अध्याय 4 / 15
दीवारों के कान
नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi
इम्पीरियल का असली ख़ुफ़िया तंत्र उसकी दीवारें हैं, नौकरों की वो फुसफुसाहट जो हर मंज़िल से होती हुई नीचे रघु तक पहुँचती है। जब करण एक काग़ज़ी कंपनी के बहाने आधे स्टाफ़ को निकालने और बूढ़े फेकू काका को सड़क पर लाने की चाल चलता है, रघु बिना सामने आए वो चाल तोड़ देता है। करण को अपनी कमाई लुटती दिखती है, पर हाथ नहीं। तीन बार पिटने के बाद करण को यक़ीन हो जाता है कि अंदर कोई गद्दार है, और वो हर नए नौकर का रिकॉर्ड खंगालने का हुक्म देता है, सबसे पहले उस अटेंडेंट का जो हर सही मौक़े पर पास खड़ा होता है।
हर बड़े होटल के अंदर दो इमारतें होती हैं।
एक वो जो ऊपर खड़ी रहती है, संगमरमर की, झूमरों की। उस इमारत को मेहमान देखते हैं। और एक वो जो नीचे चलती है, भाप की, पसीने की, फुसफुसाहट की। उस इमारत को कोई नहीं देखता। ऊपर वाली इमारत पैसे से चलती थी। नीचे वाली ख़बरों से।
और इम्पीरियल की उस नीची इमारत में एक कहावत सबसे पुरानी थी। दीवारों के कान होते हैं।
लिफ़्ट हर मंज़िल की बात अगली मंज़िल तक ढो लाती थी। लॉन्ड्री में हर राज़ धुलता था और सूखने को टँग जाता था। स्टोर का रामफल जानता था कौन सा सामान किस बहाने अंदर आया और किसकी जेब में बाहर गया। बारह सौ कमरों का ये महल बारह सौ कानों से सुनता था। और इन दिनों, वो सारे कान, चुपचाप, एक ही झुके कंधों वाले अटेंडेंट की तरफ़ खुलते जा रहे थे।
किसी को ठीक से पता नहीं था क्यों। बस इतना कि राघु भाई सुनता बहुत अच्छा था, और किसी की बात कभी किसी और तक नहीं पहुँचाता था। और दुनिया का दस्तूर है। जो बोलता है, उससे लोग डरते हैं। जो सिर्फ़ सुनता है, उसे सब कुछ बता देते हैं।
रघु को महल के असली कमरों की चाबी आन्या ने दी थी। पर महल के असली राज़ों की चाबी ये दीवारें दे रही थीं।
उस शाम स्टाफ़ कैंटीन में दाल पतली थी और ख़बर गाढ़ी।
बिट्टू अपनी थाली लिए रघु के सामने धमका, थाली में झाँका, और मुँह बनाया। "भाई, इस दाल में दाल कम, पानी की कहानी ज़्यादा सै। आज तो इसमें अपनी शक्ल साफ़ दिख री है।" रघु हल्के से हँसा। पर बिट्टू की अपनी हँसी आज आधी ही खिली, फिर बुझ गई, और उसकी हमेशा पहाड़ जैसी आवाज़ दब गई, जो उसके लिए तूफ़ान की निशानी थी।
"राघु भाई। गज़ब हो गया आज। लॉन्ड्री में शीला दीदी रो री थी।"
"क्यों?" रघु ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा।
"बेरा ना के, करण साहब कोई नई कंपनी ला रहे सैं। बाहर की। 'एपेक्स' के नाम से। हाउसकीपिंग का सारा काम उन्हें दे देंगे। मतलब... आधा स्टाफ़ बाहर।" बिट्टू ने आवाज़ और धीमी की। "और भाई, मेरा नाइट अलाउंस भी काट दिया। बोले, अब रात की डबल ड्यूटी का अलग पैसा ना मिलेगा। मन्नै तो वही पैसा घर भेजना होवै सै, भाई।"
रघु ने रोटी रखी। "लिस्ट तूने देखी?"
"देखी ना। रामफल ने पढ़ के सुनाई। शीला दीदी, उसका आदमी, लिफ़्ट वाला नत्थू, और..." बिट्टू रुका, और उसका गला भारी हो गया। "और फेकू काका।"
रघु की उँगलियाँ रुक गईं।
ठीक उसी पल, कैंटीन के दरवाज़े से, एक बूढ़ा आदमी अंदर आया। फेकू काका। सत्तर के पार, झुकी कमर, काँपते हाथ, और चेहरे पर वो थकी हुई नरमी जो बारह साल एक ही फ़र्श को पोंछते पोंछते आ जाती है। हाथ में पानी का जग, और जग इतना काँप रहा था कि पानी फ़र्श पर छलक रहा था।
"राम-राम, बेटा," काका ने रघु को देख कर कहा, और बैठने से पहले ही हाँफने लगे। "आज... आज सीढ़ियाँ भारी लाग रही सैं।"
रघु तुरंत उठा, काका के काँपते हाथ से जग लिया, उन्हें कुर्सी पर बिठाया। "काका, आप बैठो। आज पानी मैं बाँटता हूँ।"
काका की साँस फूल रही थी, वो मना भी न कर पाए। रघु ने जग उठाया और मेज़ों पर पानी रखने चल पड़ा, काका का काम, इतनी सहजता से जैसे ये उसी का काम हो। लौट कर उसने काका की हाज़िरी वाली कॉपी में, चुपचाप, उनका नाम भर दिया। काका को पता भी न चला कि आज उनकी ड्यूटी किसी और ने काटी।
काका मुस्कुराए, थके हुए। "तू अच्छा छोरा है, बेटा। पता है, मैं इस होटल में तब से हूँ जब ये बना भी ना था। नींव की ईंट मैंने अपने हाथ से उठाई थी।"
रघु एक पल के लिए स्थिर हो गया। एक बूढ़ा कर्मचारी। बारह साल से ज़्यादा। जो उस रात भी यहीं कहीं रहा होगा, जब एक और बूढ़ा कर्मचारी धुएँ में लोगों को बाहर निकालता हुआ लौट कर नहीं आया था। उसके पिता के शब्द उसके कान में गूँजे। मेरी इमारत में मेरे लोग जलेंगे, ये मुझसे नहीं होगा।
"आप यहीं रहोगे, काका," रघु ने धीरे से कहा। "कहीं नहीं जाओगे।"
काका को मतलब समझ नहीं आया, पर वो आराम से आँखें मूँद कर बैठ गए।
बिट्टू ने फुसफुसा कर कहा, "भाई, काका को निकाल देंगे तो काका कित जावैंगे? बारह साल। बाहर इन्हें कौन रखैगा? और शीला दीदी, और..." उसने मुट्ठी भींची। "मन्नै बता, मैं क्या करूँ। ऊपर जा के करण साहब के थोबड़े पे..."
"कुछ नहीं करेगा तू," रघु ने तुरंत कहा, आवाज़ नरम पर पक्की। "तू बस एक काम कर। चुप रह, और काम कर, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। ऊपर जाने वाला हर आदमी अगली सुबह बाहर होता है, बिट्टू। तेरा घर तुझ पर टिका है। तू मुझे यहाँ, सलामत, चाहिए।"
बिट्टू ने मुँह बनाया। "तो फिर कौन रोकैगा?"
"रोकूँगा नहीं।" रघु की आँखें बहुत शांत थीं। "बस सुनूँगा। बिट्टू, ये एपेक्स वाली कंपनी, रामफल ने उसका कोई काग़ज़ देखा है?"
"देखा ना। परसों स्टोर में मोहर लगवाने आया था इनका आदमी। और भाई, रामफल का दिमाग़ तो रजिस्टर सै।" बिट्टू आगे झुका। "रामफल बोला, एपेक्स का पता आंधेरी का था। और वो पता उसे जाना-पहचाना लाग्या। बिल्कुल वही पता, जो उन फूल वाले 'गुलमोहर' के बिल पे छपा रहवै सै। वही गुलमोहर, जो दस लाख के फूल बेचता है और फूल किसी ने आज तक देखे ना।"
रघु बहुत देर चुप रहा।
नई कंपनी नहीं थी। पुरानी चोरी थी, नए कपड़ों में। करण ने फूलों से जो चूसा था, अब वही आदमियों से चूसेगा। तीन सौ असली आदमी निकालो, एक काग़ज़ की कंपनी को मोटा बिल भेजो, बीच का सारा पैसा अपनी जेब में। दो शिकार, एक तीर। होटल और सस्ता, करण और अमीर, और फेकू काका सड़क पर।
"दीवारों के कान होते हैं, बिट्टू," रघु ने उठते हुए कहा, इतने धीरे कि सिर्फ़ बिट्टू सुने। "और आज दीवारों ने एक बहुत महँगी बात कह दी है।"
अगली सुबह, बृज सहगल के दफ़्तर में, करण अपनी सबसे अच्छी मुस्कान पहन कर खड़ा था।
"देखिए पापा, हिसाब सीधा है।" करण ने एक फ़ाइल मेज़ पर रखी। "एपेक्स पूरी हाउसकीपिंग सँभाल लेगी। और हमें हर महीने बारह लाख कम पड़ेंगे। ये जो हमारे पुराने नौकर हैं ना, थके हुए, सुस्त, हाथ काँपते हैं, इन्हें ढोने का ज़माना गया, पापा। बाहर की कंपनी सस्ती है, जवान है, और हमारे सिर का दर्द उसका हो जाएगा।"
बृज की उँगली अँगूठी पर रुकी। "बारह लाख महीना?" बचत के लफ़्ज़ ने उसकी आँखों में चमक भर दी। "ये तो फ़ौरन होना चाहिए। काग़ज़ कहाँ है? मैं दस्तख़त करता हूँ।"
करण ने अनुबंध आगे सरकाया। दरवाज़े के पास, कॉफ़ी की ट्रे लिए, रघु खड़ा था, बिल्कुल चुप, नज़र फ़र्श पर। बृज ने पेन उठाया।
तभी दरवाज़ा खुला, और आन्या अंदर आई, हाथ में एक पतली फ़ाइल और चेहरे पर वो ठंडी मुस्कान जो उसके सबसे ख़तरनाक होने की निशानी थी।
"दस्तख़त से पहले एक मिनट, मिस्टर सहगल।"
करण का जबड़ा कसा। "मिस कपूर, ये मैनेजमेंट का फ़ैसला है, ऑडिट का नहीं।"
"फ़ैसला आपका, हिसाब मेरा।" आन्या ने फ़ाइल मेज़ पर रखी। "ये एपेक्स मैनपावर। इसका दफ़्तर आंधेरी में है। एक कमरा, एक पता। ठीक वही पता, जिस पर 'गुलमोहर फ़्लावर्स' रजिस्टर्ड है। वही गुलमोहर, जो इम्पीरियल को दस लाख के फूल बेचता है, और जिसके फूल किसी ने आज तक नहीं देखे। एक पता, मिस्टर सहगल। एक मालिक। मेरे ऑडिट में इसका नाम है, related party।"
करण का चेहरा सफ़ेद पड़ा। "ये... ये इत्तेफ़ाक़ है।"
"इत्तेफ़ाक़?" आन्या की आवाज़ नहीं बदली, पर तीखी हो गई। "एपेक्स के पास एक भी कर्मचारी रजिस्टर्ड नहीं है। न पीएफ़, न बीमा, कुछ नहीं। आप तीन सौ असली आदमी निकाल कर एक काग़ज़ की कंपनी को बारह लाख महीना देंगे, जिसके पास एक भी आदमी नहीं है। ये बचत नहीं है, ये चोरी है।" वो बृज की तरफ़ मुड़ी, और अब उसने सही नस दबाई। "और अगर इस पर दस्तख़त हो गया, तो ये एक related-party फ़्रॉड बन जाता है। सीधे आपके लोन की शर्तों के ख़िलाफ़। गरुड़ को बस इसी एक काग़ज़ की ज़रूरत है, मिस्टर सहगल। एक फ़्रॉड, और वो पूरा क़र्ज़ एक झटके में वापस माँग सकते हैं। आप गरुड़ के हाथ में ख़ुद चाक़ू दे रहे हैं।"
गरुड़ का नाम सुनते ही कमरे की हवा बदल गई। बृज ने पेन ऐसे रख दिया जैसे वो गरम हो।
"करण।" बृज की आवाज़ बर्फ़ हो गई। "ये कंपनी तेरे चाचा की है?"
"पापा, मैं... मैं बस होटल का पैसा बचा रहा था..."
"तू होटल का पैसा बचा रहा था, या अपनी जेब भर रहा था?" बृज खड़ा हो गया, और अनुबंध को बीच से फाड़ दिया। "गरुड़ हमारी एक एक साँस गिन रहा है, और तू उन्हें एक फ़्रॉड का तोहफ़ा देने जा रहा था? ये कंपनी इस होटल में नहीं आएगी। और एक भी पुराना आदमी नहीं निकलेगा। जब तक गरुड़ का साया हमारे सिर पर है, इस होटल में एक पत्ता भी ऐसा नहीं हिलेगा जो उन्हें बहाना दे। निकल जा यहाँ से।"
करण, लाल चेहरा लिए, बाहर निकल गया, ये जाने बिना कि उसकी चाल किसने तोड़ी।
रघु, चुपचाप, आगे बढ़ा और बृज का काँपता कॉफ़ी का प्याला फिर से भर दिया। और ये थी उस सुबह की सबसे बड़ी शरारत, जिसे सिर्फ़ कहानी जानती थी। ये पूरा ख़ानदान जिस गरुड़ के नाम से काँप रहा था, जिसकी रहम की भीख माँग रहा था, वही गरुड़ इस वक़्त झुक कर बृज सहगल का प्याला भर रहा था। बृज ने नज़र उठा कर देखा तक नहीं कि उसका प्याला किसने भरा।
बड़े लोग नौकरों की आँखों में नहीं देखते। और इसी एक आदत की कीमत, बारह साल से, सहगल ख़ानदान चुका रहा था।
लॉबी के पिछले गलियारे में, आन्या तेज़ क़दमों से चल रही थी, और रघु फ़ाइलों का गट्ठर लिए उसके पीछे।
"रघु। एक बात बताओ।" आन्या रुकी, मुड़ी। "कल रात मेरी ऑडिट की फ़ाइल में एक पुराना स्टोर रजिस्टर अपने आप ऊपर आ गया था। ठीक उस पन्ने पर खुला, जिस पर गुलमोहर का पता छपा था। मैंने वो रजिस्टर माँगा भी नहीं था। और आज सुबह, ठीक उसी पल जब मुझे उसकी ज़रूरत थी, मेरे हाथ में वो पता था जिसने एपेक्स का सारा खेल ख़त्म कर दिया।"
"क़िस्मत होगी, मैडम," रघु ने नज़र झुकाए कहा।
"क़िस्मत।" आन्या उसके क़रीब आई, एक क़दम, फिर एक और, इतने पास कि उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट थी। "तुम्हारी क़िस्मत बहुत मेहनती है, रघु। मेरे लिए दरवाज़े खोलती है, चोर पकड़ती है, सबूत मेरी मेज़ पर रख जाती है, और कभी, कभी सामने नहीं आती।"
रघु ने सिर उठाया। और एक पल, बस एक पल, दोनों इतने पास थे कि गलियारे की वो ठंडी हवा भी उनके बीच नहीं आ रही थी। आन्या की नज़र उसकी आँखों में थी, उस पहेली पर जो हल नहीं हो रही थी। और रघु के सीने में वो चीज़ फिर हिली, जिसे वो हर बार नज़रअंदाज़ करता था और हर बार वो पहले से थोड़ी ज़्यादा हो जाती थी।
"एक दिन," आन्या ने बहुत धीरे कहा, "मैं इस क़िस्मत का चेहरा देखूँगी, रघु।"
फिर उसने ख़ुद को पीछे खींचा, एक झटके से, जैसे कोई किनारे पर रुक कर ख़ुद को गिरने से रोक ले, और तेज़ क़दमों से चली गई।
रघु ने उसके जाते क़दमों को देखा। फिर उन फ़ाइलों को, जो असल में उसके अपने महल का हिसाब थीं। और बहुत धीरे, इतने धीरे कि सिर्फ़ हवा सुने, उसने कहा।
"क़िस्मत नहीं, मैडम। मालिक। इस घर की हर अच्छी बात के पीछे यही एक मालिक खड़ा है। बस आप ग़लत आदमी को मालिक समझती हैं।"
उसी दोपहर, करण के दफ़्तर में, पर्दे खिंचे थे।
करण कमरे में चक्कर काट रहा था, और उसके सामने, हाथ पीछे बाँधे, खड़ा था भनोट। होटल का सिक्योरिटी और पर्सनल इंचार्ज। सपाट चेहरा, ठंडी आँखें, करण का अपना शिकारी कुत्ता।
"तीन बार, भनोट। तीन बार।" करण ने उँगलियाँ गिनाईं। "पहले फूल के बिल। बारह साल किसी ने नहीं पूछा, और जैसे ही ऑडिट शुरू हुआ, सीधा गुलमोहर पर हाथ। फिर अल-रशीद। वो सौदा डूब चुका था, मरा हुआ था, और किसी ने आख़िरी पल में उसे बचा लिया। और अब एपेक्स। पैदा होने से पहले मर गया, और आन्या के हाथ में आंधेरी का पता ऐसे आ गया जैसे किसी ने रकाबी में रख कर दिया हो।"
भनोट चुप रहा।
"कोई अंदर है।" करण रुका, आवाज़ धीमी और ज़हरीली। "कोई इस होटल के अंदर बैठ कर मुझे काट रहा है, और आन्या को खिला रहा है। एक चूहा। मेरे ही अनाज में।"
"मैडम कपूर ख़ुद तेज़ हैं, साहब," भनोट ने कहा। "हो सकता है..."
"नहीं।" करण ने सिर हिलाया। "आन्या तेज़ है, पर आन्या को इस इमारत के अंदर के रास्ते नहीं पता। उसे कोई रास्ता दिखा रहा है। पुराना स्टोर रजिस्टर अपने आप किसी की मेज़ पर नहीं चढ़ता, भनोट। कोई चढ़ा रहा है। अंदर का आदमी, जो हर दरवाज़ा जानता है।"
करण कुर्सी पर बैठा, उँगलियाँ मेज़ पर ठोकता हुआ। "तो हम चूहे को बिल से बाहर बुलाएँगे। एक झूठा काग़ज़ बना। एक नया सप्लायर, मोटा माल, ऐसा लालच कि कोई भी चूहा अपने आप को रोक न पाए। और उसे ऐसी जगह रख, जहाँ सिर्फ़ ताक-झाँक करने वाला पहुँचे। फिर देखते हैं, कौन उसे आन्या तक ले जाता है।"
"और जब वो ले जाएगा?"
"तब उसका हिसाब मैं ख़ुद करूँगा।"
करण फिर उठा, फिर चक्कर काटने लगा। पर इस बार उसके माथे पर एक नई शिकन थी, एक नया ख़याल जो आहिस्ता आहिस्ता शक्ल ले रहा था। वो रुका।
"रुक, भनोट।" उसकी आँखें सिकुड़ीं। "एक चेहरा है। हर बार। सोच। अल-रशीद के कमरे में, जिस दिन सौदा बचा, कोने में कॉफ़ी की ट्रे लिए कौन खड़ा था? आज मीटिंग के बाहर, जिस दिन एपेक्स मरा, फ़ाइल लिए कौन खड़ा था? पापा ने जिसे भरी महफ़िल में थप्पड़ मार कर निकाल दिया था, और जो फिर भी इस होटल से जोंक की तरह चिपका रहा, कौन है वो?"
भनोट ने एक भौंह उठाई। "वो... झाड़ू वाला? राघु?"
"वही झाड़ू वाला।" करण की आवाज़ बहुत शांत हो गई, और शांत करण सबसे ख़तरनाक करण था। "जहाँ कुछ सही होता है, राघु वहीं खड़ा होता है। हमेशा पास। हमेशा चुप। हमेशा बस... कॉफ़ी देता हुआ। मैंने आज तक उसकी आँखों में देखा भी नहीं, भनोट। किसी ने नहीं देखा। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी चालाकी थी।"
करण मेज़ पर झुका।
"उस स्टाफ़िंग एजेंसी को फ़ोन लगा जिसने उसे भेजा था। अभी। मुझे राघु का पूरा रिकॉर्ड चाहिए। असली नाम, पहले कहाँ काम किया, घर कहाँ है, बाप कौन है, सब। और हर नए नौकर का काग़ज़ खंगाल, पर सबसे पहले उसका।" करण की आवाज़ बर्फ़ से भी ठंडी हो गई। "और भनोट... अगर उसके एक भी काग़ज़ में एक भी झूठ निकला, तो उसे इस होटल से निकालेंगे नहीं। उसे इस होटल में गाड़ देंगे।"
भनोट ने सिर हिलाया, जेब से फ़ोन निकाला, और एजेंसी का नंबर मिलाने लगा।
और इम्पीरियल की उन्हीं दीवारों में, जिनके कानों ने बारह साल से रघु को हर राज़ चुपके से दिया था, आज पहली बार एक कान उसकी तरफ़ मुड़ गया था। जो सबसे अच्छा सुनता था, अब वही सुना जाने वाला था। शिकारी, जो ख़ुद को इस महल का सबसे बड़ा समझता था, एक चूहा ढूँढने निकला था, और उसे नहीं पता था कि जिस चूहे के पीछे वो पड़ा है, वो इस पूरे महल का असली बिल्ला है।
पर इस बार दीवारों के कान, रघु की तरफ़ नहीं, रघु के ख़िलाफ़ खुले थे।
दूसरी तरफ़ घंटी बजी, और एक थकी आवाज़ ने कहा, "हैलो, एम्पायर स्टाफ़िंग एजेंसी।"
भनोट ने रघु का नाम लिया।
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