अध्याय 13 / 15
नौकर नहीं मालिक
नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi
बारह हफ़्ते जिस नौकर को सहगल अपने पैरों की धूल समझते रहे, आज वो उनकी अपनी मेज़ पर खड़ा है, बिना मुखौटे के। गरुड़ बन कर शौर्य इम्पीरियल का पूरा क़र्ज़ वसूल कर लेता है, और देवराज प्रताप के बेटे के हक़ से होटल का असली मालिक बन कर सामने आता है। दादी वो जला हुआ पन्ना बोर्ड की मेज़ पर रख देती हैं, जो बताता है कि उद्घाटन की रात आग किसके हुक्म पर लगी थी। बृज अपना पुराना गुनाह कबूल करता है, करण गिर जाता है। पर घिरे हुए लोग सबसे ख़तरनाक होते हैं, और एक आख़िरी आग, एक चीख़ते अलार्म और अँधेरे में किसी एक की जान दाँव पर लग जाती है।
इस घर में एक चेहरा बारह हफ़्ते सबके सामने रहा, और किसी की नज़र उस पर एक पल को नहीं ठहरी। आज वो चेहरा उनकी अपनी मेज़ के सिरे पर खड़ा होने वाला था, और पहली बार, उन्हें उसे देखना पड़ता। पूरा।
ग्यारह बजे, इम्पीरियल का बोर्डरूम किसी अदालत की तरह सजा था। लंबी अख़रोट की मेज़ के गिर्द कई कुर्सियाँ, हर एक पर एक सहमा चेहरा। मेज़ के सिरे पर बृज सहगल, अपनी सबसे महँगी शेरवानी में, उस जज की तरह जो जानता है कि असल कटघरे में वो ख़ुद है। उसके दाएँ करण, रंग उड़ा हुआ, उँगलियाँ मेज़ के नीचे बँधी। और दीवार के साथ, एक कोने में, अपनी छड़ी पर दोनों हाथ टिकाए, दादी सावित्री बैठी थीं, ख़ामोश।
बृज बोल रहा था, और उसकी आवाज़ में रात भर की थकान को घमंड की कलफ़ ने ढाँप रखा था।
"...तो मैं साफ़ कह दूँ। गरुड़ ने ये क़र्ज़ हमसे ईमानदारी से नहीं, धोखे से लिया है। उसने हमारे ही घर में एक जासूस बिठाया, बारह हफ़्ते हमारी हर बात चुराई, और फिर उसी चोरी के बल पर हमें घेर लिया। मैं इसे अदालत में चुनौती दूँगा। कोई बेनाम गरुड़ सहगल का नाम इस मेज़ से नहीं मिटा सकता।"
और ठीक उसी पल, बोर्डरूम का भारी दरवाज़ा खुला। कोई दस्तक नहीं हुई थी।
अंदर एक आदमी आया। सादा, गहरे रंग का सूट, पीठ सीधी, क़दम नपे हुए। चेहरा वही था जिसे इस कमरे के हर आदमी ने पिछले बारह हफ़्ते सौ बार देखा था, और एक बार भी नहीं देखा था। पर आज न पानी की ट्रे थी, न झुके कंधे।
एक पल को पूरा कमरा उसे पहचान नहीं पाया, क्योंकि वो उसे एक ग़लत जगह पर खड़ा देख रहा था।
फिर बृज ने पहचाना।
"ये..." उसकी शेरवानी की कलाई पर उँगलियाँ कस गईं। "इस नौकर को यहाँ किसने आने दिया? निकालो इसे। अभी।"
दो गार्ड दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, फिर रुक गए। उस आदमी ने उनकी तरफ़ देखा तक नहीं था, और फिर भी वो रुक गए। बारह हफ़्ते जिस झुकी पीठ को वो कोहनी मार कर हटाते आए थे, आज उसके सीधे खड़े होने में कुछ ऐसा था जो हुक्म से भारी था।
"बैठ जाइए, सहगल साहब।" आदमी ने कहा। आवाज़ दीन नहीं थी, नरम नहीं थी, बस सीधी और इतनी शांत कि कमरे का हर शोर उसके नीचे दब गया। "आज की बैठक का एजेंडा आपकी अपनी मैनेजर ने लिखित में भेजा था। बहुमत लेनदार का प्रतिनिधि आज इसी मेज़ पर अपना पूरा क़र्ज़ ख़ुद वसूल करने आएगा। मैं वही प्रतिनिधि हूँ।"
बृज की हँसी एक सूखी खाँसी की तरह निकली। "तुम? तुम गरुड़ के प्रतिनिधि हो? एक झाड़ू वाला?"
"नहीं।"
एक पल रुका।
"मैं प्रतिनिधि नहीं हूँ, सहगल साहब। मैं गरुड़ हूँ।"
बोर्ड की मेज़ पर एक सरसराहट दौड़ी, फिर एक भारी ख़ामोशी। बृज की आँखें सिकुड़ीं, जैसे किसी ने उसके सामने एक ऐसी भाषा बोल दी हो जो उसे आती तो थी, पर जिस पर वो यक़ीन नहीं करना चाहता था।
"झूठ," उसने कहा, पर इस बार आवाज़ में एक दरार थी।
"झूठ नहीं है, पापा।" करण पहली बार बोला, और उसकी आवाज़ किसी टूटे आदमी की थी। "मैंने आपको कल रात बताया था। ये वही है। हमारा नौकर। और गरुड़। दोनों एक हैं।"
शौर्य ने अपने सूट से एक पतला फ़ोल्डर निकाला और मेज़ पर बृज की तरफ़ सरका दिया।
"इस घड़ी से, बहुमत लेनदार की हैसियत से, मैं द ग्रैंड इम्पीरियल का पूरा क़र्ज़ औपचारिक रूप से वसूल करता हूँ। एकमुश्त। बोर्ड के सामने, गवाहों के सामने।" उसकी उँगली काग़ज़ पर टिकी। "और आप जानते हैं इसका मतलब क्या है। इस पल से सहगल की हर गिरवी रखी चीज़ लेनदार की निगरानी में आ जाती है। हर खाता। हर तिजोरी। हर लॉकर।"
बृज का चेहरा एक छाया से गुज़रा। लॉकर। वो लफ़्ज़ उसके सीने में किसी कील की तरह धँसा। रात भर वो एक ही उम्मीद पर टिका था, कि सुबह बैंक खुलते ही वो उस लॉकर तक पहुँचेगा और उस एक पन्ने को राख कर देगा। और अब इस एक काग़ज़ ने, इस एक पल ने, उसके हाथ पीछे बाँध दिए थे।
"तुम..." बृज के होंठ काँपे। "तुम वो पन्ना ढूँढ रहे हो।"
"मैं वो पन्ना बारह साल से ढूँढ रहा हूँ, सहगल साहब।"
शौर्य मेज़ के साथ-साथ बृज की तरफ़ चला।
"बारह हफ़्ते आपने एक नौकर देखा," उसने कहा। "जो आपका पानी ढोता था, आपका जूठा गिलास उठाता था, और जिसकी तरफ़ देखना भी आपने अपनी शान के ख़िलाफ़ समझा। आपको याद है, उसी जलसे में, जब किसी ने पूछा था कि गरुड़ का चेहरा कौन है, तो आपने क्या कहा था?"
बृज कुछ नहीं बोला।
"आपने कहा था, पैसा जब बोलता है, तो चेहरा कौन देखता है।" शौर्य अब बृज के ठीक सामने था, मेज़ के दूसरे सिरे पर। "बारह हफ़्ते वो पैसा आपकी लॉबी में, आपके सामने, आपका पानी बाँटता रहा, और आपने एक बार भी उसका चेहरा नहीं देखा। आज वो पैसा आपकी अपनी मेज़ पर खड़ा है। अब देखिए। ध्यान से।"
बृज की नज़र पहली बार सच में उस चेहरे पर ठहरी, और जैसे-जैसे ठहरी, उसका रंग उतरता गया। वो उस गाल को देख रहा था जिस पर बारह हफ़्ते पहले उसने भरी महफ़िल में हाथ उठाया था।
"वो थप्पड़ आपको याद है?" शौर्य की आवाज़ नहीं बदली। "मुझे है। पर मैं उसका हिसाब माँगने नहीं आया। एक थप्पड़ का हिसाब छोटे लोग रखते हैं।" वो रुका। "मैं एक बड़ी चीज़ का हिसाब लेने आया हूँ।"
"तुम हो कौन?" बृज की आवाज़ अब बस एक फुसफुसाहट थी। "गरुड़ कोई नाम नहीं है। तुम्हारा असली नाम क्या है?"
शौर्य एक पल रुका। बारह साल बाद, दूसरी बार, उसने अपना नाम ख़ुद किसी और के सामने रखा। पर इस बार किसी अँधेरे कमरे में नहीं, उन्हीं लोगों के सामने जिन्होंने उसे उससे छीना था।
"शौर्य," उसने कहा। "शौर्य प्रताप। देवराज प्रताप का बेटा।"
वो नाम मेज़ पर किसी जली हुई चीज़ की तरह गिरा।
बृज की कुर्सी पीछे सरकी, जैसे उसका बदन ख़ुद उस नाम से दूर हटना चाहता हो। बारह साल उसने वो नाम लॉबी की दीवार से, सरकारी काग़ज़ों से, अपनी नींद से घिस-घिस कर मिटाया था। और आज वो नाम उसके अपने बोर्डरूम में, एक जीते-जागते आदमी की शक्ल में, उसके सामने खड़ा था।
"देवराज मर चुका है," बृज ने कहा, पर ये उसने शौर्य से नहीं, अपने आप से कहा था।
"हाँ। छह साल पहले।" शौर्य की आवाज़ पहली बार ज़रा सी भारी हुई, फिर वापस पत्थर। "एक टूटे हुए आदमी की तरह, उसी नाम के साथ जो आपके बाप ने उस पर मढ़ा था। पर उसका आधा हिस्सा नहीं मरा, सहगल साहब। इस होटल की हर वो ईंट जो कभी देवराज प्रताप के पैसे से रखी गई थी, क़ानूनन आज भी उसके वारिस की है। आपने उसका आधा हिस्सा चुराया था। मैं उसे वापस लेने आया हूँ।"
उसने पूरे कमरे की तरफ़ देखा, उन सहमे चेहरों की तरफ़, फिर बृज की तरफ़।
"आज इस मेज़ के दोनों मालिक यहाँ हैं। एक, जिसका नाम आपने दीवार से घिस दिया। और दूसरा, जिसे आपने बारह हफ़्ते अपने पैरों की धूल समझा।" उसकी आवाज़ नहीं उठी, और इसीलिए सबसे भारी पड़ी। "नौकर नहीं, सहगल साहब। इस घर का मालिक। आज से।"
बृज बहुत देर चुप रहा। फिर धीरे-धीरे उसकी रीढ़ में वो पुरानी अकड़ लौटी, उस आदमी की अकड़ जिसके पास हारने को कुछ बचे या न बचे, डुबाने को एक आख़िरी पत्ता हमेशा रहता है।
"मान लिया।" उसकी आवाज़ फिर सर्द हुई। "तुम गरुड़ हो। तुम देवराज के बेटे हो। पर एक बात तुम भूल रहे हो, बेटे।" आख़िरी लफ़्ज़ उसने ज़हर में डुबो कर कहा। "जिस पन्ने के लिए तुमने बारह साल अपनी ज़िंदगी जलाई, वो आज भी एक ऐसे लॉकर में है जो सहगल के नाम से खुलता है। तुम उसे लेनदार की निगरानी में जमा रख सकते हो, खोल नहीं सकते। बहुमत लेनदार उस लोहे के बाहर खड़ा रहेगा, और सच उसके अंदर।"
एक पल को कमरे में बृज की वो पुरानी मुस्कान लौटी।
और तभी कोने से एक छड़ी ज़मीन पर टिकी, और एक बूढ़ी आवाज़ ने उस मुस्कान को बीच से काट दिया।
"लॉकर सहगल के नाम से खुलता है, बृज।" दादी उठ खड़ी हुई थीं। "और मैं भी एक सहगल हूँ।"
बृज पलटा, जैसे उसे किसी ने पीछे से पुकारा हो। "अम्मा, आप बैठिए। ये आपका..."
"मैं आज सुबह बैंक गई थी, बृज।" दादी की आवाज़ काँप रही थी, पर रुक नहीं रही थी। "ओरिएंटल मर्केंटाइल। फ़ोर्ट वाली शाखा, जो तेरे दादा के ज़माने से हमारी है। तू रात भर उस लॉकर तक पहुँचने की चाल सोचता रहा। और मैं, जिसके हाथ में बारह साल से उसकी चाबी थी, सूरज निकलने से पहले वहाँ पहुँच गई।"
दादी ने अपने पल्लू के नीचे से एक पुराना, काला बक्सा निकाला, जिसकी पीतल की कुंडी वक़्त से काली पड़ चुकी थी, और उसे मेज़ पर रख दिया।
"बारह साल इस बक्से में सिर्फ़ एक चाबी रही," उन्होंने कहा, "और एक बेगुनाह का इंसाफ़ उस लोहे के लॉकर में बंद। आज मैं वो सच ख़ुद ले आई हूँ।"
उन्होंने कुंडी खोली। अंदर, रेशम के एक टुकड़े में लिपटा, एक पुराना पन्ना था। पीला, किनारों से भुरभुरा, एक तरफ़ से साफ़ कटा हुआ, जैसे किसी ने उसे किसी मोटी फ़ाइल की जड़ से बहुत एहतियात से अलग किया हो। सरकारी अग्निकांड जाँच का वो आख़िरी पन्ना, जिसे बारह साल पहले एक तेज़ ब्लेड ने उसकी फ़ाइल से काट दिया था।
शौर्य की साँस एक पल को रुकी। बारह साल। हर चाल, हर रात, हर ज़लालत, इसी एक पन्ने पर टिकी थी। और अब वो उसके सामने मेज़ पर पड़ा था, खुला, बेपर्दा, उन्हीं लोगों के बीच जिन्होंने उसे दफ़न किया था।
पर बारह साल की आदत एक पल में नहीं मरती। उस सीने में उठती राहत के बीच भी, उसके हाथ ने वही किया जो एक ऐसा आदमी हमेशा करता है जो कभी एक ही सबूत पर भरोसा नहीं करता। किसी की नज़र में आए बिना, उसके फ़ोन ने मेज़ पर खुले उस पन्ने की कई ख़ामोश तस्वीरें खींच लीं, इससे पहले कि कमरे में किसी और ने उसे ठीक से पढ़ा भी हो। काग़ज़ अब भी जल सकता था। पर उस पर लिखा सच अब एक जगह और महफ़ूज़ था।
बृज ने उस पन्ने को देखा, और कमरे की सारी हवा जैसे उसके फेफड़ों से निकल गई। पर वो टूटा नहीं। टूटना कमज़ोरों का काम था, और बृज सहगल आख़िरी पल तक एक ही बात पर यक़ीन करता था, कि कमज़ोरी से बड़ा कोई गुनाह नहीं।
"पढ़ लो," उसने थकी, सपाट आवाज़ में कहा। "वैसे भी अब सब पढ़ेंगे। हाँ। उस रात आग मेरे बाप के हुक्म पर लगी थी। सस्ते तार, घटिया पैनल, बिना जाँच का सामान। देवराज ने उसे रोका था, बार-बार, काग़ज़ पर। और जब उसी कटौती से आग लगी और एक आदमी मरा, तो मेरे बाप ने वो पूरी आग उठा कर देवराज के कंधों पर रख दी। क्योंकि देवराज ईमानदार था, और ईमानदार आदमी सबसे आसान शिकार होता है।"
मेज़ पर सन्नाटा था।
"मेरे बाप ने झूठ बोला," बृज ने कहा, और उसकी आवाज़ में पछतावे की एक बूँद भी नहीं थी, "और मैंने वो झूठ संभाल कर रखा। बारह साल। मैंने वो फ़ाइल दबाई, वो पन्ना छुपवाया, उस नाम को दीवार से घिसवाया। क्यों? क्योंकि सच बोल देता, तो ये महल गिर जाता, और मेरे साथ मेरा नाम भी।" उसने शौर्य की तरफ़ देखा। "तुम्हारा बाप एक इमारत के लिए ईमानदार रहा, और मर गया। मैं उसी इमारत के लिए बेईमान रहा, और बारह साल राज किया। तुम्हीं बताओ, बेटे। समझदार कौन था?"
"मेरा बाप मरा नहीं, सहगल साहब।" शौर्य की आवाज़ धीमी थी। "आपके बाप ने उसे मारा। और आप बारह साल ये समझते रहे कि आपने एक आदमी को दफ़न किया है। आपने एक वादा दफ़न किया था। और वादे राख से वापस आते हैं।"
अब तक करण एक बुत की तरह बैठा था। पर बाप का गुनाह खुलते ही उसके अंदर एक ही हिसाब जागा, अपने आप को इस डूबती नाव से अलग दिखाना।
"मैंने कुछ नहीं किया।" वो खड़ा हो गया। "ये सब मेरे बाप और दादा का है। मैं तो बस..."
दरवाज़ा खुला, और आन्या कपूर अंदर आई, हाथ में एक मोटी फ़ाइल।
"तुम तो बस महीनों से इस होटल के खातों से पैसा चुरा रहे थे, करण।" उसने फ़ाइल मेज़ पर रखी। "ये रहा हिसाब। हर झूठा बिल, हर फ़र्ज़ी ठेका, हर वो रुपया जो तुमने डूबते होटल की जेब से निकाल कर अपनी जेब में डाला। मैं हफ़्तों से ये जोड़ रही थी। आज ये भी मेज़ पर है।"
करण की आँखें फ़ाइल से शौर्य की तरफ़ घूमीं, और उनमें वही डर लौट आया जो कल रात भनोट के सामने जागा था।
"और एक बात, करण।" शौर्य की आवाज़ में अब एक बारीक, ठंडी धार थी। "अपने ही बाप को बेचने के लिए तुमने जो आदमी चुना था, वो मैं था। तुमने मेरे हाथ में अपनी ग़द्दारी की चिट्ठी थमाई, और एक ख़ामोशी का नोट पकड़ा कर समझा कि तुमने एक नौकर ख़रीद लिया। सत्रह। याद है? तुम्हारा वो लफ़्ज़, जो सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच था।"
करण का चेहरा राख हुआ।
"वो लफ़्ज़ तुम्हारे बाप के सामने रख दूँ?" शौर्य ने पूछा। "तुमने अपने बाप को मुझे बेचने की कोशिश की, करण। और जिस दिन सहगल का बेटा सहगल को बेचता है, उस दिन ख़ानदान को कोई बाहरी नहीं गिराता। वो अपने अंदर से गिरता है।"
बृज ने अपने बेटे की तरफ़ देखा, और उस एक नज़र में बारह साल का घमंड, बाप-बेटे का पूरा रिश्ता, चटक कर गिर गया। करण ने अपने बाप की वो नज़र झेली, और उसके चेहरे का आख़िरी रंग भी उतर गया।
करण की नज़र मेज़ पर पड़े उस पन्ने पर गई, और एक घिरे हुए जानवर की तरह उसके अंदर का आख़िरी हिसाब बहुत साफ़ हो गया। उस पन्ने के रहते वो जेल जाएगा। उस पन्ने के बिना सिर्फ़ इल्ज़ाम बचता है, और इल्ज़ामों से सहगल बरसों लड़ सकते हैं।
किसी के समझने से पहले, करण ने मेज़ पर झपट कर वो पन्ना उठा लिया।
"करण, नहीं!" आन्या चीख़ी।
पर करण की दूसरी जेब से पहले ही एक लाइटर निकल आया था, और उसकी छोटी पीली लौ उस सूखे, बारह साल पुराने काग़ज़ के किनारे से जा लगी।
पन्ना भभक उठा। और उस बंद बोर्डरूम में, बारह साल बाद, फिर एक लौ जागी, ठीक उसी तरह जैसे एक रात इसी होटल की सबसे ऊँची मंज़िल पर जागी थी। शौर्य मेज़ पर से लपका, पर करण पीछे हट गया, जलता पन्ना ऊपर उठाए।
"एक क़दम और, और ये राख," करण हाँफा, आँखें पागल। "फिर तेरे पास क्या बचेगा, देवराज के बेटे? एक कहानी। एक भूत। तेरा सबूत मेरी मुट्ठी में जल रहा है।"
जलते काग़ज़ की एक चिंगारी मेज़ पर बिखरे रेशम पर गिरी, फिर खिड़की के भारी मख़मली परदे पर। आग को बारह साल पुराने कपड़े और काग़ज़ से ज़्यादा भूख किसी चीज़ की नहीं होती। परदा एक साँस में लपट बन गया।
और तभी, छत पर, बारह साल बाद, वही आवाज़ फिर जागी जो उद्घाटन की रात इस होटल के संगमरमर पर गूँजी थी। फ़ायर अलार्म। एक तीख़ी, अंतहीन चीख़, किसी मरते हुए आदमी की आख़िरी पुकार जैसी।
बोर्डरूम की बत्तियाँ एक झटके में बुझ गईं, जैसे आग लगते ही पूरी इमारत ने आँखें मूँद ली हों, और उनकी जगह आपातकालीन रोशनी की वो लाल, काँपती चमक जागी। डायरेक्टर कुर्सियाँ गिराते दरवाज़े की तरफ़ भागे। धुआँ छत से नीचे उतरने लगा।
"दादी, पीछे हटिए!" शौर्य चिल्लाया।
पर करण उनके सबसे पास था। उसने जलते पन्ने को नीचे फेंका, और उसी हाथ से दादी की पतली कलाई जकड़ ली, उन्हें अपने और शौर्य के बीच खींचते हुए।
"रुक।" उसकी आवाज़ धुएँ में काँपी। "एक क़दम भी नहीं। तेरा सबूत ज़मीन पर जल रहा है, और मेरे हाथ में तेरी गवाह है। आज इस कमरे से या तो हम सब निकलेंगे, या कोई नहीं।"
ज़मीन पर वो पन्ना अब भी सुलग रहा था, आधा राख, आधा काला होता हुआ। आन्या धुएँ में घुटनों के बल गिरी, और अपनी नंगी हथेलियों से उस लौ पर हाथ मारा, उस सबूत को बचाने के लिए जिसके लिए एक आदमी ने अपनी पूरी ज़िंदगी जला दी थी।
"आन्या, छोड़ो उसे!" शौर्य की आवाज़ धुएँ में फटी, दो तरफ़ खिंची। एक तरफ़ वो बूढ़ी औरत करण की मुट्ठी में, दूसरी तरफ़ वो औरत आग में हाथ डाले।
फिर सब कुछ एक साथ हुआ।
शौर्य करण की तरफ़ झपटा। दादी की एक चीख़। आन्या की हथेली पर वो लौ। और धुएँ की एक काली दीवार, जो एक पल में पूरे कमरे को निगल गई और उस लाल काँपती रोशनी को भी बुझा गई। अब सिर्फ़ अँधेरा था, अलार्म की वो अंतहीन चीख़, और उसके नीचे कई साँसों की धक्का-मुक्की, जो दिखती नहीं थीं, बस सुनाई देती थीं।
एक जिस्म धुएँ में किसी से टकराया। एक हाथ किसी को थामने को लपका। बोर्डरूम की उस ऊँची काँच की दीवार से कोई जा भिड़ा।
और फिर वो आवाज़ आई।
काँच के टूटने की एक लंबी, तीख़ी चरमराहट, और उसके फ़ौरन बाद किसी भारी चीज़ के संगमरमर पर गिरने की एक गहरी, सपाट धमक। एक चीख़, जो शुरू हुई और बीच में ही कट गई।
फिर कुछ नहीं।
सिर्फ़ अलार्म चीख़ता रहा, धुएँ में, अँधेरे में, उस फ़र्श के ऊपर जहाँ अभी-अभी कोई गिरा था। पर किसकी आवाज़ बीच में कटी थी, और उस लाल अँधेरे में फ़र्श पर कौन पड़ा था, शौर्य, या आन्या, या वो बूढ़ी औरत जिसने आज अपना सबसे पुराना गुनाह नेकी में बदला था, ये अब सिर्फ़ वो अलार्म जानता था।
इम्पीरियल फिर जल रहा था। और इस बार, राख के सबसे क़रीब वो आदमी खड़ा था जिसने उसे बुझाने में अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी थी।
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