरवाज़ा था, और वो दरवाज़ा अब बंद हो गया। पर हर महल के नीचे एक तहख़ाना होता है, जिसका दरवाज़ा सबसे आख़िर में खुलता है। और उसे अभी ये नहीं पता कि वो किस चीज़ के ऊपर खड़ा है।"
वो हलके से मुस्कुराया, और परदा खींच दिया। "जब तक वो ऊपर देखना शुरू न करे, उसे चैन से जीने दो। बारह साल उसने अँधेरे में काटे हैं। थोड़ी रोशनी का हक़ उसका भी बनता है।"
नीचे, अपने दफ़्तर में, शौर्य ने वो कार्ड धीरे से मेज़ पर रख दिया। बारह साल की पूरी लड़ाई एक नाम के लिए थी, और वो नाम आज दीवार पर वापस था। ये नई परछाईं अपनी एक अलग कहानी थी, और उस कहानी का दिन अभी नहीं आया था। आज का दिन जीत का था। और शौर्य ने बारह साल में एक बात सीखी थी, कि जीत को उसका पूरा एक दिन देना चाहिए, इससे पहले कि अगली लड़ाई उसे छीन ले।
वो उठा, और उस ऊँचे दफ़्तर से नीचे, उसी लॉबी में आया, जहाँ बारह हफ़्ते पहले एक भरी महफ़िल में उसके गाल पर एक थप्पड़ पड़ा था, और जहाँ बारह साल पहले एक हथकड़ी की आवाज़ गूँजी थी। आज वहाँ सुबह की रोशनी थी, चार सौ लोगों के क़दमों की आवाज़ थी, और उत्तर वाली दीवार पर, संस्थापक के नाम के बराबर, एक नया चमकता हुआ नाम।
देवराज प्रताप।
शौर्य उस नाम के नीचे आ कर खड़ा हुआ। बारह हफ़्ते उसने इसी फ़र्श पर एक नौकर की वर्दी पहनी थी, सिर झुकाया था, जी साहब कहा था। पूरी दुनिया ने उसे पैरों की धूल समझा था। पर अब उसे एक बात बहुत साफ़ दिखती थी, जो उस दिन उस भरी महफ़िल में किसी को नहीं दिखी थी।
उस वर्दी के नीचे कभी कोई नौकर था ही नहीं।
उसके बाप ने एक बार कहा था, मालिक बनना आसान है, ईमानदार मालिक बनना मुश्किल। बारह साल लगे, और बहुत कुछ राख हुआ, पर आज वो दोनों था। मालिक भी, और ईमानदार भी।
वो नौकर कभी था ही नहीं। जिस दिन एक सात साल के बच्चे ने एक जलते महल की राख के सामने खड़े हो कर एक वादा किया था, उसी दिन से, हर झुके कंधे के नीचे, हर जी साहब के पीछे, इस घर का एक ही मालिक था।
और आज, बारह साल बाद, घर ने आख़िरकार अपने मालिक को पहचान लिया।
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