Chapter 8 of 15
गुम पन्ना
नौकर नहीं मालिक by Avni Oberoi
तिजोरी वाली रात के बाद रघु जानता है कि उसके बाप को बेगुनाह साबित करने वाला पन्ना एक ऐसे ख़ानदानी लॉकर में बंद है जो सिर्फ़ सहगल के दस्तख़त से खुलता है, किसी नौकर के लिए कभी नहीं। उसी दिन इम्पीरियल में एक भारी शादी का भोज हँसते-हँसते पटरी से उतर जाता है, और रघु उसी कमरे को बचाता है जो चुपके से उसी का है, और साथ-साथ उस लॉकर का पता खोजता है। फिर करण का जाल बंद हो जाता है। वो रघु को वहाँ पकड़ता है जहाँ किसी नौकर का काम नहीं, हाथ में काग़ज़ लिए, और निकालने के बजाय मुस्कुरा देता है।
कुछ ताले चाबी से खुलते हैं। और कुछ सिर्फ़ नाम से।
रघु के पास इस वक़्त पूरे शहर का पैसा था। बैंक उसकी एक चिट्ठी पर साँस रोक लेते थे। पर जिस ताले के पीछे उसके बाप का इंसाफ़ बंद था, वो पैसे से नहीं, एक नाम से खुलता था। सहगल। और रघु के पास, इस पूरे महल में, बस एक नौकर का नाम था।
तिजोरी वाली रात को तीन दिन बीत चुके थे। हर बार आँख मूँदते ही रघु को वही जली फ़ेहरिस्त दिखती, वो आधा-राख लफ़्ज़, सहगल, और एक लॉकर का अधूरा चित्र। पन्ना फाड़ा नहीं गया था, संभाल कर निकाला गया था, और किसी ख़ानदानी लॉकर में रख दिया गया था। पर वो लॉकर था कहाँ, ये उसे नहीं पता था। और पता चल भी जाता, तो भी उसे खोलने को सिर्फ़ एक सहगल का हाथ चाहिए था।
और एक तीसरी चीज़ भी थी, जिसे वो हिसाब में नहीं रखता था, फिर भी जो हर रात उसके हिसाब में घुस आती थी। आन्या के होंठों की वो गर्मी, जो तीन दिन बाद भी उतरी नहीं थी। वही औरत, जो उसका हाथ थाम कर क़सम खा चुकी थी कि गरुड़ का चेहरा ढूँढ कर तोड़ देगी, और जिसे ख़बर तक नहीं थी कि वो चेहरा उसके अपने होंठों पर रखा था। रघु ने उस याद को परे धकेला। पन्ना पहले।
"भाई! ओ राघुउ भाई!"
बिट्टू किसी तोप के गोले की तरह किचन में दाख़िल हुआ। "उठ! आज तेरी ये सोच-विचार वाली दुकान बंद। आज क़यामत आ री सै, और गज़ब वाली क़यामत।"
"क्या हुआ, बिट्टू?"
"शादी!" बिट्टू ने दोनों हाथ आसमान नापने जैसे फैलाए। "वो मल्होत्रा सेठ, स्टील वाला, जिसकी छोरी का ब्याह सै? पाँच सौ मेहमान! दो साल में इम्पीरियल की सबसे बड़ी बुकिंग! और करण साहब ने पूरा भोज ख़ुद अपने सिर पे ले लिया सै। बोले, ये शादी ऐसी चमकेगी कि मेहता को भी पता चल जावै कि इम्पीरियल अभी मरा नहीं।"
पाँच सौ मेहमान। रघु के दिमाग़ में एक हिसाब चला, और वो हिसाब उसका अपना था। ये पैसा इस होटल की रगों में जाएगा, उसी होटल की जिसे एक दिन वो छीनने वाला था। तो आज वो इस शादी को चमकाएगा। पर उसका असली काम कुछ और था।
"बिट्टू," उसने चाय छानते हुए पूछा, "सहगल ख़ानदान का सबसे पुराना सामान, गहने, पुराने काग़ज़, वो सब ऊपर वाली तिजोरी में ही रहता है, या कहीं और भी?"
"तू और तेरे अजीब सवाल।" बिट्टू ने एक समोसा मुँह में ठूँसा। "अरे, ऊपर वाली तिजोरी तो बस दिखावे की सै, काग़ज़-पत्तर वाली। असली माल, सोना-वोना, बाहर किसी बैंक के लॉकर में रहवै सै। फेकू काका बतावै थे, साल में एक बार दादी जी एक काला बक्सा ले के जाती थीं, और काका वो बक्सा गाड़ी तक पहुँचाते थे। पर कौन से बैंक, कित... काका को भी बेरा ना। बूढ़े आदमी सैं, आधी बात भूल जावैं।"
रघु की उँगली छन्नी पर एक पल को रुकी। तो लॉकर सच में था, किसी बाहर के बैंक में। गुम पन्ना वहीं सोया पड़ा था। पर किस बैंक में, ये राज़ अब भी एक बूढ़ी, काँपती याद की धुंध में डूबा था।
"पर भाई, एक काम कर," बिट्टू की आवाज़ अचानक डर के साथ धीमी हुई। "ये सवाल किसी और के सामने मत पूछियो। इन दिनों जो भी ऊपर वाली बात पूछता सै, करण साहब उसे साज़िश समझ बैठैं सैं। चल अब, ऊपर शादी सिर पे आ खड़ी सै।"
दोपहर तक इम्पीरियल का पेट एक खौलता हुआ युद्ध बन चुका था। ऊपर बॉलरूम में गेंदे की लड़ियाँ टँग रही थीं, बैंड वाले बाजे ठोक रहे थे। पर असली लड़ाई नीचे, सर्विस किचन में लड़ी जा रही थी, जहाँ भाप, चीख़ और घी की महक एक साथ उबल रहे थे। और उस अफ़रा-तफ़री के बीचों-बीच खड़ा था एक मोटा, पसीने में डूबा आदमी, टोपी टेढ़ी, हाथ में करछी। बंसी हलवाई। करण का बुलाया सस्ता बाहरी कैटरर।
"बरबाद हो गया! सब बरबाद हो गया!" बंसी ने करछी हवा में लहराई। "पाँच सौ की बुकिंग है, और माल तीन सौ का भी पूरा नहीं उतरा! पनीर की चार देग कम, बिरयानी की तीन देग कम! अब मैं पाँच सौ बारातियों को क्या परोसूँ, हवा?"
"ताऊ, तेरे ट्रक पे तो पूरा माल चढ़ा होगा," बिट्टू ने एक देग में झाँका। "बीच में किसी ने उतार लिया होगा।"
"कौन उतारेगा, बेटा? बिल पूरे पाँच सौ का कटा है! पाँच सौ का पैसा लिया है सहगल साहब ने, और माल..." बंसी रुका, और फिर उसने ज़ोर से अपनी जीभ दाँतों तले दबा ली, जैसे कुछ ज़्यादा बोल गया हो। "ख़ैर, जाने दे। ऊपर वाला जाने।"
रघु, किनारे, चुपचाप जग भर रहा था, और उसने वो निगला हुआ वाक्य सुन लिया था। पाँच सौ का बिल, तीन सौ का माल। ये कोई नया चोर नहीं, वही पुराना हाथ था। करण ने सस्ता बाहरी कैटरर इसीलिए बुलाया था, ताकि बिल मोटा कटे, माल पतला आए, और बीच का फ़र्क़ उसकी जेब में जाए। पर इस बार उसकी चोरी का बोझ पाँच सौ भूखे पेटों पर गिरने वाला था।
"बंसी ताऊ," रघु धीरे से आगे आया, सिर झुका। "आपका खाना कम नहीं है, बँटा हुआ है। पाँच सौ लोग एक साथ थोड़ी खाते हैं। हर बिरयानी की प्लेट के साथ एक कटोरी दाल मख़नी और एक तंदूरी रोटी रख दीजिए। पेट दाल-रोटी से भरता है, बिरयानी तो ज़ायक़े के लिए है। कोई कम बिरयानी को याद नहीं रखता, ठंडी को रखता है। दाल-रोटी होटल की रसोई से लगवा देता हूँ।"
बंसी ने आँखें सिकोड़ीं, फिर उसके चेहरे पर रोशनी आई। "ऐ... बात में दम है। पेट भर जाए तो किसी ने आज तक देग गिनी ना। पर होटल की रसोई किसके हुक्म से चलेगी?"
"मिश्रा जी से कह दूँगा, मैडम कपूर के ऑडिट के नाम पर।" और सिर्फ़ बंसी ने ये नहीं देखा कि वो दाल-रोटी जिस होटल की रसोई से आने वाली थी, उसका असली बिल इस पूरे महल के मालिक ही चुका रहे थे। मालिक अपनी ही जेब से अपनी ही शादी बचा रहा था।
तभी बिट्टू की दबी चीख़ किचन के दूसरे कोने से आई। "भाई! इधर देख! ये गिर रहा है!"
रघु पलटा। बीच की मेज़ पर शादी की शान, गुलाब जामुन का एक चार फुट ऊँचा पहाड़, मुंबई की उमस में एक तरफ़ झुक रहा था, चाशनी से चमकता, डगमगाता, जैसे कोई नशे में मीनार। और बिट्टू, छह फुट का पहलवान, दोनों हाथों से उस मीनार को थामे खड़ा था, चेहरे पर बारह तरह की बेबसी।
"भाई, जल्दी कुछ कर! ये मेरे ऊपर गिरा, तो मैं पूरी बारात का गुलाब जामुन बन जाऊँगा!"
"हाथ मत हटा, सीधा थाम। नत्थू, बर्फ़!" रघु आगे लपका। "ताऊ, इसके नीचे ट्रे में बर्फ़ बिछाओ, चाशनी जम जाएगी तो पकड़ बन जाएगी। और सबसे ऊपर वाले जामुन हटाओ, बोझ हलका करो, वरना नींव बैठ जाएगी।"
"वाह!" बंसी चहका, बर्फ़ की बाल्टी लपकते हुए। "ये छोरा हलवाई है के इंजीनियर?"
"ये राघु सै, ताऊ," बिट्टू ने दाँत भींचे, अब भी मीनार थामे। "ये दोनों सै। और कुछ-कुछ ऐसा भी, जो मेरी समझ में आज तक ना आया।"
शाम ढले बारात आई, और उसके साथ आया असली तूफ़ान।
बैंड इतने ज़ोर से बज रहा था कि संगमरमर की दीवारें काँप रही थीं। ढोल, शहनाई, और बीच में एक सफ़ेद घोड़ी पर सजा दूल्हा, जिसके आगे-पीछे सौ रिश्तेदार नाच रहे थे, उस ठंडी लॉबी में जहाँ कभी हीरे और शैम्पेन सजते थे। और उस जलसे की कमान सँभाले, इम्पीरियल की शान का परचम उठाए खड़ा था करण सहगल, चेहरे पर वो मुस्कान जो वो बड़े मेहमानों के लिए बचा कर रखता था।
"वेलकम टू इम्पीरियल, मल्होत्रा साहब!" करण ने हाथ जोड़े। "आज की ये रात आपकी पीढ़ियाँ याद रखेंगी। ये शादी नहीं, इतिहास है।"
और ठीक उसी वक़्त, इतिहास लड़खड़ाता हुआ करण की तरफ़ बढ़ा।
बारात का एक बुज़ुर्ग, दूल्हे का कोई फूफा, जिसकी जेब में दो घंटे पहले व्हिस्की का पहला पैग गिरा था और उसके बाद किसी ने गिनती छोड़ दी थी, लहराता हुआ सीधा करण के सामने आ खड़ा हुआ। टेढ़ी पगड़ी, और आँखों में वो दुनिया जो बस उसे ही दिख रही थी।
"ऐ छोटू!" फूफा ने करण की आस्तीन खींची। "बड़ा अच्छा कोट पहना है तूने वेटर के लिए। एक पैग और ला, बढ़िया वाला। और ये जो ठंडी हवा फेंक रहा है तेरा होटल, इसे कम कर। ससुराल वाले ठिठुर के मर गए तो रिश्ता टूट जाएगा।"
लॉबी में दबी हँसी की एक लहर दौड़ गई। करण का चेहरा पत्थर हुआ, फिर लाल। "जनाब, मैं वेटर नहीं... मैं करण सहगल हूँ, इस होटल का..."
"हाँ-हाँ, मालिक होगा तू अपने घर का।" फूफा ने उसके कंधे पर ज़ोर से हाथ मारा। "पर पहले पैग ला, छोटू। मालिक बाद में बनना।"
और इस पूरी सल्तनत में बस एक इंसान था जिसकी आँखों में, ये नज़ारा देख कर, एक हल्की लहर तैर गई। एक नशे में धुत बूढ़े ने, अनजाने में, उस आदमी को 'वेटर' कह दिया था जो सबको नौकर समझता था। बारह साल का जो हिसाब रघु अकेले नहीं कर पाया, उसका एक घूँट आज एक शराबी फूफा ने भर दिया।
"बिट्टू," करण फुफकारा, फूफा से पीछा छुड़ाते हुए, मुस्कान ज़बरदस्ती चिपकाए। "इस बुज़ुर्ग को इज़्ज़त से एक तरफ़ बिठाओ। और एक पैग दे दो, बस एक।"
"ऐ छोरे!" फूफा अब बिट्टू पर लटक गया। "तू तगड़ा है। तू मेरे साथ नाच। चल, ढोल वाले!"
बिट्टू ने एक बेबस नज़र रघु की तरफ़ डाली, फिर फूफा को सँभालते हुए हाँफा, "हाँ ताऊ, बस आराम से, यहाँ संगमरमर सै, फिसल गए तो सीधा हनीमून अस्पताल में मनाओगे।"
ऊपर बैंड और ज़ोर से बजा, फूफा और ज़ोर से नाचा, और इस सारे शोर के बीच रघु पीछे हट गया, गलियारे की उस छाया में जिसकी तरफ़ किसी की नज़र नहीं थी। और उसने अपने आप से बस इतना कहा, कि सहगल साहब को आज नाच लेने दो, जब तक उनके पैरों के नीचे ज़मीन है। क्योंकि वो ज़मीन अब उसकी अपनी मुट्ठी में थी।
ये पूरी शादी उसका सबसे अच्छा परदा थी। पाँच सौ मेहमान, हर आँख स्टेज पर, और पूरे महल में एक ही कमरा सबसे ख़ाली, ऊपर का ख़ानदानी विंग, बृज सहगल का दफ़्तर। और उसी दफ़्तर के किसी दराज़ में, शायद, उस लॉकर का पता था जो एक बूढ़ी औरत की याद से फिसल गया था।
पर एक आदमी था जो स्टेज की तरफ़ नहीं देख रहा था।
करण, फूफा से पीछा छुड़ा कर, एक खंभे की ओट में खड़ा था, और उसका दिमाग़ हिसाब लगा रहा था। आज छह घंटे में तीन बार उसका दिल बैठते-बैठते बचा था। खाना कम पड़ते-पड़ते पूरा पड़ गया, मिठाई गिरते-गिरते सँभल गई, और हर बार नीचे कोई अनदेखा हाथ चुपचाप गाँठ खोल रहा था। बिल्कुल वैसे, जैसे फूल वाले बिल में, अल-रशीद के सौदे में, एपेक्स में हुआ था।
"भनोट।" उसका सपाट-चेहरा आदमी छाया से निकल आया। "वो चूहा फिर निकला है। आज, इस शोर में, फिर किसी ने मेरा डूबता बेड़ा अपने आप पार लगा दिया। और भीड़ शिकारी की नहीं, शिकार की दोस्त होती है। आज जैसी भीड़ में ही चूहा सबसे बहादुर होता है। तेरा आदमी कहाँ है अभी?"
भनोट ने अपने वॉकी पर एक धीमा सवाल किया, और जवाब सुन कर उसकी भौंह ऊपर उठी। "साहब... वो कह रहा है, झाड़ू वाला अभी-अभी बारात की भीड़ में से निकल कर सर्विस लिफ़्ट की तरफ़ गया। ऊपर की तरफ़। ख़ानदानी विंग की तरफ़।"
करण की आँखें सिकुड़ीं, और होंठों पर एक बहुत ठंडी, बहुत धीमी मुस्कान आई। ख़ानदानी विंग। जहाँ कोई नौकर नहीं जाता। जहाँ इस वक़्त, इस पूरी शादी में, कोई नहीं था।
"देखा, भनोट?" उसने अपनी शेरवानी सीधी की। "हर शिकारी एक ही ग़लती करता है। जल्दबाज़ी। मैं बारह दिन से इंतज़ार कर रहा हूँ, और ये बारह मिनट सब्र नहीं कर पाया।" वो खंभे से सीधा हुआ। "तू यहीं रुक। ये शिकार मैं ख़ुद करूँगा। आज, अपने हाथ से।"
और करण, मुस्कान होंठों पर सजाए, उस शोर भरी लॉबी से निकल कर ख़ामोश सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया, ऊपर की तरफ़, जहाँ उसका नौकर उसका इंतज़ार कर रहा था, ये जाने बिना कि कौन किसके इंतज़ार में है।
बृज सहगल का दफ़्तर अँधेरे में डूबा था, सिर्फ़ खिड़की से नीचे की शादी की रोशनी दीवारों पर रंगीन परछाइयाँ बना रही थी।
रघु अंदर था। उसने वो काला दरवाज़ा, तिजोरी वाला, छुआ तक नहीं था, उसका शिकार आज वो नहीं था। उसका शिकार थी बृज की मेज़, उसकी दराज़ें। अगर लॉकर किसी बाहर के बैंक में था, तो उसका कोई निशान यहीं होना चाहिए था। एक चाबी, एक पुरानी पासबुक, बैंक का कोई पुराना ख़त।
ऊपर की दराज़ें, फ़ाइलें, बिल। फिर सबसे नीचे की दराज़, जिसका ताला रघु की एक पतली तार के सामने तीन सेकंड भी नहीं टिका। अंदर, मख़मल के एक पुराने डिब्बे में, ख़ानदानी काग़ज़ों के बीच, एक पतला, पीला लिफ़ाफ़ा।
रघु ने उसे खोला। अंदर एक बहुत पुराना बैंक का ख़त था, किसी निजी लॉकर के बारे में, सहगल ख़ानदान के नाम। उसकी आँखें उस एक लफ़्ज़ की तरफ़ उतरीं जो उसे चाहिए था, बैंक का नाम, उसका पता।
पर ठीक उसी जगह, जहाँ बैंक का नाम होना चाहिए था, काग़ज़ बरसों की नमी में घुल चुका था। स्याही फैल कर एक धुँधला, बेमानी धब्बा बन गई थी। पता आधा, बैंक का नाम राख। ठीक वैसे ही, जैसे तिजोरी की वो फ़ेहरिस्त आधी जली थी। जैसे किसी ने तय कर रखा हो कि ये रास्ता रघु को हर मोड़ पर सिर्फ़ इतना दिखाएगा कि वो आगे बढ़े, पहुँचे कभी नहीं।
रघु उस धुँधले काग़ज़ को बल्ब की तरफ़ उठाए खड़ा था, इतना डूबा कि बारह साल में पहली बार उसे पीछे की हल्की आहट सुनाई नहीं दी।
दरवाज़ा खुला।
"मुझे पता था।"
रघु पत्थर हो गया। वो आवाज़ वो हज़ारों में पहचान सकता था। वो धीरे से मुड़ा, हाथ में अब भी वो पीला काग़ज़, और दरवाज़े पर करण सहगल खड़ा था, एक कंधा चौखट से टिकाए, और चेहरे पर, ग़ुस्से के बजाय, एक अजीब, ठंडा इत्मीनान।
"बारह साल की सबसे बड़ी शादी मेरे नीचे चल रही है," करण ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा, "और मेरा झाड़ू वाला यहाँ, मेरे बाप के दफ़्तर में, अँधेरे में, मेरे ख़ानदानी काग़ज़ हाथ में लिए खड़ा है।"
रघु ने फ़ौरन सिर झुका लिया, और वो दीन, टूटी आवाज़ ओढ़ ली जो बारह साल से उसकी ढाल थी। "साहब... माफ़ कीजिए... मैं तो बस सफ़ाई करने आया था, और ये काग़ज़ नीचे गिरा पड़ा था, मैं बस उठा कर..."
"बस।" करण ने हाथ उठाया, और हँसा। "वो दीन-दीन वाली नौटंकी रहने दे। आज उसकी ज़रूरत नहीं है।"
रघु चुप हुआ।
करण आगे बढ़ा, उसके इर्द-गिर्द एक धीमा चक्कर काटते हुए, जैसे पहली बार किसी चीज़ की असली क़ीमत आँक रहा हो। "मैं तुझे बारह दिन से देख रहा हूँ, राघु। और आज पहली बार सच में देख पा रहा हूँ। तू वो चूहा है जो मेरे हर जाल से निकल जाता है। तेरा हर काग़ज़ साफ़ निकलता है क्योंकि तू उससे कहीं ज़्यादा चालाक है जितना दिखता है।" वो रघु के ठीक सामने रुका। "और मैंने तुझे चोरी करते रंगे हाथ पकड़ा है। एक लफ़्ज़ कहूँ, और तू कल जेल में होगा।"
रघु की उँगलियाँ काग़ज़ पर कसीं।
पर करण ने फ़ोन नहीं उठाया। गार्ड नहीं बुलाए। उसने काग़ज़ तक नहीं छीना। उसने सिर्फ़ रघु के चेहरे को देखा, बहुत देर तक, और फिर, बहुत आहिस्ता, उसके होंठ एक तरफ़ मुड़े। एक मुस्कान। पर ये वो नहीं थी जो वो मेहमानों के लिए सजाता था। ये उससे कहीं ज़्यादा सर्द थी।
"पर मैं तुझे जेल नहीं भेजूँगा," उसने कहा, और आवाज़ अब रेशम जैसी थी, और उतनी ही ख़तरनाक। "निकालूँगा भी नहीं। तू मुझे ग़लत समझा, राघु। आज तू पकड़ा नहीं गया। आज तू मिल गया है।"
रघु ने पहली बार सिर उठाया, और सीधे करण की आँखों में देखा। उन आँखों में उसे एक नई चीज़ दिखी, जो थप्पड़ से भी ज़्यादा ख़तरनाक थी।
"एक चालाक आदमी, जिसके पास खोने को कुछ नहीं," करण उसके और पास झुका। "जो हर ताला खोल सकता है, और जिसका कोई नाम नहीं, कोई घर नहीं, कोई गवाह नहीं। और जिसे मैंने अभी अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया है। ऐसे आदमी को क्या कहते हैं, राघु?"
रघु चुप रहा।
"ऐसे आदमी को मोहरा कहते हैं।" करण सीधा हुआ, और उस सर्द मुस्कान को और चौड़ा किया। "मुझे ठीक तेरे जैसे एक आदमी की ज़रूरत थी। एक काम है, जो मेरे हाथ गंदे कर सकता है, पर तेरे जैसे किसी का नाम भी नहीं। बहुत दिन से सही चूहा ढूँढ रहा था इस काम के लिए। और आज, इस शादी की भीड़ में, तू ख़ुद चल कर मेरे जाल में आ गया।"
उसने रघु के कंधे पर हाथ रखा, हल्के से, एक मालिक की तरह जो अभी एक नया औज़ार ख़रीद कर लाया हो। "कल सुबह मेरे दफ़्तर में आना। और ये बात हम दोनों के बीच रहेगी। वरना तेरी ये साफ़-सुथरी फ़ाइल, इस एक रात में, बहुत गंदी हो जाएगी।"
और वो उस अँधेरे दफ़्तर से निकल गया, अपनी सर्द मुस्कान साथ ले कर, नीचे शादी के उस शोर की तरफ़, जहाँ पाँच सौ लोग एक ख़ुशी मना रहे थे।
रघु वहीं खड़ा रह गया, हाथ में वो धुँधला, बेमानी काग़ज़, और सीने में बारह साल में पहली बार एक नई, अजनबी सी ठंडक। बारह साल वो इस पूरे महल को अपनी एक उँगली पर घुमाता आया था। और आज, पहली बार, किसी ने उसे एक मोहरा समझ लिया था। जो आदमी सबको खेलता था, अब वो ख़ुद किसी के खेल का पहला पत्ता बन गया था।
नीचे बैंड बज रहा था। ऊपर, अँधेरे में, मालिक खड़ा था, और उसके हाथ में, पहली बार, किसी और के हुक्म की डोर बँधी थी।
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