Chapter 9 of 15
मालिक से मुलाक़ात
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
करण रघु को अपने सबसे गंदे काम का मोहरा बना लेता है, और रघु डर का मुखौटा ओढ़ कर हाँ कह देता है, चुपके से डोर अपनी मुट्ठी में लेते हुए। फिर आता है इस खेल का सबसे ज़हरीला मज़ाक़। बेबस बृज आख़िरकार गरुड़ के आदमी से मिलने का मौक़ा पा लेता है, और अपने ही दफ़्तर में, अपने ही मालिक के सामने सिर झुका कर रहम माँगता है, ये जाने बिना कि गरुड़ उसके ठीक सामने खड़ा है। उधर आन्या एक पुरानी तस्वीर तक पहुँच जाती है, जिसमें नौजवान देवराज के पास खड़े एक बच्चे की आँखें उसे जानी-पहचानी लगती हैं।
इस महल में हर कोई मालिक से मिलना चाहता था। और मालिक रोज़ उन्हीं के बीच से गुज़रता था, सिर झुकाए, हाथ में किसी का जूठा गिलास, और वो उसकी तरफ़ देखते तक नहीं थे।
शादी की अगली सुबह इम्पीरियल एक हारे हुए जुआरी की तरह जागी। रात की सारी चमक उतर चुकी थी। बस एक चीज़ नहीं उतरी थी। करण की वो सर्द मुस्कान, जो उसने रात रघु के कंधे पर हाथ रखते वक़्त पहनी थी।
बृज सहगल का बेटा उस कुर्सी पर बैठा था जो कभी उसके दादा की थी, उँगलियों में एक चाँदी का पेपरवेट घुमाता हुआ।
"खड़ा रह," करण ने बिना नज़र उठाए कहा। "बैठने की आदत डालेगा तो काम भूल जाएगा। कल रात मैंने तुझे एक लफ़्ज़ कहा था। मोहरा।" उसने रघु की तरफ़ देखा। "ये होटल डूब रहा है। मेरे बाप को लगता है वो किनारे पर खड़ा है। पर मैं तैरना जानता हूँ। और डूबते जहाज़ पर सबसे अक़्लमंद वो है जो सबसे पहले उस नाव में कूद जाए जो उसे डुबाने आई है।"
"मैं समझा नहीं, साहब।"
"समझेगा।" करण उठा, धीरे से मेज़ का चक्कर काटता उसके पास आया। "गरुड़। वो बेनाम कंपनी जिसके पास हमारी एक-एक ईंट का क़र्ज़ है। मेरा बाप उसके आगे सिर नहीं झुकाएगा, क्योंकि उसे अपनी शान चाहिए। मुझे शान नहीं, ज़िंदा रहना है। जिस दिन ये महल गरुड़ के हाथ में जाएगा, मैं मलबे के नीचे नहीं, मेज़ के उस तरफ़ बैठा होना चाहता हूँ।"
रघु ने नज़र झुकाए रखी। सहगल का बेटा सहगल को बेच रहा था। और जिस ख़रीदार के पास वो दौड़ना चाहता था, वो इस वक़्त उसके सामने खड़ा था।
"पर गरुड़ तक मैं कैसे, साहब? मैं तो एक मामूली..."
"तू मामूली है, इसीलिए तू पहुँचेगा।" करण उसके क़रीब झुका। "तेरा कोई नाम नहीं, पता नहीं, गवाह नहीं। तू वो ख़त है जो किसी लिफ़ाफ़े में नहीं जाता, और फिर भी पहुँच जाता है। दो काम।" करण ने एक उँगली उठाई। "पहला। गरुड़ के आदमियों तक मेरी बात पहुँचा। मेरे बाप के पीछे। जिस दिन वो महल गिराने आएँ, करण सहगल उनके साथ खड़ा मिले।" दूसरी उँगली। "दूसरा। वो आन्या कपूर। दो दिन में वो मेहता को होटल का साफ़ हिसाब भेजने वाली है, वही हिसाब जो इस होटल को बचा सकता है। मुझे वो चाहिए, उसके मेहता तक पहुँचने से पहले। और हो सके तो..." उसकी आवाज़ रेशम हुई, "...उसे पहुँचने ही मत देना।"
उस रात जिस औरत की साँस उसकी साँस में घुली थी, आज करण उसी को इस मोहरे के हाथों गिराना चाहता था।
"साहब, मैडम कपूर तो आपकी अपनी मैनेजर हैं।"
"सोच मत। तेरे पास सोचने का हक़ नहीं।" करण ने हाथ उठाया। "कल रात मैंने तुझे मेरे बाप के दफ़्तर में चोरी करते पकड़ा था। एक फ़ोन करूँ, और तेरी वो बेदाग़ फ़ाइल इस शहर की सबसे गंदी फ़ाइल बन जाए।" उसने मेज़ से एक नोट उठा कर बढ़ाया। "ये रख। काम का नहीं, ख़ामोशी का। तो... हाँ या हाँ?"
रघु ने एक पल नोट को देखा, फिर, जैसे एक भूखे आदमी का हाथ काँपता है, उसे ले लिया। "जी, साहब।"
"शाबाश।" करण वापस कुर्सी पर जा बैठा, जैसे एक नया औज़ार रैक पर रख दिया हो। "याद रख, राघु। मोहरा सबसे ताक़तवर होता है जब तक वो अपनी जगह खड़ा रहे। जिस दिन वो ख़ुद चाल चलने की सोचे, उसी दिन पिटता है।"
रघु गलियारे में निकला, और एक पल को उसने अपना मुखौटा ढीला होने दिया। करण को गरुड़ तक एक चुपचाप रास्ता चाहिए था। रघु ख़ुद गरुड़ के आदमी उसके सामने ला खड़ा करेगा। और जो छुरी आज उसकी मुट्ठी में रखी गई थी, वो एक दिन उसी हाथ की तरफ़ मुड़ेगी जिसने उसे थमाया था। उसने वो नोट जेब में रखा, फेंका नहीं। एक मोहरा दाम लेता है।
आन्या का दफ़्तर अब भी काग़ज़ों का वही समंदर था। मेज़ पर मेहता वाली फ़ाइल लगभग पूरी थी। दो दिन। दो दिन में वो हिसाब मेहता के पास जाना था, और उसके साथ चार सौ लोगों की साँस।
रघु फ़ाइलों का गट्ठर ले कर अंदर आया। आन्या ने सिर उठाया, और एक पल को उन दोनों के बीच उस रात वाली बात बिना कहे तैर गई। आन्या ने नज़र झुकाई, पर पूरी तरह हटा नहीं पाई।
"रख दो।" फिर रुकी। "रघु, आज मेरा दिमाग़ इन आँकड़ों पर नहीं टिक रहा। ग़ुस्सा है। आज बृज सहगल ने मुझे एक कमरे से बाहर रखा। बोला, शाम को उसकी एक निजी मुलाक़ात है, और उसमें मेरी ज़रूरत नहीं। मैं इस होटल को बचाने हर रात अपनी आँखें जला रही हूँ, और वो आदमी मेरी पीठ पीछे, मेरे ही गरुड़ से, चुपके से कोई सौदा कर रहा है।"
रघु ने फ़ाइलें मेज़ पर रखीं। बृज नहीं जानता था कि उस कमरे में आज कौन दाख़िल होने वाला था।
"मैं तय कर चुकी हूँ।" आन्या एक क़दम पास आई, और उसकी आँखों में वो शिकारी फिर जागा जिससे रघु डरता था। "अगर बृज मुझे गरुड़ से नहीं मिलने देगा, तो मैं गरुड़ को ख़ुद ढूँढ निकालूँगी। उसकी हर कंपनी, हर कंपनी के पीछे की कंपनी। उस बेनाम चेहरे को नंगा कर के ही दम लूँगी।"
रघु के सीने में कुछ धीरे से बैठ गया। वो ठीक उस आदमी को ढूँढने का इरादा बाँध रही थी जो उसके सामने खड़ा था। हर क़दम जो वो गरुड़ की तरफ़ बढ़ाती, वो रघु से एक क़दम दूर जाती।
"और एक बात।" उसकी आवाज़ अचानक धीमी हुई, और उसमें से शिकारी ग़ायब हो गया। "उस रात के बाद मैंने ख़ुद से एक वादा किया, कि इस गरुड़ का चेहरा ढूँढ कर ही रहूँगी। क्योंकि जब तक वो अँधेरे में बैठा है, मैं तुम्हारे साथ भी पूरी तरह यहाँ नहीं हो पाती। उसे ख़त्म करना है, तभी कुछ शुरू हो सकता है।"
रघु ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार अपना सच एक पत्थर की तरह गले में अटका महसूस किया। वो जिस जंग को ख़त्म कर के उसके साथ कुछ शुरू करना चाहती थी, उसी जंग का दूसरा सिरा वो ख़ुद था।
"कुछ चेहरे ढूँढ लेने से, मैडम," उसने बहुत धीरे कहा, "वो शुरू नहीं होता जिसकी आप उम्मीद करती हैं। कभी-कभी जो ख़त्म होता है, वो भी वही होता है।"
"पहेलियाँ तुम भी बुझाते हो।" वो हल्के से मुस्कुराई, फिर वापस मेज़ पर झुक गई, रजिस्ट्रार के पुराने काग़ज़ों का गट्ठर अपनी तरफ़ खींचते हुए। "जाओ। मुझे आज रात एक चेहरा ढूँढना है।"
रघु एक पल दरवाज़े पर रुका, उस औरत को देखता जो दीये के नीचे झुक कर, अनजाने, अपनी ही तबाही का नक़्शा बना रही थी। फिर निकल गया।
बृज सहगल का दफ़्तर उस शाम किसी मंदिर की तरह सजा था जिसमें देवता के आने का इंतज़ार हो। बृज अपनी सबसे क़ीमती शेरवानी में, उँगलियाँ बार-बार उलझतीं, एक बेचैनी जिसे उसका घमंड छुपा नहीं पा रहा था। आज, आख़िरकार, गरुड़ ने अपना एक आदमी भेजा था।
दरवाज़ा खुला।
पहले अंदर आया एक चिकना, इस्त्री किया हुआ आदमी, महँगा सूट, हाथ में चमड़े का फ़ोल्डर, चेहरे पर वो नपी-तुली मुस्कान जो वकील पहनते हैं। उसके पीछे एक और आदमी, सलेटी सूट, सादा, नज़र हल्की झुकी। एक सहयोगी। बृज की नज़र उस पर पड़ी, और फिसल गई, जैसे पानी काँच से फिसलता है।
"सहगल साहब।" पहला आदमी हाथ जोड़े आगे बढ़ा। "गरुड़ कैपिटल की तरफ़ से। मैं खन्ना। एडवोकेट। और ये मेरे सहयोगी। गरुड़ साहब की हर शर्त इन्हीं के पास रहती है। वो ख़ुद कभी सामने नहीं आते, ये उनका उसूल है।"
"बैठिए।" बृज की आवाज़ में वो गर्मजोशी थी जो उसने आख़िरी बार किसी मेहमान के लिए नहीं, किसी क़र्ज़दार के लिए निकाली थी। "खन्ना साहब, मैं बारह साल से इस मुलाक़ात का इंतज़ार कर रहा हूँ। हम सहगल किसी के दरवाज़े नहीं जाते। पर एक अच्छे साझेदार के लिए..."
"मुलाक़ात साझेदारी की नहीं है, सहगल साहब।" वो सहयोगी पहली बार बोला, और उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, बहुत सपाट, उसमें एक भी अतिरिक्त लफ़्ज़ नहीं। "हिसाब की है। गरुड़ साहब आपका पूरा क़र्ज़ वापस माँग रहे हैं। एकमुश्त। आप वो चुका नहीं सकते। इसलिए, क़ानूनन, ये होटल अब उनका है। हम आपको बताने आए हैं कि वो इसे कैसे लेंगे।"
बृज की मुस्कान एक पल को जमी।
रघु ने वो लफ़्ज़ बृज की आँखों में सीधे देख कर कहे, बारह साल में पहली बार। दिल हथौड़े की तरह बज रहा था, पर आवाज़ पत्थर सी सीधी। बृज को बस ये देखना था कि ये सहयोगी कौन है, पर वो सिर्फ़ अपने डूबते महल को देख रहा था।
"देखिए..." बृज आगे झुका, और उसका घमंड एक पतली बर्फ़ की तरह चटकने लगा। "एक महल गिराना आसान है, चलाना मुश्किल। चार सौ लोग इसमें साँस लेते हैं। मैं गरुड़ साहब से एक बार मिलना चाहता हूँ, खन्ना साहब। ख़ुद। आँख में आँख डाल कर। ये काग़ज़ों के पीछे छुपा खेल बहुत हो गया।"
"गरुड़ साहब आपसे आँख में आँख डाल कर मिल चुके हैं, सहगल साहब।" रघु ने कहा, और उसकी नज़र एक पल को बृज के चेहरे पर ठहर गई। "बहुत पहले। आपको याद नहीं। पर उन्हें है।"
बृज एक बेचैन हँसी हँसा। फिर उसकी नज़र पहली बार सच में सहयोगी के चेहरे पर ठहरी, माथे पर एक लकीर उभरी। "एक मिनट। आपका चेहरा... कहीं देखा है क्या?"
रघु की रगों में बर्फ़ दौड़ गई, पर चेहरा हिला तक नहीं। "मेरा चेहरा बहुत आम है, साहब। ऐसे चेहरे आपके इस होटल में दर्जनों फिरते हैं। आप उन्हें रोज़ देखते हैं, और कभी नहीं देखते।"
बृज ने बात झाड़ दी। पैसा जब बोलता है, वो हमेशा कहता था, तो चेहरा कौन देखता है। और यही उसकी ज़िंदगी का सबसे महँगा उसूल था। क्योंकि अगर बृज सहगल ने आज, सिर्फ़ एक बार, पैसे के पीछे का चेहरा देख लिया होता, तो वो उस लड़के को पहचान लेता जिसके बाप को उसने राख कर दिया था।
खन्ना ने हस्तांतरण की शर्तें एक के बाद एक रखीं, और हर शर्त के साथ बृज थोड़ा और झुकता गया। वो आदमी जिसने भरी महफ़िल में कहा था कि हम सहगल झुकते नहीं, अब हर लाइन पर अपना सिर थोड़ा और नीचे कर रहा था।
"बस एक चीज़।" उसकी आवाज़ अब लगभग एक मिन्नत थी। "गरुड़ साहब जो चाहें ले जाएँ। पर सहगल का नाम इस लॉबी की दीवार पर रहना चाहिए। एक ख़ानदान सिर्फ़ अपने नाम से जीता है, खन्ना साहब।"
"नाम।" रघु ने वो लफ़्ज़ बहुत धीरे दोहराया, जैसे तौल रहा हो। "एक नाम दीवार से उतारना एक रात का काम होता है, साहब। एक कील ढीली कीजिए, एक पीतल की पट्टी पर रेगमाल फेरिए, और बारह साल का इतिहास फ़र्श पर। पर उसी नाम को वापस उसी दीवार पर लगाना..." उसने सिर उठाया, और सीधे बृज की आँखों में देखा। "...उसमें पूरी एक ज़िंदगी लग जाती है। कभी-कभी एक से ज़्यादा।"
बृज ने सिर हिलाया, जैसे एक गहरी बात सुन ली हो, और कुछ समझे बिना। फिर खन्ना ने फ़ोल्डर बंद किया। "गरुड़ साहब एक बात पर राज़ी हैं। कुछ दिन। एक आख़िरी मोहलत, ताकि हस्तांतरण व्यवस्थित रहे, और शोर न मचे। इससे ज़्यादा नहीं।"
बृज की आँखें भर आईं, बारह साल में पहली बार। एक डूबते आदमी को तिनका मिल गया था, और उसे ये भी नहीं पता था कि वो किसने फेंका, और क्यों।
"शुक्रिया।" वो उठ खड़ा हुआ। और फिर इम्पीरियल का मालिक बृज सहगल, जिसने भरी महफ़िल में अपने ही महल के एक नौकर के गाल पर थप्पड़ मारा था, जिसने कहा था कि सहगल किसी के पैर नहीं पकड़ते, उसने अपना सिर झुकाया, और अपना हाथ उस सलेटी सूट वाले सहयोगी की तरफ़ बढ़ाया। "गरुड़ साहब से कहिएगा, बृज सहगल ये एहसान कभी नहीं भूलेगा। और अगर कभी उनसे मिलूँ, तो कहिएगा, बृज सहगल उनका शुक्रगुज़ार है।"
रघु ने एक पल उस बढ़े हुए हाथ को देखा। फिर उसने उसे थाम लिया।
और इस महल का असली मालिक, बारह साल बाद, पहली बार उस आदमी का हाथ अपने हाथ में लिए खड़ा था जिसने उसके बाप को मिटा दिया था। वो आदमी, उसका हाथ अपने दोनों हाथों में जकड़े, सिर झुकाए, उस मालिक का शुक्रिया अदा कर रहा था जिसे उसने नौकर समझ कर थप्पड़ मारा था, उसी कमरे में, जिसकी आधी ईंटें कभी देवराज प्रताप के पैसे से रखी गई थीं।
"गरुड़ साहब तक आपका हर लफ़्ज़ पहुँच जाएगा, सहगल साहब," रघु ने कहा, और अपना हाथ धीरे से छुड़ाया। "एक भी लफ़्ज़ नहीं छूटेगा।"
बाहर, ख़ाली गलियारे में, खन्ना ने धीमे से कहा, "मैं सिर्फ़ बैठा रहा, हर लाइन आपने दी। ऐसा आदमी मैंने आज तक नहीं देखा।"
"समझ कर भूल जाइए, खन्ना साहब।" रघु का लहजा वो था जिसके आगे बात नहीं बढ़ती। "आप गरुड़ का एक काम थे। काम ख़त्म।"
रघु अकेला लॉबी से गुज़रा, और एक पल को उस दीवार के सामने रुक गया जहाँ कभी उसके पिता की तस्वीर टँगी थी। अब वहाँ बृज सहगल का चमकीला तैलचित्र था, और नीचे, पीतल की पट्टी पर, सिर्फ़ एक नाम। सहगल।
उसने उँगली उस पीतल पर फेरी, उस जगह जहाँ बारह साल पहले एक नाम घिस कर मिटा दिया गया था। पट्टी ठंडी और चिकनी थी, जैसे वहाँ कभी कुछ लिखा ही न हो। उसने अपनी बाक़ी ज़िंदगी इसी एक पट्टी के लिए रख छोड़ी थी।
उसी रात, तीन मंज़िल ऊपर, आन्या के दफ़्तर की अकेली बत्ती जल रही थी।
मेज़ पर अब मेहता की फ़ाइल नहीं थी। उसकी जगह रजिस्ट्रार के पुराने पन्नों का ढेर था, हर पन्ने पर लाल पेन से घेरा हुआ एक ही नाम। गरुड़ कैपिटल। पिछले चार घंटे से आन्या एक ऐसी गली में चल रही थी जिसका कोई सिरा नहीं था। गरुड़ के पीछे एक होल्डिंग कंपनी, उसके पीछे एक और, उसके पीछे एक बेनाम ट्रस्ट। हर परत बस उसी तरफ़ इशारा करती जहाँ कुछ नहीं था।
"तुम हो कौन," उसने उस लाल घेरे को घूरते हुए फुसफुसाया।
और तब, सबसे नीचे की परत पर, उसकी उँगली रुक गई। गरुड़ की सबसे गहरी परत का पंजीकरण। और उस पर एक तारीख़।
आन्या की साँस एक पल को रुकी।
वो सबसे पुरानी परत कोई नई कंपनी नहीं थी। वो वही बेनाम ट्रस्ट था, जो किसी और के मलबे पर खड़ा किया गया था। और उसका पंजीकरण ठीक उन्हीं हफ़्तों का था जिन हफ़्तों में, इसी इम्पीरियल की उद्घाटन की रात, वो आग लगी थी। एक मौत। एक मुक़दमा। एक मिटा दिया गया नाम। गरुड़ की सबसे गहरी जड़ ठीक उसी राख में दबी थी जिस राख में ये होटल जला था।
आन्या पीछे टिक गई, और उसके दिमाग़ में एक ठंडी रोशनी की तरह एक नया ख़याल उतरा। वो अब तक एक बाहरी ख़रीदार को ढूँढ रही थी, कोई अजनबी जो दूर बैठ कर ये महल निगलना चाहता था। पर कोई अजनबी बारह साल इंतज़ार नहीं करता। ये किसी अजनबी की भूख नहीं थी, ये किसी अपने का इंतज़ार था। ये कोई था जिसे ये होटल कभी अपना था, और जिसे इसने एक बार पहले ही दफ़न कर दिया था।
वो किसी नए चेहरे का शिकार नहीं कर रही थी। शायद एक बहुत पुराने चेहरे का। और पुराने चेहरे एक ही जगह सोते हैं, इस होटल के अपने अतीत में।
आन्या के पैर उसे नीचे ले गए, उस छोटे, धूल भरे कमरे की तरफ़ जिसे होटल का विरासत भंडार कहा जाता था, जहाँ पुराने रिकॉर्ड, उतार दी गई तस्वीरें, और इम्पीरियल के पहले दिनों के काग़ज़ बेतरतीब पड़े थे। साफ़ टाइटल के लिए उसे वैसे भी ये काग़ज़ चाहिए थे। पर आज वो एक और चीज़ ढूँढने आई थी। एक चेहरा।
उसने उद्घाटन की रात के पुराने एल्बम खींचे, भुरभुरे, पीले। बारह साल पुरानी रात मुस्कुराती तस्वीरों में क़ैद थी। उसने पन्ने पलटे, और हर पन्ने के साथ उसका दिल तेज़ होता गया।
और फिर एक तस्वीर पर उसका हाथ रुक गया।
उद्घाटन की रात की एक तस्वीर। संगमरमर की वही नई लॉबी, बीच में एक लाल फ़ीता काटते दो आदमी। एक, बृज का बूढ़ा बाप, जिसे वो दादी के कमरे की चाँदी की फ़्रेम से पहचानती थी। और उसके बराबर एक दूसरा आदमी, नौजवान, खुली आँखों वाला, एक ऐसी मुस्कान के साथ जो सच में आँखों तक पहुँचती थी। उसका नाम कहीं नहीं था। पट्टी पर सिर्फ़ एक नाम छपा था, सहगल। दूसरा घिस दिया गया था।
पर आन्या उस आदमी को नहीं देख रही थी।
क्योंकि उस नौजवान के बराबर, उसका हाथ थामे, एक छोटा सा लड़का खड़ा था। सात-आठ साल का। उसने ऊपर, झूमरों की तरफ़ देखा था, ठीक उसी पल जब कैमरा चमका था। मुँह थोड़ा खुला, हैरानी से भरा। और उसकी आँखें।
आन्या ने वो तस्वीर बल्ब के नीचे की।
वो आँखें।
उसने उन आँखों को देर रात डेढ़ बजे, काग़ज़ों के एक पीले घेरे में देखा था। बारिश में, होटल की छत पर देखा था। हर रोज़, अपनी फ़ाइलों के पीछे, एक झुके कंधे वाले अटेंडेंट के चेहरे पर देखा था, जो जब झूठ बोलता था तो रुकता नहीं था, और जब सच बोलता था तो एक पल को तौलता था।
वो बारह साल पुरानी एक तस्वीर थी, और उसमें से रघु की आँखें उसकी तरफ़ देख रही थीं।
"ये आँखें..." आन्या के होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
उसकी उँगलियों से वो फ़ाइल फिसल कर फ़र्श पर गिर गई, और वो उसे उठाना भूल गई। वो बस उस नन्हे लड़के की आँखों को घूरती रही।
धूल भरे उस भंडार में, अकेली, बारह साल पुरानी रात हाथ में थामे, आन्या कपूर खड़ी रही, और उसकी आँखों में एक सच जागने लगा, जिसका नाम उसने अभी तक नहीं लिया था।
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