अध्याय 14 / 15
बाप का नाम
नौकर नहीं मालिक द्वारा Avni Oberoi
उस रात की आग बुझ जाती है, पर शौर्य दादी और आन्या को अपने बदन से बचाते हुए ख़ुद ज़ख़्मी हो जाता है। पन्ना जल चुका है, फिर भी सच बच जाता है, शौर्य ने उसकी तस्वीर पहले ले ली थी, बृज का इक़बाल बोर्ड के रिकॉर्ड पर है, और दादी गवाह बन जाती हैं। बारह साल बाद देवराज प्रताप का नाम क़ानूनन साफ़ होता है। पूरी ताक़त पा कर भी शौर्य सब राख करने के बजाय इम्पीरियल को बचाता है, चार सौ की छत रखता है, दादी को माफ़ करता है। पर फ़ाइल में एक तीसरा नाम छिपा है, वो आदमी जिसे आग से सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ।
राख दो तरह की होती है। एक वो, जो किसी चीज़ के जल जाने के बाद बचती है। और एक वो, जो किसी के सीने में बरसों जमा रहती है, बिना किसी लौ के। उस अँधेरे बोर्डरूम में, उस एक पल में, दोनों एक साथ हवा में तैर रही थीं।
फिर छत बोल पड़ी।
बारह साल पहले इसी होटल की सबसे ऊँची मंज़िल पर जब आग जागी थी, तो छत चुप रही थी, क्योंकि सहगल के बाप ने उसी कटौती में छिड़काव-यंत्रों के तार भी कटवा दिए थे। पर आज इम्पीरियल की छत ने पहली बार अपना फ़र्ज़ निभाया। पानी की एक ठंडी बौछार, जैसे ये इमारत आख़िरकार उस चीज़ पर रो पड़ी हो जो उसने बारह साल पहले चुपचाप निगल ली थी। परदे की वो भूखी लौ एक हिचकी में बुझ गई। आग हार चुकी थी। इस बार इमारत ने उसे जीतने नहीं दिया।
लाल आपातकालीन रोशनी काँपती हुई लौटी, और उस गीली, धुँधली चमक में कमरा धीरे-धीरे साफ़ हुआ।
आन्या घुटनों के बल फ़र्श पर थी, हथेलियाँ जलन से सुन्न, और उसके कानों में अब भी वो आवाज़ गूँज रही थी। काँच के टूटने की लंबी चरमराहट, और उसके बाद किसी के संगमरमर पर गिरने की वो गहरी धमक। अँधेरे में, धुएँ की उस काली दीवार के पीछे, कोई गिरा था। और उसे नहीं पता था कौन।
"शौर्य?" उसने पुकारा, पर धुएँ ने उसकी आवाज़ निगल ली। "शौर्य!"
जो हुआ था, वो अँधेरे में हुआ था, एक साँस में। शौर्य ने धुएँ में करण तक पहुँच कर दादी की कलाई एक झटके में छुड़ा ली थी, और दादी को, और उनके पीछे आन्या को, उस काँच की दीवार से परे धकेल दिया था। करण लड़खड़ाया, और दोनों उस ऊँची दीवार से जा भिड़े। दीवार चटकी, और जिस पल वो हज़ार टुकड़ों में गिरी, शौर्य ने अपना बदन घुमा कर ख़ुद को उसके और उन दो औरतों के बीच कर लिया, ताकि गिरता काँच उन तक न पहुँचे, उस तक पहुँचे।
एक लंबे, टेढ़े टुकड़े ने उसके कंधे से कोहनी तक का कोट चीर दिया, और उसके नीचे का माँस भी। वो उसी संगमरमर पर गिरा जिस पर बारह हफ़्ते वो झुक कर औरों का गिराया उठाता रहा था। दादी की एक चीख़ शुरू हुई, और आन्या के उन्हें सीने से लगाते ही, धुएँ में कहीं कट गई। करण भी उसी काँच में गिरा था, और जब गलियारे से गार्ड और बिट्टू बौछार चीरते अंदर घुसे, तो वो भाग पाने की हालत में नहीं था। दो हाथों ने उसे फ़र्श से उठाया, इस बार किसी को आदाब बजाने के लिए नहीं।
आन्या धुएँ में घिसटती हुई शौर्य तक पहुँची। उसका कोट उसके अपने ख़ून से गहरा हो रहा था, चेहरा राख और पसीने से सना। एक पल को आन्या की साँस रुक गई, ठीक वही पल जिससे वो बारह हफ़्ते डरती आई थी।
"शौर्य।" उसकी जली हथेलियों ने उसका चेहरा थामा। "मेरी तरफ़ देखो। बोलो कुछ।"
उसकी पलकें काँपीं, खुलीं। और बारह साल जिस आदमी का पहला सवाल हमेशा उसके सबूत के बारे में होता था, उसके होंठ हिले, और जो लफ़्ज़ निकले, वो किसी पन्ने के बारे में नहीं थे।
"दादी... आन्या... तुम दोनों ठीक हो?"
आन्या की आँख से एक आँसू गिरा, राख में एक साफ़ लकीर खींचता हुआ। बारह हफ़्ते उसने एक ऐसे आदमी को खोजा था जो हर चीज़ नापता था। और आज, अपने ही ख़ून में पड़े, उसका पहला हिसाब उन दो जानों का था जिन्हें उसने बचाया था। मुखौटे के नीचे का आदमी, पहली बार, पूरा दिख गया।
"हम ठीक हैं," उसने फुसफुसाया। "तुम्हारी वजह से। अब चुप रहो।"
उस रात इम्पीरियल सोया नहीं। बोर्डरूम सील हो चुका था, और होटल के अपने छोटे से दवाख़ाने में शौर्य के कंधे पर पट्टी बँध रही थी। सत्रह टाँके, जिन्हें गिनते हुए आन्या के होंठ कसे रहे।
दादी एक कोने में बैठी थीं, छड़ी पर दोनों हाथ, चेहरे पर उस इंसान का दर्द जिसने जीत के बीच कुछ बहुत क़ीमती खो दिया हो।
"वो जल गया," उन्होंने आख़िरकार कहा। "बारह साल मैंने जिसे एक काले बक्से में संभाला, वो मेरी आँखों के सामने राख हो गया। उस पन्ने के बिना ये सब सिर्फ़ एक कहानी है, बेटा। एक भूत।"
फिर आन्या उठी, उसकी पट्टी बँधी हथेलियों में उसका फ़ोन था, और चेहरे पर वो थका इत्मीनान जो किसी अच्छे मैनेजर के पास तभी होता है जब उसने सबसे बुरी घड़ी के लिए पहले से एक रास्ता रख छोड़ा हो।
"दादी जी," उसने फ़ोन उनकी तरफ़ घुमाया। "काग़ज़ जल गया। पन्ना नहीं।"
दादी की धुँधली आँखें उस चमकती स्क्रीन पर टिकीं। उस पर वही पन्ना था, पूरा, साफ़, हर लाइन पढ़ी जा सकती थी, हर मोहर, हर दस्तख़त।
"और जानती हैं, दादी, इसने क्या किया?" आन्या ने कहा। "जिस पल आपने वो बक्सा खोला और पन्ना मेज़ पर रखा, उससे पहले कि बृज उसे पढ़ कर ख़त्म करता, इसने मेज़ के उस पार से उसकी हर लाइन की तस्वीर ले ली, और उसी पल उसे इस इमारत से बाहर, एक ऐसी जगह भेज दिया जहाँ करण का कोई लाइटर नहीं पहुँचता। तब तो मैं उस कमरे में दाख़िल भी नहीं हुई थी।"
शौर्य ने पट्टी बँधे कंधे से धीरे से कहा, "जिस सबूत को एक माचिस की तीली ख़त्म कर सके, वो सबूत नहीं होता, दादी। मैंने ये पन्ना इसलिए ढूँढा कि इसका सच इतनी जगह पहुँच जाए कि फिर कोई आग उसे वापस न ले सके। काग़ज़ जलने के लिए बना था। सच नहीं।"
"और सिर्फ़ तस्वीर नहीं," आन्या ने कहा। "आज की बैठक औपचारिक थी, उसकी कार्यवाही दर्ज होती है। पूरे बोर्ड के सामने, रिकॉर्ड पर, बृज सहगल ने अपने मुँह से कहा कि उस रात आग किसके हुक्म पर लगी और देवराज प्रताप को किसने फँसाया। वो शब्द अब किसी काले बक्से में बंद नहीं हैं।"
शौर्य ने दादी की तरफ़ देखा। "और एक तीसरी चीज़, जो किसी तस्वीर से बड़ी है। एक ज़िंदा गवाह। आप। एक जली राख अदालत में चुप रहती है, दादी। पर एक सहगल, जो अपने ही ख़ानदान के ख़िलाफ़ सच कहने खड़ा हो, उसे कोई वकील नहीं काट सकता।"
दादी बहुत देर उस तस्वीर को देखती रहीं। फिर उनकी झुर्रियों में कुछ ढीला पड़ा।
"तो मैं बारह साल एक राख की पहरेदारी करती रही," उन्होंने धीरे से कहा, "और तुमने उसकी रौशनी पहले ही चुरा कर महफ़ूज़ कर ली।"
"आपने उसे बचाया, दादी। बारह साल। अगर आप उस रात उसे जला देतीं, तो आज किसी तस्वीर के लिए कुछ बचता ही नहीं। राख आपकी वजह से सच बनी।"
एक तस्वीर, एक दर्ज आवाज़, और एक बूढ़ी औरत की गवाही, तीनों मिल कर क़ानून को, जो बारह साल आँख मूँदे बैठा था, आँख खोलने पर मजबूर कर देती हैं। वो पुरानी, सीलबंद फ़ाइल, जिसे बारह साल पहले एक तेज़ ब्लेड और एक भारी रिश्वत ने चुप कराया था, दोबारा खुल गई। इस बार उसे चुप कराने वाला कोई नहीं था, क्योंकि जिस ख़ानदान के पास उसे दबाने का पैसा था, उसी का मुखिया अपने मुँह से सब कबूल चुका था।
हफ़्तों बाद, उसी शहर के एक अदालती कमरे में, एक जज ने वो फ़ैसला पढ़ा जो बारह साल देर से आया था। इम्पीरियल की उद्घाटन-रात की आग एक हादसा नहीं, एक साज़िश थी, और उसका सारा इल्ज़ाम जान-बूझ कर एक बेगुनाह साझेदार पर मढ़ा गया, जिसने उसी घातक कटौती के ख़िलाफ़ बार-बार लिख कर चेताया था।
देवराज प्रताप, मरणोपरांत, बेगुनाह।
ये शब्द पढ़े गए, तो शौर्य प्रताप ने कोई आवाज़ नहीं की। उसने सिर्फ़ अपनी जेब से एक चीज़ निकाली, पीतल का एक छोटा, घिसा हुआ टुकड़ा, जो कभी इम्पीरियल की नींव की पट्टिका से, उसके बाप के नाम वाले हिस्से से, किसी ने छेनी मार कर अलग कर दिया था। बारह साल वो उसकी जेब में रहा था, एक अधूरे नाम की तरह। आज वो उसे उँगलियों में घुमाता रहा, और पहली बार उसका वज़न हलका लगा।
बाहर, सहगल का नाम उसी तरह उछला जिस तरह बारह साल पहले देवराज का उछला था। बृज पर साज़िश और सबूत छुपाने का मुक़दमा चला, करण पर खातों की हेराफेरी और उस रात बोर्डरूम में आग लगाने का। जिस क़ानून को सहगल बारह साल अपनी जेब में रखते आए थे, वो आज उनके सामने खड़ा था।
"तुम्हारे बाप का नाम साफ़ हो गया, शौर्य।" आन्या अदालत की सीढ़ियों पर उसके पास खड़ी थी। "आज पूरे शहर ने सुना, देवराज प्रताप बेगुनाह था।"
शौर्य ने वो पीतल का टुकड़ा मुट्ठी में बंद किया। "बाप का नाम," उसने धीरे से कहा। "बारह साल मैंने सोचा था कि जिस दिन ये नाम साफ़ होगा, मेरे अंदर की वो आग बुझ जाएगी। पर वो बुझी नहीं, आन्या। बस... हलकी हो गई। जैसे किसी ने उसके नीचे से लकड़ी हटा ली हो।"
जीत का असली इम्तिहान ये नहीं कि आदमी क्या पा सकता है। वो ये है कि जब सब कुछ पाने की ताक़त उसके हाथ में हो, और रोकने वाला कोई न बचे, तो वो क्या बन जाता है।
इम्पीरियल की सबसे ऊँची मंज़िल का वो दफ़्तर, जो कभी बृज सहगल का था, अब किसी और के नाम पर खुलता था। मेज़ पर खन्ना ने काग़ज़ों के दो ढेर रखे। आन्या दरवाज़े के पास चुपचाप खड़ी थी, रोकने नहीं, सिर्फ़ देखने।
"पहला रास्ता, सर।" खन्ना का स्वर सपाट था। "आप बहुमत लेनदार हैं, और अब अदालती तौर पर देवराज प्रताप के वारिस। चाहें तो आज ही पूरा क़र्ज़ भुना सकते हैं। सहगल की हर परिसंपत्ति नीलाम, ये इमारत किसी विदेशी फ़ंड को बेच कर लागत का तिगुना वसूल। बृज और करण जेल में, पूरा ख़ानदान सड़क पर। बारह साल का हिसाब, एक दस्तख़त में पूरा।"
शौर्य ने वो पहला ढेर देखा। बारह साल जिस पल के लिए उसने हर रात बुनी थी, वो अब एक क़लम की नोक पर रखा था। एक दस्तख़त, और जिस महल ने उसके बाप को निगला था, वो उसके पैरों के नीचे राख हो जाता।
"और दूसरा रास्ता?"
"दूसरा कारोबार की नज़र से बेवक़ूफ़ी है, सर।" खन्ना ने झिझकते हुए दूसरा ढेर बढ़ाया। "आप क़र्ज़ भुनाने के बजाय होटल को बचाते हैं, इसे दोबारा खड़ा करते हैं, स्टाफ़ रखते हैं। मालिक बनते हैं, हमलावर नहीं। मुनाफ़ा सालों में आएगा, अगर आया तो। ईमानदारी से कहूँ, कोई समझदार आदमी पहला रास्ता चुनेगा।"
शौर्य देर तक खिड़की के बाहर उस लॉबी की छत की तरफ़ देखता रहा, जिसके नीचे चार सौ लोग बिना जाने काम कर रहे थे कि उनकी छत एक क़लम की नोक पर टिकी है। फेकू काका, जिसने इस नींव की पहली ईंट उठाई थी। बिट्टू, जो उसे भाई कहता था।
"मेरे बाप ने ये होटल बनाया था, खन्ना। अपने हाथ से, एक-एक ईंट। सहगल के बाप ने इसे एक झूठ की बुनियाद पर हड़पा। अगर आज मैं इसे गिरा कर, इसके चार सौ लोगों को सड़क पर डाल कर अपना तिगुना वसूल करूँ, तो मुझमें और उस आदमी में फ़र्क़ क्या रहा जिसने बारह साल पहले मुनाफ़े के लिए तार कटवाए थे?"
उसने पहले ढेर को परे सरका दिया।
"बदला आसान है। एक दस्तख़त, और सब राख। पर राख से मैं बारह साल पहले निकला था, उसी में लौटने नहीं आया।" उसने दूसरा ढेर खींचा। "ये होटल गिरेगा नहीं। ये खड़ा होगा, अपने सही नाम पर। और इसकी हर छत, उन चार सौ के सिर पर, बनी रहेगी। यही मेरा बाप चाहता।"
खन्ना ने धीरे से सिर हिलाया, उस आदमी की तरह जो बारह साल इस ख़ानदान के लिए काम करता आया, और आज पहली बार किसी मालिक से सिर ऊँचा कर के लौट रहा था।
मेज़ पर एक और काग़ज़ था, सबसे नीचे, जैसे खन्ना जानता हो कि ये सबसे भारी है। "और दादी, सर? वो भी सहगल हैं। उन्होंने बारह साल वो सबूत छुपाए रखा। चाहें तो मुक़दमे में उनका नाम भी..."
"नहीं।" शौर्य की आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी। "उस सबूत को छुपाने वाला उनका पति था। उन्होंने तो उसे बचाया, इस उम्मीद में कि एक दिन वो किसी बेगुनाह के काम आए। और जिस दिन उसका वक़्त आया, उन्होंने अपने ही बेटे के ख़िलाफ़ उसे मेज़ पर रख दिया। जिस घर में सब झूठ के साथ खड़े थे, वो अकेली सच के साथ खड़ी हुईं। उन्हें इस घर में जगह मिलेगी, पूरी इज़्ज़त के साथ।"
दरवाज़े पर दादी आ खड़ी हुई थीं, और शायद ये आख़िरी वाक्य उन्होंने सुन लिया था। उनकी छड़ी एक पल को काँपी। "मैंने तेरे बाप को दफ़न होते देखा था, बेटा, और चुप रही। तू मुझे सज़ा दे सकता था। उसका तुझे पूरा हक़ था।"
शौर्य उनके पास गया, और बारह साल बाद पहली बार उसने उस बूढ़ी औरत का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया, ठीक उसी तरह जैसे उस रात उन्होंने उसकी मुट्ठी में चाबी रख कर उसके हाथ बंद किए थे।
"मेरे बाप का इंसाफ़ आपकी उसी ख़ामोशी के काले बक्से से निकला, दादी। सज़ा उसे मिलेगी जिसने झूठ बोला। आपने तो आख़िर में सच चुना, सबसे महँगी क़ीमत पर, अपने ही बेटे की क़ीमत पर। ये घर अब भी आपका है।"
दादी की धुँधली आँखें भर आईं, और बारह साल का वो काँटा, जो उनके सीने में गड़ा था, पहली बार बाहर की तरफ़ सरका।
खन्ना और दादी के जाने के बाद, उस ऊँचे दफ़्तर में सिर्फ़ दो लोग बचे, और वो बारिश वाली रात उनके बीच फिर खड़ी थी, पर इस बार उसका रंग बदला हुआ था।
आन्या आगे आई। उसकी हथेलियों की पट्टियाँ अब पतली हो चुकी थीं, पर निशान बाक़ी थे।
"बारह हफ़्ते मैं एक सवाल का जवाब ढूँढती रही," उसने कहा। "वो दीन नौकर असली था, या वो सर्द मालिक। दो चेहरे, और मैं नहीं जानती थी किससे मेरा दिल उलझा है। आज मुझे जवाब मिल गया।"
"कौन सा?"
"कोई नहीं। दोनों मुखौटे थे। एक डर का, एक ग़ुस्से का। असली आदमी वो है जिसे मैंने आज इस मेज़ पर देखा। जिसके हाथ में सब कुछ राख करने का दस्तख़त था, और जिसने उसे परे सरका दिया। तुमने बदले के बजाय इंसाफ़ चुना, शौर्य।"
उसने अपनी पट्टी बँधी हथेली बहुत धीरे से उसके पट्टी बँधे कंधे पर रखी। दो ज़ख़्म, एक ही रात के, एक ही आग के।
"उस रात तुमने अपने सबूत से पहले हमारी जान पूछी थी," उसने फुसफुसा कर कहा। "उसी पल मेरा वो टूटा भरोसा... जुड़ने लगा था। मुझे यक़ीन नहीं था। अब है।"
शौर्य ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया, उन्हीं जली हथेलियों को, जिन्होंने एक रात आग में हाथ डाल कर उसके बाप का इंसाफ़ बचाने की कोशिश की थी।
"तुमने मुझसे एक वादा लिया था। इंसाफ़, सब राख करना नहीं।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "मैं वो वादा निभा रहा हूँ, आन्या। तुम्हारे लिए नहीं। तुम्हारी वजह से। तुमने मुझे वो आदमी याद दिलाया जो मेरा बाप चाहता था कि मैं बनूँ।"
दोनों बहुत पास थे। उनके बीच की वो हवा अब न पुल थी, न दीवार। बस एक फ़ासला, जो हर साँस के साथ कम हो रहा था। पर अभी नहीं। अभी इतना ही काफ़ी था, कि दोनों जानते थे, वो फ़ासला अब बढ़ नहीं रहा।
उस रात, जब इम्पीरियल बारह साल बाद पहली बार चैन से साँस ले रहा था, शौर्य अपने नए दफ़्तर में अकेला बैठा था, और सामने वो पूरी फ़ाइल खुली थी जिसका सिर्फ़ एक पन्ना अब तक उसकी ज़िंदगी का मरकज़ रहा था। बारह साल वो एक पन्ने के पीछे भागता रहा, और आज पहली बार उसके पास उसके बाप की पूरी कहानी थी।
जिस नाम को वो बारह साल से जानता था, सहगल, वो इस कहानी का सिर्फ़ एक हाथ था। क़त्ल करने वाला हाथ। पर हर हाथ के पीछे एक दिमाग़ होता है। आग के बाद इम्पीरियल का छिना हुआ आधा हिस्सा सहगल के पास गया, ये सब जानते थे। पर उसे चलाने का पैसा सहगल के पास उस वक़्त था ही नहीं। किसी ने उन्हें उस रात के लिए पैसा दिया था, और सहगल को आगे कर के ख़ुद कभी रोशनी में क़दम नहीं रखा।
उसके बाप की पुरानी साझेदारी के काग़ज़ के आख़िरी पन्ने पर, हाशिये में, एक तीसरा दस्तख़त था। न देवराज का, न सहगल का। एक और नाम, जिसे बारह साल पहले हर सरकारी काग़ज़ से उतनी ही सफ़ाई से मिटाया गया था जितनी सफ़ाई से देवराज का। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था। देवराज का नाम सज़ा पाने के लिए मिटाया गया था। और ये नाम, बच निकलने के लिए।
शौर्य की उँगली उस दस्तख़त पर रुकी, और जीत के उस पल में उसकी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ी। सहगल ने आग को हाथ दिया था, पर उससे सबसे ज़्यादा फ़ायदा सहगल को नहीं हुआ था। सबसे बड़ा हिस्सा किसी और की जेब में गया था, चुपचाप, बारह साल पहले, और तब से वो आदमी सहगल से कहीं ऊँचा उठ चुका था। बेदाग़, बेनाम, इस पूरे खेल से कोसों दूर।
उसी रात, मुंबई के सबसे ऊँचे शीशे के एक मीनार में, जहाँ से इम्पीरियल की रोशनी नीचे किसी खिलौने की तरह दिखती थी, एक आदमी खिड़की के सामने खड़ा था, हाथ में फ़ोन। दूसरे सिरे से किसी ने अभी एक ख़बर दी थी।
"तो देवराज का बेटा ज़िंदा है," उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ में न डर था, न जल्दी। "और उसने सहगल की फ़ाइल खुलवा दी।"
दूसरी तरफ़ कोई काँपती आवाज़ कुछ कहती रही।
"सहगल कमज़ोर थे। बारह साल पहले भी, आज भी। उनका गिरना तय था।" वो आदमी हलके से मुस्कुराया, और नीचे इम्पीरियल की उस रोशनी को देखता रहा, जिसे उसने बारह साल पहले एक रात बुझते देखा था, और जिसकी राख पर उसने अपनी पूरी सल्तनत खड़ी की थी। "पर वो लड़का बारह साल एक पन्ना ढूँढता रहा। और मैं वो पूरी किताब हूँ जिससे वो पन्ना फाड़ा गया था।"
उसने फ़ोन नीचे रखा। "उस पर नज़र रखो। जिस दिन वो ऊपर देखना शुरू करे... मुझे सबसे पहले बताना।"
नीचे, इम्पीरियल जल नहीं रहा था। पहली बार बारह साल में, वो सिर्फ़ रोशन था। बाप का नाम साफ़ हो चुका था। पर जिस आदमी ने उस नाम को आग में झोंका था, उसका नाम अब भी उस रोशनी से बहुत ऊपर, अँधेरे में था।
और नीचे अपने दफ़्तर में, शौर्य प्रताप उस तीसरे दस्तख़त को देखता रहा, और समझ गया। ये जंग ख़त्म नहीं हुई थी। ये अभी शुरू हुई थी।
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